मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

अंतस का समाधान

कल की पोस्ट में मैंने समस्या और समाधान के बारे में बात करते हुए लिखा था कि मनुज की कोई भी समस्या स्वयं उसके जीवन से बड़ी नहीं हो सकती इस संदर्भ में चंद्र मोहन गुप्त जी ने पूछा है कि " पर हमारी समस्या यह है कि यदि इन्सान, जैसा कि प्रायः होता है, जान-बुझ कर पैसा कमाने के लालच में समस्याएं खड़ी करता है. इसका क्या समाधान है ? क्या पैसा देकर ही काम कराया जाये ? यदि शिकायत करते हैं तो उनका मिला-जुला ग्रुप भविष्य में तरह-तरह से परेशान करता है, और परिणाम स्वरुप केवल ज्यादा आर्थिक हानि उठानी पड़ती है, बल्कि कानूनी पेचीदगियों में भी उलझा दिए जाते हैं.......मतलब कि " बैल मुझे मार" जैसी हालत कर बैठते है............. इस पर थोडा प्रकाश डालें... "

किसी समस्या को देखने के दो दृष्टिकोण हैं : एक दृष्टिकोण व्यवहारिक है, जिसे सांसारिक दृष्टिकोण कहा गया है और दूसरा उपाय अंदर का है, जिसे आध्यात्मिक उपाय कहा गया है सांसारिक दृष्टिकोण या व्यवहारिक दृष्टिकोण में समस्या के पहलूओं को सांसारिक ढ़ंग से देखा जाता है संसार के प्रचलित कायदे-कानून और दोहरे मापदंड इसमें दिखाई पड़ते हैं इस दृष्टि का विचार रखने वाले व्यक्ति का स्वयं का कोई विचार नहीं होता ऐसे व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति के साथ बदल जाते हैं आप के सम्मुख आप के जैसी बात, तो किसी अन्य के सम्मुख उस जैसी बात ऐसे लोगों का दायरा तो बहुत बड़ा होता है, पर वस्तुत: इनका व्यवहार इनके अंतस के अनुसार होकर अन्य लोगों की इच्छा तुष्टि का होता है फिर चाहे उन्हें अपनी बात को कितनी ही बार और कितने ही लोगों के सम्मुख बदल-बदलकर रखना पड़े ये अपने स्वार्थ और दूसरे की तुष्टि के लिए कभी स्वयं के अंतस का मंतव्य नहीं रखेंगे ऐसे लोगों को ही हम व्यवहारिक कहते हैं अब आपने जिस समस्या का संदर्भ दिया है, उस समस्या को पैदा करने वाले ऐसे लोग ही हैं समय के हर चक्र में, हर युग में सांसारिकता ऐसे ही चलती आई है लेकिन आध्यात्म में प्यास रखनेवाले व्यक्ति इस व्यवहारिकता से ऊपर उठते हैं और अपने मन और उसकी चालाकियों का अध्ययन शुरु करते हैं । उसके प्रति सजग होते हैं धीरे-धीरे उन्हें मन की चालबाजियाँ समझ में आने लगती हैं मन ही दौड़ाता है फिर मन से पार भावों पर नज़र जाती है, कि भाव कहां से और कैसे पैदा हो रहें हैं ? भावों के पार भी अंदर एक और सत्ता का अनुभव होता है जो सिर्फ चीजों को घटते हुए निरपेक्ष भाव से देखती है और कोई धारणा वह नहीं बनाती इसे ही द्रष्टा या अंतस- चेतना अथवा आत्मा कहा गया है

अब समस्या यह है कि बाहर की जिन समस्याओं की आपने बात की, उनका संबंध केवल आपसे नहीं है, बल्कि उसमें बाहर के बहुत से लोग शामिल हैं और आप बाहर के इन लोगों को बदल नहीं सकते लेकिन आपकी अपेक्षा होती है कि दूसरे लोग आपकी अपेक्षानुरूप व्यवहार करें लेकिन यह संभव नहीं दूसरों से की गई अपेक्षा जब पूरी नहीं होती तो दुख होता है, क्षोभ होता है वस्तुत:
अपेक्षा दुख के अतिरिक्त कुछ नहीं देती

लेकिन हम स्वयं को बदल सकते हैं
यात्रा को हम बाहर से अंदर की ओर मोड़ सकते हैं हम संसार के हर अनुभव से सीखें और स्वयं को इतना संवेदनशील बना लें कि बाहर की हर घटना के प्रति सजग रहें, तो धीरे-धीरे हम अंदर की ओर गमन करना शुरु करेंगे और चीजों को देखने का एक नया दृष्टिकोण विकसित होगा

लेकिन आपकी समस्या अभी भी ज्यों की त्यों है ? इसके लिए आप अभिनेता हो जाइए संसार को इस तरह से जिएं जैसे कि आप इसमें एक अभिनेता से अधिक कुछ नहीं हैं मात्र एक अभिनेता हैं जो संसार रूपी मंच पर अपनी भूमिका कथा के अनुसार निभा रहा है लेकिन अंदर का होश निरंतर बना रहे धीरे-धीरे आप कर्ता भाव से मुक्त हो जाएंगे और संसार की समस्याएँ, जो सदा से हैं और सदा रहेंगी, आपको दुखी और परेशान नहीं करेंगी , क्योंकि आप समस्या में शामिल नहीं होते
समस्या अलग होती है और आप अलग होते हैं । आपको समस्या का परम समाधान मिल चुका होता है ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन अंदर का होश निरंतर बना रहे । धीरे-धीरे आप कर्ता भाव से मुक्त हो जाएंगे और संसार की समस्याएँ, जो सदा से हैं और सदा रहेंगी, आपको दुखी और परेशान नहीं करेंगी , क्योंकि आप समस्या में शामिल नहीं होते । समस्या अलग होती है और आप अलग होते हैं । आपको समस्या का परम समाधान मिल चुका होता है

    भारती जी आपने समाधान देने का काफी प्रयास किया, पर यह सब कोरी बातें ही लगाती है, हकीकत की ज़मीन पर ये दुष्ट लोग इतना गिर जाते हैं कि समझदार का इज्ज़त से जीना दूभर हो जाता है, समस्या में शामिल न होने के बावजूद केंद्र बिंदु बन कर रह जाते हैं, अंततः समस्या का समाधान या तो उनसे हाथ मिला लेने में या खुदकशी में ही दिखता है, वर्ना जीवन पर्यत्न परेशानिया ही परेशानियाँ को झेलना पड़ता है, अपमानित सा होकर जीना पड़ता है......

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. दूसरों की समस्‍याओं का समाधान करने में मजा लेने वाले मन का चरि‍त्र भी होशपूर्वक देखना चाहि‍ये।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपने सही मुद्दे पर बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया है! हर इंसान के जीवन में कठिनाइयाँ आती है पर उनका समाधान तो निकालना ही चाहिए वरना ज़िन्दगी कैसे गुज़रेगी!

    उत्तर देंहटाएं