मंगलवार, 22 सितंबर 2009

गुनाह-ए-मोहब्बत

मुझे तुमसे कितना प्रेम है
इसका यकीं तुम्हें कैसे दिलाऊँ
बस मैं तो इतना ही जानता हूँ
कि इस दिल में बसा चेहरा तुम्हारा
मुझे पुकार-पुकार कर बार-बार तुम्हारी
याद दिला देता है -
भुला दोगी मुझको यूँ तुम
ये सोचा भी नहीं था कभी
बदल देगा मेरा प्यार तुम्हें -
मुझको तो यह पूरा यकीं था
पर नहीं प्यार तुझको मुझे
जब कहा तूने यह -
तो तुम्हारी आंखों में कोई भाव न था
जब तुम्हें मुझसे कोई प्यार नहीं है
फिर भी मैं तुम्हें भूला नहीं पा रहा हूँ
तो मैं जो तुम्हें इतना प्यार करता हूँ
मुझे कैसे भूला सकती हो तुम ?
मुझे भूलना इतना आसां तो नहीं
क्योंकि मुझे मालूम है
कि मैंने तुम्हें अपनी रुह से ज्यादा चाहा है
और वह जानती है कि मेरी चाहत में कोई गुनाह नहीं है
फिर यह कैसे हो सकता है
कि तुम मुझे भूल जाओ
और भूल जाओ वे क्षण
जो शाश्वत थे ...शाश्वत हैं ...
जब हमारे बीच कुछ घट रहा था
जिसके गवाह हैं हम दोनों !

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