सोमवार, 28 सितंबर 2009

सौंदर्य

ज्ञात के मौन आमंत्रण में सौंदर्य है ।

बाह्य लिपा-पोती कुरुपता को ढ़ांपने के लिए है । क्या सौंदर्य को भी बाह्य प्रसाधनों और सजने-संवरने की जरूरत होती है ?

सौंदर्य शरीर का ही नहीं बल्कि उसके अंतस का भी होता है । कुछ लोग शारीरिक सौंदर्य के अहंकारवश अंतस सौंदर्य को खो देते हैं ।

सौंदर्य सदैव एक नवीन अहसास है । अनुभव है । प्रकृति में सौंदर्य प्रतिक्षण निखर रहा है । सौंदर्य को देखने के लिए संवेदनशीलता चाहिए । प्रकृति में सौंदर्य भरा पड़ा है । जिन्हें प्रकृति का यह सौंदर्य दिखाई नहीं पड़ता, उन्हें संवेदनशीलता पुन: प्राप्त करनी होगी । सौंदर्य का संबंध मन से है । जहां कहीं सौंदर्य का अभाव आरोपित किया जाता है, वहां कुरुपता दिखाई देती है ।

सौंदर्य अधिकार-भाव से मुक्त है । सुंदरता कभी अधिकारपूर्वक नहीं कहती - "मैं सुंदर हूँ ।" सौंदर्य आंतरिक भाव है । अंतस सजग है और वह क्षण प्रति क्षण जीना जानता है तो सर्वत्र सौंदर्य है ।

कृष्ण श्याम वर्ण हैं, फिर भी उनमें अद्भूत सौंदर्य है । वे जो हैं उसे पूर्णता से, सजगता से और सहजता से जीते हैं । अपने अंतस के अतिरिक्त वहां कुछ और होने का प्रयास या भाव किंचित भी नहीं है । वस्तुत: जो स्वयं में स्थित हो कर जीता है- वह सुंदर है । सौंदर्य उसकी पूजा करता है ।

जो सौंदर्य वासना की पूर्ति हेतु आरोपित किया गया है । वह टूटेगा, खण्डित होगा और कुरुप हो जाएगा । वासनामय दृष्टि सौंदर्य से अंधी होती है । वासना-ग्रसित व्यक्ति सौंदर्य क्या जाने ?

सूर्योदय से सूर्यास्त तक और फिर रात्रि से भौर तक सौंदर्य ही सौंदर्य बिखरा पड़ा है । क्या कोई क्षण है जो सौंदर्य से आपूरित न हो ? क्या कोई स्थान ऐसा है जहां सौंदर्य का अभाव हो ?

वस्तुत: सौंदर्य अस्तित्व का परम फूल है जो कभी मुरझाता नहीं ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. कृष्ण श्याम वर्ण हैं, फिर भी उनमें अद्भूत सौंदर्य है

    समझदार के लिए आपकी उपरोक्त बात ही बहुत कुछ कह देती है, पर अफ़सोस कि हम पढ़ लिख कर भी समझाना ही नहीं चाहते.

    मैं आपकी समस्त बैटन से सहमत हूँ और इसी विचारधारा का भी हूँ, प्रकृति में गहरा विश्वास और कृतिमता से तीव्र विरोध.

    हार्दिक आभार, इतने अच्छे विचारों से अवगत करने के लिए...........

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  2. सौंदर्य के मायने यूँ तो सबकी नज़रों में अलग अलग हैं परन्तु प्रकृति के नियम अपने ही नियम हैं ...प्राकृतिक सौंदर्य की बात ही कुछ और है ....लीपा पोती ( राजनीतिक नहीं ) करके तो कोई भी सुन्दर बन सकता है ...

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  3. सौंदर्य अस्तित्व का परम फूल है जो कभी मुरझाता नहीं

    sach kaha hai aapne.........

    सौंदर्य अस्तित्व का परम फूल है जो कभी मुरझाता नहीं....

    thnx for sharing..

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  4. वाह वाह क्या बात है! अत्यन्त सुंदर! आपकी लेखनी को सलाम!
    मेरे इस ब्लॉग पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

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  5. वस्तुत: सौंदर्य अस्तित्व का परम फूल है जो कभी मुरझाता नहीं .

    bahut sunder.saundrya ki purn paribhasha.

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