मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

अश्रु

वह
ह्रदय की
मृदु भूमि में
दफ़न करती रही
कोमल बीज भावनाओं को और
मृदु हिय भूमि मरु बनती रही

एक रोज प्रेम की
वर्षा हुई
ह्रदय की मरु भूमि
फिर से मृदु हुई
समझ की हवाओं से
विश्वास की उष्मा से
दमित भाव
अंकुरित हो उठे
और
अश्रु बन आँख से
झरने लगे

आंखे जो पत्थरा गई थी
दमन से, प्रताड़ना से और द्वंद्व से
धुल गई एक ही फुहार में
और देख पा रही हैं
जीवन को आज नए ढ़ंग से ...

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह क्या बात है! बहुत ही ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने!

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  2. वाह अद्भुत रचना !! जीवन को नए अंदाज से देखने के लिए आँखों का अश्रुपूरित होना जरुरी है !!

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  3. ताजी वर्षा से धुली साफ़ सुथरी और नर्म पत्ती सी लगी यह कविता । आभार

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