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ऊबा हुआ आदमी

आदमी
अपनी जिंदगी से
इतना
ऊब गया है कि
दूसरों की जिंदगी में
तांक-झांक
करने के लिए
बनाता है खिड़कियाँ
जैसे
यही एकमात्र सुख
बचा हो
उसकी जिंदगी मे

टिप्पणियाँ

  1. लगभग सभी लोगों का सच है यह, पर लोग इस ऊबी हुई जिंदगी और बनावटी दुनिया में घुटने मजबूर हैं. इस मनहूसियत से निकलने का रास्ता भी तो नहीं है.

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  2. आदमी
    अपनी जिंदगी से
    इतना
    ऊब गया है कि
    दूसरों की जिंदगी में
    तांक-झांक
    करने के लिए
    बनाता है खिड़कियाँ

    पर जब मैं ऊब जाती हूँ ज़िन्दगी से
    खिड़की से झांकती हूँ उस गौरैया को जो
    पड़ोसियों के घर आँगन में टंगे गमले पर
    बनाती है नीड़ एक- एक तिनके से
    वहीँ पास बैठा चिड़ा निहारता है उसे एक टक
    कितनी मासूमियत से .....
    कभी तुलसी के नीचे जलते दीये को
    देखती हूँ जलते बुझते ...
    कभी रिक्त आसमां में
    ढूढती हूँ खुद को ....

    ये खिड़कियाँ मन को बहुत सुकून देती हैं कभी कभी .....!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. हरकिरत जी !

    आप ऊब का बहुत सुंदर उपयोग करती हैं
    स्वयं को खोजने के लिए

    आपने तो कविता के मर्म से कहीं आगे की टिप्पणी कर दी ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. Saadar Pranaam,
    kabhi saari khidkiyaan, darwaaze band karke andhere mein baithna aur khud se ji bhar ke baatein karna bhi accha hota hai...kam se kam pados ka shor to dakhal nahi deta...
    ham to yahi karte hain....aur tabhi ham jaante hain ki ham jo sochte hain ham hain ...usse kahi jyada ham hote hain...fir usi khushi ko baantane nikal padte hain apnon ke saath...jo badhti hi jaati hai ...kyunki khushiyon se khushiyan judti jo jaati hain...

    उत्तर देंहटाएं
  5. अदा जी !

    वस्तुत:यह भाव कविता के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में मेरे मनस-पटल पर उभरा था । अधिकांश लोग दूसरों के बारे में इधर-उधर की बातें करके अपना कीमती समय बरबाद करते हैं, टाइम पास करते हैं । उन्हें सत्य या तथ्यों से कुछ लेना-देना नहीं होता । वे तो बस मजा़ लेते हैं अपनी ऊब और बोरियत को मिटाने के लिए । यहाँ खिड़कियों से आशय घर की खिड़कियों से ही नहीं बल्कि लोगों की उस मनोवृत्ति से है (वस्तुत: हमारी इंद्रियाँ खिड़कियों का ही काम करती हैं) जो स्वयं से ज्यादा दूसरों की जिंदगी में रुचि लेती है और अपने दर्द को दूसरों के दर्द में भूलाना चाहता है ।

    आप सृजनशील हैं,और स्वयं का आनंद लेना जानती हैं,खिड़कियाँ बंद करके स्वयं में डूबकि लगाती हैं, और आनंद का मोती ढ़ूँढ़ लाती हैं, जो बँट कर कई गुना बढ़ जाता है ।

    इस कविता को लिखने का उद्देश्य भी यही है कि लोग स्वयं में रुचि लें, स्वयं को पहचाने ताकि उन्हें भी आनंद क्या है, इसकी झलक मिल सके और बँट कर कई गुना हो सके ।

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