मंगलवार, 15 सितंबर 2009

सौंदर्य-परख

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के जीवन की एक घटना । एक रात किसी पर्यटन स्थल पर नौका में सवार थे । किसी मित्र ने सौंदर्यशास्त्र (एस्थेटिक्स) पर एक बहुत बड़ा ग्रंथ उन्हें भेंट किया था । अपने बजरे में बैठकर दीये की रोशनी में उसे पढ़ते रहे । सौंदर्य क्या है ? इसकी परिभाषा क्या है ? यह कितने प्रकार का होता है ? और इसी तरह की विभिन्न चर्चाएँ ग्रंथ में विस्तार के साथ दी गई थी । जितना शास्त्र को पढ़ते गए, उतना ही यह ख़्याल भूलते गए कि सौंदर्य क्या है ? शब्द और शब्द, उलझन और उलझन ... सिद्धांत पर सिद्धांत बढ़ते जाते थे, तब आधी रात ऊबकर ग्रंथ को बंद कर दिया ।
आँख उठाकर बाहर देखा तो आश्चर्य चकित रह गए । बजरे की खिड़की के बाहर सौंदर्य बिखरा पड़ा था । पूरे चाँद की रात थी । आकाश से चाँदनी बरस रही थी । नदी की लहरें चाँदी हो गई थी । सन्नाटा और मौन दूर तक फैला था । दूर-दूर तक सब नीरव था । सौंदर्य वहां पूरा मौजूद था । तब उन्होंने सिर पीटा और स्वयं से कहा - सौंदर्य द्वार के बाहर मौजूद है और मैं उसे किताब में खोजता हूँ, जहां केवल शब्द ही शब्द हैं और कोरे सिद्धांत हैं । उन्होंने वह किताब बंद कर दी और बाहर फैले सौंदर्य में डूब गए ।
अगले दिन मित्र को पत्र लिखा - मित्र तुम्हारी किताब धन्यवाद सहित वापस लौटा रहा हूँ । सौंदर्य क्या है ? इसे जानने के लिए आपकी पुस्तक हेतु बनी । जब तक इसे पढ़ता था, सौंदर्य द्वार पर थपकी देता रहा और मैं सौंदर्य से वंचित रहा । लेकिन जैसे ही दीपक बुझाया और बाहर दृष्टि गई तो पाया कि सौंदर्य तो अपने पूर्ण यौवन पर बाहर खड़ा है । इसके साथ ही मुझे एक ओर सत्य दिखाई पड़ा कि जब तक मैं एक छोटा सा दीया (अहंकार का) जलाकर भीतर बैठा था, तब तक परमात्मा की रोशनी भीतर नहीं आ पा रही थी । मेरा दीया परमात्मा के दीये के लिए दीवाल बना हुआ था, उसके प्रकाश को भीतर नहीं आने दे रहा था । और जैसे ही मैंने अपने भीतर के अहंकार को बूझा दिया, तो उसका प्रकाश मेरे भीतर आलोकित हो उठा ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा दीया परमात्मा के दीये के लिए दीवाल बना हुआ था, उसके प्रकाश को भीतर नहीं आने दे रहा था । और जैसे ही मैंने अपने भीतर के अहंकार को बूझा दिया, तो उसका प्रकाश मेरे भीतर आलोकित हो उठा ।

    सुन्दर !! अंहकार रुपी दीवार आध्यात्म की रौशनी को कभी भी अन्दर प्रवेष नहीं करने देगी.... .

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  2. ....जब तक इसे पढ़ता था, सौंदर्य द्वार पर थपकी देता रहा और मैं सौंदर्य से वंचित रहा । लेकिन जैसे ही दीपक बुझाया और बाहर दृष्टि गई तो पाया कि सौंदर्य तो अपने पूर्ण यौवन पर बाहर खड़ा है ।

    BAdi gehri baat hai.

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