गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

मुखौटों का जीवन

अंधेरा प्रिय होता जा रहा है आज
और डर लगने लगा है उजाले से आज
क्योंकि सबके चेहरे हो गए हैं दोहरे आज
और डरे डरे से हैं सब उजाले से आज
कि कहीं बेनकाब न हो जाएँ
उनके झूठे, नकली और सभ्य चेहरे आज

मानवता का चेहरा हो गया है अमानुष आज
और डर लगने लगा है मनुज को उजाले से आज
क्योंकि दोहरे चेहरे बने हैं बीभत्स आज
और सच्चे चेहरे भी डर गए हैं इन बीभत्स चेहरों से आज
कि कहीं बदनाम न हो जाएँ
वे इस भद्र और सभ्य दुनिया में आज

इस अमर्यादित होती जा रही दुनिया में आज
अंधेरे ने गढ़ लिया है उजाले का रूप आज
क्योंकि इस बनावटी दुनिया में आज
लड़की लड़का हो जाती है तो उसका सम्मान है
और खोटा भी खरे के नाम से बिकता है आज


और मलिन हो गए चेहरों ने आज
बना लिया है अपना एक समाज
क्योंकि हर मुखौटा चिंतित है असल से
इसलिए बना ली है मुखौटा यूनियन सबने आज
ताकि मुखौटे कायम रह सकें
और सच का भ्रम बना रहे
कि सब कुछ ठीक-ठाक है ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. अंधेरा प्रिय होता जा रहा है आज
    और डर लगने लगा है उजाले से आज
    सही फरमाया है
    सुन्दर रचना

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  2. बहुत ही ख़ूबसूरत और सही मुद्दे को लेकर शानदार रचना लिखा है आपने! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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  3. स्वामीजी
    आज के अनेक कवियों को पढ़ना सर फोड़ने जैसा लगता है. पर आपकी कविताओं से छलकता ओशो-रस भिंगो देता है. आपने अपनी तस्वीर क्यों नहीं लगायी ? कम से कम एक तस्वीर होनी चाहिए.
    आपको मित्र मान सकते हैं न ?
    अपने बारे में और बतायेंगे. हमें जानकर अच्छा लगेगा. अगर आपको असुविधा न हो.
    प्रणाम
    जूलीमटुक

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