शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

कोई ख़्याल कैसे आ जाता है ...

क्षण-प्रतिक्षण
विचार आते रहते हैं मन में
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

जितना ज्यादा पकड़ने लगता हूँ इनको
उतने ही बढ़ते जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

ढ़ूँढ़ता हूँ, खोजता हूँ, उत्स इनका
पर ये बढ़ते ही जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

जितना खोजता हूँ, उतने ही और और
भांति-भांति के ख़्याल बढ़ते जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

इनमें से कुछ विचार तो प्रतिक्रिया स्वरूप हैं
जो अच्छा नहीं लगता मुझे उसकी एवज में
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

कुछ विचार जो मुझे अच्छे लगते
वे इकट्ठे होते जाते किसी बंद गहरी अंधेरी गुहा में
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है


जो विचार इकट्ठे होते जाते बंद गहरी अंधेरी गुहा में
वे मेरा स्वरूप बनते जाते हैं
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

लेकिन कौन है जो चुनता बिंदु-बिंदु
इन विचारों को और अवसर पर उच्छाल देता गहरी अंधेरी गुहा से
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

और कौन है जिसे अच्छा नहीं लगता कोई विचार
और नहीं बन पाता मेरा भाव-बोध
कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
इन पर किसका बंधन है

नहीं ढ़ूँढ़ पाया उत्स इनका
लेकिन देख पाया हूँ कि ख़्यालों का ताना-बाना ही मन है
और जो ख़्याल आता इस मन में
वो किसी की प्रतिछाया है, जो खो जाती है स्वयं के सान्निध्य में आने पर

2 टिप्‍पणियां:

  1. नहीं ढ़ूँढ़ पाया उत्स इनका
    लेकिन देख पाया हूँ कि ख़्यालों का ताना-बाना ही मन है
    और जो ख़्याल आता इस मन में
    वो किसी की प्रतिछाया है, जो खो जाती है स्वयं के सान्निध्य में आने पर
    शायद हर ख्याल, हर कल्पना स्वयं के सानिध्य में आकर, विलीन हो ही जाती है...
    सुन्दर प्रस्तुति..

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  2. कोई ख़्याल कैसे आ जाता है मन में
    इन पर किसका बंधन है

    अति सुन्दर रचना....................


    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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