शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

लेखक और संवेदना

अनुभव प्रत्येक व्यक्ति के आस-पास घटित होते हैं, लेकिन लेखक की संवेदना ही उन अनुभवों को अभिव्यक्त करना जानती है । - मनोज भारती 

11 टिप्‍पणियां:

  1. सच संवेदना ही सृजन करती है. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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  2. पूरी तरह सहमत हूँ



    संवेदना के इस दर्द को
    सृजन के इस मर्म को,
    क्या कभी समझेगा यह जमाना?
    ये हृदयहीन लोग पाषाण पुरुष
    कवि और चिन्तक की कराह पर,
    दिल की करुण आह पर
    वाह वाह करते है.
    फिर भी हौसला तो डेको
    अंडे पड़ें या टमाटर
    ये चिन्यक अपनी बात
    कहने से कब डरते हैं ?

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  3. संस्कृत के ‘भू’ धातु से बने शब्द ‘भव’ का अर्थ होता है ‘होना’ अर्थात ‘घटित होना’. यह एक निरंतर प्रक्रिया है. किंतु सिर्फ एक शब्द ‘अनु’, भले ही इसका अर्थ पीछे होता हो, एक उपसर्ग बनकर इस ‘भव’ को ‘अनुभव’ बना देता है. घटना जब तक बाहर हो रही है पराई है, किंतु एक ‘अनु’ के जुड़ जाने से ‘अनुभव’ किसी का निजी हो जाता है. और जब वह समाज से बाँटता है तो पूरे समाज का.
    मनोज जी! कितने सरल शब्दों में आपने एक अद्भुत अनुभव से दो चार किया.

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  4. जी हाँ,
    सही कहा है आपने !
    लेखक उसी अनुभव को शब्दों की माला में पिरोकर एक सुन्दर शब्दमाला बना देता है ।

    नवरात्रों की ढेरों शुभकामनाएँ ।

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  5. सहमत हूँ आपसे...
    संवेदनाएं हीं साहित्य का सृजन करती हैं...

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  6. बिहारी बाबू ...आप तो अनुभवों को सुंदर अभिव्यक्ति देते हैं अपने ब्लॉग पर, निश्चित रूप से यह आपकी लेखकीय संवेदना है; जिसकी बात मैंने इस विचार में की है । इस विचार का आप से बेहतर उदाहरण कौन हो सकता है ।

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  7. मनोज जी
    अब संसार तरक़्क़ी कर गया है ,
    जैसे आत्मविश्वास के समानांतर कुटिल ढीठता चलती है , वैसे ही संवेदना के समानांतर छद्म ड्रामेबाज़ी भी !
    बहरहाल , एक श्रेष्ठ विचार के लिए आप बधाई के पात्र हैं !

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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