सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

क्षण-क्षण जीना

रोज़ रात
मैं
मर जाता हूँ
आज के
अच्छे-बुरे
विशेषणों से
ताकि
रोज़ सबेरे
मैं
जिंदा रहूँ
आज के
क्षण-क्षण में

7 टिप्‍पणियां:

  1. भारती जी,
    आपकी यह कविता, उसमें व्यक्त आपके भाव, सोंच को मैं ठीक से पकड़ पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ. अगर कुछ सहायता कर सकें तो ज्ञान में वृद्धि होगी.

    हार्दिक आभार.
    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर.
    www.cmgupta.blogspot.com

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  2. bahut acche bhav .aaj kee parichai me kal jeena mayne nahee rakhata .ise pal-pal badalatee duniya me .

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  3. गहरा भाव! कम शब्दों में सुंदर अभिवयक्ति !

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  4. मुमुक्षु जी !

    वस्तुत: जब हम रात को सोने जाते हैं तो दिन भर की घटनाओं का अच्छे-बुरे में विश्लेषण करना शुरु कर देते हैं, कुछ घटनाओं को अच्छा मान कर हम उनमें खो जाते हैं, तो कुछ बुरी घटनाओं के लिए चिंतित होते हैं । लेकिन घटनाओं पर लगाए गए अच्छे-बुरे के लेबल हमारे मन में गहरे बैठ जाते हैं, जो कभी उतारे नहीं उतरते और हमारे अचेतन मन में हलचल पैदा करते रहते हैं । लेकिन यदि हम इन घटनाओं को अच्छे-बुरे के विश्लेषण में न तोड़ें और शांत भाव से उन्हें बस विदा कर दें, उनके प्रति हम मर जाएं तो अगली सुबह हम ताजा उठते हैं और हमारे सामने एक नया दिन होता है जिसका हर पल नया है, यदि हम इसे बीते कल की यादों से धूमिल न करें तो हम आनंद मना सकते हैं, प्रत्येक क्षण का ।

    बस यही भाव व्यक्त करना चाह रहा था मैं इन पंक्तियों में ।

    सादर,

    मनोज भारती

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  5. प्रिय अनाम जी !!

    सप्रेम !

    बहुत बार हम दूसरों के अनुभवों से भी सीखते हैं, निश्चित ही क्षण-क्षण जीने का विचार मेरा नहीं है, लेकिन इस विचार से प्रेरित यह भाव अभिव्यक्ति मेरी ही है ।

    कोई भी जो आध्यात्म की यात्रा पर चलता है,
    वह स्वयं का अध्ययन करना शुरु करता है और
    इस अध्ययन में वह अपने शरीर, विचार,भाव की गहराइयों में प्रवेश करता है इस यात्रा में जो भी उसकी अनुभूति से मेल खाता है, वह उसका ही मौलिक अनुभव होता है ।

    हमारा जीवन जो चेतन मन से होते हुए अचेतन, अति-चेतन मन के अंधेरे-उजालों से संचालित होता है; की गहराइयों में प्रवेश किए बिना मानवीय समस्याओं का हल नहीं ढ़ूँढ़ा जा सकता । हम स्वयं अपने अचेतन मन के निर्माता हैं, जो रोज-रोज की हमारी अच्छी-बुरी धारणाओं के आधार पर बड़ा होता जाता है । अगर हम कोई धारणा न बनाएँ तो हम प्रति पल जी सकते हैं और किसी के प्रति हमारा कोई राग या द्वेष भी नहीं होगा; क्योंकि वस्तुत: अच्छा या बुरा हमारे द्वारा दिए गए लेबल हैं इसके अतिरिक्त कुछ नहीं ।

    और इस प्रश्न को पूछने के लिए बेनामी का सहारा क्यों ले रहे हो ? अपनी पहचान बता कर सीधा संवाद करते तो आपके प्रश्न की सार्थकता अधिक होती ।

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  6. बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना प्रशंग्सनीय है!

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