शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

नीत्शे के बहाने

प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्शे ने कहा है :

विशाल जन-समूह निरे साधन हैं
अथवा रुकावटें
या नकलें हैं
महान कार्य ऐसी सामूहिक हलचल पर
निर्भर नहीं हुआ करते,
क्योंकि सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ का भी
जन-समूह पर कोई
प्रभाव नहीं !

कितना सही कहा है । सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ हमेशा भीड़ से अलग अकेला खड़ा होता है और हर सफल इंसान सफल इस लिए होता है क्योंकि वह भीड़ से अलग कुछ विशेष रखता है । दूसरी ओर यह भी सच है कि सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ का भी जन-समूह पर कोई प्रभाव नहीं ! कितने लोग सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ, फिर चाहे वे कलात्मक फिल्में हों या उत्कृष्ट साहित्य पसंद करते हैं । निश्चित ही सर्वोत्तम सर्वोत्तम को ही प्रभावित कर सकता है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. "धर्म " इस शब्दकी व्याख्या गर हम देखें , तो प्राचीन भारतीय भाषायों में इसका उपयोग निसर्ग के नियमों से जुडा है .."धारयती इती धम्म"...जैसे इंसान हैं,तो इंसानियत धारण करें...या जैसे अग्नी का ' स्वभाव धर्म' है जलना और जलाना...यहाँ किसी आत्मा परमात्मा या , मनकी किसी धारणा का सम्बन्ध नही...क़ुदरत के क़ानून, पृथ्वी/धरातल की पीठ पे कहीं जायें एक सामान हैं...
    रुतु का अर्थ है, निसर्ग के के बने मौसम, या उनसे निगडित कानून...इनका जो अभ्यास करता है,समझता है, वह है रूषी...a scientist (अब ये " rushee" शब्द भी जैसे अवतरित होना चाहिए वैसा नही हो रहा ,क्षमा करें!)Pahlee baar maine padha ki, dharm is shabd kaa kisee ne sahee proyog kiya hai...anek aabhaar...maine jo samajha vahee likha hai..
    गर छोटा मुँह और बड़ी बात कह दी हो तो फिर एकबार माफी चाहती हूँ।

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