रविवार, 18 अक्तूबर 2009

उस दिन जिंदगी हार गई

अभी तो मुश्किल से
सत्रह बरस भी पूरे नहीं किए थे
और जिंदगी को यूं खत्म कर लिया
क्यों ... क्यों... क्यों ?

बार-बार अब भी पूछता रहता हूँ
बीस साल बीतने पर भी
नहीं भूला हूँ उस ह्रदय विदारक घटना को
जब तुमने उस सत्रह बरस की
कोमल काया को समाप्त कर लिया

शायद वो तुम्हारा निर्णय न रहा हो
तुम्हें उकसाया गया होगा
तुम्हें फुसलाया गया होगा
तुम्हें जीने के मोह से भटकाया गया होगा
समझ ही कहां रही होगी
जीने का मतलब ही कब जाना था

या वो दिन ही ऐसे रहे होंगे
जब मां-बाप की बेटे की चाहत ने
तुम तीनों बहनों को
हिला कर रख दिया होगा
अब तक जिन्हें नाज़ों से पाला गया था
जिनके लिए तुम सब बेटों के बराबर थी
उनके मनों में कहीं गहरे में बेटे की चाहत दबी थी
और प्रकृति ने भी अज़ब लीला रची थी
सोलह बरस बाद तुम्हारी मां की गोद फिर से हरी हुई थी
और कोख़ में बेटा दिया ...

तुम तीनों ने बहुत समझाया होगा
अपने मां-बाप को
कि नहीं चाहिए तुम्हें भाई
कि तुम सब हो उनकी पुत्रवत बेटियाँ
फिर पुत्र क्यों ?


सबसे पहले विरोध के स्वर बड़ी बेटी में उपजे
उसने मां को समझाया, नहीं चाहिए उन्हे भाई
मां-बाप और बेटियों में इस पर लम्बी बहसें हुई होंगी
पर नहीं झूके मां-बाप बेटियों की जिद्द पर
और बेटे को पलने दिया कोख में
नहीं था अहसास उन्हें बढ़ रहे घातक विरोध के परिणाम का

एक दिन बड़ी बेटी ने
कोशिश की अपनी जान लेने की
बचा लिया गया तब किसी तरह उसे
फिर तुम तीनों ने एक मन बनाया
मां बाप से मूक-बधिर बन गई
विद्रोह धीरे-धीरे बढ़ता गया
कोख में जीवन बढ़ता गया
इधर तुम्हारा जीवन-दर्शन जीवन विरोधी होता गया
जीने की तृष्णा जो कभी मिटती नहीं देखी गई
तुम्हारे लिए भारी हो गई
एक जीवन तुम तीनों पर भारी पड़ा

क्यों तुमने सोचा
कि भाई के आ जाने पर तुम
उपेक्षित हो जाओगी
और क्यों परवाह की जमाने की
कि इतने बरस बाद कैसे दोगी ख़बर
भाई के आने की
आस-पड़ौस और स्कूल कॉलेज़ के दोस्तों को
क्यों इस प्राकृतिक तथ्य को
सहजता से न लिया ?
और जीवन-संघर्ष से हार मान ली
शायद -
उपहास बर्दास्त नहीं होता तुम्हें
पर तुम्हारा आत्म-सम्मान कहीं बड़ा था जीवन से


और वह दिन आया
जब एक नये जीव ने संसार में आँखें खोली
और तुम तीनों ने जीवन से आँखे मूँद ली
एक साथ, तीनों में से एक भी नहीं डिगी
कितनी सामूहिक संकल्प शक्ति रही होगी
तुम तीनों में ,जब झूल गई फंदों पर एकसाथ ...
यह बदले की आग थी या
लड़की होने की दहशत ?
विश्व के पर्दे पर यह घटना बहुत बड़ी घटना बनके उभरी

मैं आज भी आहत हूँ
उस घटना से ...
बीस बरस बाद भी ।

8 टिप्‍पणियां:

  1. अपने प्रिय को स्मरण करते हुए तथा अभिव्यक्ति की स्पषटता लिए भावभीनी रचना।

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  2. एक दिन बड़ी बेटी ने
    कोशिश की अपनी जान लेने की
    बचा लिया गया तब किसी तरह उसे
    फिर तुम तीनों ने एक मन बनाया
    मां बाप से मूक-बधिर बन गई
    विद्रोह धीरे-धीरे बढ़ता गया
    कोख में जीवन बढ़ता गया
    इधर तुम्हारा जीवन-दर्शन जीवन विरोधी होता गया
    जीने की तृष्णा जो कभी मिटती नहीं देखी गई
    तुम्हारे लिए भारी हो गई
    एक जीवन तुम तीनों पर भारी पड़ा

    अत्यंत सुन्दर रचना

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  3. आपने तो हिला कर रख दिया ......

    बस जुबां खामोश है और
    दिमाग की नसें झनझना रहीं हैं
    समझ सकती हूँ इस विद्रोह को .......!!

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  4. मर्माहत कर देने वाली रचना.

    कुछ जिद दिशाहीन होते है.

    कुछ विद्रोह दिशाहीन होते है.

    बहुत गहरे तक उतर गयी यह रचना

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  5. शायद -
    उपहास बर्दास्त नहीं होता तुम्हें
    पर तुम्हारा आत्म-सम्मान कहीं बड़ा था जीवन से

    सच बस गुमनाम ही रहता है. किन्तु, परन्तु, शायद सब बाद की बातें हैं...........
    सामूहिक संकल्प की द्रढता सचमुच विश्वसनीय नहीं पर घटित तो हुई, यही सच है, द्रढता डिगी नहीं, यही सबसे बड़ा सबूत है उपहास या आत्मसम्मान खोने के डर का.

    जो भी है, समाज के मुंह पर तमाचा है और अत्यंत मार्मिक ह्रदय विदारक घटना है...........

    अफ़सोस कि हम ऐसे कुत्सित समाज के ही एक अंग हैं.........

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  6. भाई दूज की हार्दिक शुभकामनायें!
    बहुत ही गहरे भाव के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना दिल को छू गई!

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  7. यह मार्मिक कविता आपके संवेदनशील हृदय को परिलक्षित करती है। कविता की मार्मिकता लिंग-भेद का सुस्पष्ट संदेश देती है। मुझे याद है आपने यह कविता राजभाषा अधिकारियों के सम्मेलन में सुनाई थी और यह उपस्थित हृदयों के मर्मको छू गई थी।

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