शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

वह अकेला आदमी ::3::

राम आश्रय सुरेश का बड़ा भाई गांव से एक कोस दूर दूसरे गांव में पढ़ने जाता था। बीच में एक अहिरों का खेत था। खेत में कूंआ था। कूएं के पास ही उनका घर था। एक दिन राम आश्रय ने स्कूल जाते हुए उनके वहां एक सुंदर कुत्ता देखा। जो बहुत बड़ा नहीं था। अहिरों ने उसे खेत और घर की सुरक्षा के लिए पाला था। कुत्ता सफेद रंग का था, जिस पर काले रंग की धारियां उसे और भी आकर्षक बना रही थी। राम आश्रय को वह कुत्ता बहुत आकर्षक लगा। उसने उस कुत्ते को वहां से उठा लेने की योजना बना ली। एक दिन स्कूल से घर लौटते हुए वह उस कुत्ते को वहां से उठा लाया।
जब वह गांव में कुत्ते के साथ अपने घर जा रहा था, तो उसको मनु ने देख लिया। उसने राम आश्रय से पूछा, "चच्चा, यह कुत्ता तो बहुत सुंदर है। कहां से लाए?"
राम आश्रय ने कहा, "स्कूल के पास मिला। अच्छा कोई अनजान आदमी इसके बारे में पूछे तो कहना तुम्हें कुछ नहीं मालूम। मैं इसे पालूंगा।"
"क्या तुम इसे किसी के घर से उठा लाए हो?" मनु ने पूछा।
"नहीं, नहीं, ...मुझे तो यह आवारा मिला। पर हो सकता है किसी का हो और वह इसे ढ़ूंढते हुए यहां आए और इसके बारे में पूछे तो उससे कहना तुम्हें उसके बारे में कुछ नहीं मालूम।"
" चच्चा, यदि यह किसी का  है और वह इसे लेने आएगा तो यह तुम्हें उसे लौटा देना चाहिए।" मनु ने कहा।
"तुम्हें जो कहा, उतना मानों। आगे मैं देख लूंगा।"
"लेकिन चच्चा इतना सुंदर कुत्ता आवारा नहीं हो सकता। जरूर किसी का होगा। वह इसे खोजते हुए जरूर आएगा। और किसी की चीज़ बिना उसकी अनुमति के अपने पास रखना अच्छी बात नहीं है।"

"लेकिन अगर तुमने बताया कि यह कुत्ता हमारे घर है तो मैं तुम्हें अच्छाई का सबक ज़रूर सिखाऊंगा।"
ऐसा कह कर राम आश्रय कुत्ते को लेकर अपने घर चला गया।
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अगले दिन राम आश्रय स्कूल से घर लौटा तो कुछ डरा हुआ था। ऐसा लग रहा था किसी ने उसको खूब लताड़ा है। मनु ने उसको देख कर पूछा, "क्यों चच्चा, कुत्ते के बारे में किसी ने तुमसे पूछा क्या?"
राम आश्रय चिल्ला कर बोला, तुम्हें क्या? जाओ अपना काम करो। और हां, यदि कुत्ते के बारे में किसी से कुछ कहा तो तुम्हारी खैर नहीं।"
मनु फिर से गली में खेलने लगा। कुछ देर बाद उसने देखा कि एक औरत गोद में बच्चे को लिए उसकी ओर चली आ रही है। उसके पास आते ही औरत ने पूछा, "बेटा क्या तुमने सफेद रंग का कोई कुत्ता देखा है? तुम्हारे गांव के किसी लड़के को उसे हमारे घर से उठाते हुए किसी ने देखा था। मेरा यह बच्चा कल से उसके बिना रो-रो कर हाल बुरा किए हुए है। बता बेटा, क्या तुमने उसे यहां किसी के घर देखा है क्या?"
मनु ने कहा, " देखा तो है, वह राम आश्रय चच्चा उसे कल लाए थे और कह रहे थे स्कूल के पास मिला।"
कहां है उसका घर ? औरत ने पूछा।
मनु ने अगले घर की ओर इशारा करते हुए, औरत को घर का पता बता दिया।
कुछ देर बाद औरत कुत्ते के साथ  वहां से निकली तो मनु के चहरे पर मुस्कान तैर गई। मनु घर चला गया।
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अगली सुबह मनु अपने घर की दीवार के साथ खड़ा धूप सेंक रहा था। तभी राम आश्रय आया और उसने मनु के पेट में जोर से पहले मूका व फिर लात से वार किया। मनु दर्द से चिल्ला उठा। उसके रोने की आवाज़ सुन कर उसकी मां घर से बाहर निकली। तब तक राम आश्रय नज़रों से ओझल हो चुका था।
मां ने उसे चुप कराया और उससे पूछा क्या हुआ?
मनु ने काफी देर बाद सारा हाल कह सुनाया।
मां ने कहा, "मैं उसकी शिकायत ताई से करूंगी। लेकिन तुझे उसके मामलें में पड़ने की क्या ज़रूरत थी?"
मनु के कोमल मन पर आज फिर एक संस्कार छप चुका था।
   

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

वह अकेला आदमी ::2::

एक दिन वह गांव की कच्ची गलियों में अपने हमउम्र  बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते-खेलते वह नीम की छांव तले  आ गया। पीछे-पीछे उसका दोस्त सुरेश भी आ गया। वह जमीन में देखने लगा। जमीन कभी गारे-गोबर से लीपी गई थी। जमीन में उसे दो चीज़ें दिखाई दी। जो गारे-गोबर के साथ जमीन में धंस गई थी। एक  नए पैसे का सिक्का और एक स्वर्ण की आभा लिए श्वेत पत्थर। पैसे से अधिक उसे पत्थर ने आकर्षित किया। उसने अपने नन्हें हाथों से खुर्च-खुर्च कर उस पत्थर को जमीन से निकालने का प्रयास किया। तब तक उसके दोस्त की निगाह एक पैसे के सिक्के पर पड़ चुकी थी। सुरेश उस सिक्के को निकालने में लग गया।कुछ देर बाद उसने वह पत्थर जमीन से बाहर निकाल लिया था। उधर सुरेश ने भी तब तक नए पैसे का सिक्का जमीन से निकाल लिया।


सुरेश ने उससे पूछा, "मनु तूने मुझ से पहले यह सिक्का देख लिया था,फिर तू यह पत्थर क्यों निकालने लगा।"


उसने कहा, "देख यह पत्थर कितना सुंदर है। इस पर यह पीले रंग की धारी कितनी सुंदर लग रही है और यह देख इसका आकार तेरे सिक्के से कितना अच्छा है-गोल-गोल। इस पत्थर को मैं हमेशा अपने पास रखूंगा। यह कोई सिक्का थोड़े ही है,जो आज तुम्हारे पास और  कल किसी और का होगा।  यह पत्थर तो कीमती है। हमेशा पास में रखने लायक। इसको देखते ही मैं जान गया था कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं है,बल्कि हिरा है हिरा।"


सुरेश को बात जंची कि सचमुच सिक्के से वह ज्यादा से ज्यादा एक मीठी गोली खरीद पाएगा। जबकि उसे मिला वह पत्थर तो बहुत सुंदर और गले में लटकाने लायक था। सुरेश को लालच आया। उसने मनु के हाथ से पत्थर छीन लिया और वहां से भाग गया। भाग कर वह अपने घर में घुस गया। घर में जाकर फूस भरे छप्पर में घुस गया। पीछे-पीछे वह भी भागा। लेकिन सुरेश छप्पर में जा कर दुबुक गया और वहां से बोला- "नहीं दूंगा तुम्हें यह पत्थर। यह तो मैं रखूंगा।"


मनु उदास और रुआंसा हो गया। वह अपनी मां के पास गया। मां को सारा किस्सा कह सुनाया। मां उसे लेकर सुरेश के पास आयी और उसे उसका पत्थर लौटाने को कहा।


सुरेश ने कहा, "सिक्का ले ले, पत्थर न दूंगा। पत्थर तो मैं ही रखूंगा।"


मां ने उसे समझाया "बेटा तू सिक्का ले ले, पत्थर से उसे खेलने दे।"


"नहीं मां, मुझे तो वह पत्थर ही चाहिए, पैसा लेना होता तो मैं पहले सिक्के को ही चुनता। दोनों को पहले मैंने ही देखा था।"


मां ने उसे समझाया, "बेटा न वह पैसा और न पत्थर ही तेरे थे। दोनों ही मिट्टी में सने थे। तूने पत्थर को कीमती समझा और उसने पैसे को। लेकिन दोनों ही पराए हैं। न वो तेरा था न यह तेरा। सब उसका ही उसका।  तू समझदार है और उससे बड़ा भी। घर चल, बहुत देर हो गई है। भूख लगी होगी।"  

रविवार, 4 सितंबर 2016

सिद्धार्थ : हरमन हेसे का उपन्यास :: 2 ::

गतांक से आगे ...
लेकिन सिद्धार्थ स्वयं खुश नहीं था। अंजीर के बाग की गुलाबी पगडंडियों पर घुमते हुए,बनी की नीली छाया में बैठकर चिंतन-मनन करते हुए ,प्रायश्चित के दैनिक स्नान के दौरान अपने अंग धोते हुए, आचरण की पूरी गरिमा के साथ छायादार अमराई में हवन करते हुए,सबके प्रिय,सबकी प्रसन्नता के कारण होते हुए भी,उसके अपने हृदय में आनंद नहीं था। नदी की लहरों से,रात के आकाश में टिमटिमाते सितारों से,सूर्य की पिघलती किरणों से,सपने और बेचैन ख़याल बहते हुए उस तक आते। हवन के घुमड़ते हुए धुएं से,ऋग्वेद के मंत्रों और ऋचाओं से नि:सृत होकर,वयोवृद्ध ब्राह्मणों की शिक्षा से रिसते और टपकते हुए स्वप्न और आत्मा की उद्विग्नता उसे घेर लेती। 
सिद्धार्थ को अपने भीतर असंतोष के बीज महसूस होने लगे थे।  उसे एहसास होने लगा था कि उसके माता-पिता का स्नेह और उसके मित्र गोविंदा का प्रेम भी उसे हमेशा सुखी नहीं रख पाएगा,उसे शांति नहीं दे सकेगा, न उसे संतुष्ट और परिपूर्ण कर पाएगा। उसे इस बात का आभास होने लगा था कि उसके योग्य पिता और दूसरे शिक्षक,वे ज्ञानी ब्राह्मण अब तक अपनी शिक्षा का अधिकतर और सर्वोत्तम अंश उसे सौंप चुके थे,और उन्होंने पहले ही अपने ज्ञान का कुल जमा उसके प्रतीक्षारत पात्र में उंडेल दिया था; लेकिन उसका पात्र पूरा नहीं भर पाया था,उसकी मेधा संतुष्ट नहीं हुई थी,उसकी आत्मा संतुष्ट नहीं थी,उसका हृदय शांत थिर नहीं था। प्रक्षालन(स्नान)के कर्मकांड अच्छे थे,पर उनमें केवल जल था,वे पाप नहीं धोते थे,वे संतप्त हृदय को राहत नहीं पहुंचाते थे। बलियां व देवताओं से की गई प्रार्थनाएं सर्वोत्तम थी - मगर वही सब कुछ नहीं थी? क्या बलियां सुख का संचार करती थी? और देवताओं के संबंध में क्या? क्या सचमुच प्रजापति ने ही दुनिया बनाई थी? क्या केवल आत्मा ने ही उसकी सृष्टि नहीं की थी? क्या देवता मेरी और तुम्हारी तरह रचे गए रूप नहीं थे,मरणशील और क्षणभंगुर? तब क्या यह शुभ और उचित था , क्या देवताओं को बलि देना उपयुक्त व उचित था? तब सिवा उसके, आत्मा के, उस एकमात्र के, और किसको हम बलि अर्पित करें,किसके प्रति सम्मान जतलाएं? और फिर, यह आत्मा मिलेगा कहां, कहां था उसका निवास, कहां धड़कता था उसका शाश्वत हृदय - अगर वह नहीं था आत्मा के भीतर,अंतरतम में,उस शाश्वत में जो हर व्यक्ति लिए रहता था अपने अंदर? लेकिन यह स्व, यह अंतरतम कहां था आखिर? वह मांस और हड्डी नहीं था, वह विचार या चेतना नहीं था। यही सिखाया था ज्ञानी पुरुषों ने। तब कहां था वह? क्या कोई और रास्ता था जो खोजे जाने योग्य था, जिससे स्व की ओर,आत्मा की ओर बढ़ा जा सकता था? कोई वह रास्ता नहीं दिखाता था। किसी को उसकी जानकारी नहीं थी --न उसके पिता को, न गुरुओं को और न ही ज्ञानी पुरुषों को और न ही पवित्र भजनों में। ब्राह्मण और उनके पवित्र ग्रंथ सब कुछ जानते थे, सब : उन्होंने हर चीज को परखा था - संसार की सृष्टि,वाणी की उत्पत्ति,भोजन,श्वास-प्रश्वास,इंद्रियों की व्यवस्था,देवताओं के कृत्य। उन्हें असंख्य बातें ज्ञात थी --लेकिन इन सब चीजों को जानने का क्या मूल्य   था? अगर उन्हें वह एक महत्वपूर्ण चीज़ ज्ञात नहीं थी, वह एकमात्र महत्वपूर्ण चीज़?
पवित्र ग्रंथों के अनेक श्लोक,सबसे अधिक सामवेद के उपनिषद इस अंतरंग चीज़ की चर्चा करते थे। लिखा है -- "तुम्हारी आत्मा ही संपूर्ण विश्व है।" यह कहता है कि जब आदमी सोता है, तब वह अपने अंतस्तल को भेद कर आत्मा में निवास करता है। इन श्लोकों में आश्चर्यजनक ज्ञान था; ऋषियों का सारा ज्ञान यहां मधुमक्खियों द्वारा इकट्ठाठा किए गए शुद्ध शहद की तरह चित्ताकर्षक भाषा में उल्लेखित था। नहीं,ज्ञानी ब्राहमणों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी इक्ट्ठा किए गए और सुरक्षित किए गए इस ज्ञान को आसानी से ओझल नहीं किया जा सकता। किंतु कहां थे वे ब्राह्मण,वे पुरोहित,वे विज्ञ जन जो इस ज्ञान,इस गहन पांडित्य को प्राप्त करने और सुरक्षित रखने में ही नहीं,बल्कि उसे अनुभव करने में भी सफल हुए थे? कहां थे वे दीक्षित-अभिमंत्रित व्यक्ति जो नींद के दौरान आत्मा को उपलब्ध हुए और उसे चेतनावस्था में,जीवन में,हर जगह, वाणी और कर्म में संजोये रख सकते थे? सिद्धार्थ बहुत से योग्य ब्राह्मणों से परिचित था, सबसे पहले उसके पिता- धर्मपरायण,ज्ञानी,प्रतिष्ठित,सम्मानित। उसके पिता प्रशंसा योग्य थे, उनका आचरण शांत व गरिमायुक्त था। वे अच्छा जीवन जीते थे। उनकी वाणी में ज्ञान था,उनके मस्तिष्क में ऊंचे और प्रकांड विचार रहते थे--लेकिन क्या वे भी,जो इतना जानते थे,आनंदपूर्ण जीते थे? क्या उनके भीतर शांति थी? क्या वे सतत अन्वेषी नहीं थे,कभी तृप्त न होने वाले? क्या वे लगातार न बुझनेवाली प्यास लिए उन पवित्र स्रोतों के पास नहीं जाते थे,यज्ञों व बलियों में हिस्सा लेने,धर्मग्रंथों का परायण करने,ब्राह्मणों और पंडितों के वाद-विवाद और धर्म चर्चा सुनने? जो निर्मल और निर्दोष है, उसे रोज नित्य-प्रति अपने पापों को क्यों धोना पड़ता और खुद को शुद्ध करना पड़ता? तो क्या उनके भीतर वह आत्मा नहीं था। क्या स्रोत उनके अपने हृदय के भीतर नहीं था? हमें खुद अपने अस्तित्व के भीतर उस स्रोत को खोजना चाहिए,हमें उसे पाना चाहिए। बाकी सब कुछ मात्र एक खोज थी -एक भटकाव, भूल।
यही थे सिद्धार्थ के मन में उठने वाले विचार,यही उसकी प्यास थी, उसकी वेदना व पीड़ा।