रविवार, 30 जनवरी 2011

यजुर्वेद

यजुर्वेद का संबंध यज्ञ से है।ज्ञान को कर्म में परिणित करना इसका उद्देश्य है।कर्म के लिए प्रेरित करने वाला शास्त्र होने के कारण ही इसे कर्मवेद के रूप में भी पहचाना जाता है।यजुर्वेद के पहले मंत्र में ही कर्म करने का आदेश है: 
देवो व: सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे। 
अर्थात सबका सृजन करने वाला देव ! तुम सबको श्रेष्ठ कर्म करने के लिए प्रेरित करो। 

इसी तरह यजुर्वेद के अंतिम चालिसवें अध्याय के दूसरे मंत्र में कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखने को कहा गया है: 
कुर्वन्नवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समा:।
इस वेद में यज्ञ के समय उपयोग में लाए जाने वाले नियमों एवं मंत्रों का वर्णन है। यह प्रमुखत: गद्य में है। यजुर्वेद मुख्यत: अध्वर्यु पुरोहितों की दिग्दर्शिका है; जो कर्मकांडों के नियमों का पालन करते थे।यजुर्वेद संहिता के दो भाग हैं: 1.कृष्ण यजुर्वेद 2. शुक्ल यजुर्वेद।

1. कृष्ण यजुर्वेद : कृष्ण यजुर्वेद की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को यजुर्वेद सिखलाया। वैशम्पायन ने याज्ञवल्क्य ऋषि को इसकी शिक्षा दी।बाद में किसी बात पर रुष्ट होकर वैशम्पायन ने अपनी दी हुई शिक्षा याज्ञवल्क्य से वापस मांगी, जिसके कारण याज्ञवल्क्य ने पठित यजुषों(मंत्रों)का वमन कर दिया, तब वैशम्पायन के अन्य शिष्यों ने तित्तिर (तीतर) का रूप धारण कर उन्हें चुन लिया।इसके बाद यजुर्वेद का नाम तैत्तरीय संहिता हुआ। यही कृष्ण यजुर्वेद कहलाया।बुद्धि की मलिनता के कारण यजुषों का रंग काला पड़ गया,इसी लिए यह कृष्ण यजुर्वेद के नाम से प्रसिद्ध हुआ।कृष्ण यजुर्वेद में छंदोबद्ध मंत्रों के अलावा गद्यात्मक टिप्पणी भी हैं।इसकी चार शाखाएँ हैं : 1.तैत्तिरीय संहिता2.मैत्रायणी संहिता3.काठक संहिता4.कपिष्ठल संहिता। 
2. शुक्ल यजुर्वेद : वैशम्पायन के मांगने पर याज्ञवल्क्य ने यजुषों का वमन करने के पश्चात सूर्य की आराधना कर नवीन यजुषों को उत्पन्न किया। ये यजुष ही शुक्ल यजुर्वेद कहलायी। कहा जाता है कि सूर्य ने बाजी अर्थात घोड़े का रूप धारण कर इसका उपदेश याज्ञवल्क्य को दिया था।इसलिए इसे बाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है।इसमें चालिस अध्याय हैं।इसकी दो प्रमुख शाखाएँ हैं- 1.माध्यन्दिन 2. काण्व । 

शुक्ल यजुर्वेद ऋग्वेद की तरह पद्य में है।प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से शुक्ल-यजुर्वेद प्राधान्य है। देवपूजा, संगतिकरण और दान इन तीन अर्थों में याज्ञिक दृष्टि या वैदिक कर्म-कांड का संपूर्ण इतिहास इसमें आ जाता है। यजुर्वेद के कुल चालिस अध्याय हैं, जिसमें 1975 मंत्र हैं । 

शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण प्रसिद्ध है।यह सौ अध्यायों में है और वैदिक कालीन धार्मिक समाज का उज्ज्वल चित्रण करता है।

कृष्ण-यजुर्वेद का तैत्तिरीय ब्राह्मण ग्रंथ है। 

शतपथ ब्राह्मण का चौदहवाँ कांड बृहदआरण्यक के नाम से प्रसिद्ध है। 

कृष्ण यजुर्वेद के आरण्यकों में तैत्तिरीयाण्यक और मैत्रायणी आरण्यक आते हैं। 

शुक्ल यजुर्वेद का चालिसवाँ अध्याय ईशोपनिषद के नाम से प्रसिद्ध है। बृहदारण्यक उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद की और कठोपनिषद,तैत्तिरीयोपनिषद, श्वेताश्वेत उपनिषद, मैत्रायणी और कैवल्य उपनिषद कृष्ण-यजुर्वेद की उपनिषद हैं ।  

रविवार, 23 जनवरी 2011

ऋग्वेद

वैदिक संहिताओं में ऋग्वेद को सबसे प्राचीन स्वीकृत किया गया है।लोकमान्य तिलक ने ऋग्वेद का रचना काल 4000 ई.पू. से 6000ई.पू. के मध्य माना है।यद्यपि अन्य इतिहासकार और विद्वान इस मत से सहमत नहीं हैं, तथापि ऋग्वेद के प्राचीनतम ग्रंथ होने से सभी एकमत हैं।कतिपय विद्वानों ने ऋग्वेद को एक स्वतंत्र ग्रंथ न स्वीकार कर इसे विशालकाय ग्रंथ समूह माना है।इन विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद किसी एक ऋषि की रचना न होकर कई ऋषियों द्वारा विभिन्न कालों में रची गई रचना है।

ग्वेद सूक्त वेद है। सूक्त का अर्थ है:उत्तम कथन।उत्तम कथन से युक्त मंत्रों के समूह को सूक्त कहते हैं।सूक्त को ऋक या ऋचा भी कहते हैं। ऋक का अर्थ है स्तुति योग्य मंत्र और वेद का अर्थ है ज्ञान।इस प्रकार ऋग्वेद का अर्थ हुआ-स्तुति योग्य मंत्रों (उक्तियों) का ज्ञान।ऋग्वेद की ऋचाओं में मुख्यत: देवताओं की स्तुतियाँ हैं।ऋषियों ने ज्ञान रूप में अपने चारों ओर जो दर्शन किया,उसे उन्होंने मंत्रबद्ध कर दिया।प्रकृति में अस्तित्व रखने वाली हर चीज उनके चिंतन का विषय रही।इसलिए देव-स्तुतियों के साथ-साथ लाभांश में सृष्टि के अनेक रहस्यों का उद्घाटन भी हो गया। 

ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ मानी गई हैं : 1. शाकल 2.वाष्कल 3.आश्वलायन 4.सांख्यायन एवं 5.मांडूकायन।इन पाँचों शाखाओं में वर्तमान में पूर्णरूप से केवल शाकल शाखा ही उपलब्ध है। वैदिक वाङ्मय का इतिहास में पं भगवद्दत्त ने ऋग्वेद की 27 शाखाओं का परिचय दिया है।

विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद के दो प्रकार के विभाग उपलब्ध हैं :- 
1.मंडल,अनुवाक और सूक्त । 
2.अष्टक,अध्याय और सूक्त । 
पहले विभाग के अनुसार ऋग्वेद दस खंडों में विभक्त है,जिसे मंडल कहा जाता है।मंडल में संग्रहीत मंत्र समूह को सूक्त तथा इन सूक्तों के खंडों को ऋचाएँ कहते हैं ।ऋग्वेद का यह विभाग ही महत्त्वपूर्ण और प्रचलित है।इसके अनुसार संपूर्ण ऋग्वेद में कुल 10 मंडल, 1028 सूक्त तथा 10552 मंत्र हैं।इसमें कुल 33 देवताओं से संबद्ध ऋचाएँ हैं।जिन्हें 33 कोटियों में परिगणित किया गया है।इन्हीं कोटियों को कालांतर में करोड़ के अर्थ में भ्रमपूर्ण अर्थ में मान लिया गया।जिसके चलते हिंदुओं के देवताओं की संख्या 33 करोड़ मानी जाती है, जो सत्य व तथ्य से सर्वथा परे है।इन ऋचाओं के संकलन के कारण ही इसे ऋग्वेद कहा गया।ऋग्वेद के दसों मंडलों में दूसरे एवं सातवें मंडल की ऋचाएँ सर्वाधिक प्राचीन हैं।जबकि पहला और दसवां मंडल,जिनमें सर्वाधिक सूक्त हैं, को बाद में जोड़ा गया है।

दूसरे विभाग के अनुसार ऋग्वेद में आठ अष्टक हैं, प्रत्येक अष्टक में 8 अध्याय हैं, इस प्रकार पूरे ऋग्वेद में 64 अध्याय हैं। 

विदित है कि वेदों के बाद ब्राह्मण ग्रंथों का स्थान है।इन ग्रंथों का उद्देश्य यज्ञ विधि और कर्म कांड को बतलाना है।ब्राह्मण ग्रंथों के पुन: तीन विभाग हैं : 1.ब्राह्मण 2.आरण्यक 3.उपनिषद। ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रंथ हैं : कौषीतकी और ऐतेरय।इन का परस्पर घनिष्ठ संबंध है।इन ब्राह्मण ग्रंथों में सोम और राजसूय यज्ञों का वर्णन है।

आरण्यक ग्रंथों में अधिकांशत: उपनिषदों के ही अंश संकलित हैं।ऋग्वेद के ऐतरेय और कौषीतकी दो आरण्यक हैं।ऐतरेय के पाँच ग्रंथ पाए जाते हैं,इनमें प्रत्येक को आरण्यक ही कहते हैं।दूसरे और तीसरे तो स्वतंत्र उपनिषद ही हैं।दूसरे के उत्तरार्द्ध के शेष चार परिच्छेद वेदांत ग्रंथ के रूप में गिने जाते हैं,इसलिए उनका नाम ऐतरेय उपनिषद है। कौषीतकी आरण्यक के तीन खंड हैं।इनमें से दो खंड कर्म-कांड से परिपूर्ण हैं।तीसरा खंड कौषीतकी उपनिषद कहलता है।

ऋग्वेदीय उपनिषदों में ऐतरेय, कौषीतकी,वाष्कल और मैत्रायणी हैं । 

बुधवार, 19 जनवरी 2011

अनुभव और गलत निर्णय

मुल्ला नसरुद्दीन से किसी ने पूछा , "सफलता का रहस्य क्या है?"
"सही निर्णय पर काम करना, नसरुद्दीन ने कहा।"
"लेकिन सही निर्णय किए कैसे जाते हैं?"
"अनुभवों के आधार पर।"
"और अनुभव किस प्रकार होते हैं?"
नसरुद्दीन ने कुछ सोचा और फिर कहा, "गलत निर्णयों पर काम करके।"

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

क्रोध का स्रोत

यामाओकु तेशु एक युवा झेन-साधक हुआ। साधक वह जरूर था, पर अधीर इतना कि कभी किसी एक गुरु के पास न रहता । एक बार वह शोकोकू आश्रम के झेन-गुरु दोकुओन के पास गया। 

अपना ज्ञान बघारते हुए यामाओका तेशु ने कहा, "मन,बुद्धि,चेतन,जगत आदि सब अस्तित्वहीन हैं । आभास मात्र। सत्य केवल शून्य है। और कुछ भी सत्य नहीं।कोई भ्रम नहीं।कोई महान नहीं,कोई अपूर्ण नहीं ...न किसी से कुछ लेना,न देना।"

दोकुओन आराम से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, कोई प्रतिक्रिया नहीं की। अचानक उन्होंने हुक्का उठाया और यामाओका के सिर पर दे मारा। चोट खाया हुआ यामाओका क्रोध से आग-बबूला हो गया। 

'अगर सबकुछ शून्य है', दोकुओन ने उससे पूछा, 'तो यह क्रोध कहाँ से आया?' 

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

मकर संक्रांति

संक्रांति का अर्थ है संक्रमण। पौष महीने में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, तो मकर संक्रांति होती है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को होती है।कभी-कभी यह 15 जनवरी को भी हो जाती है।यूं तो संक्रांति हर महीने में होती है।किंतु कर्क एवं मकर राशियों में सूर्य के जाने का विशेष महत्त्व होता है।यह संक्रमण क्रिया छ: छ: महीने के अंतर से होती है।मकर संक्रांति से पूर्व सूर्य दक्षिणायन रहते हैं।मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं।सूर्य के उत्तरायण होने से दिन बड़े होने लगते हैं व रातें छोटी होने लगती हैं।हिंदु धर्म में मकर संक्रांति का दिन विशेष महत्त्व का होता है। तीर्थ-स्नान,गंगा स्नान का इस दिन बहुत अधिक महत्त्व होता है।ऐसी मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान से सभी पाप धुल जाते हैं। हिंदु इस दिन स्नान आदि कर सूर्य-पूजा कर दान को पुण्य कर्म मानते हैं।दक्षिण भारत में इस पर्व को पोंगल कहा गया है। 

मकर संक्रांति की सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएँ। यह उत्सव आपके जीवन में शुचिता लेकर आए । 

स्वप्न

च्वांगत्सू ने स्वप्न में देखा कि वह एक तितली है । रंग बिरंगी, पंख फड़फड़ाती, उड़ती, फूलों पर मँडराती ,तितली । तितली के रूप में उसे जरा भी ध्यान नहीं आया कि वह वास्तव में एक इंसान है । अपने मनुष्य रूप का कोई बोध उसके मन में नहीं था । फूलों पर मँडराते-मँडराते अचानक उसकी नींद टूटी ।

वह सोचने लगा ," क्या मैं एक मनुष्य हूँ, जो तितली होने का स्वप्न देख रहा था ? या मैं एक तितली हूँ जो मनुष्य होने का स्वप्न देख रही है ?"

बुधवार, 12 जनवरी 2011

शायद है

एक गाँव के एक धनी किसान के पास एक बहुत सुंदर घोड़ा था । एक दिन उसका वह घोड़ा बाड़े की बाड़ तोड़ कर  जंगल में भाग गया । गाँव के जिन लोगों को इस बात का पता चला, उन्होंने किसान के पास आ कर कहा, "आपका घोड़ा भाग गया, बड़े अफसोस की बात है ।" 

"शायद है ।" किसान ने कहा । 

तीन दिन बाद घोड़ा वापस आ गया और साथ में पाँच बेहतरीन ताकतवर जंगली घोड़े भी ले आया । गाँव वालों ने किसान से कहा, "भई वाह! यह तो बड़ी खुशी की बात है ।" 

"शायद है ।" किसान ने कहा । 

कुछ दिन बाद एक जंगली घोड़े को काबू करने की कोशिश में किसान का जवान बेटा अपने हाथ-पाँव जख्मी करवा बैठा । गाँव वाले आकर बोले, "आपका इकलौता जवान बेटा इतना घायल हो गया । आपके तो दिन ही खराब चल रहें हैं । बड़े दुख की बात है ।" 

"शायद है ।" किसान ने कहा । 

अगले दिन राजा के सैनिक गाँव में आए । पड़ोसी देश से बड़ा भारी युद्ध छिड़ गया था । रोज  सैकड़ों लोग मारे जा रहे थे । सेना कम हो रही थी । इसलिए राज्य के सभी जवान लोगों को सेना में भर्ती होना अनिवार्य कर दिया गया था । गाँव के सभी जवानों को सैनिक साथ ले गए । किसान के बेटे के हाथ-पाँव टूटे होने के कारण वे उसे वहीं छोड़ गए । गाँव के लोगों ने किसान से कहा, "हमारे बेटे तो फौज में चले गए । पता नहीं जिंदा लौटेंगे या नहीं । तुम्हारा बेटा बच गया । खुशकिस्मती है तुम्हारी !" 

"शायद है ।" किसान ने कहा ।

सोमवार, 10 जनवरी 2011

वेद : सामान्य परिचय

हिंदू धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ वेद हैं । इन्हें अपौरुषेय कहा गया है अर्थात इनकी रचना मनुष्यों ने नहीं की है । कहते हैं कि द्रष्टा ऋषि-मुनियों को सीधे ईश्वर से इनका ज्ञान प्राप्त हुआ । इस प्रकार स्वयं ईश्वर इनका स्रष्टा है । वेद शब्द की व्युत्पत्ति विद् धातु से हुई है, जिसका अर्थ है ज्ञान,सत्ता,विचारण और लाभ । इस प्रकार वेद का शाब्दिक अर्थ हुआ, जिसके कारण से मनुष्य अनेक विधाओं का ज्ञान अर्जित करते हैं, विचार करते हैं और मनुष्य होने का अर्थ सार्थक करते हैं, वही वेद है । निष्पत्ति रूप से कहा जा सकता है कि वेदों का उद्देश्य मनुष्य को समग्र अस्तित्व का ज्ञान करवाना है ।

वेदों को प्रारंभिक समय में लिपिबद्ध नहीं किया गया था । बल्कि यह गुरु-शिष्य परंपरा में श्रवण करके स्मृति में रखे जाते थे । इसी लिए वेदों को श्रुति कहा गया है । कालांतर में इन्हें लिपिबद्ध किया गया । वेदों की संख्या चार है : ऋग्वेद, यजुर्वेद,सामवेद और अथर्ववेद । सबसे पुराना वेद ऋग्वेद है । ऋग्वेद में पद्य मंत्र हैं, यजुर्वेद में गद्य मंत्र हैं । सामवेद में सभी गेय मंत्र हैं तथा अथर्ववेद में अधिकांश पद्य मंत्र हैं । ऋग्वेद का विषय स्तुति, यजुर्वेद का यज्ञकर्म, सामवेद का स्तुति स्त्रोत तथा अथर्ववेद का विषय प्रायश्चित है ।

वेद के मुख्यत: दो भाग किए गए हैं : 1. संहिता 2. ब्राह्मण ।

1. संहिता : संहिताएं वैदिक साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं । मंत्रों के संग्रह अथवा समुच्चय को संहिता कहते हैं । ये मंत्र विभिन्न देवताओं की स्तुति में प्रयुक्त किए गए हैं । संहिताओं की संख्या चार है - 1.ऋग्वेद संहिता 2. यजुर्वेद संहिता 3. सामवेद संहिता 4 अथर्ववेद संहिता । इन संहिताओं का संकलन महर्षि वेदव्यास ने यज्ञ की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया था ।

2. ब्राह्मण : ब्राह्मण वैदिक साहित्य अथवा वेद का दूसरा भाग है । ब्राह्मण ग्रंथ आगे तीन भागों में विभाजित हैं : 1. ब्राह्मण 2. आरण्यक 3. उपनिषद् ।

1. ब्राह्मण :ब्राह्मण ग्रंथों को ब्राह्म साहित्य भी कहा गया है । यहां ब्राह्म का शाब्दिक अर्थ यज्ञ है । इनका विषय यज्ञादि कर्मकांड से संबंधित है । इन ग्रंथों में एक प्रकार से संहिताओं में वर्णित मंत्रों की विस्तृत व्याख्या की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य यज्ञ का सविस्तार वर्णन करना है ।

2. आरण्यक : इन ग्रंथों का चिंतन-मनन वनों में होने के कारण इन्हें आरण्यक कहा गया । इन ग्रंथों में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों का वर्णन है । आरण्यकों में एक ओर संहिताओं तथा ब्राह्मणों के कर्मकांडों का तथा दूसरी ओर उपनिषदों के दर्शनों का संक्रमण मिलता है । इनकी संख्या सात कही गई है ।

3. उपनिषद : वेदों का अंतिम भाग होने के कारण इन्हें वेदांत भी कहा गया है । उपनिषद् का शाब्दिक अर्थ है : समीप बैठना । गुरु -शिष्य परम्परा में गुरु के समीप बैठ कर शिष्य द्वारा गुरु से प्राप्त ज्ञान के कारण ही इन्हें उपनिषद् कहा गया । उपनिषद् वेदों के ज्ञानकांड से संबंधित हैं । ज्ञान का विराट विवेचन ही उपनिषदों का मुख्य विषय है । ब्रह्म, जीव एवं जगत की विस्तृत व्याख्या उपनिषदों में मिलती है ।

शनिवार, 8 जनवरी 2011

न पानी, न चाँद

चाँदनी रात थी । एक झेन साधिका लकड़ी की बाल्टी में पानी भर कर आश्रम की ओर लौट रही थी । पानी में चाँद प्रतिबिंबित हो रहा था । बाल्टी पुरानी थी । अचानक बाल्टी जिस बाँस से बंधी थी वह टूट गया और उसका पेंदा निकल गया । पानी बिखर गया । इस घटना से साधिका को ज्ञान हुआ ।  बाद में उसने एक कविता लिखी  -

ऐसे-वैसे, जैसे-तैसे बचाया मैंने जल-पात्र को,
कि  कमजोर पड़ता जा रहा था बाँस का बंधन 
और आखिर टूट ही गया पेंदा उसका
न जल-पात्र में रहा पानी
न पानी में चाँद !!! 

बुधवार, 5 जनवरी 2011

ध्यान की ओर यात्रा

जापान में एक प्रसिद्ध योद्धा हुए शिंगेन । इनकी पोती रियोनेन हुई । जो बहुत सुंदर होने के साथ-साथ काव्य-प्रतिभा की धनी भी थी । इसी कारण वह 17 वर्ष की अल्पायु में ही जापान की साम्राज्ञी की विशिष्ट सेविका चुनी गई और शीघ्र ही राज-परिवार में अपना सिक्का जमा लिया । 

एक दिन अकस्मात सम्राज्ञी का निधन हो गया । जिससे उसे जीवन की क्षण-भंगुरता का अनुभव हुआ । उसमें जीवन को जानने की तीव्र जिज्ञासा हुई जो शीघ्र ही मुमुक्षु की हद तक पहुँच गई । वह झेन-साधिका होकर साधना करना चाहती थी । 

परंतु उसके परिवार ने इसकी अनुमति न दी और उस पर विवाह का दबाव डाला । परिवार इस शर्त पर उसके झेन साधवी बनने पर राजी हो गया कि यदि वह विवाह-बंधन में बंधे और तीन बच्चों की मां बने तो वह  साधवी हो सकती है । उसने विवाह कर लिया और पचीस वर्ष की होते-होते तीन बच्चों की मां बन गई । अब उसे साधवी होने से कोई रोक नहीं सकता था । उसने साधवी का रूप धारण किया और झेन आश्रम का रुख किया । 

रियोनेन ईडो नाम के एक शहर पहुँची और झेन गुरु तेत्सुग्या से स्वयं को शिष्या के रूप में स्वीकार करने की विनती की । उसको कुछ देर देखने के बाद गुरु ने उसे शिष्या के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया,क्योंकि वह बहुत सुंदर थी । रियोनेन झेन-गुरु हाकुओ के पास गई । उसने भी उसे यह कह कर शिष्या के रूप में अस्वीकार कर दिया कि उसकी सुंदरता अनेक समस्याओं को जन्म देगी । 

रियोनेन को कहीं से एक इस्तिरी हासिल हुई । उसने उसे गर्म करके अपने चेहरे पर रख लिया । उसका सुंदर चेहरा क्षण भर में ही कुरुप हो गया । विद्रुप हो जाने पर झेन-गुरु हाकुओ ने उसे शिष्या के रूप में स्वीकार कर लिया । अपनी दीक्षा की याद में रियोनेन ने एक कविता लिखी :- 
"जब साम्राज्ञी की सेवा में थी 
मैं जलाती थी लोबान 
सुंगंधित करने को 
अपने सुंदर वस्त्र 
एक अनिकेत संन्यासिन के रूप में 
अब मैं जलाती हूँ अपना चेहरा 
कि दाखिल हो सकूँ 
एक झेन-आश्रम में "

इस संसार से अपनी  विदाई की घड़ी में उसने एक और कविता लिखी :- 

" छियासठ बार देखा है मैंने 
अपनी आँखों से 
पतझड़ के दृश्यों को 
वसन्त में बदलते 
ख़ूब कर चुकी मैं 
चाँदनी की बातें 
कुछ न पूछो और 
अब सुनों केवल 
देवदारु और तून वृक्षों की आवाज़ 
हवा जबकि बिल्कुल बंद हो !" 

रविवार, 2 जनवरी 2011

शेख और आलम

कवि आलम रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हुए । इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण जाति में हुआ । उस समय देश में औरंगजेब का राज था । इनकी कवि प्रतिभा और चतुराई से औरंगजेब का लड़का बहुत प्रभावित था । उसके आग्रह पर ही आलम उनका राज कवि बना । एक बार उन्हें एक समस्या पहेली के रूप में दी गई और इसे पूरा करने के लिए कहा गया । दोहे की वह पंक्ति कुछ यूँ थी :-
"कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन "
बहुत सोच-विचार करने पर भी वे इसके समाधान में दूसरी पंक्ति न सोच सके । जिस कागज पर यह पंक्ति लिखी गई थी, वह कागज उन्होंने अपनी पगड़ी में रख लिया । वह कागज उनकी पगड़ी के साथ धुलने के लिए रंगरेजिन के पास चला गया । कहते हैं कि वह रंगरेजिन बहुत सुंदर और चतुर थी । उसका नाम शेख था । जब उसने पगड़ी को धोने के लिए खोला, तो उसके हाथ वह कागज लगा, जिस पर पहेली-रूपी में वह पंक्ति लिखी थी । उसने समस्या को ध्यान से पढ़ा और उसके नीचे लिख दिया :-
"कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धर दीनी ।"
जब पगड़ी धुल गई तो उस कागज को ज्यों का त्यों उसमें रख दिया । जब आलम ने पगड़ी लेकर अपना कागज देखा तो उसमें समस्या का उत्तर लिखा हुआ देख, वे समझ गए कि यह काम रंगरेजिन का ही हो सकता है । वे तुरंत ही उसके घर गए, और पगड़ी की धुलाई एक आना के साथ उसे एक हजार रुपए इनाम स्वरूप दिए । इस घटना के बाद, उनमें प्रेम हो गया। कुछ समय बाद वे शादी के बंधन में बंध गए । उससे उन्हें एक लड़का हुआ, जिसका नाम उन्होंने जहान रखा । 

एक बार औरंगजेब का लड़का आलम के घर के सामने से निकल रहा था । तो शेख को देख उसने पूछा कि क्या आप ही आलम की स्त्री हैं ? तब शेख ने उत्तर में कहा, "जी हां, जहांपनाह, जहान की माँ मैं ही हूँ ।" इस उत्तर को सुनकर वह बड़ा लज्जित हुआ और फिर आगे उसने कभी छोटे मुँह बड़ी बात नहीं की । 

शनिवार, 1 जनवरी 2011

मन की फड़फड़ाहट

उस दिन हवा बहुत वेग से बह रही थी । एक झेन आश्रम की ध्वजा फड़फड़ा रही थी । एक झेन साधक ने यह नजारा देख कर कहा, "देखो, धर्म की ध्वजा फड़फड़ा रही है ।" 

दूसरे साधक ने कहा, "नहीं,ध्वजा केवल नजर आ रही है, असल में तो हवा फड़फड़ा रही है ।"

तीसरा साधक जो अब तक दोनों साधकों की बात सुन रहा था,  उनके निकट आ कर धीरे से बोला, "ध्वजा नजर आ रही है, हवा महसूस हो रही है, किंतु फड़फड़ाहट तो मन में हो रही है ।"

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नव वर्ष 2011 में इस मन की फड़फड़ाहट शांत हो, इसी मंगल कामना के साथ इस ब्लॉग के सभी पाठकों को नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं ।