सोमवार, 10 जनवरी 2011

वेद : सामान्य परिचय

हिंदू धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ वेद हैं । इन्हें अपौरुषेय कहा गया है अर्थात इनकी रचना मनुष्यों ने नहीं की है । कहते हैं कि द्रष्टा ऋषि-मुनियों को सीधे ईश्वर से इनका ज्ञान प्राप्त हुआ । इस प्रकार स्वयं ईश्वर इनका स्रष्टा है । वेद शब्द की व्युत्पत्ति विद् धातु से हुई है, जिसका अर्थ है ज्ञान,सत्ता,विचारण और लाभ । इस प्रकार वेद का शाब्दिक अर्थ हुआ, जिसके कारण से मनुष्य अनेक विधाओं का ज्ञान अर्जित करते हैं, विचार करते हैं और मनुष्य होने का अर्थ सार्थक करते हैं, वही वेद है । निष्पत्ति रूप से कहा जा सकता है कि वेदों का उद्देश्य मनुष्य को समग्र अस्तित्व का ज्ञान करवाना है ।

वेदों को प्रारंभिक समय में लिपिबद्ध नहीं किया गया था । बल्कि यह गुरु-शिष्य परंपरा में श्रवण करके स्मृति में रखे जाते थे । इसी लिए वेदों को श्रुति कहा गया है । कालांतर में इन्हें लिपिबद्ध किया गया । वेदों की संख्या चार है : ऋग्वेद, यजुर्वेद,सामवेद और अथर्ववेद । सबसे पुराना वेद ऋग्वेद है । ऋग्वेद में पद्य मंत्र हैं, यजुर्वेद में गद्य मंत्र हैं । सामवेद में सभी गेय मंत्र हैं तथा अथर्ववेद में अधिकांश पद्य मंत्र हैं । ऋग्वेद का विषय स्तुति, यजुर्वेद का यज्ञकर्म, सामवेद का स्तुति स्त्रोत तथा अथर्ववेद का विषय प्रायश्चित है ।

वेद के मुख्यत: दो भाग किए गए हैं : 1. संहिता 2. ब्राह्मण ।

1. संहिता : संहिताएं वैदिक साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं । मंत्रों के संग्रह अथवा समुच्चय को संहिता कहते हैं । ये मंत्र विभिन्न देवताओं की स्तुति में प्रयुक्त किए गए हैं । संहिताओं की संख्या चार है - 1.ऋग्वेद संहिता 2. यजुर्वेद संहिता 3. सामवेद संहिता 4 अथर्ववेद संहिता । इन संहिताओं का संकलन महर्षि वेदव्यास ने यज्ञ की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया था ।

2. ब्राह्मण : ब्राह्मण वैदिक साहित्य अथवा वेद का दूसरा भाग है । ब्राह्मण ग्रंथ आगे तीन भागों में विभाजित हैं : 1. ब्राह्मण 2. आरण्यक 3. उपनिषद् ।

1. ब्राह्मण :ब्राह्मण ग्रंथों को ब्राह्म साहित्य भी कहा गया है । यहां ब्राह्म का शाब्दिक अर्थ यज्ञ है । इनका विषय यज्ञादि कर्मकांड से संबंधित है । इन ग्रंथों में एक प्रकार से संहिताओं में वर्णित मंत्रों की विस्तृत व्याख्या की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य यज्ञ का सविस्तार वर्णन करना है ।

2. आरण्यक : इन ग्रंथों का चिंतन-मनन वनों में होने के कारण इन्हें आरण्यक कहा गया । इन ग्रंथों में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों का वर्णन है । आरण्यकों में एक ओर संहिताओं तथा ब्राह्मणों के कर्मकांडों का तथा दूसरी ओर उपनिषदों के दर्शनों का संक्रमण मिलता है । इनकी संख्या सात कही गई है ।

3. उपनिषद : वेदों का अंतिम भाग होने के कारण इन्हें वेदांत भी कहा गया है । उपनिषद् का शाब्दिक अर्थ है : समीप बैठना । गुरु -शिष्य परम्परा में गुरु के समीप बैठ कर शिष्य द्वारा गुरु से प्राप्त ज्ञान के कारण ही इन्हें उपनिषद् कहा गया । उपनिषद् वेदों के ज्ञानकांड से संबंधित हैं । ज्ञान का विराट विवेचन ही उपनिषदों का मुख्य विषय है । ब्रह्म, जीव एवं जगत की विस्तृत व्याख्या उपनिषदों में मिलती है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक बहुत अच्छा परिचय दिया आपने वेदों का।
    आभार।

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  2. एक संक्षिप्त किंतु परिपूर्ण आलेख.. तथ्यपरक एवम् ज्ञानवर्धक! इतने सहज भाव से इतना गहन विषय प्रस्तुत किया आपने कि बस सीधा हृदय पर अंकित हो गया!

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