मंगलवार, 1 सितंबर 2009

प्रीत पराई

वो आए
दिल पर दस्तख दी
द्वार खुला था
अंदर तक नि:संकोच चले आए
ठहरे, पहचान बनाई, कहानी रची
पर बाहर हरदम झांकते रहे
किसी से बतियाते रहे
किसी को जलाते रहे
मासूम दिल पर जब उनके निशान बन गए
उलटे पाँव बाहर निकल गए
एक दर्द का रिश्ता देकर
वो बाहर किसी सुलझे से उलझते गए
हम भीतर जख्मों से उलझते रहे
जिन्हें शिद्दत से पलकों पर नवाजा था
वो आँसू बन कर पुतलियों से बह गए !

3 टिप्‍पणियां:

  1. पर बाहर हरदम झांकते रहे
    किसी से बतियाते रहे
    किसी को जलाते रहे
    भारती जी,
    ये..............क्या हुआ ?
    कैसे हुआ ?
    कब हुआ ?
    क्यूँ हुआ ?
    जब हुआ ?
    तब हुआ ?
    गज़ब हुआ ?
    और अब क्या होगा ????

    उत्तर देंहटाएं
  2. अदा जी !

    सादर प्रणाम,

    कोई हमारे साथ कितना ही बुरा करे, कहीं न कहीं वह हमें माँझने सँवारने का हिस्सेदार बनता है । बस जरूरत है तो सजग होकर सारी प्रक्रिया को समझने की ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक दर्द का रिश्ता देकर
    वो बाहर किसी सुलझे से उलझते गए
    हम भीतर जख्मों से उलझते रहे
    जिन्हें शिद्दत से पलकों पर नवाजा था
    वो आँसू बन कर पुतलियों से बह गए !

    कोई बात नहीं, जिंदगी की ऐसी ठोकरें, स्वतः बहुत कुछ सिखा देती हैं.............
    भावयुक्त आपकी यह कविता रोचक लगी.
    बधाई

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं