बुधवार, 23 सितंबर 2009

उनकी आँख -मिचौनी

क्यों तुम करती हो
मेरे सम्मुख अभिनय
कभी झूठ को सच साबित करने का
तो कभी सच को झूठ साबित करने का
यदि नहीं बचा है हमारे बीच कोई रिश्ता
तो यह आँख-मिचौनी क्यों
मुझसे भी क्या डरना
जिसने कभी तुम्हारा बुरा चाहा नहीं
यह मैं और मेरी रुह दोनों जानती हैं
फिर क्यों नहीं कहती अपनी बात
जैसी है तुम्हारे हिय में वैसी बात
प्रिय-प्रियतम में यह अभिनय कैसा
जब तक मुझे यूँ उलझाती रहोगी
सच से सकुचाती रहोगी
दुनिया से डरती रहोगी
मुझे कभी न पा सकोगी
मुझे पाना है तो दुई के पर्दे को हटा
और तू जैसी है वैसी ही मेरे समक्ष
आ जा !!!
समझता हूँ नारी लज्ज़ा और अभिनय का फर्क
अच्छी तरह से मैं
मुझे मत उलझाओ इन झूठे वास्तों में
जो कहना है स्पष्ट कह दो
और बात खत्म करो

2 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज भाई पहली बार आपके ब्लॉग पर आया लेकिन आपकी लेखनी ने मन मोह लिया . बहुत सुन्दर अभिव्यक्ती

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