रविवार, 25 अक्तूबर 2009

आदतवश

बात तेरह साल पहले की है मेरे पड़ौस में एक परिवार रहता था उनके दो बेटे थे माँ अक्सर अपने बेटों को बात-बात पर डाँटती रहती थी डाँटते समय उनके मुख से हमेशा हरामजादा शब्द निकलता था मैं जब भी इस शब्द को सुनता तो मुझे बहुत अजीब-सा लगता था मैं सोचता कि इस शब्द का प्रयोग सचेतन हो रहा है या आदतवश ? पड़ौस से इस शब्द का प्रयोग रोज ही सुनने को मिल जाता था एक दिन मैंने उनके छोटे बेटे से पूछ ही लिया कि क्या तुम्हें हरामजादे शब्द का मतलब मालूम है जो आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था उसने अनभिज्ञता व्यक्त की मैंने उसे कहा, ठीक है ! इस बार आंटी जब आप को यह गाली दे तो उनसे पूछना कि हरामजादे का मतलब क्या होता है छोटे बेटे ने वैसा ही किया कुछ असर दिखाई पड़ा पड़ौस से अब हरामजादे की आवाज़े बहुत कम सुनाई देने लगी थी

व्यवहार में हम कितने ही शब्दों का प्रयोग आदतवश करते हैं, बिना यह सोचे विचारे की कि जिन शब्दों का हम प्रयोग कर रहें हैं, उनका मतलब क्या है ? क्या यह सचेतन जीना है ?

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

प्रेम

तुम्हारी सांसों में
वही बसता है जो मेरी सांसों में
अनंत विस्तार में टूटा यह जीवन
प्रेम की आंखों से बंधा यह जीवन
द्वैत में नहीं वह जीवन आधार
अद्वैत में है वह आकार निराकार

तुम मुझ से पृथक नहीं
इस अनुभूति में है प्रेम

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

उस दिन जिंदगी हार गई

अभी तो मुश्किल से
सत्रह बरस भी पूरे नहीं किए थे
और जिंदगी को यूं खत्म कर लिया
क्यों ... क्यों... क्यों ?

बार-बार अब भी पूछता रहता हूँ
बीस साल बीतने पर भी
नहीं भूला हूँ उस ह्रदय विदारक घटना को
जब तुमने उस सत्रह बरस की
कोमल काया को समाप्त कर लिया

शायद वो तुम्हारा निर्णय न रहा हो
तुम्हें उकसाया गया होगा
तुम्हें फुसलाया गया होगा
तुम्हें जीने के मोह से भटकाया गया होगा
समझ ही कहां रही होगी
जीने का मतलब ही कब जाना था

या वो दिन ही ऐसे रहे होंगे
जब मां-बाप की बेटे की चाहत ने
तुम तीनों बहनों को
हिला कर रख दिया होगा
अब तक जिन्हें नाज़ों से पाला गया था
जिनके लिए तुम सब बेटों के बराबर थी
उनके मनों में कहीं गहरे में बेटे की चाहत दबी थी
और प्रकृति ने भी अज़ब लीला रची थी
सोलह बरस बाद तुम्हारी मां की गोद फिर से हरी हुई थी
और कोख़ में बेटा दिया ...

तुम तीनों ने बहुत समझाया होगा
अपने मां-बाप को
कि नहीं चाहिए तुम्हें भाई
कि तुम सब हो उनकी पुत्रवत बेटियाँ
फिर पुत्र क्यों ?


सबसे पहले विरोध के स्वर बड़ी बेटी में उपजे
उसने मां को समझाया, नहीं चाहिए उन्हे भाई
मां-बाप और बेटियों में इस पर लम्बी बहसें हुई होंगी
पर नहीं झूके मां-बाप बेटियों की जिद्द पर
और बेटे को पलने दिया कोख में
नहीं था अहसास उन्हें बढ़ रहे घातक विरोध के परिणाम का

एक दिन बड़ी बेटी ने
कोशिश की अपनी जान लेने की
बचा लिया गया तब किसी तरह उसे
फिर तुम तीनों ने एक मन बनाया
मां बाप से मूक-बधिर बन गई
विद्रोह धीरे-धीरे बढ़ता गया
कोख में जीवन बढ़ता गया
इधर तुम्हारा जीवन-दर्शन जीवन विरोधी होता गया
जीने की तृष्णा जो कभी मिटती नहीं देखी गई
तुम्हारे लिए भारी हो गई
एक जीवन तुम तीनों पर भारी पड़ा

क्यों तुमने सोचा
कि भाई के आ जाने पर तुम
उपेक्षित हो जाओगी
और क्यों परवाह की जमाने की
कि इतने बरस बाद कैसे दोगी ख़बर
भाई के आने की
आस-पड़ौस और स्कूल कॉलेज़ के दोस्तों को
क्यों इस प्राकृतिक तथ्य को
सहजता से न लिया ?
और जीवन-संघर्ष से हार मान ली
शायद -
उपहास बर्दास्त नहीं होता तुम्हें
पर तुम्हारा आत्म-सम्मान कहीं बड़ा था जीवन से


और वह दिन आया
जब एक नये जीव ने संसार में आँखें खोली
और तुम तीनों ने जीवन से आँखे मूँद ली
एक साथ, तीनों में से एक भी नहीं डिगी
कितनी सामूहिक संकल्प शक्ति रही होगी
तुम तीनों में ,जब झूल गई फंदों पर एकसाथ ...
यह बदले की आग थी या
लड़की होने की दहशत ?
विश्व के पर्दे पर यह घटना बहुत बड़ी घटना बनके उभरी

मैं आज भी आहत हूँ
उस घटना से ...
बीस बरस बाद भी ।

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

दिवाली के दिन



दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ
यह दीपावली आप सब के जीवन में लाए
खुशियाँ अपार
धन-सुख समृद्धि बढ़े अपार
रहे जीवन आपका जगमगाता
हर दम हर पल
.................................................................................................


अक्सर दिवाली या तो मंगलवार को आती है या शुक्रवार को । इसी संदर्भ में हमारे लोक-जीवन में मान्यता रही है कि :-

मंगल को आए दिवाली
तो हँसे किसान
रोये व्यापारी 

और
शुक्र को आए दिवाली
तो हँसे व्यापारी और
रोये काश्तकारी

लेकिन इस बार तो दिवाली न मंगलवार की है, न शुक्रवार की ।
क्या इस रहस्य को आप खोलेंगे कि आज दिवाली शनिवार को क्यों हैं ?

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

देहरी पर

जीवन यह सारा
देहरी पर ही बीत गया
बाहर की बहुत पूजा प्रार्थना की
अंदर के देवता से पहचान न हुई
ऐसी प्रणति हमारी
बाहर देवता को पुष्प चढ़ाए
अंदर के देवता सम्मुख न झुके
मैं के मद में जीवन देहरी पर ही ठहरा रहा
वहां भीतर देवता स्थिर सनातन
बिन नैवद्य के सदा पूरा रहा
मैं इधर देहरी पर आधा अधूरा
रिक्त होता रहा, जीवन कणों से

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

सत्य

सत्य
न नया है न पुराना
न अपना है न पराया
न दिखावा है न बहाना
न लुभावना है न डरावना
न प्रचारक है न भ्रामक

वह तो अनुभव की अग्नि में
जल कर तप्त हुआ
निखरा हुआ
कुंदन है
जो बहुत से सत्यों में
अकेला अलग सा पहचाना गया

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

अश्रु

वह
ह्रदय की
मृदु भूमि में
दफ़न करती रही
कोमल बीज भावनाओं को और
मृदु हिय भूमि मरु बनती रही

एक रोज प्रेम की
वर्षा हुई
ह्रदय की मरु भूमि
फिर से मृदु हुई
समझ की हवाओं से
विश्वास की उष्मा से
दमित भाव
अंकुरित हो उठे
और
अश्रु बन आँख से
झरने लगे

आंखे जो पत्थरा गई थी
दमन से, प्रताड़ना से और द्वंद्व से
धुल गई एक ही फुहार में
और देख पा रही हैं
जीवन को आज नए ढ़ंग से ...

अंतस का समाधान

कल की पोस्ट में मैंने समस्या और समाधान के बारे में बात करते हुए लिखा था कि मनुज की कोई भी समस्या स्वयं उसके जीवन से बड़ी नहीं हो सकती इस संदर्भ में चंद्र मोहन गुप्त जी ने पूछा है कि " पर हमारी समस्या यह है कि यदि इन्सान, जैसा कि प्रायः होता है, जान-बुझ कर पैसा कमाने के लालच में समस्याएं खड़ी करता है. इसका क्या समाधान है ? क्या पैसा देकर ही काम कराया जाये ? यदि शिकायत करते हैं तो उनका मिला-जुला ग्रुप भविष्य में तरह-तरह से परेशान करता है, और परिणाम स्वरुप केवल ज्यादा आर्थिक हानि उठानी पड़ती है, बल्कि कानूनी पेचीदगियों में भी उलझा दिए जाते हैं.......मतलब कि " बैल मुझे मार" जैसी हालत कर बैठते है............. इस पर थोडा प्रकाश डालें... "

किसी समस्या को देखने के दो दृष्टिकोण हैं : एक दृष्टिकोण व्यवहारिक है, जिसे सांसारिक दृष्टिकोण कहा गया है और दूसरा उपाय अंदर का है, जिसे आध्यात्मिक उपाय कहा गया है सांसारिक दृष्टिकोण या व्यवहारिक दृष्टिकोण में समस्या के पहलूओं को सांसारिक ढ़ंग से देखा जाता है संसार के प्रचलित कायदे-कानून और दोहरे मापदंड इसमें दिखाई पड़ते हैं इस दृष्टि का विचार रखने वाले व्यक्ति का स्वयं का कोई विचार नहीं होता ऐसे व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति के साथ बदल जाते हैं आप के सम्मुख आप के जैसी बात, तो किसी अन्य के सम्मुख उस जैसी बात ऐसे लोगों का दायरा तो बहुत बड़ा होता है, पर वस्तुत: इनका व्यवहार इनके अंतस के अनुसार होकर अन्य लोगों की इच्छा तुष्टि का होता है फिर चाहे उन्हें अपनी बात को कितनी ही बार और कितने ही लोगों के सम्मुख बदल-बदलकर रखना पड़े ये अपने स्वार्थ और दूसरे की तुष्टि के लिए कभी स्वयं के अंतस का मंतव्य नहीं रखेंगे ऐसे लोगों को ही हम व्यवहारिक कहते हैं अब आपने जिस समस्या का संदर्भ दिया है, उस समस्या को पैदा करने वाले ऐसे लोग ही हैं समय के हर चक्र में, हर युग में सांसारिकता ऐसे ही चलती आई है लेकिन आध्यात्म में प्यास रखनेवाले व्यक्ति इस व्यवहारिकता से ऊपर उठते हैं और अपने मन और उसकी चालाकियों का अध्ययन शुरु करते हैं । उसके प्रति सजग होते हैं धीरे-धीरे उन्हें मन की चालबाजियाँ समझ में आने लगती हैं मन ही दौड़ाता है फिर मन से पार भावों पर नज़र जाती है, कि भाव कहां से और कैसे पैदा हो रहें हैं ? भावों के पार भी अंदर एक और सत्ता का अनुभव होता है जो सिर्फ चीजों को घटते हुए निरपेक्ष भाव से देखती है और कोई धारणा वह नहीं बनाती इसे ही द्रष्टा या अंतस- चेतना अथवा आत्मा कहा गया है

अब समस्या यह है कि बाहर की जिन समस्याओं की आपने बात की, उनका संबंध केवल आपसे नहीं है, बल्कि उसमें बाहर के बहुत से लोग शामिल हैं और आप बाहर के इन लोगों को बदल नहीं सकते लेकिन आपकी अपेक्षा होती है कि दूसरे लोग आपकी अपेक्षानुरूप व्यवहार करें लेकिन यह संभव नहीं दूसरों से की गई अपेक्षा जब पूरी नहीं होती तो दुख होता है, क्षोभ होता है वस्तुत:
अपेक्षा दुख के अतिरिक्त कुछ नहीं देती

लेकिन हम स्वयं को बदल सकते हैं
यात्रा को हम बाहर से अंदर की ओर मोड़ सकते हैं हम संसार के हर अनुभव से सीखें और स्वयं को इतना संवेदनशील बना लें कि बाहर की हर घटना के प्रति सजग रहें, तो धीरे-धीरे हम अंदर की ओर गमन करना शुरु करेंगे और चीजों को देखने का एक नया दृष्टिकोण विकसित होगा

लेकिन आपकी समस्या अभी भी ज्यों की त्यों है ? इसके लिए आप अभिनेता हो जाइए संसार को इस तरह से जिएं जैसे कि आप इसमें एक अभिनेता से अधिक कुछ नहीं हैं मात्र एक अभिनेता हैं जो संसार रूपी मंच पर अपनी भूमिका कथा के अनुसार निभा रहा है लेकिन अंदर का होश निरंतर बना रहे धीरे-धीरे आप कर्ता भाव से मुक्त हो जाएंगे और संसार की समस्याएँ, जो सदा से हैं और सदा रहेंगी, आपको दुखी और परेशान नहीं करेंगी , क्योंकि आप समस्या में शामिल नहीं होते
समस्या अलग होती है और आप अलग होते हैं । आपको समस्या का परम समाधान मिल चुका होता है ।

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

समस्या और समाधान


समस्याएँ हरेक के जीवन में आती हैं समस्याएँ हैं तो उनके कुछ कारण भी होते हैं और यदि कारण हैं, तो उनको दूर करने का उपाय भी है समस्याओं के समाधान के लिए जरुरी है कि समस्या को ठीक से समझें समस्या को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ तथ्यों की पूरी जानकारी लीजिए एक बार आप समस्या के मूल कारणों को जान लेते हैं, तो उनके निदान के उपाय भी दिखाई देने लगते हैं

समस्या समाधान में व्यक्ति की मौलिक विशेषताएँ जैसे उसका चीजों को देखने का दृष्टिकोण, धैर्य शक्ति, विवेक-बोध और चिंतन की गहराई तथा चीज़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करने का ढ़ंग उसे अन्य लोगों से अलग करता है

एक ही समस्या को भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न ढ़ंग से लेते हैं । जीवन में आने वाली समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए बल्कि उनका विश्लेषण, संश्लेषण कर उनके कारणों को जानना चाहिए और कारणों को जान कर उन कारणों को हटाने का उपाय करना चाहिए इसके लिए अंतर्विवेक से काम लीजिए आप निश्चित ही समस्या का समाधान पा लेंगे कोई भी समस्या मनुज से बड़ी नहीं है जीवन में आई हर समस्या का समाधान है

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

दुख

मिट्टी का घड़ा
आग में पकाया
न गया हो
तो क्या
पानी उसमें ठहर पाएगा

जीवन का घड़ा
दुख की अग्नि में पकाया
न गया हो
तो क्या
वह आनंद का पात्र
बन पाएगा

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

ज्ञान

ज्ञान जब आदत बन जाता है, तो व्यर्थ हो जाता है ।
ज्ञान आदत में नहीं है, बल्कि सजगता का फल है ।
ज्ञान जब तृप्ति देता है, तो पूर्ण होता है ।
पूर्ण ज्ञान अपूर्णता के द्वार न खोले तो वह बंधन है ।
ज्ञान इंद्रिय-अनुभव है, पर हर ज्ञान अनुभव नहीं है ।
सत्य का अनुभव पहले होता है, तब वह ज्ञान बनता है ।
एक ही अनुभव बार-बार नहीं होता, हर अनुभव अद्वितीय है ।
हर अनुभव का ज्ञान अनूठा है ।
एक ही अनुभव की बार-बार कल्पना करना अज्ञानता है ।
क्योंकि कोई भी अनुभव पुनरावृत्त नहीं होता ।
जो पुनरावृत्त हो वह ज्ञान नहीं ।
ज्ञान हर पल नया होता है ।
आदत अज्ञानता है क्योंकि वह नये के लिए बंधन है ।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

सांस साज़ और साथ

सांस आती जाती है एक लय में
रास आती जाती है जिंदगी एक वय में

खास बात होती है जिंदगी एक साथ में
साथ सांसों सा हो तो जिंदगी एक साद है

साथों में ढ़ूँढ़ते हैं हम जिंदगी का राग
बातों में खोजते हैं हम जिंदगी का राज

साथ मिल जाए गर उस माशूके मजाजी का
साज़ जिसका मेरे नगमें पर करे आशिकी हकीकत

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

क्षण-क्षण जीना

रोज़ रात
मैं
मर जाता हूँ
आज के
अच्छे-बुरे
विशेषणों से
ताकि
रोज़ सबेरे
मैं
जिंदा रहूँ
आज के
क्षण-क्षण में

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

ऊबा हुआ आदमी

आदमी
अपनी जिंदगी से
इतना
ऊब गया है कि
दूसरों की जिंदगी में
तांक-झांक
करने के लिए
बनाता है खिड़कियाँ
जैसे
यही एकमात्र सुख
बचा हो
उसकी जिंदगी मे

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

विश्वासघात

घात कोई भी हो, पीड़ा तो देता ही है पर सबसे बड़ा घात है विश्वास में घात विश्वासघात की पीड़ा को वही जान सकता है, जिसने इसे भोगा हो

विश्वास सब संबंधों की नींव है जितना बड़ा संबंध होता है वहां उतना ही ज्यादा विश्वास होता है कहा जाता है जितना ज्यादा विश्वास होता है ; उतना ही ज्यादा उन संबंधों में प्रेम होता है और जब प्रेम किसी से होता है तो विश्वास स्वमेव जाता है विश्वास प्रेम की छाया है जहां प्रेम नहीं वहां विश्वास भी नहीं होता आधुनिक खोजें कहती हैं कि विश्वास कम या ज्यादा नहीं होता वह या तो होता है या नहीं होता और विश्वास की धारणा बच्चे में बचपन से उसके परिवार से ही सबसे ज्यादा बनती है ; यदि बच्चा अपने परिवार के लोगों से विश्वास नहीं अर्जित कर पाता; तो वह जीवन में कभी किसी पर विश्वास नहीं कर पाएगा

संसार विविधताओं और अनेक ध्रुवों से युक्त है इसमें छल, कपट, धोखे और अनेक आघात-प्रतिघात हैं आदमी अपने स्वार्थपूर्ति के लिए अनेकों बार विश्वासघात करता है लेकिन वह नहीं जानता कि जब किसी का विश्वास टूटता है, तो उसके अंतस अथवा आत्मा को कितना आघात पहुँचता है धोखा खाया हुआ आदमी बहुत बार मनुष्यता से विश्वास खो बैठता है

उधर सत्य का दूसरा पक्ष भी है संसार में केवल छली,कपटी और धोखेबाज लोग ही नहीं हैं, बल्कि सच्चे, सच्चरित्र, स्नेही और दूसरों की पीड़ा, कष्ट को समझने वाले लोग भी हैं और अक्सर देखा गया है कि इन अच्छे लोगों से परमात्मा बड़ी चुनौतीपूर्ण परिक्षाएँ लेता है इन्हें हम संबंधों में बहुत बार देख सकते हैं संबंधों में अक्सर अच्छे लोग बुरे लोगों के समक्ष खड़े होते हैं इन संबंधों में जहां अच्छे आदमी की अच्छाई की परीक्षा होती है, वहीं बुरे आदमी को सुधरने का अवसर भी मिलता है

शायद इसी लिए कहा गया है कि जीवन परीक्षाओं का नाम है ; अच्छा मनुष्य परीक्षा और चुनौतियों में खरा उतरता है

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

मुखौटों का जीवन

अंधेरा प्रिय होता जा रहा है आज
और डर लगने लगा है उजाले से आज
क्योंकि सबके चेहरे हो गए हैं दोहरे आज
और डरे डरे से हैं सब उजाले से आज
कि कहीं बेनकाब न हो जाएँ
उनके झूठे, नकली और सभ्य चेहरे आज

मानवता का चेहरा हो गया है अमानुष आज
और डर लगने लगा है मनुज को उजाले से आज
क्योंकि दोहरे चेहरे बने हैं बीभत्स आज
और सच्चे चेहरे भी डर गए हैं इन बीभत्स चेहरों से आज
कि कहीं बदनाम न हो जाएँ
वे इस भद्र और सभ्य दुनिया में आज

इस अमर्यादित होती जा रही दुनिया में आज
अंधेरे ने गढ़ लिया है उजाले का रूप आज
क्योंकि इस बनावटी दुनिया में आज
लड़की लड़का हो जाती है तो उसका सम्मान है
और खोटा भी खरे के नाम से बिकता है आज


और मलिन हो गए चेहरों ने आज
बना लिया है अपना एक समाज
क्योंकि हर मुखौटा चिंतित है असल से
इसलिए बना ली है मुखौटा यूनियन सबने आज
ताकि मुखौटे कायम रह सकें
और सच का भ्रम बना रहे
कि सब कुछ ठीक-ठाक है ।