बुधवार, 2 सितंबर 2009

अहंकार की परिणति

बूंद को समुद्र में अपनी सत्ता का विलय अच्छा न लगा ।
वह अपनी अहंता और पृथकता बनाए रखना चाहती थी ।
नदियों ने उसे इस विरक्तता से आगाह भी किया ।
पर वह मानी नहीं, और अलग ही बनी रही ।
तेज सूर्य किरणों में वह भाप बन हवा में उड़ गई और बादलो में खोने लगी ।
बादलों के साथ यह दोस्ती उसे रास नहीं आई ।
रात हुई और वह पत्तों पर ओस बनकर अलग-थलग पड़ी रही ।
धूप रोज निकलती, उसे ऊपर उठाती, पर उसे नीचे ही गिरना जो पसंद था ।
सर्प ने उस ओस को चाटा और विष में बदल दिया ।
जो न समुद्र बनते और न बादल अंतत: उन्हें विष में बदलना पड़ता है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. तभी रत्नाकर जी ने कहा है उद्धव शतक मे
    जैसे बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि की,
    बुँदता बिलैहे बूँद बिबस बिचारी की

    खूबसूरत

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  2. कतरा गर दरिया से जुदा हो जाए तो उसकी क्या बिसात ......कुछ भी नहीं...
    और अगर संगति किसी ऐसे वैसे की हो जाए तो फिर अमृत से विष बनते कहाँ देर लगी...
    बहुत ही सुन्दर दृष्टांत ....हमेशा की तरह नायाब.....अनोखा...
    ह्रदय से धन्यवाद आपका....

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