रविवार, 25 अक्तूबर 2009

आदतवश

बात तेरह साल पहले की है मेरे पड़ौस में एक परिवार रहता था उनके दो बेटे थे माँ अक्सर अपने बेटों को बात-बात पर डाँटती रहती थी डाँटते समय उनके मुख से हमेशा हरामजादा शब्द निकलता था मैं जब भी इस शब्द को सुनता तो मुझे बहुत अजीब-सा लगता था मैं सोचता कि इस शब्द का प्रयोग सचेतन हो रहा है या आदतवश ? पड़ौस से इस शब्द का प्रयोग रोज ही सुनने को मिल जाता था एक दिन मैंने उनके छोटे बेटे से पूछ ही लिया कि क्या तुम्हें हरामजादे शब्द का मतलब मालूम है जो आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था उसने अनभिज्ञता व्यक्त की मैंने उसे कहा, ठीक है ! इस बार आंटी जब आप को यह गाली दे तो उनसे पूछना कि हरामजादे का मतलब क्या होता है छोटे बेटे ने वैसा ही किया कुछ असर दिखाई पड़ा पड़ौस से अब हरामजादे की आवाज़े बहुत कम सुनाई देने लगी थी

व्यवहार में हम कितने ही शब्दों का प्रयोग आदतवश करते हैं, बिना यह सोचे विचारे की कि जिन शब्दों का हम प्रयोग कर रहें हैं, उनका मतलब क्या है ? क्या यह सचेतन जीना है ?

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

प्रेम

तुम्हारी सांसों में
वही बसता है जो मेरी सांसों में
अनंत विस्तार में टूटा यह जीवन
प्रेम की आंखों से बंधा यह जीवन
द्वैत में नहीं वह जीवन आधार
अद्वैत में है वह आकार निराकार

तुम मुझ से पृथक नहीं
इस अनुभूति में है प्रेम

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

उस दिन जिंदगी हार गई

अभी तो मुश्किल से
सत्रह बरस भी पूरे नहीं किए थे
और जिंदगी को यूं खत्म कर लिया
क्यों ... क्यों... क्यों ?

बार-बार अब भी पूछता रहता हूँ
बीस साल बीतने पर भी
नहीं भूला हूँ उस ह्रदय विदारक घटना को
जब तुमने उस सत्रह बरस की
कोमल काया को समाप्त कर लिया

शायद वो तुम्हारा निर्णय न रहा हो
तुम्हें उकसाया गया होगा
तुम्हें फुसलाया गया होगा
तुम्हें जीने के मोह से भटकाया गया होगा
समझ ही कहां रही होगी
जीने का मतलब ही कब जाना था

या वो दिन ही ऐसे रहे होंगे
जब मां-बाप की बेटे की चाहत ने
तुम तीनों बहनों को
हिला कर रख दिया होगा
अब तक जिन्हें नाज़ों से पाला गया था
जिनके लिए तुम सब बेटों के बराबर थी
उनके मनों में कहीं गहरे में बेटे की चाहत दबी थी
और प्रकृति ने भी अज़ब लीला रची थी
सोलह बरस बाद तुम्हारी मां की गोद फिर से हरी हुई थी
और कोख़ में बेटा दिया ...

तुम तीनों ने बहुत समझाया होगा
अपने मां-बाप को
कि नहीं चाहिए तुम्हें भाई
कि तुम सब हो उनकी पुत्रवत बेटियाँ
फिर पुत्र क्यों ?


सबसे पहले विरोध के स्वर बड़ी बेटी में उपजे
उसने मां को समझाया, नहीं चाहिए उन्हे भाई
मां-बाप और बेटियों में इस पर लम्बी बहसें हुई होंगी
पर नहीं झूके मां-बाप बेटियों की जिद्द पर
और बेटे को पलने दिया कोख में
नहीं था अहसास उन्हें बढ़ रहे घातक विरोध के परिणाम का

एक दिन बड़ी बेटी ने
कोशिश की अपनी जान लेने की
बचा लिया गया तब किसी तरह उसे
फिर तुम तीनों ने एक मन बनाया
मां बाप से मूक-बधिर बन गई
विद्रोह धीरे-धीरे बढ़ता गया
कोख में जीवन बढ़ता गया
इधर तुम्हारा जीवन-दर्शन जीवन विरोधी होता गया
जीने की तृष्णा जो कभी मिटती नहीं देखी गई
तुम्हारे लिए भारी हो गई
एक जीवन तुम तीनों पर भारी पड़ा

क्यों तुमने सोचा
कि भाई के आ जाने पर तुम
उपेक्षित हो जाओगी
और क्यों परवाह की जमाने की
कि इतने बरस बाद कैसे दोगी ख़बर
भाई के आने की
आस-पड़ौस और स्कूल कॉलेज़ के दोस्तों को
क्यों इस प्राकृतिक तथ्य को
सहजता से न लिया ?
और जीवन-संघर्ष से हार मान ली
शायद -
उपहास बर्दास्त नहीं होता तुम्हें
पर तुम्हारा आत्म-सम्मान कहीं बड़ा था जीवन से


और वह दिन आया
जब एक नये जीव ने संसार में आँखें खोली
और तुम तीनों ने जीवन से आँखे मूँद ली
एक साथ, तीनों में से एक भी नहीं डिगी
कितनी सामूहिक संकल्प शक्ति रही होगी
तुम तीनों में ,जब झूल गई फंदों पर एकसाथ ...
यह बदले की आग थी या
लड़की होने की दहशत ?
विश्व के पर्दे पर यह घटना बहुत बड़ी घटना बनके उभरी

मैं आज भी आहत हूँ
उस घटना से ...
बीस बरस बाद भी ।

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

दिवाली के दिन



दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ
यह दीपावली आप सब के जीवन में लाए
खुशियाँ अपार
धन-सुख समृद्धि बढ़े अपार
रहे जीवन आपका जगमगाता
हर दम हर पल
.................................................................................................


अक्सर दिवाली या तो मंगलवार को आती है या शुक्रवार को । इसी संदर्भ में हमारे लोक-जीवन में मान्यता रही है कि :-

मंगल को आए दिवाली
तो हँसे किसान
रोये व्यापारी 

और
शुक्र को आए दिवाली
तो हँसे व्यापारी और
रोये काश्तकारी

लेकिन इस बार तो दिवाली न मंगलवार की है, न शुक्रवार की ।
क्या इस रहस्य को आप खोलेंगे कि आज दिवाली शनिवार को क्यों हैं ?

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

देहरी पर

जीवन यह सारा
देहरी पर ही बीत गया
बाहर की बहुत पूजा प्रार्थना की
अंदर के देवता से पहचान न हुई
ऐसी प्रणति हमारी
बाहर देवता को पुष्प चढ़ाए
अंदर के देवता सम्मुख न झुके
मैं के मद में जीवन देहरी पर ही ठहरा रहा
वहां भीतर देवता स्थिर सनातन
बिन नैवद्य के सदा पूरा रहा
मैं इधर देहरी पर आधा अधूरा
रिक्त होता रहा, जीवन कणों से

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

सत्य

सत्य
न नया है न पुराना
न अपना है न पराया
न दिखावा है न बहाना
न लुभावना है न डरावना
न प्रचारक है न भ्रामक

वह तो अनुभव की अग्नि में
जल कर तप्त हुआ
निखरा हुआ
कुंदन है
जो बहुत से सत्यों में
अकेला अलग सा पहचाना गया

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

अश्रु

वह
ह्रदय की
मृदु भूमि में
दफ़न करती रही
कोमल बीज भावनाओं को और
मृदु हिय भूमि मरु बनती रही

एक रोज प्रेम की
वर्षा हुई
ह्रदय की मरु भूमि
फिर से मृदु हुई
समझ की हवाओं से
विश्वास की उष्मा से
दमित भाव
अंकुरित हो उठे
और
अश्रु बन आँख से
झरने लगे

आंखे जो पत्थरा गई थी
दमन से, प्रताड़ना से और द्वंद्व से
धुल गई एक ही फुहार में
और देख पा रही हैं
जीवन को आज नए ढ़ंग से ...

अंतस का समाधान

कल की पोस्ट में मैंने समस्या और समाधान के बारे में बात करते हुए लिखा था कि मनुज की कोई भी समस्या स्वयं उसके जीवन से बड़ी नहीं हो सकती इस संदर्भ में चंद्र मोहन गुप्त जी ने पूछा है कि " पर हमारी समस्या यह है कि यदि इन्सान, जैसा कि प्रायः होता है, जान-बुझ कर पैसा कमाने के लालच में समस्याएं खड़ी करता है. इसका क्या समाधान है ? क्या पैसा देकर ही काम कराया जाये ? यदि शिकायत करते हैं तो उनका मिला-जुला ग्रुप भविष्य में तरह-तरह से परेशान करता है, और परिणाम स्वरुप केवल ज्यादा आर्थिक हानि उठानी पड़ती है, बल्कि कानूनी पेचीदगियों में भी उलझा दिए जाते हैं.......मतलब कि " बैल मुझे मार" जैसी हालत कर बैठते है............. इस पर थोडा प्रकाश डालें... "

किसी समस्या को देखने के दो दृष्टिकोण हैं : एक दृष्टिकोण व्यवहारिक है, जिसे सांसारिक दृष्टिकोण कहा गया है और दूसरा उपाय अंदर का है, जिसे आध्यात्मिक उपाय कहा गया है सांसारिक दृष्टिकोण या व्यवहारिक दृष्टिकोण में समस्या के पहलूओं को सांसारिक ढ़ंग से देखा जाता है संसार के प्रचलित कायदे-कानून और दोहरे मापदंड इसमें दिखाई पड़ते हैं इस दृष्टि का विचार रखने वाले व्यक्ति का स्वयं का कोई विचार नहीं होता ऐसे व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति के साथ बदल जाते हैं आप के सम्मुख आप के जैसी बात, तो किसी अन्य के सम्मुख उस जैसी बात ऐसे लोगों का दायरा तो बहुत बड़ा होता है, पर वस्तुत: इनका व्यवहार इनके अंतस के अनुसार होकर अन्य लोगों की इच्छा तुष्टि का होता है फिर चाहे उन्हें अपनी बात को कितनी ही बार और कितने ही लोगों के सम्मुख बदल-बदलकर रखना पड़े ये अपने स्वार्थ और दूसरे की तुष्टि के लिए कभी स्वयं के अंतस का मंतव्य नहीं रखेंगे ऐसे लोगों को ही हम व्यवहारिक कहते हैं अब आपने जिस समस्या का संदर्भ दिया है, उस समस्या को पैदा करने वाले ऐसे लोग ही हैं समय के हर चक्र में, हर युग में सांसारिकता ऐसे ही चलती आई है लेकिन आध्यात्म में प्यास रखनेवाले व्यक्ति इस व्यवहारिकता से ऊपर उठते हैं और अपने मन और उसकी चालाकियों का अध्ययन शुरु करते हैं । उसके प्रति सजग होते हैं धीरे-धीरे उन्हें मन की चालबाजियाँ समझ में आने लगती हैं मन ही दौड़ाता है फिर मन से पार भावों पर नज़र जाती है, कि भाव कहां से और कैसे पैदा हो रहें हैं ? भावों के पार भी अंदर एक और सत्ता का अनुभव होता है जो सिर्फ चीजों को घटते हुए निरपेक्ष भाव से देखती है और कोई धारणा वह नहीं बनाती इसे ही द्रष्टा या अंतस- चेतना अथवा आत्मा कहा गया है

अब समस्या यह है कि बाहर की जिन समस्याओं की आपने बात की, उनका संबंध केवल आपसे नहीं है, बल्कि उसमें बाहर के बहुत से लोग शामिल हैं और आप बाहर के इन लोगों को बदल नहीं सकते लेकिन आपकी अपेक्षा होती है कि दूसरे लोग आपकी अपेक्षानुरूप व्यवहार करें लेकिन यह संभव नहीं दूसरों से की गई अपेक्षा जब पूरी नहीं होती तो दुख होता है, क्षोभ होता है वस्तुत:
अपेक्षा दुख के अतिरिक्त कुछ नहीं देती

लेकिन हम स्वयं को बदल सकते हैं
यात्रा को हम बाहर से अंदर की ओर मोड़ सकते हैं हम संसार के हर अनुभव से सीखें और स्वयं को इतना संवेदनशील बना लें कि बाहर की हर घटना के प्रति सजग रहें, तो धीरे-धीरे हम अंदर की ओर गमन करना शुरु करेंगे और चीजों को देखने का एक नया दृष्टिकोण विकसित होगा

लेकिन आपकी समस्या अभी भी ज्यों की त्यों है ? इसके लिए आप अभिनेता हो जाइए संसार को इस तरह से जिएं जैसे कि आप इसमें एक अभिनेता से अधिक कुछ नहीं हैं मात्र एक अभिनेता हैं जो संसार रूपी मंच पर अपनी भूमिका कथा के अनुसार निभा रहा है लेकिन अंदर का होश निरंतर बना रहे धीरे-धीरे आप कर्ता भाव से मुक्त हो जाएंगे और संसार की समस्याएँ, जो सदा से हैं और सदा रहेंगी, आपको दुखी और परेशान नहीं करेंगी , क्योंकि आप समस्या में शामिल नहीं होते
समस्या अलग होती है और आप अलग होते हैं । आपको समस्या का परम समाधान मिल चुका होता है ।

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

समस्या और समाधान


समस्याएँ हरेक के जीवन में आती हैं समस्याएँ हैं तो उनके कुछ कारण भी होते हैं और यदि कारण हैं, तो उनको दूर करने का उपाय भी है समस्याओं के समाधान के लिए जरुरी है कि समस्या को ठीक से समझें समस्या को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएँ तथ्यों की पूरी जानकारी लीजिए एक बार आप समस्या के मूल कारणों को जान लेते हैं, तो उनके निदान के उपाय भी दिखाई देने लगते हैं

समस्या समाधान में व्यक्ति की मौलिक विशेषताएँ जैसे उसका चीजों को देखने का दृष्टिकोण, धैर्य शक्ति, विवेक-बोध और चिंतन की गहराई तथा चीज़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करने का ढ़ंग उसे अन्य लोगों से अलग करता है

एक ही समस्या को भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न ढ़ंग से लेते हैं । जीवन में आने वाली समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए बल्कि उनका विश्लेषण, संश्लेषण कर उनके कारणों को जानना चाहिए और कारणों को जान कर उन कारणों को हटाने का उपाय करना चाहिए इसके लिए अंतर्विवेक से काम लीजिए आप निश्चित ही समस्या का समाधान पा लेंगे कोई भी समस्या मनुज से बड़ी नहीं है जीवन में आई हर समस्या का समाधान है

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

दुख

मिट्टी का घड़ा
आग में पकाया
न गया हो
तो क्या
पानी उसमें ठहर पाएगा

जीवन का घड़ा
दुख की अग्नि में पकाया
न गया हो
तो क्या
वह आनंद का पात्र
बन पाएगा

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

ज्ञान

ज्ञान जब आदत बन जाता है, तो व्यर्थ हो जाता है ।
ज्ञान आदत में नहीं है, बल्कि सजगता का फल है ।
ज्ञान जब तृप्ति देता है, तो पूर्ण होता है ।
पूर्ण ज्ञान अपूर्णता के द्वार न खोले तो वह बंधन है ।
ज्ञान इंद्रिय-अनुभव है, पर हर ज्ञान अनुभव नहीं है ।
सत्य का अनुभव पहले होता है, तब वह ज्ञान बनता है ।
एक ही अनुभव बार-बार नहीं होता, हर अनुभव अद्वितीय है ।
हर अनुभव का ज्ञान अनूठा है ।
एक ही अनुभव की बार-बार कल्पना करना अज्ञानता है ।
क्योंकि कोई भी अनुभव पुनरावृत्त नहीं होता ।
जो पुनरावृत्त हो वह ज्ञान नहीं ।
ज्ञान हर पल नया होता है ।
आदत अज्ञानता है क्योंकि वह नये के लिए बंधन है ।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

सांस साज़ और साथ

सांस आती जाती है एक लय में
रास आती जाती है जिंदगी एक वय में

खास बात होती है जिंदगी एक साथ में
साथ सांसों सा हो तो जिंदगी एक साद है

साथों में ढ़ूँढ़ते हैं हम जिंदगी का राग
बातों में खोजते हैं हम जिंदगी का राज

साथ मिल जाए गर उस माशूके मजाजी का
साज़ जिसका मेरे नगमें पर करे आशिकी हकीकत

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

क्षण-क्षण जीना

रोज़ रात
मैं
मर जाता हूँ
आज के
अच्छे-बुरे
विशेषणों से
ताकि
रोज़ सबेरे
मैं
जिंदा रहूँ
आज के
क्षण-क्षण में

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

ऊबा हुआ आदमी

आदमी
अपनी जिंदगी से
इतना
ऊब गया है कि
दूसरों की जिंदगी में
तांक-झांक
करने के लिए
बनाता है खिड़कियाँ
जैसे
यही एकमात्र सुख
बचा हो
उसकी जिंदगी मे

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

विश्वासघात

घात कोई भी हो, पीड़ा तो देता ही है पर सबसे बड़ा घात है विश्वास में घात विश्वासघात की पीड़ा को वही जान सकता है, जिसने इसे भोगा हो

विश्वास सब संबंधों की नींव है जितना बड़ा संबंध होता है वहां उतना ही ज्यादा विश्वास होता है कहा जाता है जितना ज्यादा विश्वास होता है ; उतना ही ज्यादा उन संबंधों में प्रेम होता है और जब प्रेम किसी से होता है तो विश्वास स्वमेव जाता है विश्वास प्रेम की छाया है जहां प्रेम नहीं वहां विश्वास भी नहीं होता आधुनिक खोजें कहती हैं कि विश्वास कम या ज्यादा नहीं होता वह या तो होता है या नहीं होता और विश्वास की धारणा बच्चे में बचपन से उसके परिवार से ही सबसे ज्यादा बनती है ; यदि बच्चा अपने परिवार के लोगों से विश्वास नहीं अर्जित कर पाता; तो वह जीवन में कभी किसी पर विश्वास नहीं कर पाएगा

संसार विविधताओं और अनेक ध्रुवों से युक्त है इसमें छल, कपट, धोखे और अनेक आघात-प्रतिघात हैं आदमी अपने स्वार्थपूर्ति के लिए अनेकों बार विश्वासघात करता है लेकिन वह नहीं जानता कि जब किसी का विश्वास टूटता है, तो उसके अंतस अथवा आत्मा को कितना आघात पहुँचता है धोखा खाया हुआ आदमी बहुत बार मनुष्यता से विश्वास खो बैठता है

उधर सत्य का दूसरा पक्ष भी है संसार में केवल छली,कपटी और धोखेबाज लोग ही नहीं हैं, बल्कि सच्चे, सच्चरित्र, स्नेही और दूसरों की पीड़ा, कष्ट को समझने वाले लोग भी हैं और अक्सर देखा गया है कि इन अच्छे लोगों से परमात्मा बड़ी चुनौतीपूर्ण परिक्षाएँ लेता है इन्हें हम संबंधों में बहुत बार देख सकते हैं संबंधों में अक्सर अच्छे लोग बुरे लोगों के समक्ष खड़े होते हैं इन संबंधों में जहां अच्छे आदमी की अच्छाई की परीक्षा होती है, वहीं बुरे आदमी को सुधरने का अवसर भी मिलता है

शायद इसी लिए कहा गया है कि जीवन परीक्षाओं का नाम है ; अच्छा मनुष्य परीक्षा और चुनौतियों में खरा उतरता है

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

मुखौटों का जीवन

अंधेरा प्रिय होता जा रहा है आज
और डर लगने लगा है उजाले से आज
क्योंकि सबके चेहरे हो गए हैं दोहरे आज
और डरे डरे से हैं सब उजाले से आज
कि कहीं बेनकाब न हो जाएँ
उनके झूठे, नकली और सभ्य चेहरे आज

मानवता का चेहरा हो गया है अमानुष आज
और डर लगने लगा है मनुज को उजाले से आज
क्योंकि दोहरे चेहरे बने हैं बीभत्स आज
और सच्चे चेहरे भी डर गए हैं इन बीभत्स चेहरों से आज
कि कहीं बदनाम न हो जाएँ
वे इस भद्र और सभ्य दुनिया में आज

इस अमर्यादित होती जा रही दुनिया में आज
अंधेरे ने गढ़ लिया है उजाले का रूप आज
क्योंकि इस बनावटी दुनिया में आज
लड़की लड़का हो जाती है तो उसका सम्मान है
और खोटा भी खरे के नाम से बिकता है आज


और मलिन हो गए चेहरों ने आज
बना लिया है अपना एक समाज
क्योंकि हर मुखौटा चिंतित है असल से
इसलिए बना ली है मुखौटा यूनियन सबने आज
ताकि मुखौटे कायम रह सकें
और सच का भ्रम बना रहे
कि सब कुछ ठीक-ठाक है ।

सोमवार, 28 सितंबर 2009

सौंदर्य

ज्ञात के मौन आमंत्रण में सौंदर्य है ।

बाह्य लिपा-पोती कुरुपता को ढ़ांपने के लिए है । क्या सौंदर्य को भी बाह्य प्रसाधनों और सजने-संवरने की जरूरत होती है ?

सौंदर्य शरीर का ही नहीं बल्कि उसके अंतस का भी होता है । कुछ लोग शारीरिक सौंदर्य के अहंकारवश अंतस सौंदर्य को खो देते हैं ।

सौंदर्य सदैव एक नवीन अहसास है । अनुभव है । प्रकृति में सौंदर्य प्रतिक्षण निखर रहा है । सौंदर्य को देखने के लिए संवेदनशीलता चाहिए । प्रकृति में सौंदर्य भरा पड़ा है । जिन्हें प्रकृति का यह सौंदर्य दिखाई नहीं पड़ता, उन्हें संवेदनशीलता पुन: प्राप्त करनी होगी । सौंदर्य का संबंध मन से है । जहां कहीं सौंदर्य का अभाव आरोपित किया जाता है, वहां कुरुपता दिखाई देती है ।

सौंदर्य अधिकार-भाव से मुक्त है । सुंदरता कभी अधिकारपूर्वक नहीं कहती - "मैं सुंदर हूँ ।" सौंदर्य आंतरिक भाव है । अंतस सजग है और वह क्षण प्रति क्षण जीना जानता है तो सर्वत्र सौंदर्य है ।

कृष्ण श्याम वर्ण हैं, फिर भी उनमें अद्भूत सौंदर्य है । वे जो हैं उसे पूर्णता से, सजगता से और सहजता से जीते हैं । अपने अंतस के अतिरिक्त वहां कुछ और होने का प्रयास या भाव किंचित भी नहीं है । वस्तुत: जो स्वयं में स्थित हो कर जीता है- वह सुंदर है । सौंदर्य उसकी पूजा करता है ।

जो सौंदर्य वासना की पूर्ति हेतु आरोपित किया गया है । वह टूटेगा, खण्डित होगा और कुरुप हो जाएगा । वासनामय दृष्टि सौंदर्य से अंधी होती है । वासना-ग्रसित व्यक्ति सौंदर्य क्या जाने ?

सूर्योदय से सूर्यास्त तक और फिर रात्रि से भौर तक सौंदर्य ही सौंदर्य बिखरा पड़ा है । क्या कोई क्षण है जो सौंदर्य से आपूरित न हो ? क्या कोई स्थान ऐसा है जहां सौंदर्य का अभाव हो ?

वस्तुत: सौंदर्य अस्तित्व का परम फूल है जो कभी मुरझाता नहीं ।

रविवार, 27 सितंबर 2009

सृजन

कवि की सुंदर कल्पना सृजन है ; क्योंकि उसके पीछे साधना का श्रम है ।

चित्रकार की कृति में सृजन है ; क्योंकि उसमें रंगने के लिए चित्रकार की पूरी तैयारी है । कृति और कृतिकार का अंतर मिट गया है ।

विध्वंशकारी गतिविधियों का मात्र एक ही हल है : सृजन । स्वयं को सृजनात्मक होने दो ।

अस्तित्व तुमसे तुमको मांगता है ।
यह तुम्हारी इच्छा है चाहो तो स्वयं को जीवित समर्पित करो, अन्यथा मृत्यु के रूप में तो वह तुमको तमसे छीन ही लेगा ।

अस्तित्व तुमसे सृजन चाहता है । इसलिए वह तुमसे समर्पण चाहता है - जीवित समर्पण । बिना समर्पित हुए अहम नहीं जाता और अहम के रहते हुए सृजन कहां ।

सृजन निर्भार करता है ।
सृजन असीम से जोड़ता है ।
सृजन सक्रिय और गतिमय है ।
सृजन तुमको तुमसे मिलाने में सहयोगी है ।

कार्य में तल्लीनता की चरम सीमा सृजन है । ध्यान की पूर्ण अवस्था में सृजनात्मकता का जन्म होता है । जो स्वयं को बचाये रखने का प्रयास करते हैं, वे अंतत: स्वयं को खो देते हैं और जो स्वयं को खोने के लिए, छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं, वे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करते हैं ।

शनिवार, 26 सितंबर 2009

मानवीय संवेदना

आज होम्ज़ का एक वचन याद आ रहा है : -

संसार के महान व्यक्ति अक्सर बड़े विद्वान नहीं रहते, और न ही बड़े विद्वान महान व्यक्ति हुए हैं ।

यह वचन जब पहली बार पढ़ा था, तभी मन-मस्तिष्क और अंतस ने इसे स्वीकार कर लिया था और जीवन-अनुभव में भी यह पाता हूँ कि जो विद्वान होने का दंभ भरते हैं; उनके पास पुस्तकों और शास्त्रों की स्मृतियाँ तो बहुत होती हैं, पर उनके पास वह संवेदना नहीं होती जो जीवंत सत्य को देख सके और उसके अनुरुप व्यवहार कर सके और न ही मुझे ऐसे विद्वानों में वो सनकीपन और जुनून ही दिखाई पड़ता जो महान लोगों में होता है । अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक बार मार्ग से गुजरते हुए एक बीमार सूअर को कीचड़ में फँसे हुए देखा और अपने अंतस की आवाज को सुन उसे बचाने कीचड़ में कूद उस सूअर को बाहर निकाल लाए । लोगों ने हैरानी से इसका सबब पूछा तो वे बोले - मैंने सूअर को बचा कर अपने ह्रदय की वेदना का बोझ दूर किया है । दुखियों को देखकर हमारे ह्रदय में जो टीस उठती है, उसी को मिटाने के लिए हम दुखियों का दु:ख दूर करते हैं ।

काश ! कुछ थोड़े से लोग भी अपने अंतस की आवाज़ के अनुसार जिएं और उसके साथ कभी समझौता न करें तो मानवीय संवेदना को जिंदा रखा जा सकता है । तथाकथित विद्वानों की नहीं आज मानवीय संवेदना को जिंदा रखने का साहस चाहिए ।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

धर्म

अपने अंतस को जान लेना और उसके अनुसार जीना धर्म है ।

धर्म आंतरिक अनुशासन-बद्धता का दूसरा नाम है । आंतरिक अनुशासन-बद्धता आ जाने से बाह्य अनुशासन स्वत: ही आ जाता है । धर्म ऋत है; जिसके कारण प्रकृति में संतुलन और लयबद्धता है ।

धर्म विश्वास नहीं है । धर्म एक साक्षात अनुभव है । जो हर ह्रदय में धारणीय है । जिससे ह्रदय के तार झंकृत हो उठते हैं और आत्मा नृत्य करने लगती है । यह नृत्य लय और ताल से आबद्ध है ।

धर्म अनेक नहीं हैं । धर्म अद्वैत की स्थिति है । जहां द्वंद्व नहीं, द्वैत नहीं, वहां धर्म है । प्रकृति भी धर्ममय है । प्रकृति का अपना आंतरिक अनुशासन है, जिसके कारण उसमें अद्भूत सौंदर्य है । वस्तुत: जहां अन्तस का प्रकाश है - वहां सौंदर्य है ।

धर्म का कोई संप्रदाय नहीं है । जहां संप्रदाय है, वहां धर्म नहीं है । धर्म एकांतिक अनुभव है ; जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड को जोड़ने की शक्ति है ।

धर्म मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा में नहीं, वह तो सर्वत्र है । अपने ह्रदय को रिक्त करो और वह धर्म-कणों से आपूरित हो जाएगा ।

नीत्शे के बहाने

प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्शे ने कहा है :

विशाल जन-समूह निरे साधन हैं
अथवा रुकावटें
या नकलें हैं
महान कार्य ऐसी सामूहिक हलचल पर
निर्भर नहीं हुआ करते,
क्योंकि सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ का भी
जन-समूह पर कोई
प्रभाव नहीं !

कितना सही कहा है । सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ हमेशा भीड़ से अलग अकेला खड़ा होता है और हर सफल इंसान सफल इस लिए होता है क्योंकि वह भीड़ से अलग कुछ विशेष रखता है । दूसरी ओर यह भी सच है कि सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ का भी जन-समूह पर कोई प्रभाव नहीं ! कितने लोग सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ, फिर चाहे वे कलात्मक फिल्में हों या उत्कृष्ट साहित्य पसंद करते हैं । निश्चित ही सर्वोत्तम सर्वोत्तम को ही प्रभावित कर सकता है ।

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

दुश्मनी

कांटों से
दुश्मनी
करके
कब
किसने
फूलों को
पाया है

बुधवार, 23 सितंबर 2009

मौलिकता

समाधि की अवस्था में मानवीय चेतना से उपजा हर विचार मौलिक है ।
प्रेम
-युक्त आलिंगन की मौन स्थिति मौलिक है।
प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में मौलिक है
प्रत्येक क्षण मौलिक है
इच्छा रहित शांत चित्त मौलिक है
विचार रहित वर्तमान मौलिक है
फूल का खिलना मौलिक है
फूल का मुरझा कर गिरना मौलिक है
किसी पत्थर का तुम्हारे द्वारा उठाया जाना मौलिक घटना है
पत्थर स्वयं भी मौलिक है
अनुकरण रहित आचरण मौलिक है
ह्रदय का रुदन मौलिक है
किसी की बात को ठीक-ठीक उसी अर्थ में समझ लेना,जान लेना जैसा कि वक्ता के मन में है, एक मौलिक घटना है
स्वयं की अनुभूति मौलिक है
स्वयं की आह ! मौलिक है
आश्चर्य मौलिक है
जीवन मौलिक है ; मृत्यु मौलिक है
स्वयं का आविष्कार, खोज मौलिक है
स्वयं की भटकन जानना मौलिक है
पत्तों की खनखनाहट, वृक्षों की सांय-सांय, पक्षियों की चहचाहट, तारों की टिमटिमाहट, शशि का सौंदर्य, कामिनी की चंचलता मौलिक है
सद्-वचनों की अभिव्यक्ति जो स्वानुभव से निकली हो और जो चेतना को विराट रूप प्रदान करे- वह मौलिक है

नृत्य मौलिक है ;संगीत मौलिक है ; काव्य मौलिक है ; यदि इन की उद्भावना ह्रदय की जमीन पर और आत्मा की लयबद्धता तथा अंत:करण की अनुशासनबद्धता से हुई है
वह सब मौलिक है जिसे ईमानदारी से आप अपना कह सको

उनकी आँख -मिचौनी

क्यों तुम करती हो
मेरे सम्मुख अभिनय
कभी झूठ को सच साबित करने का
तो कभी सच को झूठ साबित करने का
यदि नहीं बचा है हमारे बीच कोई रिश्ता
तो यह आँख-मिचौनी क्यों
मुझसे भी क्या डरना
जिसने कभी तुम्हारा बुरा चाहा नहीं
यह मैं और मेरी रुह दोनों जानती हैं
फिर क्यों नहीं कहती अपनी बात
जैसी है तुम्हारे हिय में वैसी बात
प्रिय-प्रियतम में यह अभिनय कैसा
जब तक मुझे यूँ उलझाती रहोगी
सच से सकुचाती रहोगी
दुनिया से डरती रहोगी
मुझे कभी न पा सकोगी
मुझे पाना है तो दुई के पर्दे को हटा
और तू जैसी है वैसी ही मेरे समक्ष
आ जा !!!
समझता हूँ नारी लज्ज़ा और अभिनय का फर्क
अच्छी तरह से मैं
मुझे मत उलझाओ इन झूठे वास्तों में
जो कहना है स्पष्ट कह दो
और बात खत्म करो

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

गुनाह-ए-मोहब्बत

मुझे तुमसे कितना प्रेम है
इसका यकीं तुम्हें कैसे दिलाऊँ
बस मैं तो इतना ही जानता हूँ
कि इस दिल में बसा चेहरा तुम्हारा
मुझे पुकार-पुकार कर बार-बार तुम्हारी
याद दिला देता है -
भुला दोगी मुझको यूँ तुम
ये सोचा भी नहीं था कभी
बदल देगा मेरा प्यार तुम्हें -
मुझको तो यह पूरा यकीं था
पर नहीं प्यार तुझको मुझे
जब कहा तूने यह -
तो तुम्हारी आंखों में कोई भाव न था
जब तुम्हें मुझसे कोई प्यार नहीं है
फिर भी मैं तुम्हें भूला नहीं पा रहा हूँ
तो मैं जो तुम्हें इतना प्यार करता हूँ
मुझे कैसे भूला सकती हो तुम ?
मुझे भूलना इतना आसां तो नहीं
क्योंकि मुझे मालूम है
कि मैंने तुम्हें अपनी रुह से ज्यादा चाहा है
और वह जानती है कि मेरी चाहत में कोई गुनाह नहीं है
फिर यह कैसे हो सकता है
कि तुम मुझे भूल जाओ
और भूल जाओ वे क्षण
जो शाश्वत थे ...शाश्वत हैं ...
जब हमारे बीच कुछ घट रहा था
जिसके गवाह हैं हम दोनों !

सोमवार, 21 सितंबर 2009

मनुष्य का जीवन

कहते हैं भगवान ने जब सृष्टि की रचना की और पृथ्वी पर जीवन की परिकल्पना की, तो सभी प्राणियों को ४० वर्ष की उम्र दी । मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी प्राणी भगवान को अनुगृहीत भाव से धन्यवाद देकर पृथ्वी पर उतरने लगे । लेकिन असंतुष्ट मनुष्य की जब पृथ्वी पर जाने की बारी आई, तो उसने भगवान से प्रार्थना की कि २० साल की उम्र में तो शादी करुंगा और ४० साल की उम्र तक तो बच्चे भी बड़े नहीं होंगे और मेरे मरने की घड़ी आ जाएगी । इसलिए प्रभु से अनुरोध है कि मेरी उम्र बढ़ा दी जाए । भगवान ने मनुष्य के अनुरोध को स्वीकार करते हुए कहा कि, तुम अभी रुको, जिसे उम्र कम चाहिए होगी, उसकी उम्र मैं तुम्हें दे दूँगा ।
जब गधे की बारी आई, तो उसने भगवान से कहा कि मैं पृथ्वी पर ४० साल तक क्या करुँगा । उन्होंने कहा, बोझ उठाना और मनुष्य की सेवा करना । गधे ने प्रार्थना की कि मेरी उम्र २० साल कम कर दें, इतनी लंबी आयु का बोझ मैं कैसे उठाऊँगा । भगवान ने उसकी उम्र २० वर्ष कम करके शेष २० वर्ष की आयु मनुष्य को दे दी । मनुष्य ६० वर्ष की आयु से भी संतुष्ट न हुआ । आगे बारी आई कुत्ते की । उसने भी पूछा, मैं पृथ्वी पर ४० वर्ष तक क्या करुँगा । भगवान ने जवाब दिया, मनुष्य की रक्षा करना । कुत्ते ने भी अपनी उम्र कम करने का भगवान से आग्रह किया । भगवान ने प्रार्थना स्वीकार की ओर कुत्ते की आयु २० वर्ष निर्धारित कर दी, तथा शेष २० वर्ष की आयु असंतुष्ट मनुष्य को दे दी । अगले क्रम पर उल्लू ने भी भगवान से पूछा, मैं ४० वर्ष तक पृथ्वी पर क्या करुँगा, प्रभु । भगवान ने कहा, तुम रातभर जाग कर पेड़ पर उल्टा लटकना । उसने भी इस कर्म को४० वर्षों तक झेलना उचित न समझा और अपनी आयु कम करने का अनुरोध किया । और मनुष्य ८० वर्ष की उम्र पाने पर भी संतुष्ट न था । उल्लू की प्रार्थना भी स्वीकार कर ली गई । भगवान ने उसकी उम्र २० वर्ष कम कर दी और उसकी शेष आयु मनुष्य को भेंट कर दी । इस प्रकार मनुष्य की आयु १०० साल हो गई । भगवान को धन्यवाद देकर मनुष्य धरती पर चला आया ।

२० वर्ष की वय में उसने शादी रचाई । २० से ४० वर्ष तक उसने बच्चों को पढ़ाया और जीवन को किसी हद तक सुखी-सुखी जीने का साहस दिखाया । अब ४० से ६० साल की उम्र तक उसने बेटी की शादी की,बेटे को नौकरी लगवाया, घर बनवाया, धन इकट्ठा किया अर्थात् गधे की तरह कार्य में जुटा रहा । ६० साल की उम्र में स्वयं की नौकरी से रिटायर हो गया । ६० से ८० साल के बीच उसके बेटे बड़े होकर जिम्मेदारियाँ संभालने लगे । अब वह पूरे दिन बेटे-बहू के काम में भौंक-भौंक कर दखलंदाजी करने लगा तो बेटे ने बहु से कहा कि अब यह बूढ़ा हो गया है । इसलिए कुत्ते की तरह भौंकता है । औरअब उसके पास घर के बाहर कुत्तों की तरह बैठ कर पहरेदारी करने सिवा कोई चारा न रहा । अब ८० साल कुत्ते की तरह भौंकते और पहरेदारी में बीत गए । शेष बचे ८० से १०० साल । उसमें उसकी आंखें कमजोर हो गई , लेकिन कान बहुत तेज हो गए । उसे रात भर उल्लू की तरह नींद नहीं आती और वह यह पूछता रहता है, क्या हुआ ? इस तरह मनुष्य अपनी जिंदगी जीता है ।

क्या यह कहानी मात्र कल्पित-कपोल है या वास्तव में ही मनुष्य की लोभ वृत्ति और उसके जीवन के प्रति मोह की द्योतक नहीं ? क्या मनुष्य अपने स्वभाविक जीवन से हटकर अन्य प्राणियों के जीवन की कामना नहीं रखता ? यदि नहीं, तो इस जीवन को सफल बनाने के लिए इसके मर्म को पहचाने और सार्थक जीवन जिएं ।

रविवार, 20 सितंबर 2009

पहचान

सूर्य के प्रकाश के साथ
आत्मा का चैतन्य हो
तो मन का अंधकार मिटे
सहज कर्म घटे
परिश्रम से थकान न हो
जीवन में ठहराव न हो
व्यापार में हानि न हो
संसार में शांति हो

रात्रि के अंधकार के साथ
दिन के परिश्रम से उपजा विश्राम हो
तो मन में शांति हो
तन में कांति हो
धन में वृद्धि हो
जन में सुबुद्धि हो

प्रकृति ने दिया मनुष्य को
वह सब
जिस से वह बने महान
आंखें दो, कान दो, मुँह एक
ताकि -
वह अधिक देखे, अधिक सुने और
कम बोले

लेकिन -
कहां हैं वे आँखें -
जो पहचान सकें प्रकृति के सच को
कहां हैं वे कान -
जो सुन सकें प्रकृति के नाद को
बस एक मुँह है -
जो बकता है और चरता है हरदम

हे मानव !
उठ और पहचान अपनी प्रकृति को
इससे पहले कि -
काल तुझे अपने गाल में ले ले

बुधवार, 16 सितंबर 2009

आसान-कठिन : सीढ़ी दर सीढ़ी

पुस्तक खरीदना आसान है
पढ़ना कठिन है

पढ़ना आसान है
समझना कठिन है

समझना आसान है
सोचना कठिन है

सोचना आसान है
चिंतन कठिन है

चिंतन आसान है
मनन कठिन है

मनन आसान है
मौन कठिन है

मौन साधे सभी सधे !!!

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

सौंदर्य-परख

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के जीवन की एक घटना । एक रात किसी पर्यटन स्थल पर नौका में सवार थे । किसी मित्र ने सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) पर एक बहुत बड़ा ग्रंथ उन्हें भेंट किया था । अपने बजरे में बैठकर दीये की रोशनी में उसे पढ़ते रहे । सौंदर्य क्या है ? इसकी परिभाषा क्या है ? यह कितने प्रकार का होता है ? और इसी तरह की विभिन्न चर्चाएँ ग्रंथ में विस्तार के साथ दी गई थी । जितना शास्त्र को पढ़ते गए, उतना ही यह ख़्याल भूलते गए कि सौंदर्य क्या है ? शब्द और शब्द, उलझन और उलझन ... सिद्धांत पर सिद्धांत बढ़ते जाते थे, तब आधी रात ऊबकर ग्रंथ को बंद कर दिया ।
आँख उठाकर बाहर देखा तो आश्चर्य चकित रह गए । बजरे की खिड़की के बाहर सौंदर्य बिखरा पड़ा था । पूरे चाँद की रात थी । आकाश से चाँदनी बरस रही थी । नदी की लहरें चाँदी हो गई थी । सन्नाटा और मौन दूर तक फैला था । दूर-दूर तक सब नीरव था । सौंदर्य वहां पूरा मौजूद था । तब उन्होंने सिर पीटा और स्वयं से कहा - सौंदर्य द्वार के बाहर मौजूद है और मैं उसे किताब में खोजता हूँ, जहां केवल शब्द ही शब्द हैं और कोरे सिद्धांत हैं । उन्होंने वह किताब बंद कर दी और बाहर फैले सौंदर्य में डूब गए ।
अगले दिन मित्र को पत्र लिखा - मित्र तुम्हारी किताब धन्यवाद सहित वापस लौटा रहा हूँ । सौंदर्य क्या है ? इसे जानने के लिए आपकी पुस्तक हेतु बनी । जब तक इसे पढ़ता था, सौंदर्य द्वार पर थपकी देता रहा और मैं सौंदर्य से वंचित रहा । लेकिन जैसे ही दीपक बुझाया और बाहर दृष्टि गई तो पाया कि सौंदर्य तो अपने पूर्ण यौवन पर बाहर खड़ा है । इसके साथ ही मुझे एक ओर सत्य दिखाई पड़ा कि जब तक मैं एक छोटा सा दीया (अहंकार का) जलाकर भीतर बैठा था, तब तक परमात्मा की रोशनी भीतर नहीं आ पा रही थी । मेरा दीया परमात्मा के दीये के लिए दीवाल बना हुआ था, उसके प्रकाश को भीतर नहीं आने दे रहा था । और जैसे ही मैंने अपने भीतर के अहंकार को बूझा दिया, तो उसका प्रकाश मेरे भीतर आलोकित हो उठा ।

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

उसी से गर्म उसी से ठंडा : विरोधाभास

सर्दियों के दिन थे । कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । गुरु और शिष्य यात्रा पर थे । सुबह-सुबह उठे तो ठंड से ठिठुरे जा रहे थे । गुरु ने सहसा अपनी दोनों हथेलियों को रगड़ना शुरु किया और उनमें मुंह से फूंक मारना शुरु किया । यह देख कर शिष्य ने गुरु से जानना चाहा- "गुरु जी ! आप हाथों को क्यों रगड़ रहें हैं और उसमें फूंक क्यों रहें हैं ?" गुरु ने कहा कि हाथों को रगड़ने और उसमें गर्म फूंक मारने से शरीर को ठंड नहीं लगती, इससे शरीर में गर्माहट आती है । कुछ देर बाद उन्होंने आग जलाई और उसमें खाने के लिए आलू भूने । गुरु ने आलू आग से निकाले । आलू अभी गर्म थे । आलू छीलना शुरु किया और मुंह से फूंक-फूंक कर उन्हें ठंडा करने लगे । शिष्य ने पूछा गुरु जी आप आलू में फूंक क्यों मार रहें हैं ? गुरु ने कहा फूंक कर आलू को ठंडा कर रहा हूँ । शिष्य ने पूछा, कुछ देर पहले आप फूंक कर अपनी हथेलियों को गर्म कर रहे थे और अब फूंक कर आलुओं को ठंडा कर रहे हो । यह कैसे संभव है कि उसी से गर्म और उसी से ठंडा ? गुरु ने कहा- "ऐसा ही है, जीवन में बहुत सी चीजों का स्वभाव गर्म या ठंडा हो सकता है, लेकिन उनका उपयोग हम कैसे करते हैं, उस से वे हमारे लिए उपयोगी और सार्थक बन जाती हैं ।" फूंक की तरह जो कभी हथेलियों को गर्म करने के काम आती है तो कभी आलुओं को ठंडा करने के लिए । वह स्वयं में गर्म है, लेकिन अलग-अलग परिस्थितियों में इसका प्रयोग बड़ा विरोधाभासी है । बुद्ध पुरुषों के वचन भी ऐसे ही होते हैं । जो बहुत बार हमें विरोधाभासी लगते हैं लेकिन हर परिस्थिति में सार्थक होते हैं ।

बुधवार, 9 सितंबर 2009

चेहरे पर चेहरे

जब दो व्यक्ति मिलते हैं
शारीरिक रूप से दो होते हैं
पर मानसिक रूप से छ: होते हैं
कैसे-
पहले व्यक्ति के तीन मानसिक चेहरे :
एक वह जो वह वास्तव में है
दूसरा वह जो वह स्वयं को समझता है
तीसरा वह जो दूसरा व्यक्ति पहले व्यक्ति के बारे में समझता है
इसी प्रकार तीन चेहरे दूसरे व्यक्ति के
हो गए न दो के छ:

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

कोई ख़्याल कैसे आ जाता है ...

क्षण-प्रतिक्षण
विचार आते रहते हैं मन में
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

जितना ज्यादा पकड़ने लगता हूँ इनको
उतने ही बढ़ते जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

ढ़ूँढ़ता हूँ, खोजता हूँ, उत्स इनका
पर ये बढ़ते ही जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

जितना खोजता हूँ, उतने ही और और
भांति-भांति के ख़्याल बढ़ते जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

इनमें से कुछ विचार तो प्रतिक्रिया स्वरूप हैं
जो अच्छा नहीं लगता मुझे उसकी एवज में
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

कुछ विचार जो मुझे अच्छे लगते
वे इकट्ठे होते जाते किसी बंद गहरी अंधेरी गुहा में
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है


जो विचार इकट्ठे होते जाते बंद गहरी अंधेरी गुहा में
वे मेरा स्वरूप बनते जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

लेकिन कौन है जो चुनता बिंदु-बिंदु
इन विचारों को और अवसर पर उच्छाल देता गहरी अंधेरी गुहा से
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

और कौन है जिसे अच्छा नहीं लगता कोई विचार
और नहीं बन पाता मेरा भाव-बोध
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

नहीं ढ़ूँढ़ पाया उत्स इनका
लेकिन देख पाया हूँ कि ख़्यालों का ताना-बाना ही मन है
और जो ख़्याल आता इस मन में
वो किसी की प्रतिछाया है, जो खो जाती है स्वयं के सान्निध्य में आने पर

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

ह्रदय का सूनापन

हरे भरे पेड़ों के बीच
मैं आकर्षित होता हूँ
उस पेड़ की ओर जो सूख कर
ठूंठ हो गया है


तारों भरे आकाश में
मैं आकर्षित होता हूँ
उस चाँद की ओर जो
एकाकी पड़ गया है


सुख- दुख से भरे इस संसार में
मैं आकर्षित होता हूँ
उस इंसान की ओर
जो समानुभूति रखता है -
ठूंठ हो गए पेड़ से
एकाकी पड़े चाँद से
और मेरे ह्रदय के सूनेपन से

बुधवार, 2 सितंबर 2009

अहंकार की परिणति

बूंद को समुद्र में अपनी सत्ता का विलय अच्छा न लगा ।
वह अपनी अहंता और पृथकता बनाए रखना चाहती थी ।
नदियों ने उसे इस विरक्तता से आगाह भी किया ।
पर वह मानी नहीं, और अलग ही बनी रही ।
तेज सूर्य किरणों में वह भाप बन हवा में उड़ गई और बादलो में खोने लगी ।
बादलों के साथ यह दोस्ती उसे रास नहीं आई ।
रात हुई और वह पत्तों पर ओस बनकर अलग-थलग पड़ी रही ।
धूप रोज निकलती, उसे ऊपर उठाती, पर उसे नीचे ही गिरना जो पसंद था ।
सर्प ने उस ओस को चाटा और विष में बदल दिया ।
जो न समुद्र बनते और न बादल अंतत: उन्हें विष में बदलना पड़ता है ।

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

प्रीत पराई

वो आए
दिल पर दस्तख दी
द्वार खुला था
अंदर तक नि:संकोच चले आए
ठहरे, पहचान बनाई, कहानी रची
पर बाहर हरदम झांकते रहे
किसी से बतियाते रहे
किसी को जलाते रहे
मासूम दिल पर जब उनके निशान बन गए
उलटे पाँव बाहर निकल गए
एक दर्द का रिश्ता देकर
वो बाहर किसी सुलझे से उलझते गए
हम भीतर जख्मों से उलझते रहे
जिन्हें शिद्दत से पलकों पर नवाजा था
वो आँसू बन कर पुतलियों से बह गए !

रविवार, 30 अगस्त 2009

अस्तित्व

अस्तित्व
यह कैसा खेल
रच रहा
धरती को चिलम बना
उसमें जीवन का
तंबाखू डाल
और
तारों की सुलगती अग्नि भर
जलते कश भर रहा
और धुंध भरी सांसे
उगल रहा ।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

डूबना-उबरना

हम
गिरते रहे
भावना के
एक ही
कुँए में
रोज
और
डूब गए
डूबते को
तिनके का
सहारा भी
न मिला
और
हम टूट गए
इस कदर
कि अब
रोज भावना से मिलना होता है,
हम प्रतिबिंबित भी होते हैं उसमें
पर डूबते नहीं ...
सार समझ में आ गया !

( स्वप्न मंजूषा शैल जी (अदा जी), ने इस अभिव्यक्ति को शीर्षक भी दिया और लेबल भी, मैं ह्रदय से आभारी हूँ ।)

प्रतिध्वनि

एक व्यक्ति अपने नन्हें बेटे के साथ पहाड़ों की यात्रा पर था एक जगह अचानक बेटे का पैर फिसला, उसे चोट लगी और मुँह से आह! की तेज ध्वनि निकली बच्चे ने सुना कि घाटियों में कोई और भी है जो उसके जैसी ही आवाज निकाल रहा है उसने जोर से चिल्लाकर पूछा-"तुम कौन हो ?" जवाब मिला - "तुम कौन हो ?" लड़का फिर बोला-"मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ ?" उत्तर आया- "मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ ?" बच्चे ने आश्चर्य से अपने पिता से इसका रहस्य जानना चाहा पिता ने मुस्कराते हुए कहा- "बेटा, यह तुम्हारी ही आवाज़ है, जो घाटियों द्वारा वापस लौटा दी गई है विज्ञान इसे इको (प्रतिध्वनि) कहता है लेकिन मेरे देखे हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है तुम जो कुछ इसे दोगे यह वापस कर देता है यह हमारे कर्मों का प्रतिबिंब है तुम दुनिया में जितना प्यार देखना चाहते हो, उतना प्यार स्वयं में पैदा करो, जितनी क्षमता दुनिया में देखना चाहते हो, उतना खुद में विकसित करो, जितना सकारात्मक परिणाम पाना चाहते हो, उतने ही सकारात्मक प्रयास करो यह जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है "

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

झूठ और सच

एक बहुत पुरानी कथा है, शायद तब की जब कि परमात्मा ने यह दुनिया बनाई । कहते हैं कि परमात्मा ने जब यह दुनिया बनाई तो बहुत एक रूप और साम्यबद्ध बनाई । फिर परमात्मा ने देखा कि पृथ्वी पर कोई हलचल नहीं है । सब एकरूप और शिथिल सा है । तब परमात्मा ने पृथ्वी पर विरोधी तत्वों की कामना की । और एक सच की देवी तथा एक झूठ की देवी बनाई । दोनों में विपरीत्त गुण भरे । और उन दोनों को पृथ्वी पर भेजा । आकाश से जमीन पर आते-आते उनके कपड़े मैले हो गए । रास्ते की धूल जम गई । जब वे जमीन पर उतर रही थी, तो भोर के अंतिम तारे डूब रहे थे। सूर्य निकलने के करीब था । थोड़ी देर थी सूरज निकलने में । इसके पहले कि वे परमात्मा के संदेश के अनुसार पृथ्वी की यात्रा पर जाएं और अपना काम शुरु करें, झूठ की देवी ने सच की देवी से सरोवर में स्नान का प्रस्ताव रखा । दोनों देवियाँ कपड़े उतारकर सरोवर में स्नान करने को उतरी । सच की देवी तैरती हुई आगे चली गई, उसे कुछ भी पता न था कि उसके पीछे कोई धोखा हो जाने को है । झूठ की देवी किनारे पर वापस आई और सच की देवी के कपड़े पहन कर भाग खड़ी हुई, और तो और स्वयं के कपड़े भी साथ ही लेते गई । जब लौटकर सच की देवी ने देखा, तो वह हैरान हो गई । वह नग्न थी । उसके कपड़े वहां नहीं थे । सूर्य निकल चुका था । गाँव के लोग जागने लगे थे । उसके पास कोई चारा न था । वह छुपते-छिपाते झूठ की देवी का पीछा करने लगी । कुछ डरी सी, कुछ सहमी सी, कुछ सकुचाई सी । लेकिन कथा कहती है कि वह अब तक भी झूठ की देवी को पकड़ नहीं पाई है । झूठ की देवी अब भी सच की देवी के वस्त्र पहन कर घूम रही है । और सच की देवी छुपती-छुपाती उसके पीछे-पीछे भाग रही है । लेकिन जब कभी वह झूठ के सामने प्रत्यक्ष नग्न खड़ी हो जाती है, तो किसी को बर्दाश्त नहीं होता क्योंकि सभी के मुखौटे उतर जाते हैं । तब से संसार में हलचल और विविधता तो बहुत है, पर सब थोथा और झूठा । मुखौटों से लदे चेहरे, जो सच के सामने तिलमिला जाते हैं ।

विडम्बना

मां दुखी
पिता परेशान
कि
बेटा छब्बीस का
होने को आया
पर
मिली नहीं नौकरी

बाप परेशान
कि
दे नहीं सकता
घूस में लाखों

मां दुखी
कि
बेटा यूनिवर्सिटी तक
प्रथम श्रेणी में रहकर
भी है बेकार

और बेटा ...
अर्थ से बेअर्थ हुआ
जो कुछ अर्थ पाता
ले जाकर उसको
खरीदता कविता की पुस्तकें
ताकि
अपना खोया संतुलन पा सके
और संयमित हो सके

बुधवार, 26 अगस्त 2009

मां-बेटी

हर मां
एक बेटी
फिर भी
वह
बेटा चाहती
शायद
वह
जानती है
बेटी होने का
दुख !

सृजन की वेदना

सृजन के पथ पर
निकली हर आह
प्रसव वेदना को सहने का संबल है
जो मन मंजूषा भरी है
भावों से, उनकी आभा पीली है
क्योंकि हर भाव अपनी परिपक्वता में
इसी रंगत में आकर टूट जाता है

पीड़ा अपने चरम पर
आकर बिखर जाती है

सृजन की अंतिम घड़ियों में
वीणा से संगीत भी शांत हो जाता है

और
धीरे से आह निकलती है
कोई जन्म ले रहा है ।

जीवन-रहस्य

एक लहर उठी
और गिर गई

एक पतंग उड़ी
और कट गई

एक दोस्त मिला
और बिछुड़ गया

एक फूल खिला
और मूर्झा गया

एक आशा बंधी
और निराशा बनी

एक सुख आया
और दुख हो गया

एक दोस्त बना
और दुश्मन हो गया

एक सांस आई
और एक सांस गई

एक ऋतु आई
और दूसरी ऋतु गई

एक अपेक्षा की
और उपेक्षा हो गई

एक जमाना आया
और दूसरा जमाना गया

क्या परिवर्तन का दूसरा नाम
जीवन नहीं है ?

या कुछ है शाश्वत
अमिट, अमृत, आनंद

हे जीवन तुम्हीं
रहस्य खोलो

सौंदर्य-परख

मैं चंडीगढ़ में था । फरवरी का महीना था । चंडीगढ़ के रोज़-गार्डन में रोज़-फैस्टिवेल लगा था । मैं एक मित्र के साथ रोज़-फैस्टिवेल देखने गया था । पहले तो हमने मेले में लगे विभिन्न स्टालों को देखा । फिर गार्डन के एक ओर एकांत में जाकर बैठ गए और आस-पास की चहल-पहल के बारे में बात करने लगे । तभी मैंने पास की एक क्यारी से गुलाब का एक सुंदर फूल तोड़ लिया और उसे सूंघते हुए अपने मित्र से पूछा -" क्या तुम्हें गुलाब सुंदर नहीं लगते ?" मित्र ने कहा- "मुझे फूल इतने प्रिय और सुंदर लगते हैं कि इन्हें डाल से तोड़ते हुए भी मुझे पीड़ा होती है ।" मित्र के इस जवाब से मैं सन्न रह गया । मुझे अपनी भूल का अहसास होने लगा था ।

सोमवार, 24 अगस्त 2009

बेदर्दों की दुनिया

कितनी पीड़ा होती है
जब किसी पेड़ पर खुदा
दिल,तीर और प्रेम संदेश देखता हूँ
पर बेबस मैं कर ही क्या सकता हूँ

बस एक ही ख्याल मन में
आता है बार-बार
क्या प्रेम इतना अंधा और संवेदनहीन होता है
कि दर्द नहीं होता ऐसे पेड़ की छाती को चीरते हुए


क्या ऐसा प्रेम प्रेमिका की छाती का दर्द समझता है
या यूं ही उसे चीरने का सुख लेता है
और फिर छोड़ उसे एकाकी दूर निकल जाता है
एक दर्द का निशान हमेशा उसके कलेजे पर छोड़

फिर देखता हूँ -
कि पेड़ के जख्म भरते जाते हैं
और दिल,तीर उभरते जाते हैं
और नाम छाती में अमिट बने रहते हैं

मानो कह रहें हों कहानी उस प्रेम की
जो न केवल अंधा और संवेदनहीन है
बल्कि बेदर्द और बेसबब भी है
जो किसी को दर्द दे वह किसी को सुख कैसे दे देता है

पेड़ से इस बारे में
एक दिन पूछ बैठा
पेड़ ने कहा मत पूछो
उस दर्द की कहानी -
बस बेदर्दों की दुनिया में जीना है
तो छाती चिरवाने में खुशी समझो ।

रविवार, 23 अगस्त 2009

टूटते-सपने



चीन में एक अद्भूत फकीर हुआ च्वांगत्से । एक रात जब वह सोया था, तो उसने एक सपना देखा । उसने सपने में देखा कि वह तितली हो गया । खुले आकाश में, हवाएँ बह रहीं हैं और मुक्त तितली उड़ रही है । सुबह च्वांगत्से उठा और रोने लगा । उसके संबंधियों ने पूछा कि क्यों रोते हो ? च्वांगत्से ने कहा, मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूँ । रात मैंने एक सपना देखा कि मैं तितली हो गया हूँ और बाग-बगीचे में फूल-फूल पर डोल रहा हूँ । संबंधियों ने कहा, सपने हम सभी देखते हैं, इसमें परेशानी की क्या बात है ?


च्वांगत्से ने कहा, नहीं, मैं परेशान इसलिए हो रहा हूँ कि अगर च्वांगत्से रात सपने में तितली हो सकता है, तो यह भी हो सकता है कि तितली अब सपना देख रही हो कि वह च्वांगत्से नाम का आदमी हो गई है । जब आदमी सपने में तितली बन सकता है तो क्या तितली सपने में आदमी नहीं बन सकती ? मैं इसलिए मुश्किल में पड़ गया हूँ कि मैं च्वांगत्से हूँ, जिसने तितली का सपना देखा है या मैं हकीकत में एक तितली हूँ , जो अब च्वांगत्से का सपना देख रही है !


वस्तुत: न तो च्वांगत्से सपने में तितली बनता और न तितली च्वांगत्से । एक अदृश्य शक्ति दो तरह के सपने देखती है, वह रात में तितली बन जाती है, दिन में च्वांगत्से बन जाती है । लेकिन सब सपने टूट जाते हैं । क्या जीवन भी एक सपना नहीं है ? जो टूट जाता है और बिखर जाता है ।यदि वास्तव में ही जिंदगी सपना नहीं, तो क्या है ???



जीवन के प्रतिबिंब

जीवन क्या है ? निश्चित ही जीवन आधा-अधूरा नहीं है। क्योंकि मैंने इसमें पूर्णता का प्रतिबिंब देखा है और जिसमें पूर्णता प्रतिबिंबित हो सके,वह आधा-अधूरा कैसे हो सकता है ? यह व्यर्थ और सारहीन भी नहीं है। क्योंकि इसमें जो घटता है, उससे कहीं बड़ा है इसका विस्तार। कितनी ही चीजें इस जीवन में आई और हमें उनकी व्यर्थता दिखाई पड़ी । लेकिन खुद जीवन, जो चीजों की परिभाषा बुनता है, अपरिभाष्य है । क्योंकि जिस जीवन में चीजों की व्यर्थता दिखाई पड़ती है,वह खुद व्यर्थ नहीं हो सकता । अर्थहीन चीज अर्थ को कैसे जन्म दे सकती है । इसलिए यह जीवन सार्थक है, क्योंकि यह अर्थों को परिभाषित करता है ।

जीवन की कोई पगडंडियाँ नहीं होती । इन्हें तो व्यक्ति-व्यक्ति को खुद ही बनाना पड़ता है । हर व्यक्ति के लिए जीवन का अर्थ उतना ही होता है, जितना कि वह जीता है और वह उतना ही जीता है, जितना कि वह अपने लिए आकाश देखता है । आकाश अनंत है,लेकिन आप उसे किस नजर से देखते हैं, यह आप पर निर्भर है । आपकी दृष्टि ही सृष्टि बनती है ।

जीवन को देखने की कितनी ही दृष्टियाँ रहीं हैं । लेकिन फिर भी जीवन रहस्यमय बना रहता है । इन विभिन्न दृष्टियों में भी एकता दिखाई पड़ती है, क्योंकि कोई भी दृष्टि संपूर्ण का अंश ही हो सकती है । संपूर्ण सत्ता में हम सब संबंधित है । एक अदृश्य सेतु से बंधे हुए । मैं कभी यह नहीं कह सकता कि मेरा अस्तित्व तुम्हारे अस्तित्व से भिन्न है । क्योंकि वस्तुत: आपका होना ही मेरा होना है । हम संपूर्णता की सत्ता के अंश मात्र हैं । आपके न होने से मुझ में कुछ रिक्त हो जाएगा, इस रिक्तता को कोई नहीं भर सकता ।

वस्तुत: मेरा या आपका अस्तित्व नहीं है, बल्कि स्वयं अस्तित्व का ही अस्तित्व है । हम सिर्फ उसके रूप हैं, जो बदलते रहते हैं । और जब तक मैं और तू की लहरें रहती हैं, तब तक हममें अधूरापन रहता है । जब हम स्वयं को अस्तित्व से अलग समझते हैं, तभी यह अधूरापन दिखाई पड़ता है । किंतु आपका और मेरा जीवन अलग-अलग अस्तित्व नहीं रखता । यह संयुक्त है । सब जीवन उसी में समाहित हैं । व्यक्ति को जब यह दृष्टि मिलती है, तभी उसे पूर्णता की अनुभूति होती है ।

इन अर्थों में जीवन की कोई परिभाषा नहीं हो सकती । क्योंकि अगर इसे परिभाषा में बांधते हैं, तो इसके रहस्य को, इसके विस्तार को सीमा में बांध रहें हैं । जो सब कुछ है, उसकी परिभाषा कैसे हो सकती है ? परिभाषा तो उन चीजों की ही की जा सकती है, जो इस जीवन में प्रतिबिंबित होती है। उस जीवन की नहीं जिसमें वह सब प्रतिबिंबित होता है । क्योंकि हम उसको नाम दे सकते हैं, जो हम नहीं हैं, पर जो हम हैं, उसे नाम या परिभाषा कैसे दें ?

जीवन सदा से है और सदा रहेगा । लेकिन इसके रूप बदलते रहेंगे । किंतु जीवन, "जीवन-नहीं" कभी नहीं होगा ।


यारो ! मैं तो बहता हूँ, निरुद्देश्य ही
चारों ओर इन उद्देश्य की आंधियों में
जाने मेरा क्या वजूद हो इन आंधियों में
यारो ! मैं तो बहता हूँ अंतत: यहीं और अभी
यही जीवन है कि रुकता नहीं सफर इसका ।