रविवार, 31 अक्तूबर 2010

संग्राम और युद्ध

एक पुराना शब्द है संग्राम । शब्दकोश में इसका अर्थ मिलेगा - युद्ध । लेकिन इसका उत्पत्ति अर्थ है : दो गाँवों की सीमा, दो गाँवों को अलग करने वाली रेखा । यह शब्द युद्ध का पर्यायवाची शायद इसलिए बन गया, क्योंकि जहाँ  सीमा है वहाँ युद्ध भी है । ओशो कहते हैं : "जहाँ सीमा है वहाँ युद्ध भी हैं । जहाँ दो आदमियों के बीच सीमाएँ हैं, वहाँ युद्ध भी है । प्रेम की दुनिया तो उस दिन बन सकेगी, जिस दिन राष्ट्र की कोई सीमाएँ न हों । ...सीमाएँ हैं तो प्रेम की दुनिया नहीँ बन सकती ।"

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

गंदगी

गंदगी में पत्थर फैंकने से गंदगी के छींटे लौट कर स्वयं पर ही पड़ेगें ।

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

आत्मा और परमात्मा : एक या अनेक

सारे मनुष्य का अनुभव शरीर का अनुभव है, सारे योगी का अनुभव सूक्ष्म शरीर का अनुभव है, परम योगी का अनुभव परमात्मा का अनुभव है । परमात्मा एक है, सूक्ष्म शरीर अनंत हैं, स्थूल शरीर अनंत हैं । वह जो सूक्ष्म है, वह नए स्थूल शरीर ग्रहण करता है । हम यहाँ देख रहें हैं कि बहुत से बल्ब जले हुए हैं । विद्युत तो एक है, विद्युत बहुत नहीं है । वह ऊर्जा, वह शक्ति, वह एनर्जी एक है ; लेकिन दो अलग बल्बों में प्रकट हो रही है । बल्ब का शरीर अलग अलग है, उसकी आत्मा एक है । हमारे भीतर से जो चेतना झाँक रही है, वह चेतना एक है, लेकिन उपकरण है सूक्ष्म देह, दूसरा उपकरण है स्थूल देह । हमारा अनुभव स्थूल देह तक ही रुक जाता है । यह जो स्थूल देह तक रुक गया अनुभव है, यही मनुष्य के जीवन का सारा अंधकार और दुख है । लेकिन कुछ लोग सूक्ष्म शरीर पर भी रुक सकते हैं । जो लोग सूक्ष्म शरीर पर रुक जाते हैं, वे ऐसा कहेंगे कि आत्माएँ अनंत हैं ।॥(योगी)॥ लेकिन जो सूक्ष्म शरीर से भी आगे चले जाते हैं, वे कहेंगे परमात्मा एक है, आत्मा एक है , ब्रह्म एक है ।।(परम योगी)॥

मेरी इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है । मैंने जो आत्मा के प्रवेश के लिए कहा उसका अर्थ है वह आत्मा जिसका सूक्ष्म शरीर गिर नहीं गया है । इसलिए हम कहते हैं कि जो आत्मा परम मुक्ति को उपलब्ध हो जाती है, उसका जन्म-मरण बंद हो जाता है । आत्मा का तो कोई जन्म-मरण है ही नहीं, वह न तो कभी जन्मी है और न कभी मरेगी । वह जो सूक्ष्म शरीर है वह भी समाप्त हो जाने पर कोई जन्म-मरण नहीं रह जाता है क्योंकि सूक्ष्म शरीर ही कारण बनता है नए जन्मों का । सूक्ष्म शरीर का अर्थ है हमारे विचार, हमारी कामनाएँ, हमारी वासनाएँ, हमारी इच्छाएँ, हमारे अनुभव, हमारे ज्ञान इन सबका जो संग्रहीभूत बीज है वह हमारा सूक्ष्म शरीर है , वही हमें आगे की यात्रा पर ले जाता है । लेकिन जिस मनुष्य के सारे विचार नष्ट हो गए, जिस मनुष्य की सारी वासनाएँ क्षीण हो गई, जिस मनुष्य की सारी इच्छाएँ विलीन हो गई, जिसके भीतर अब कोई भी इच्छा शेष न रही, उस मनुष्य को जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती है, जाने का कोई कारण नहीं बचता । जन्म की कोई वजह नहीं रह जाती । 

राम कृष्ण के जीवन में एक अद्-भुत घटना है । रामकृष्ण को जो लोग बहुत निकट से परमहंस जानते थे उनको यह बात जानकर अत्यंत कठिनाई होती थी कि रामकृष्ण जैसा परमहंस, रामकृष्ण जैसा समाधिस्थ व्यक्ति भोजन के संबंध में बहुत लोलुप था । रामकृष्ण भोजन के लिए बहुत आतुर होते थे और भोजन के लिए इतनी प्रतीक्षा करते थे कि कई बार उठकर चौका में पहुँच जाते और पूछते शारदा को, बहुत देर हो गई, क्या बन रहा है आज ? ब्रह्म की चर्चा चलती और बीच में ब्रह्म चर्चा छोड़कर पहुँच जाते चौके में और पूछने लगते, क्या बना है आज और खोजने लगते । शारदा ने उन्हें कहा, आप क्या करते हैं ? लोग क्या सोचते होंगे कि ब्रह्म चर्चा छोड़कर एकदम अन्न की चर्चा पर आप उतर आते हैं  । रामकृष्ण हँसते और चुप रह जाते । उनके शिष्यों ने भी बहुत बार कहा कि इससे बहुत बदनामी होती है । लोग कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति क्या  ज्ञान को उपलब्ध हुआ होगा, जिसकी अभी रसना, जिसकी अभी जीभ इतनी लालायित होती है  भोजन के लिए । एक दिन बहुत कुछ भला-बुरा कहा रामकृष्ण की पत्नी शारदा ने, तो रामकृष्ण ने कहा कि तुझे पता नहीं, जिस दिन मैं भोजन के प्रति अरुचि प्रकट करुँ, तू समझ लेना कि अब मेरे जीवन की यात्रा केवल तीन दिन और शेष बच गई । बस तीन दिन से ज्यादा फिर मैं बचूँगा नहीं । जिस दिन भोजन के प्रति मेरी उपेक्षा हो, तू समझ लेना कि तीन दिन बाद मेरी मौत आ जाएगी ।  शारदा कहने लगी इसका अर्थ ? रामकृष्ण कहने लगे, मेरी सारी वासनाएँ क्षीण हो गई , मेरी सारी इच्छाएँ विलीन हो गई, मेरे सारे विचार नष्ट हो गए, लेकिन जगत के हित के लिए मैं रुका रहना चाहता हूँ । मैं एक वासना को जबरदस्ती पकड़े हुए हूँ ; जैसे किसी नाव की सारी जंजीरे खुल गई हों और एक जंजीर से नाव अटकी रह गई हो और वह जंजीर भी टूट जाए तो नाव अपनी अनंत यात्रा पर निकल जाएगी । मैं चेष्टा करके रुका हुआ हूँ । किसी की समझ में शायद यह बात नहीं आई । लेकिन रामकृष्ण की मृत्यु के तीन दिन पहले शारदा थाली लगाकर उनके कमरे में गयी । वे बैठे हुए देख रहे थे । उन्होंने थाली देखकर आँखें बंद कर ली, और पीठ कर ली शारदा की तरफ । उसे एकदम से ख्याल आया कि उन्होंने कहा था कि तीन दिन बाद मौत हो जाएगी, जिस दिन भोजन के प्रति अरुचि करुँ । उसके हाथ से थाली गिर गई और पीट-पीट कर रोने लगी । रामकृष्ण ने कहा, रोओ मत । तुम जो कहती थी वह बात अब पूरी हो गई । ठीक तीन दिन बाद रामकृष्ण की मृत्यु हो गई । एक छोटी सी वासना को प्रयास करके वे रोके हुए थे। उतनी छोटी सी वासना जीवन यात्रा का आधार बनी थी । वह वासना भी चली गई तो जीवन यात्रा का सारा आधार समाप्त हो गया । जिसे तिर्थंकर कहते हैं, जिसे हम  ईश्वर पुत्र कहते हैं, जिसे हम अवतार कहते हैं, उनकी भी एक वासना शेष रह गई होती है और उस वासना को वे शेष रखना चाहते हैं करुणा के हित, मंगल के हित, सर्वमंगल के हित, सर्वलोक के हित । जिस दिन वह वासना भी क्षीण हो जाती है उसी दिन जीवन की यह यात्रा समाप्त और अनंत की अंतहीन यात्रा शुरु होती है । उसके बाद जन्म नहीं, उसके बाद मरण नहीं है , उसके बाद न एक है, न अनेक है । उसके बाद तो जो शेष रह जाता है उसे संख्या में गिनने का कोई उपाय नहीं । इसलिए जो जानते हैं वे यह भी नहीं कहते  कि ब्रह्म एक है, परमात्मा एक है । क्योंकि एक कहना व्यर्थ है जबकि दो की गिनती न बनती हो । एक कहने का कोई अर्थ नहीं जब कि दो और तीन नहीं कहे जा सकते हों । एक कहना तभी सार्थक है जब तक कि दो, तीन,चार भी सार्थक होते हैं । संख्याओं के बीच में ही एक की सार्थकता है । इसलिए जो जानते हैं वे यह भी नहीं कहते कि ब्रह्म एक है, वे कहते हैं ब्रह्म अद्वैत है, दो नहीं है, बहुत अद्-भुत बात कहते हैं । वे कहते हैं परमात्मा दो नहीं है । एक कहकर भी हम संख्या में गिनने की कोशिश करते हैं, वह गलत है । लेकिन उस तक पहुँचना दूर है, अभी तो हम स्थूल में खड़ें हैं, उस शरीर पर जो अनंत है, अनेक है । उस शरीर के भीतर हम प्रवेश करेंगे तो एक और शरीर उपलब्ध होगा, सूक्ष्म शरीर । उस शरीर को भी पार करेंगे तो वह उपलब्ध होगा जो शरीर नहीं है, अशरीर है, जो आत्मा है । 

 (शो की पुस्तक "घाट भुलाना बाट बिनु"  के जीवन और मृत्यु प्रवचन से उद्धृत एक प्रवचनांश )

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

क्षणिकाएँ

सपने टूटे
प्रेम टूटा
भ्रम छूटा


आदमी की परेशानी
मकड़ी का जाल
दम तोड़ा फंस कर


आदत
मजबूर
लोग


आदमी
झगड़े
वासना

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

सलिल वर्मा उर्फ चला बिहारी ब्लॉगर बनने














जगमग अंदर में हिया , दिया न बाती तेल
 परम प्रकासक पुरुष का, कहा बताऊं खेल 
तुलसी की ये पंक्तियाँ संवेदनशील हृदय के स्वामी सलिल वर्मा जी के लिए हैं । सलिल वर्मा जी से परिचय चैतन्य आलोक के माध्यम से हुआ । पिछले वर्ष नवम्बर में मैं नागपुर से स्थानांतरित होकर चंडीगढ़ आया तो एक कवि सम्मेलन के लिए चैतन्य जी से कविता की कुछ पंक्तियाँ सुनी तो चैतन्य जी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका । फिर उनकी (चैतन्य जी) प्रतिभा को देख ब्लॉग लिखने की सलाह दी । चैतन्य जी और सलिल जी दो अलग शहरों में रहते हुए भी प्रतिदिन विचारों का आदान-प्रदान करते रहते । कुछ महीनों में ही हमारे सामने सलिल जी और चैतन्य जी का "सम्वेदना के स्वर" ब्लॉग देखने को मिला और धीरे-धीरे मैं भी उनकी बातचीत में यदा-कदा शामिल होने लगा । थोड़े से समय बाद मुझे "उड़न -तश्तरी" बलॉग पर "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" की टिप्पणी पढ़ने को मिली,...मैं इस बेनामी व्यक्ति से प्रभावित हुआ । कुछ महीनों तक मैं अक्सर चैतन्य जी से "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" की टिप्पणियों की चर्चा करता रहा । तब मुझे यह कतई ज्ञात न था कि "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" वाले  और कोई नहीं बल्कि स्वयं सलिल जी हैं । यह राज तो तब खुला जब समीर लाल और सलिल जी के बीच टिप्पणियों को लेकर तक्ररार होने लगी और एक दिन चैतन्य जी ने इस बात का रहस्योद्-घाटन किया कि "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" वाले बिहारी बाबू हमारे सलिल जी ही हैं ;। बाद में सलिल जी बेनामी की गुहा से बाहर निकल आए और अपने नाम के साथ लिखने लगे । आज तो वे ब्लॉग जगत में निरंतर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ रहें हैं । उनकी टिप्पणियाँ किसी भी रचना के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं । 

     अपने ब्लॉग के अपने परिचय में वे लिखते है:  सलिलवर्मा,वल्दः शम्भु नाथ वर्मा,साकिनः कदम कुँआ, पटना,हाल साकिनः नोएडा. हम तीन माँ के बेटा हैं,बृज कुमारी हमको जनम देने वाली,पुष्पा अर्याणी मेरे अंदर के कलाकार को जन्म देने वाली,अऊर गंगा माँ जिसके गोदी में बचपन बीता अऊर कॉलेज (साइंस कॉलेज/पटना विश्वविद्यालय) की पढाई की.बस ई तीन को निकाल लिया तो हम ही नहीं रहेंगे...
इस परिचय को पढ़ने के बाद कोई भी पाठक यह सहज ही अनुमान लगा सकता है कि सलिल जी में सहृदयता और सामाजिकता एक हो गई हैं । जो स्वयं को तीन माँ का बेटा कहता है ; उसकी संवेदनाएँ कितनी गहरी होंगी । हृदय कितने ममत्व से भरा होगा । और इनके प्रकृति प्रेम का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्होंने गंगा को माँ के समान दर्जा दिया और जहाँ से पढ़ाई की उस संस्थान को भी दिल मे बिठलाए हुए हैं ।
इनकी रुचियों में संगीत ,साहित्य और अभिनय की त्रिवेणी है । इनके ब्लॉग को पढ़ने पर संगीत की मधुर स्वर लहरियाँ सुनाई पड़ती हैं । अपने अनुभवों को इस ढ़ग से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक एक बार पढ़ना शुरु कर दे तो अंत तक उनके सम्मोहन पाश में बँधा रहता है । इनकी दृष्टि में संगीत वही अच्छा होता है जिसको सुनकर व्यक्ति अपना अस्तित्व भूल जाए । सलिल जी का साहित्य में गहरा दखल है । उर्दू, अरबी,हिंदी, बंगला, मलयाली और अंग्रेजी भाषाओं पर इनका अच्छा अधिकार है । ग़ज़ल के व्याकरण की समझ ने इन्हें उर्दू शायरी का नगीना बना दिया है । साखी ब्लॉग पर इनकी सटीक टिप्पणियाँ इस बात की परिचायक हैं ।

राही मासूम रजा, सआदत हसन मंटो, गुलजार ,हरिवंश राय बच्चन, शंकर, राजेश रेड्डी , जेम्स हेडली, रस्किन बाँड, मोपासाँ, ओ.हेनरी सरीखे साहित्यकारों को न केवल इन्होंने पढ़ा है, बल्कि उन पर चिंतन, मनन और गुनन भी किया है ।

थोड़ा बहुत हमने इनका अभिनय भी देखा है...मार्फत चैतन्य जी । वहाँ भी ये किसी से कम नहीं ठहरते ।

पिछले दिनों गूँज अनुगूँज के संदर्भ में बात निकली । कुछ हँसी-मजाक की बातों ही बातों में अनुगूँज शब्द को लेकर और अनु उपसर्ग को लेकर बात हो रही थी...तो इनके मुख से एक कविता अवतरित हुई । यह कविता यहाँ प्रस्तुत है :-




अनुगूंज उठी अंतर्मन से 
अनुसरण लगा उसका करने
अनुराग जगा ऐसा मन में
अनुनाद लगा उसका सुनने.
अनुरोध प्रिये से इतना है
अनुदान प्रेम का मुझको दे
अनुलम्बन दूर करे अपना
अनुकम्पा मुझ पर बरसा दे.
अनुदार नहीं वह हो सकता
अनुताप वियोग का क्यों देगा
अनुपम है प्राण प्रिये मेरा
अनुबंध भला क्यों तोड़ेगा.
अनुपस्थित हो तुम आज प्रिये
अनुगामी बन कर आओगे
अनुदेश सुनोगे जब दिल का
अनुशासन ना रख पाओगे!

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

सोच और सृजन

व्यक्ति की वैयक्तिक सोच, जब तक सृजन में साकार नहीं हो जाती, तब तक उस व्यक्ति की वह सोच वायवीय समझी जाती है । एक पागलपन । - मनोज भारती 

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

लेखक और संवेदना

अनुभव प्रत्येक व्यक्ति के आस-पास घटित होते हैं, लेकिन लेखक की संवेदना ही उन अनुभवों को अभिव्यक्त करना जानती है । - मनोज भारती 

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

जीवन-संगीत

संगीत तुम्हारा गीत हमारा 
आओ हम मिल कर खेलें 
एक खेल ऐसा जिस में सुर हो
हमारा तुम्हारा.

जब सुर से सुर मिले 
तो एक संगीत बने
जीवन एक गीत है 
जिसे सांसों के संगीत पर गाना है 


सांस आती जाती है एक लय में 
रास आती जाती है जिंदगी एक वय में
खास बात होती है जिंदगी एक साथ में
साथ सांसों सा हो, तो जिंदगी एक संगीत है .