शनिवार, 31 दिसंबर 2011

काम

तीसरा पुरुषार्थ काम है।इसका शाब्दिक अर्थ है-'इच्छा'। पुरुषार्थ के रूप में काम से अभिप्राय: मनुष्य की उन सभी शारीरिक,मानसिक,संवेगात्मक तथा कलात्मक इच्छाओं की पूर्ति से है जो उसके संपूर्ण विकास और जीवन के परम लक्ष्य(मोक्ष)को प्राप्त करने में सहायक हैं। इच्छा सभी कार्यों की प्रेरक शक्ति होती है। इस प्रकार हर कार्य के पीछे काम का होना एक अनिवार्य शर्त है। इस काम को भारतीय मनीषा ने तीन श्रेणियों में रखा है-सात्विक,राजसिक और तामसिक। सात्विक काम फल की प्रत्याशा के बिना स्वधर्मानुसार(विवेकानुसार)संपन्न किया जाता है। इस तरह का काम धर्मसम्मत होता है। इसीलिए श्री कृष्ण गीता के सातवें अध्याय के 11वें श्लोक में कहते हैं-
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोअस्मि भरतर्षभ॥
अर्थात मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल(अर्थात् सामर्थ्य) हूँ तथा सभी प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम हूँ। 
राजसिक काम विषय,वासना और इंद्रिय संयोग से पैदा होने वाला अहंकारयुक्त और फल की इच्छा से किया जाने वाला काम है। इस प्रकार का काम भोगते समय तो सुखकारी प्रतीत होता है,किंतु परिणाम दुखकारी होता है। तामसिक काम में मनुष्य मोहपाश में बंधा होता है,वह न तो वर्तमान का और न ही भविष्य का कोई विचार करता है। आलस्य,निद्रा और प्रमाद इस काम के जनक कहे गए हैं। इस प्रकार का काम न तो भोगते समय सुख देता है और न ही इसका परिणाम सुखकारी होता है। इन तीनों कामों में सात्विक काम श्रेष्ठ है,जो भोगते समय विषकारी प्रतीत हो सकता है,लेकिन परिणाम सदैव आनंददायी और मुक्तिकारक होता है। अन्य काम बंधन बनते हैं।

काम को संकुचित अर्थों में केवल इंद्रिय सुख और यौन प्रवृत्तियों की संतुष्टि तक सीमित कर दिया गया है। विस्तृत अर्थों में काम से अभिप्राय: मनुष्य की समस्त प्रवृत्तियों और इच्छाओं की विवेकसम्मत पूर्ति से है। मनुष्य में यौन संबंधी इच्छाएं होती हैं और वह इन इच्छाओं को संतुष्ट करना चाहता है। यह मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है। इस इच्छा को अनुचित रूप से दबाना हानिकारक होता है। इस इच्छा की पूर्ति न होने से मनुष्य विक्षिप्त हो सकता है। यही कारण है कि भारतीय मनीषा ने यह स्वीकार किया है कि यौन संबंधी इच्छाओं की तृप्ति जीवन का एक सहज,स्वाभाविक या मूल प्रवृत्यात्मक अंग है। इसकी संतुष्टि के लिए विवाह का विधान है। विवाह के लक्ष्य में धर्म तथा संतानोत्पति के साथ काम(रति) को भी एक उद्देश्य स्वीकार किया गया। गृहस्थ जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य यौन संबंधी संतुष्टि प्राप्त करना है। काम से ही सृष्टि चलती है। इसे अवरुद्ध करना सृष्टि में बाधक है। विपरीत लिंग के प्रति प्रेम और आकर्षण काम के ही कारण है।'कामसूत्र' के रचयिता वात्स्यायन का कहना है कि काम को उच्छृंखल नहीं छोड़ना चाहिए। उस पर नियंत्रण बहुत जरूरी है। काम की शक्ति इतनी है कि वह आसानी से वश में नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां वात्स्यायन कामात्मक भावनाओं को कलाओं में लगाने का परामर्श देते हैं ताकि काम-ऊर्जा का उर्ध्वीकरण हो सके। जिससे एक ओर तो काम की सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति होती है दूसरी ओर नैतिक विकास भी।  यहीं से काम का दूसरा पक्ष स्पष्ट होता है। यह मनुष्य के संवेगात्मक,उद्वेगात्मक और सौंदर्यात्मक जीवन को प्रकट करता है। इसी को स्पष्ट करने के लिए वात्स्यायन कामसूत्र में 64 कलाओं का वर्णन करता है। कामसूत्र में वासनामय काम का ही वर्णन नहीं बल्कि उससे अधिक मानसिक और नैतिक विकास के साधनों और कलाओं पर भी विस्तृत रूप से विचार किया गया है। मनुष्य का काम ही सुंदर वस्तुओं के निर्माण में सहायक बनता है। मनुष्य आदिकाल से ही सौंदर्य का इच्छुक रहा है। वह मात्र सौंदर्य को देख कर ही खुश नहीं होता बल्कि स्वयं सौंदर्य की रचना भी करना चाहता है। इससे मनुष्य और पशु के बीच एक अंतर स्पष्ट होता है। मनुष्य कला का सृजन कर सकता है,लेकिन पशु ऐसा नहीं कर सकते। मनुष्य केवल खाने-पीने की सामग्री पाकर,पहनने के लिए अच्छे कपड़े पाकर और रहने के लिए अच्छे घर को पाकर ही खुश नहीं होता। रोटी,कपड़ा और मकान की प्राप्ति के बाद भी उसकी बहुत सी इच्छाएं होती हैं। वह स्वयं सर्जक बनना चाहता है। सौंदर्य में रमना चाहता है। वह जिस सौंदर्य को देखता है,उसे वैसा ही नहीं देखना चाहता बल्कि उसमें कुछ और जोड़ देना चाहता है। उसके इस प्रयास में ही अनेक कलाओं का विकास हुआ है। मनुष्य अपने तमाम संघर्षों और व्यस्तताओं के बावजूद इतना समय और अवसर निकाल ही लेता है कि वह खेल-कूद सके या संगीत,नृत्य,रंगमंच,लेखन और विभिन्न सृजनात्मक कलाओं आदि में स्वयं को डूबो सके। इस प्रकार के सृजनात्मक व सौंदर्य की अभिव्यक्तिपरक कामों से वह आनंदलोक में पहुंच जाता है और इन क्षणों में वह सर्वस्व विस्मरण कर देता है। उसका हृदय पक्ष सबल हो जाता है और मानवीय संवेदना शिखर पर पहुंच जाती है। स्पष्ट है कि मानव की सृजनात्मक प्रवृत्तियों को यदि अवसर न मिले तो उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। जीवन का आनंद सृजनात्मक प्रवृत्तियों में ही है। काम की शक्ति ही सृजन में परिवर्तित होकर प्रशंशित होती है और जीवन को विकसित करती है। अत: मानव की इस मूल प्रवृत्ति को दबाना उचित नहीं बल्कि उसके समन्वित विकास के लिए उसे सृजन में लगाना मध्यम-मार्ग है,जो पुरुषार्थ का सिद्धांत प्रदर्शित करता है।

गीता में इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए काम को तृप्त करने के लिए कहा गया है। गीता के दूसरे अध्याय के 62वें और 63वें श्लोक में कहा गया है कि विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की इन विषयों के साथ आसक्ति हो जाती है;आसक्ति से काम पैदा होता है और काम की तृप्ति न होने से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से मोह पैदा होता है, मोह से स्मृति-भंग,अविवेक पैदा होता है। अविवेक से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि नष्ट हो जाने से मनुष्य नष्ट हो जाता है अर्थात् पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता।

स्पष्ट है कि नियंत्रित और विवेकसम्मत तथा कलाओं में लगाया गया काम जीवन को सुखी और आनंदमय बना देता है। किंतु वासनामय काम मनुष्य को नीचे गिरा देता है। काम साधन है,साध्य नहीं। यह धर्म का साधन है न कि स्वयं साध्य और वहीं तक उचित है जहां तक कि उसका उपयोग संयमित और धर्मानुकूल है। काम सृजनात्मक होकर ही सार्थक और मुक्ति का मार्ग बनता है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

अर्थ

हिंदू जीवन दर्शन में 'अर्थ' को दूसरा पुरुषार्थ कहा गया है। अर्थ का शाब्दिक अर्थ 'वस्तु' या 'पदार्थ' है। इसमें वे सभी भौतिक वस्तुएं आती हैं जिन्हें जीवन यापन के लिए मनुष्य अपने अधिकार-क्षेत्र में रखना चाहता है।अर्थ से ही मनुष्य अपने उदर की पूर्ति करता है।कर्त्तव्य-निर्वहण में अर्थ की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अर्थ में केवल धन या मुद्रा ही नहीं बल्कि वे सभी चीजें शामिल हैं जिनसे भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। भारत में कभी भी अर्थ को उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखा गया। बल्कि इसे धर्म का साधन कहा गया है। संस्कृत में एक श्लोक है-'धनाद् धर्म' अर्थात् धन से धर्म की सिद्धि होती है। भारतीय धर्मशास्त्रों में धर्म-संबंधी ही चर्चा नहीं है,बल्कि उनमें अर्थनीति,राजनीति,दंडनीति आदि विषयों पर भी चर्चा हुई है। समाज व्यवस्था में अर्थ का नियोजन बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।कौटिल्य ने अपने 'अर्थशास्त्र' में बहुत से विषयों जैसे राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा,मंत्री-मंडल,जासूस,राजदूत,निवास,शासन-व्यवस्था,दुष्टों की रोकथाम,कानून,वस्तुओं में मिलावट,मूल्य-नियंत्रण,झूठे नाप-तौल को रोकने के उपाय,कूटनीति,युद्ध-संचालन,गुप्त-विद्या आदि बहुत से विषयों पर सुलझे हुए विचार दिए हैं; जो उसके अर्थशास्त्र से जुड़े हुए हैं। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी ये विचार न केवल व्यवहारिक बल्कि समीचीन भी हैं।वात्स्यायन ने अपने 'कामसूत्र' में अर्थशास्त्र के अंतर्गत पशु,अनाज,सोना,चांदी,मित्र,शिक्षा आदि की उन्नति को सम्मिलित किया है। इन सब शास्त्रों में अर्थ पर विचार करते हुए इस बात का उल्लेख हुआ है कि अर्थ का इस्तेमाल धर्म के साधन रूप में किया जाए, न कि साध्य के रूप में। इस प्रकार भारतीय संस्कृति में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति मनुष्य का लक्ष्य है।अर्थ मनुष्य की उन्नति के लिए है,उसके पतन के लिए नहीं। इसलिए यह अन्य पुरुषार्थों का साधन है न कि स्वयं साध्य। 

मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएं रोटी,कपड़ा और मकान अर्थ से ही पूरी होती हैं।शिक्षा,स्वास्थ्य और सुविधा भी अर्थ से ही पूरी होती हैं। इसी लिए भारतीय धर्मशास्त्रों में मनुष्य की दूसरी अवस्था (गृहस्थ आश्रम) में धन कमाना मनुष्य का लक्ष्य कहा गया है। एक श्लोक में कहा गया है कि जिस मनुष्य ने अपनी पहली अवस्था(ब्रह्मचर्य आश्रम) में विद्या नहीं ग्रहण की, दूसरी अवस्था (गृहस्थ आश्रम) में धन नहीं अर्जित किया, तीसरी अवस्था (वानप्रस्थ आश्रम)में तप नहीं किया, वह चौथी अवस्था(संन्यास आश्रम) में क्या कर सकेगा अर्थात् उसका जन्म व्यर्थ है -
आद्ये वयसि नाद्योतं द्वितीये नार्जिते धनम्।
तृतीय न तपस्तप्तं चतुर्थे किं करिष्यति ॥
द्वितीय अवस्था में धन कमाना इसलिए जरुरी है क्योंकि इस अवस्था में व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। उसका परिवार बनता है। परिवार की आवश्यकताओं के लिए धन का होना जरुरी है। इस तरह से धर्म(कर्त्तव्य) और काम की पूर्ति का साधन अर्थ है।धर्म समाज को धारण करता है और काम समाज में प्रवाह बनाए रखता है।

अर्थ को भारतीय संस्कृति में वहीं तक महत्व प्राप्त है,जहां तक वह मनुष्य को शिष्ट और सभ्य बनाए अर्थात उसके विवेक में सहायक हो। मनुष्य के जीवन के लिए अर्थ है,मनुष्य स्वयं अर्थ के लिए नहीं।इसलिए भारतीय संस्कृति में धन के एकत्रीकरण को महत्त्व नहीं दिया गया है।धन को साध्य मान लेने पर समाज का स्वाभाविक पतन होने लगता है।किसी ने सही कहा है- Where wealth accumulates man degenerates.इसलिए संभवत: हिंदू-दर्शन में दान की परम्परा है। ताकि किसी के पास जरूरत से अधिक धन का संचय न हो। धर्म,अर्थ और काम में सबसे ऊँचा धर्म है क्योंकि धर्म ही अर्थ और काम के सही उपयोग का पथ-प्रदर्शक है।पंचतंत्र और हितोपदेश के बहुत से नीति-श्लोकों में इस बात को समझाया गया है। 

आधुनिक संदर्भ में देखें तो अर्थ में सभी आर्थिक-क्रियाएं समाहित हैं।संपत्ति का उत्पादन,उपभोग,विनिमय,वितरण आदि।हमारी सरकार को अर्थ का नियोजन-विनियोजन इस प्रकार से करना चाहिए कि धन का प्रवाह बना रहे।वह कुछ लोगों के पास एकत्रित न हो। जिससे कि समाज के सभी वर्गों तक धन पहुंचे और उसे अपनी समाज-व्यवस्था और आर्थिक नीतियां इस रूप में तैयार करनी चाहिए जिससे कि सभी का समुचित उन्नयन हो,सभी को मूलभुत सुविधाएं मिलें। अर्थ के दुरुपयोग से समाज में अपराध बढ़तें हैं लोगों में असुरक्षा का भाव आता है और लोग अपने कर्त्तव्य से च्युत होते हैं। 

रविवार, 6 नवंबर 2011

धर्म

धर्म शब्द आज बहुत ही दूषित हो गया है। धर्म के साथ जो चीजें जुड़ गई हैं,वे धर्म के बिलकुल विपरीत्त हैं। भारतीय संस्कृति का मूल धर्म ही है। बल्कि कहना चाहिए कि भारतीय संस्कृति का प्राण धर्म है। धर्म ही भारतीय संस्कृति के सभी मूल्यों व आदर्शों को निश्चित करता है।दूसरे देशों की संस्कृति में जहां भौतिक तत्त्व की प्रधानता है,वहीं भारतीय संस्कृति में धर्म की प्रधानता है। इसलिए वह आध्यात्मिक संस्कृति है। धर्म शब्द को परिभाषा में बांधना कठिन ही नहीं बल्कि दुष्कर है। धर्म शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की धृ धातु से हुई है। जिसका अर्थ है-'धारण करना'। इस प्रकार धर्म वह है जिसके धारण करने से व्यक्ति व्यष्टि से समष्टि से जुड़ जाता है।
धारणात् धर्ममित्याहु: धर्मो धारयति प्रजा: 
अर्थात् धारण करने वाले को धर्म कहते हैं; धर्म प्रजा को धारण करता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि धर्म व्यक्ति ही नहीं धारण करता बल्कि स्वयं धर्म भी व्यक्ति को धारण किए हुए है। धर्म से व्यक्ति को और व्यक्ति को धर्म से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

पंचतंत्र में धर्म की परिभाषा मनुष्य को अन्य जीवधारियों से अलग करने वाले तत्त्व के रूप में की गई है।खाना,सोना,भय और संतानोत्पति मनुष्य और पशुओं में एक समान है। इन क्रियाओं के करने में मनुष्य और पशु दोनों एक ही स्तर पर हैं। लेकिन धर्म मनुष्य को अन्य जीवधारियों से अलग करता है।यदि मनुष्य से धर्म तत्त्व को अलग कर दिया जाए तो मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं है। पंचतंत्र का श्लोक उद्धृत है- 
आहारनिद्राभयमैथुनंच सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मों हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना: पशुभिर्समाना॥
वैशेषिक दर्शन के प्रणेता कणाद धर्म को वैशेषिक सूत्र में इस प्रकार परिभाषित करते हैं- 
यतोभ्युदयनि:श्रेयस सिद्ध: स धर्म:।
अर्थात् जिससे अभ्युदय(सांसारिक सुख) और नि:श्रेयस(आध्यात्मिक कल्याण)प्राप्त हो, वही धर्म है। धर्म का यह लक्षण स्पष्ट रूप से भौतिक और आध्यात्मिक पक्षों में समन्वय स्थापित करता है। निश्चित ही जो धर्म आध्यात्मिकता की ओर ध्यान न देकर केवल भौतिक उन्नति पर ही अपना ध्यान रखता है,वह एकांगी है और धर्म नहीं है।उसी तरह जो भौतिक समृद्धि को छोड़कर केवल आध्यात्मिकता की ओर ही अपना ध्यान रखता है, वह भी एकांगी है और धर्म नहीं है। धर्म वह है जो भीतर के सौंदर्य के साथ-साथ बाहर की समृद्धि में भी अभिवृद्धि करता है। इस प्रकार धर्म भौतिक और आध्यात्मिक पक्षों में समुचित समन्वय और सामंजस्य लाता है। 

धर्म और रिलीजन में अंतर है। धर्म शब्द को बहुत व्यापक अर्थ में लिया गया है। धर्म और रिलीजन एक नहीं हैं। दोनों शब्दों के अर्थों और प्रयोग में बहुत अंतर है। अंग्रेजी के रिलीजन शब्द का प्रयोग केवल बाह्य आचार और व्यवहार के लिए होता है। उसका अर्थ धार्मिक क्रिया-कलापों अर्थात पूजा-पाठ और कर्मकांड से लिया जाता है। लेकिन धर्म शब्द का प्रयोग यहीं तक सीमित नहीं है। धर्म शब्द में पश्चिम का कल्चर और सिविलाइजेशन समाहित है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने तो सिविलाइजेशन के लिए धर्म शब्द को उपयुक्त माना है।स्पष्टत: धर्म रिलीजन नहीं है बल्कि इससे कहीं बृहतर और गहरा है।

मनुस्मृति में धर्म के चार स्रोत बताए गए हैं - श्रुति,स्मृति,सदाचार तथा जो अपनी आत्मा को प्रिय लगे। धर्म में सर्व का कल्याण निहित है। सर्व के कल्याण से इसमें नैतिकता,आदर्श और मूल्य समाहित हो गए हैं।गौतम ने अपने धर्मसूत्र में कहा है- 
अथाष्टा वात्मार्गुणा: दया सर्वभूतेषु: क्षान्तिरनसूया शौच मता मासौ मंगलमय कार्यण्य स्पृहेति।
अर्थात् सब प्राणियों पर दया, क्षमा,अनुसूया,शुचिता,अतिश्रम वर्जन,शुभ में प्रवृत्ति,दानशीलता तथा निलोभता, ये आठ आत्मगुण हैं अर्थात धर्म हैं।

उपनिषदों में कहा गया है कि धर्म समस्त विश्व का आधार है; क्योंकि इसके द्वारा व्यक्ति के आचरण की वे सभी बुराइयां दूर हो जाती हैं,जो विश्व कल्याण में बाधक हैं।

कौटिल्य ने धर्म को वह शाश्वत सत्य माना है जो सारे संसार पर शासन करता है। 

बौद्धधर्म के अनुसार अच्छाई तथा बुराई, सत्य और असत्य में धर्म ही अंतर स्पष्ट करता है।धर्म शासकों का शासक है, तथा यह विश्व में सबसे ऊँचा है।

मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बतलाए गए हैं। मनु ने लिखा है-
धृति: क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्नियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्॥
अर्थात् धैर्य,क्षमा,संयम,चोरी न करना,आंतरिक व बाह्य शुद्धि,इन्द्रियों को वश में रखना,बुद्धि,शिक्षा,सत्य और क्रोध न करना धर्म के दस लक्षण हैं।

स्पष्टत: धर्म  व्यापक अवधारणा है। क्रिया और कर्म में मनुष्य को ऊँचा उठाने वाले सभी मानसिक क्रिया-कलाप धर्म में शामिल हैं। मनुष्य के पास विचारशक्ति है, जिसके द्वारा वह उचित-अनुचित में निर्णय कर सकने में सक्षम है। जहां कहीं उचित और अनुचित के बीच निर्णय का प्रश्न है,वहां उचित का मार्ग दिखाने वाला तत्व धर्म है। इस प्रकार धर्म आध्यात्मिक है। 

भारतीय संस्कृति में चारों पुरुषार्थों में धर्म को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। कालिदास ने 'कुमार संभव' नामक महाकाव्य में धर्म को त्रिवर्ग अर्थात् अर्थ,काम और मोक्ष का सार कहा है।धर्म द्वारा ही भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक अभ्युदय होता है। धर्म अन्य पुरुषार्थों का मूल है। महाभारत में धर्म को अर्थ और काम का स्रोत माना गया है - 
उर्ध्वबाहुर्विरौम्येष, न च कश्चित शृणोति मे।
धर्मादर्थश्च कामश्च, स किमर्थ न सेव्यते॥
अर्थात् मैं बाहों को उठाकर जोर-शोर से चिल्ला रहा हूँ, किंतु मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से ही अर्थ और काम प्राप्त होते हैं, फिर उस धर्म का किसलिए पालन नहीं किया जाता?

केवल महाभारत में ही नहीं बल्कि याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णुस्मृति और मनुस्मृति तथा अन्य धर्मशास्त्रों में भी पुरुषार्थों में धर्म को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है। जो अपने धर्म को छोड़ कर,अन्य का धर्म अपनाता है,धर्म उसका विनाश कर देता है। जो धर्म की रक्षा करता है,धर्म उसकी रक्षा करता है।- 
धर्म एको हतो हन्ति,धर्मो रक्षति रक्षितम्।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो धर्मो वधो वषीत्॥
 यहां अपने धर्म से अभिप्राय: स्वधर्म है जो विवेक से संचालित है। न कि कोई विशिष्ट रिलिजन यथा हिंदू।

गीता में भी धर्म के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। गीता के अठारहवें अध्याय में कृष्ण अर्जुन को धर्म का महत्त्व बतलाते हुए कहते हैं- 
श्रेयान्स्वधर्मों विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्॥
अर्थात गुण रहित होने पर भी स्वधर्म (जो अपना विवेक कहे)पालन करना अच्छा है,चाहे दूसरे का धर्म(विवेक) कितना भी अच्छा क्यों न हो। यदि मनुष्य अपने धर्म का पालन करता है तो वह पाप से बचा रहता है। 

गीता तो यहां तक कह देती है कि अपने धर्म(स्वविवेक) के पालन के लिए प्राण भी गवां देना दूसरे के धर्म(किसी अन्य की समझ से चलने से)पालन से अच्छा है, क्योंकि दूसरे का धर्म भयावह (अपरिचित) है।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मों भयावह:
धर्म के इस महत्त्व को पुराणों में भी स्वीकार किया गया है। पुराणों का कहना है कि अधर्मी (अपने विवेक से च्युत) पुरुष यदि काम और अर्थ संबंधी क्रियाएं करता है तो उसका फल बांझ स्त्री के पुत्र जैसा होता है अर्थात् उनसे किसी प्रकार के कल्याण की सिद्धि नहीं होती।

हमें धर्म के वास्तविक अर्थ को समझना चाहिए और इसे गलत संदर्भों में इस्तेमाल करते हुए इसके अर्थ को विकृत और प्रदूषित नहीं करना चाहिए।


रविवार, 30 अक्तूबर 2011

पुरुषार्थ

पुरुषार्थ क्या है?
पुरुषार्थ हिंदू सामाजिक व्यवस्था का मनो-सामाजिक आधार है।हिंदू सामाजिक दर्शन के अंतर्गत प्रतिपादित पुरुषार्थ की अवधारणा,जीवन के प्रमुख लक्ष्य की व्याख्या करती है। इसके अंतर्गत चार पुरुषार्थ स्वीकृत हैं,जो मानव के उन चार लक्ष्य-स्तम्भों की ओर संकेत करते हैं,जिनकी प्राप्ति मानव जीवन के लिए अनिवार्य है। भारतीय दर्शन के अनुसार,मानव जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है।अर्थ तथा काम इस लक्ष्य तक पहुंचने के माध्यम हैं। इन माध्यमों का प्रयोग किस प्रकार किया जाय,इसे स्पष्ट करने वाला महानियम धर्म है। इस प्रकार हिंदू दर्शन ने मानव जीवन के लिए धर्म,अर्थ,काम व मोक्ष को स्वीकार किया है।हमारा स्पष्ट मत है कि"पुरुषार्थ व्यक्ति के होने का अर्थ सिद्ध करता है।"काम तो प्रत्येक मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।काम और अन्य जीवन आवश्यकताओं की पूर्ति तथा समाज की जीवन व्यवस्था का साधन है-अर्थ अर्थात धन। धर्म वह महानियम है जिसके नियंत्रण में काम और अर्थ का संयमित उपयोग होने पर जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष सहज ही प्राप्त हो जाता है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार,जिससे इस लोक में मनुष्य की उन्नति हो और परलोक में मुक्ति की प्राप्ति हो,वही धर्म है।धर्म,अर्थ और काम समूह को त्रिवर्ग कहा गया है।धर्म नैतिक आदर्शों को बताता है।अर्थ से भौतिक साधनों की पूर्ति होती है और काम मनुष्य की शारीरिक,मानसिक और प्राणात्मक इच्छाओं को पूरा करता है। अर्थ और काम मनुष्य के सामाजिक पक्ष का बोध कराते हैं,जबकि धर्म नैसर्गिक पक्ष की तरफ संकेत करता है। काम शब्द का संबोधन न्यूनतम स्तर पर वासना(सेक्सुअल ड्राइव) के लिए होता है,जिसे मनुष्य के छ: दुश्मनों में से एक माना जाता है।काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद और मत्सर(ईर्ष्या) मनुष्य के यही छ: रिपु हैं। इस संसार में अर्थ बिना काम नहीं चल सकता। जीवन को बिताने के लिए भौतिक साधनों का होना आवश्यक है। काम भी सृष्टि की वृद्धि के लिए परमआवश्यक है। काम की पूर्ति हेतु विवाह का प्रावधान है।अर्थ और काम धर्म के आधार पर ही अपनाए जाने चाहिए। धर्म सर्वोच्च है और अर्थ को मध्य स्थान पर रखना चाहिए तथा काम को सबसे निम्न स्थान पर रखा जाए।तभी जीवन में संतुलन और मोक्ष की प्राप्ति संभव है। गीता में रजोगुण को काम की उत्पत्ति का स्रोत माना गया है। गीता के अनुसार,"जिस प्रकार धुयें से अग्नि और मन से दर्पण ढक जाता है,उसी प्रकार काम ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।"धर्म पर चलते हुए अर्थ का अर्जन और काम की तुष्टि करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। इस त्रिवर्ग के द्वारा मनुष्य अपने जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।इस प्रकार पुरुषार्थ सार्थक जीवन शक्ति का प्रतीक है,जो सांसारिक सुख-भोग के बीच,धर्म पालन के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।

डॉ. कपाड़िया के अनुसार, "मोक्ष मानव जीवन का चरम लक्ष्य तथा आध्यात्मिक अनुभूति का प्रतीक है।काम मानव की सहज प्रवृत्ति तथा उसकी संतुष्टि की ओर संकेत करता है।अर्थ मानव और सांसारिक क्रिया-कलापों का प्रतिनिधित्व करता है। धर्म पाश्विक तथा दैवी प्रकृति की शृंखला है।इस प्रकार भारतीय विचारधारा के अंतर्गत मानव के चरम लक्ष्यों को चार प्रमुख भागों में विभक्त किया गया है। मानव जीवन के इन चार लक्ष्यों को समन्वित रूप से पुरुषार्थ कहा गया है।"

पुरुषार्थ जीवन का संतुलित पक्ष बनाते हैं और सामाजिक-व्यवस्था में लोक मानस के मनो-सामाजिक आधार बनते हैं।इन्हीं के आधार पर आश्रम-व्यवस्था बनी है।

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

गोत्र या प्रवर की वैज्ञानिकता

सगोत्र और सप्रवर निषेध में समाजशास्त्री कोई वैज्ञानिकता नहीं देखते। वे इसे सामाजिक विकास का एक प्रारूप मात्र स्वीकार करते हैं।उनके अनुसार यह कोई सनातन परम्परा नहीं है,क्योंकि यज्ञ के लिए चुने गए ऋषि स्वेच्छिक हैं,न कि यह उनके साथ कोई रक्त संबंध का द्योतक है और कोई भी व्यक्ति स्पष्टत: अपने गोत्र या प्रवर का दावा नहीं कर सकता। फलत: समाज शास्त्रियों के लिए गोत्र और प्रवर प्रत्यय केवल धर्मशास्त्रीय शब्द मात्र हैं।

लेकिन हमारा मत है कि हिंदू धर्म इस बात को समझता रहा है कि विवाह के लिए  संबंधों में रक्त निकटता नहीं होनी चाहिए। इससे अनेक आनुवंशिक विसंगतियां पैदा होती हैं। इसलिए उन्होंने विवाह के लिए गोत्र व प्रवर का  प्रावधान किया। यदि सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत इसका अनुपालन किया जाए तो बेहतर संतति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

ओशो का कथन है कि स्त्री-पुरुष जितनी अधिक दूरी पर विवाह करते हैं उनकी संतान उतनी ही अधिक प्रतिभाशाली और गुणी होती है। उनमें आनुवंशिक रोग होने की संभावनाएं कम से कम होती हैं। उनके गुणसूत्र बहुत मजबूत होते हैं और वे जीवन-संघर्ष में परिस्थितियों का दृढ़ता के साथ मुकाबला करते हैं।

इस संबंध में आप क्या कहते हैं? आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।


सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

हिंदू विवाह के निषेध

हिंदुओं में विवाह के कुछ निषेध निश्चित हैं। हिंदू अपने ही गोत्र और प्रवर में विवाह नहीं करते। आइए इस पोस्ट में यह जाने कि गोत्र और प्रवर क्या हैं? और अपने ही गोत्र और प्रवर में विवाह वर्जित क्यों माना गया है।

गोत्र : गोत्र के संबंध में धर्मशास्त्रों,सूत्रों में विभिन्न विचार मिलते हैं।सत्यपाठ हिरण्यकेशी श्रौतसूत के अनुसार-विश्वामित्र,जमदग्नि,भारद्वाज,गौतम,अत्रि,वशिष्ठ,कश्यप और अगस्त नामक आठ ऋषियों की संतान गोत्र कहलाती है।वैदिक साहित्य में गोत्र शब्द का प्रयोग गौओं की रक्षा के लिए बनाए गए बाड़े के रूप में किया गया है। मैक्समूलर भी इस धारणा को मानते हैं कि जिन लोगों की गायें एक ही स्थान(बाड़े में)पर बंधती थी,वे उस स्थान पर रहने वाले एक ही पूर्वज ऋषि की संतान समझे जाते थे,बाद में यह लोग एक ही गोत्र के सदस्य समझे जाने लगे। 

पाणिनि ने अपने एक सूत्र में पोते तक की संतान को गोत्र कहा है।

पतंजलि के महाभाष्य में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले 80 हजार ऋषि हुए,किंतु उनमें से केवल आठ ऋषियों की संतान का प्रसार हो पाया। इसलिए इन्हीं आठ ऋषियों की संतान ही गोत्र कहलाती है।

मनुस्मृति के सबसे बड़े टीकाकार मेघातिथि ने लिखा है कि गोत्र का अर्थ यह नहीं है कि वे किसी विशेष समय में उत्पन्न हुए ऋषि की संतान हैं,बल्कि जैसे परम्परा के अनुसार कुछ को ब्राह्मण माना जाता है,वैसे ही गोत्र भी परम्परागत वंश का नाम है। 

विज्ञानेश्वर के अनुसार - वंश परम्परा प्रसिद्ध गोत्रम् अर्थात परम्परा में जो नाम प्रसिद्ध होता है,वह उस वंश का गोत्र कहलाता है। 

बोधायन ने गोत्र की संख्या करोड़ों में बताई है। मिताक्षरान्याय के अनुसार,गोत्र का अर्थ रक्त की निकटता है।

उपर्युक्त विचारों से निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि गोत्र शब्द का प्रयोग एक घेरे में रहने वाले तथा एक विशेष समूह के व्यक्तियों के लिए किया जाता है,जिनके वंशज एक ही थे। इस धारणा के अनुसार एक ही गोत्र में विवाह अर्थात सगोत्र विवाह वर्जित है,क्योंकि वस्तुत: वे एक ही वंश की संतान है। जो बाद में बहिर्विवाह की प्रथा का हेतु बन गया। इसलिए हिंदुओं में सगोत्र कन्या से विवाह का निषेध है। 

प्रवर : प्रवर शब्द वृञ वरणो से अथवा वृ धातु से बना है। वर का अर्थ है चुन लेना, प्र का अर्थ है विशेष रूप से; इस प्रकार प्रवर शब्द का अर्थ हुआ : विशेष रूप से (यज्ञ) के लिए चुन लिया गया। डॉ. पांडुरंग वामन काणे का कथन है कि यज्ञ करते समय पुरोहित कुछ प्रसिद्ध एवं यशस्वी ऋषियों को चुनकर उनके नाम से यज्ञ में आहुति देता था और प्रार्थना करता था कि मैं अग्नि में वैसे ही आहुति देता हूं जैसे भृगु ने दी थी, जैसे अंगिरा ने दी थी, अत्रि ने दी थी। इस प्रकार चुने गए प्राचीन ऋषि प्रवर कहलाने लगे। इस प्रकार प्रवर ऋषियों की संख्या निश्चित कर दी गई और यह संख्या 49 है।

वैदिक इंडेक्स के अनुसार प्रवर का अर्थ है: आह्वाह्न करना। 

डॉ. प्रभु के अनुसार, इंडो आर्यन लोगों में अग्नि-पूजा और हवन करने का प्रचलन था। हवन करते समय पुरोहित अपने प्रमुख और श्रेष्ठ,ऋषि पूर्वज का नाम लेते थे। इस प्रकार प्रवर के अंतर्गत एक व्यक्ति के उन पूर्वजों का समावेश है जो अग्नि का आह्वाह्न करते हैं। बाद में इसके साथ सामाजिक धारणा भी जुड़ गई और इन पूर्वज ऋषियों का महत्त्व अनेक अन्य घरेलू और सामाजिक संस्कारों में भी हो गया,जिनमें विवाह संस्कार प्रमुख है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वे सभी व्यक्ति जो स्वयं को एक ही सामान्य ऋषि की संतान मानते हैं सप्रवर हैं; जिनके परस्पर विवाह वर्जित हैं। 

वस्तुत: प्रवर भी प्राचीन ऋषियों के नाम हैं। विज्ञानेश्वर के अनुसार केवल ब्राह्मणों के ही वास्तविक गोत्र व प्रवर होते हैं। क्षत्रिय और वैश्यों के गोत्र और प्रवर उनके पुरोहितों पर आश्रित होते हैं। शूद्रों के कोई प्रवर या गोत्र नहीं होते। पांडुरंग वामन काणे ने गोत्र और प्रवर का अंतर बतलाते हुए कहा है कि गोत्र उन ऋषियों के नाम हैं जो परम्परा द्वारा अनेक पीढ़ियों से किसी वंश या व्यक्ति के पूर्वज माने जाते हैं; परंतु प्रवर वे अत्यंत प्राचीन ऋषि हैं जो गोत्र चलाने वाले ऋषियों के पूर्वज थे। 

सगोत्र और सप्रवर विवाह हिंदु विचारधारा के अनुसार असामाजिक माना जाता है। हिंदू शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों से सगोत्र और सप्रवर विवाह वर्जित माने गए हैं। गौतम,वशिष्ठ और शंख धर्मसूत्रों का कथन है कि एक ही प्रवर के वर-कन्या का विवाह उचित नहीं। विष्णु,मनु तथा याज्ञवल्क्य स्मृतियों के अनुसार समान प्रवर के अतिरिक्त समान गोत्र रखने वाली कन्या से विवाह निषेध है। बोधायन के अनुसार, सगोत्र कन्या से विवाह करने पर चन्द्रायण नामक प्रायश्चित करना चाहिए। अपरार्क के अनुसार जानबूझ कर सगोत्र विवाह करने से व्यक्ति जातिच्युत हो जाता है और उसकी संतान चांडाल होती है। 

करन्दीकर के अनुसार, आर्यों ने इस प्रथा को अनार्य जातियों से ग्रहण किया; जो अपने टोटम से बाहर विवाह नहीं करते थे। अधिकांश लोगों का यह विचार है कि एक गोत्र और प्रवर में रक्त की निकटता होती है; इसलिए इसके दुष्परिणामों से बचने के लिए सगोत्र और सप्रवर विवाह वर्जित हैं।

अल्तेकर ने यह मत प्रकट किया है कि सगोत्र विवाह 600 ई.पू. नहीं मिलते हैं। वैदिक काल में गोत्र शब्द का प्रयोग दूसरे अर्थ में होता था। श्रीपाद डांगे ने तो यह सिद्ध किया है कि आर्य अपने गोत्र अथवा अग्नि से बाहर विवाह करने की बात ही नहीं सोच सकते थे। 

कुछ भी हो, आज विवाह में इन वर्जनाओं का उतना चलन नहीं रह गया है।

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

हिंदू विवाह के प्रकार

हिंदू धर्मसूत्रों,शास्त्रों और स्मृतियों में विभिन्न प्रकार के विवाह बताए गए हैं। मनु ने विवाह के आठ भेद किए हैं परंतु वशिष्ठ ने छ: प्रकार के विवाह माने हैं। मनु स्मृति में कहा गया है-
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्ष प्राजापत्यस्तथासुर:।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चष्टमोधम:॥
इस प्रकार मनु ने ब्रह्म,दैव,आर्ष,प्राजापत्य,आसुर,गांधर्व,राक्षस और पैशाच आठ प्रकार के विवाह माने हैं।वशिष्ठ ने ब्राह्म,दैव,आर्ष,गांधर्व,क्षात्र(राक्षस) और मानुष(आसुर) विवाह के छ: प्रकार माने हैं।ब्राह्म विवाह, दैव विवाह,आर्ष विवाह और प्राजापत्य विवाहों को धर्म विवाह कहा गया है और ये समाज द्वारा स्वीकृत विवाह होने के कारण उत्तम विवाह कहे गए।अन्य चार विवाहों को अधर्म विवाह कहा गया है और इसीलिए ये समाज द्वारा अस्वीकृत कहे गए हैं।

1) ब्राह्म विवाह :मनुस्मृति में ब्राह्म विवाह के संबंध में लिखा है-
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुति शीलवते स्वयम्।
आहुय दानं कन्याय ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित:॥
अर्थात कन्या को वस्त्र,अलंकार आदि से सुसज्जित करके विद्वान,शीलवान वर को आमंत्रित करके कन्यादान करने का नाम ब्रह्म विवाह है। यह विवाह वस्तुत: ब्रह्म-विद्या में संलग्न विद्वान पुरुष के लिए है। इसमें विवाह के तीन पक्ष स्पष्ट हैं- विद्वान व्यक्ति द्वारा विवाह की स्वीकृति,विवाह संस्कार का होना तथा दहेज न लिया जाना।इस विवाह में श्रेष्ठ कन्या को ब्रह्म विद्या में संलग्न विद्वान पुरुष को केवल एक वस्त्र से अलंकृत कर उसका दान किया जाता है।

2) दैव विवाह ::दैव विवाह को परिभाषित करते हुए मनु ने लिखा है-
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते।
अलंकृत्य सुतादानं दैव धर्म प्रचक्षते॥
अर्थात दैव विवाह में वस्त्रों और अलंकारों से सुसज्जित कन्या का दान उस यज्ञकर्ता ऋत्विक(पुरोहित) को किया जाता है,जो किसी यज्ञशाला में यज्ञ कार्य को उचित रूप से पूरा करता है। इस प्रकार का विवाह देवताओं (प्राकृतिक शक्तियों का आह्वाहन)की स्तुति के समय संपन्न होता था,इसलिए इसे दैव विवाह कहा गया।बाद में इस विवाह में तड़क-भड़क और दहेज भी समाविष्ट हो गया।

3)आर्ष विवाह:: मनु के शब्दों में -
एकं गोमिथुने द्वेवा वारदशेय धर्मत:।
कन्या प्रदानं विधिवरार्षो धर्म स उच्चते॥
अर्थात पवित्र धर्म के निर्वाह के उद्देश्य से एक गाय और बैल अथवा दो जोड़े बैल लेकर कन्या के माता-पिता उसे ऋषि की पत्नी के रूप में सौंप देते हैं।ये वस्तुएं कन्या-मूल्य नहीं थी,बल्कि ऋषि के गृहस्थ जीवन बिताने के निश्चय की सूचक थी। आर्ष शब्द का अर्थ ही ऋषि है,इस प्रकार किसी सुपात्र कन्या का ऋषि से पाणिग्रहण ही आर्ष विवाह कहलाता है।

4)प्राजापात्य विवाह:: मनु ने मनुस्मृति में इस विवाह के संबंध में लिखा है-
सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानु भाष्य च:।
कन्या प्रदानमभ्यर्त्थ प्राजापत्यो विधि: स्मृत:॥
अर्थात तुम दोनों मिलकर गृहस्थ धर्म का आचरण करना,यह कहकर विधिवत वर की पूजा करके कन्यादान करना प्राजापात्य विवाह है। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार वर और वधू दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के लिए हो,यह कामना ही प्रजापत्य विवाह का आधार है।

वस्तुत: यह विवाह प्रजा अर्थात संतति-उत्पत्ति की दृष्टि से सर्व-साधारण का विवाह है। इस विवाह में स्त्री या पुरुष का कोई धार्मिक गुण या विशेषता नहीं देखी जाती थी। यह विवाह बहुत बाद में प्रचलित हुआ लगता है क्योंकि वशिष्ठ और आपस्तम्ब दोनों ने ही इस विवाह के संबंध में कुछ नहीं लिखा है। संभवत: इस विवाह को बाद में उस वर्ग का ध्यान रखते हुए जोड़ा गया जो ब्रह्म-ज्ञान में उत्सुक नहीं है,लेकिन प्रजा की दृष्टि से धर्म का पालन कर सकता है।इस प्रकार से संतति के उद्देश्य से कन्या को घर लाने को प्राजापात्य विवाह कहा गया।

5)आसुर विवाह:: मनु ने इस विवाह को इस प्रकार परिभाषित किया है-
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्वा कन्याये चैव शक्तित:।
कन्या प्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म स उच्यते॥
अर्थात् आसुर विवाह उसे कहते हैं जब विवाह के लिए इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छा से कन्या के परिवार वालों को धन देकर विवाह करता है। महाभारत काल में पांडु का माद्री के साथ इसी प्रकार का विवाह हुआ था। यह विवाह समाज में स्वीकृत नहीं रहा।

6)गांधर्व विवाह::मनुस्मृति में गांधर्व विवाह के संबंध में कहा गया है कि-
इच्छामान्योन्य संयोग: कन्यायाश्च वरस्य च:।
गंधर्व: सतु विज्ञेयो मैथुन्य: काम: संभव: ॥
अर्थात गंधर्व विवाह उसे कहते हैं जो कन्या और वर के परस्पर प्रेम के फलस्वरूप होता है। इसमें वैवाहिक संस्कार कार्य संभोग के बाद पूर्ण किये जाते हैं। इसका उदाहरण दुष्यंत और शकुंतला का विवाह है।

इस प्रकार के विवाह में पुरुष और स्त्री दोनों अपनी इच्छा के अनुसार पति और पत्नी चुन लेते हैं और विवाह पूर्व ही पति-पत्नी के रूप में रहने लगते हैं और बाद में अपने परिवार और समाज से उसकी स्वीकृति लेते हैं।

कामसूत्र के रचयिता वात्स्यायन ने गंधर्व विवाह को आदर्श माना है। बौधायन का कहना है कि कुछ लोग    गांधर्व विवाह की इसलिए प्रशंसा करते हैं क्योंकि यह स्त्री-पुरुष की इच्छा से होता है,इसलिए यह आदर्श है। तैत्तरीय संहिता में कहा गया है कि "स्त्री कामा वै गंधर्वा" अर्थात स्त्री की कामना गांधर्व लोगों की विशेषता है।वस्तुत: प्राचीन काल में गांधर्व नाम की एक जाति थी जो अत्यंत कामुक थी। यह उन्हीं के लिए कहा गया है।इसी कारण कामवासना पर आश्रित इस प्रकार के विवाह को स्मृतिकारों ने गांधर्व विवाह की संज्ञा दी।

सत्यार्थ प्रकाश में महर्षि दयानंद सरस्वती ने कहा है कि अनियम,असमय इत्यादि किसी कारण से दोनों की प्राचीन इच्छा से वर-कन्या का परस्पर संयोग होना गंधर्व विवाह है।

7)राक्षस विवाह:: राक्षस विवाह उस काल की प्रथा है जबकि स्त्रियां युद्ध का पारितोषिक मानी जाती थी। मनु ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है-
हत्वा,छित्वा च भित्वा च क्रोशन्ति रूदन्ती गृहातौ।
प्रसाह्य कन्या हरणं राक्षसो विधिरुच्यते॥
अर्थात् राक्षस विवाह में विजेता कन्या पक्ष के लोगों को मार-काट कर उनका घर तोड़कर विलाप करती हुई कन्या को उसके घर से उठा लाता है। श्री कृष्ण से रुक्मणी का ऐसा ही विवाह हुआ था। इस विवाह को क्षत्रीय विवाह भी कहा गया क्योंकि क्षत्रिय लोग ही युद्ध करते थे और विजयी होने पर शत्रु की कन्याओं को पारितोषिक रूप से उठा लाते थे।

8) पैशाच विवाह::मनु ने पैशाच विवाह के संबंध में लिखा है-
सुप्तां मत्तां प्रमतां वा रहो यमोपगच्छत।
स पापिष्ठो विवाहनां पैशाचाष्टमोधम:॥
अर्थात सोई हुई,शराब पीने से उन्मत्त हुई स्त्री से एकांत में विवाह(बलात्कार) करना ही पैशाच विवाह है।इस प्रकार बलात्कारी द्वारा विधिपूर्वक विवाह संस्कार कर लेने पर समाज की स्वीकृति मिल जाती थी,जिसमें शारीरिक संयोग की पवित्रता और सामाजिक व्यवस्था बनी रहे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदू समाज में विवाह के अनेक रूप रहे हैं। विवाह के प्राचीन रूपों में कुछ का आज भी अस्तित्व दिखाई देता है। पहले  विवाह का आधार व्यक्ति का वर्ण था। मनु के अनुसार  ब्राह्मणों के लिए दैव,आर्ष और प्राजापत्य, क्षत्रियों के लिए राक्षस और वैश्यों तथा शूद्रों के लिए आसुर विवाह उचित हैं।आज भी उच्च वर्ग के लोगों में प्राजापत्य विवाह और निम्न वर्ग के लोगों में आसुर विवाह प्रचलित हैं।

आज सर्वाधिक प्रचलित विवाह प्रेम-विवाह बन गया है। इसके कारणों में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव, औद्योगिकरण,शहरीकरण,आधुनिक शिक्षा और व्यक्तिवादी विचारधारा का विकास, नारी सशक्तिकरण आदि को माना जा रहा है। संयुक्त परिवार का ह्तास भी इसका एक कारण हो सकता है।

इधर विवाह का एक अलग ही चलन देखने में आया है- लिव इन रिलेशनशिप, इस विवाह में युवा लड़का-लड़की बिना विवाह के एक साथ तब तक रहते हैं जब तक कि उनके बीच में किसी बात विशेष को लेकर मतभेद पैदा न हो। इस प्रकार के रिलेशनशिप महानगरों में बहुत दिखाई पड़ते हैं। इसके बहुत से कारण हैं। जिसके बारे में हम आगे किसी पोस्ट में चर्चा करेंगे। 

सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

विवाह के उद्देश्य


धर्म
पिछली पोस्ट में हमने जाना कि हिंदू दर्शन में विवाह एक संस्कार है।भारतीय दर्शन में धर्म का बहुत महत्त्व है।विवाह के प्रमुख उद्देश्य में भी धर्म सर्वोपरि है।स्त्री-पुरुष के मिलन से समाज की जो इकाई बनती है,वह परिवार कहलाता है।दाम्पत्य जीवन के बिना पारिवारिक जीवन दुष्कर ही नहीं वरन असंभव है। परिवार के जन्म के साथ ही मनुष्य में कर्त्तव्य-भाव का विकास दिखाई देता है। हिंदु-दर्शन के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कुछ निश्चित कर्त्तव्य हैं और विवाह इन कर्त्तव्यों को उचित ढ़ंग से निष्पादित करने में सहायक है। हिंदु-धर्म के अनुसार मनुष्य जीवन के पंच महायज्ञ स्वीकार किए गए हैं। ये पांच महायज्ञ हैं: ब्रह्म यज्ञ, पितृ यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ और नृ यज्ञ। इन पांचों यज्ञों को पूरा करने के लिए पत्नी का सहयोग परम आवश्यक है।
ब्रह्म यज्ञ :: ब्रह्म यज्ञ से अभिप्राय: है :इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को समझना। इस ब्रह्मांड में निरंतर सृजन और विनाश जारी है। विवाह सृजन में सहायक है। विवाह से ही सृष्टि का क्रम निरंतर बना रहता है। व्यक्ति को निरंतर अपने ज्ञान-चक्षुओं को खुला रखना ही ब्रह्म-यज्ञ है। प्राचीन समय में ज्ञान को वेद कहा गया,इसलिए वेदों के अध्ययन को ब्रह्म-ज्ञान का प्रमुख स्रोत कहा गया।

पितृ यज्ञ :: साधारणतया इसे मृत पितरों से संबंधित तर्पण आदि से जोड़ दिया गया है। जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति पर पितरों का ऋण होता है और इस ऋण से उऋण होने के लिए पुत्र प्राप्त करना जरूरी समझा गया। जिसके लिए विवाह आवश्यक हो जाता है। लेकिन पितृ यज्ञ का गहरा अर्थ यह है कि सृष्टि के चक्कर को बनाए रखा जाए। पति पत्नी के गर्भ से संतति को जन्म दे।वह पिता बने और पत्नी मां। पिता बनने पर ही व्यक्ति अपने पितृ यज्ञ को पूरा कर सकता है। भारतीय संस्कृति में इसी लिए पितामह होने पर व्यक्ति को जो खुशी मिलती है,उसका कोई पारावार नहीं। हिंदु धर्म में विश्व एक निरंतरता है। इस निरंतरता में विवाह एक सेतु है। जो वर्तमान पीढ़ी को उसकी भूत और भविष्य पीढ़ी से जोड़ती है। पितरों को तर्पण करना भी इस महत श्रृंखला का द्योतक है।

देव यज्ञ :: देव कौन हैं? जो भी इस ब्रह्मांड की सृष्टि में सहायक शक्तियां हैं वे देव हैं। मनुष्य का धर्म है कि वह इन शक्तियों को पहचाने व इनके संरक्षण में सहायक बने। पृथ्वी,वायु,आकाश,जल,अग्नि जैसे तत्वों से मनुष्य के शरीर का निर्माण हुआ है। इस दृष्टि से ये देव हैं।पति और पत्नी इन तत्वों के संरक्षण में सहायक बन सकते हैं। इसी लिए किसी भी यज्ञ को पत्नी के बिना पूरा नहीं किया जा सकता। जब मनुष्य में अपने वातावरण में मौजूद हर जीवित,अजीवित वस्तु के प्रति प्रेम भाव उमगता है; तो वह देव यज्ञ में सहभागी हो रहा होता है। स्त्री से प्रेम व्यक्ति के जीवन में संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रति प्रेम भाव जागृत करने में सहायक है। 

भूत यज्ञ :: चौथा यज्ञ भूत यज्ञ है; जिसे स्मृतिकारों ने बलिवैश्वदेव भी कहा है। इस यज्ञ का तात्पर्य यह है कि कि मनुष्य प्राणि-मात्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों को समझे। जो भूत हो चुके हैं अर्थात अब देह में नहीं हैं, जो निराधार हैं या किन्हीं कारणवश अपने उदर की पूर्ति नहीं कर सकते उन्हें भोजन आदि देकर सहायता करें। शायद इसी कारण से व्यक्ति से यह अपेक्षा की गई कि वह स्वयं भोजन करने से पूर्व वह अपने भोजन में से कुछ कुत्ते,पतित,पापी,श्वपच,रोगी,वायस,कृमि आदि को दे। इस यज्ञ के द्वारा मनुष्य अन्यों के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निर्वहण करता है। 

नृ यज्ञ :: पांचवां नृयज्ञ कहा गया। इसे अतिथि यज्ञ भी कहते हैं। मनुष्य अतिथि की सेवा करे तो नृ यज्ञ संपन्न होता है। नृ यानी मानव की सेवा मात्र इस यज्ञ का हेतु है। 

इस प्रकार इन पांच यज्ञों से मनुष्य-जीवन के सभी कर्त्तव्यों को जोड़ दिया गया है। मनु ने लिखा है कि स्त्रियों की सृष्टि माता बनने के लिए और पुरुषों की सृष्टि पिता बनने के लिए की गई। धार्मिक कार्य पुरुषों को अपनी स्त्रियों के साथ ही करना चाहिए। यही कारण है कि विवाह को हिंदु विचारधारा के अनुसार एक संस्कार अथवा शरीर संस्कार माना जाता है; जिससे शरीर शुद्धि होती है।
ऋग्वेद के अनुसार विवाह का आदर्श गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर देवताओं के लिए यज्ञ करना और संतान उत्पन्न करना है। 
आपस्तम्ब धर्म सूत्र के अनुसार विवाह द्वारा ही मनुष्य धार्मिक अनुष्ठानों को करने के योग्य बनता है,क्योंकि अविवाहित पुरुष अपूर्ण रहता है।
विवाह के द्वारा ही मनुष्य को पुत्र की प्राप्ति हो सकती है, जो उसे नरक से बचाता है। मनु का मत है कि संतान धारण,धार्मिक आचारों का पालन,सेवा, श्रेष्ठ आनंद और स्वर्ग प्राप्ति स्त्री के बिना संभव नहीं। अत: धर्म के पालन के लिए विवाह आवश्यक है। 
प्रजा 
हिंदू विवाह का दूसरा उद्देश्य संतति उत्पन्न करना है। पुत्र उत्पन्न करना हिंदू विचारधारा के अनुसार अति आवश्यक है। मनु संहिता और महाभारत में दी गई व्याख्या के अनुसार पुत्र का अर्थ है: नरक(पुम) में जाने से पिता की रक्षा करने वाला। पुत्र प्राप्ति को और प्रजनन क्रिया को यौन संतुष्टि का परिणाम न मानकर उसे धर्म साधन कहा गया है। वास्तव में विवाह का मुख्य आदर्श है- धर्म पालन,क्योंकि प्रजा और रति भी धर्म पालन के अंग हैं।
मनु के अनुसार पुत्र प्राप्ति इस संसार और अगले संसार दोनों में सुख का साधन समझा गया है। मनु ने लिखा है- केवल वह व्यक्ति ही पूर्ण कहलाने योग्य है,जिसके पास पत्नी और बच्चे हैं। अत: प्रत्येक हिंदू के लिए विवाह करना अनिवार्य माना जाता है। विवाह अपने पूर्वजों के प्रति एक कर्त्तव्य है।
महा भारत में एक कथा है जिसके अनुसार एक स्त्री बिना विवाह ही तपस्या करने लगी, परंतु नारद जी ने उससे कहा कि विवाह द्वारा शुद्ध हुए बिना उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। तब उसने अपने तप का आधा फल देकर श्रृंग्वान से विवाह किया और फिर कहीं स्वर्ग को जा सकी। पुत्र का उत्पन्न होना आवश्यक है क्योंकि बिना पुत्र के अनेक धर्म नहीं हो सकते- जैसे तर्पण, पिंडदान तथा पितरों की शांति। ऐसा कहा जाता है कि जरकाल उग्र तपस्वी ऋषि थे, किंतु अपने पितरों की दयनीय दशा देककर विवाह किया और पुत्र उत्पन्न किया। 
रति
हिंदू विवाह का तीसरा उद्देश्य रति अर्थात यौनिक आनंद प्राप्ति है। रति का स्थान हिंदू विवाह में सबसे गौण रखा गया है और यौन क्रिया का सामाजीकरण ही विवाह का मुख्य आधार माना गया है। केवल यौन संतुष्टि ही विवाह का एकमात्र उद्देश्य नहीं है। विवाह में रति के गौण स्थान को सिद्ध करने के लिए कहा गया है कि नीच पुरुष ही इंद्रिय सुख के लिए विवाह करता है, जो सांसारिक और दहिक सुखों को ही सब कुछ समझता है...ऐसे पुरुष के जीवन में कोई उच्च आदर्श नहीं होता। 
हिंदु विवाह को पवित्र माना गया है और यह अविच्छेद्य होता है। हिंदु-धर्म में तलाक का कोई स्थान नहीं है। यहां तक कि पति-पत्नी मृत्योपरांत भी विवाह-बंधन में बंधे रहते हैं। इसी कारण हिंदुओं में विधवा विवाह का विधान नहीं रहा। विवाह जन्म-जनमांतर का संबंध माना गया। हिंदुओं में दाम्पत्य जीवन में संघर्ष की भावना को कोई स्थान नहीं दिया गया है। पत्नी अर्धांग्नी समझी जाती है और उनमें व्यक्तिगत स्वार्थों को कोई महत्व नहीं दिया गया। इसी भावना के कारण भारत में संयुक्त परिवार को बल मिला। पत्नी का पति से परे कोई अस्तित्व नहीं होता। सती और पतिव्रता की धारणाओं से यह सिद्ध होता है कि पत्नी पति का एक रूप मानी जाती है, उसका अपना अलग कोई स्थान नहीं। 
अत: हिंदू विवाह एक धार्मिक गठबंधन है। जिसमें पति पत्नी मृत्योपरांत भी एक बंधन में बंधे रहते हैं। विवाह एक समझौता मात्र नहीं है,बल्कि एक धार्मिक संस्कार है। इसे बिना धार्मिक कृत्यों के संपन्न नहीं किया जा सकता। इसे पुरोहित द्वारा अग्नि को साक्षी मान सम्पन्न कराया जाता है। इसमें धर्म का स्थान सर्वोपरि है। यह मानव जीवन के पुरुषार्थों को पूर्ण करने का साधन है।

रविवार, 18 सितंबर 2011

हिंदू विवाह : एक संस्कार

हिंदू दर्शन में विवाह एक संस्कार के रूप में स्वीकृत है। भारत में प्राचीन समय से ही विवाह संबंधी अनेक प्रत्यय जैसे-परिणयन,उपयम,पाणिग्रहण आदि प्रचलित रहें हैं।इन प्रत्ययों में विवाह संस्कार के अनेक पहलू सम्मिलित हैं।

स्त्री-पुरुष के पारस्परिक संबंधों के लिए प्रत्येक समाज में कोई न कोई संस्थात्मक व्यवस्था होती है।जिससे परिवार बनता है। परिवार किसी समाज की आधारभूत इकाई है।यह स्त्री-पुरुष के संबंधों पर आधारित है।परिवार के निर्माण के लिए विवाह समाज द्वारा स्वीकृत एक मान्य संस्था है। दूसरे शब्दों में विवाह यौन संबंधों को स्थापित करने की एक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था है। इसी कारण भारतीय शास्त्रकारों ने विवाह तथा गृहस्थ जीवन को अत्यधिक महत्त्व दिया है। भारतीय दर्शन में मानव जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष) में काम की पूर्ति हेतु विवाह का विधान है। इसी के द्वारा मनुष्य अपने पितृ-ऋण से मुक्त होता है।

समाजशास्त्री डॉ. कपाड़िया के अनुसार," हिंदू विवाह स्त्री-पुरुष के बीच धर्म के पालन की दृष्टि से एक ऐसा संस्कार है,जो जन्म-जन्मांतर के संबंधों की धारणा पर आधारित है।....हिंदू विवाह को इसलिए एक संस्कार माना जाता है क्योंकि यह तभी पूर्ण समझा जाता है,जब कुछ पवित्र मंत्रों द्वारा किन्हीं रीतियों का पालन करते हुए संपन्न हो।"

डॉ. पी.एन.प्रभु के अनुसार, "हिंदू विवाह मुख्यत: एक संस्कार और औपचारिकता है,जिसका होना गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के लिए आवश्यक है।विवाह का अर्थ ही कन्या को वर के घर ले जाना है।"

मेनडोएक ने संसार के 250 समाजों में प्रचलित विवाह-प्रथा का तुलनात्मक अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि विवाह के तीन मुख्य उद्देश्य हैं-1. यौन संबंधी आनंद 2.आर्थिक सहयोग 3. बच्चों का पालन-पोषण। मेनडोएक ने विवाह के यौन संबंधी उद्देश्य को गौण बताया है। उसने आर्थिक सहयोग और बच्चों के लालन-पालन को प्रमुख माना है।उसने बहुत से उदाहरण रखे हैं जिनके द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि यौन-संबंध को एक गौण स्थान पर रखा जा सकता है। कुछ समाज में पति और पत्नी को यौन संबंध के लिए पूर्ण स्वतंत्रता होती है।वे दूसरे के साथ भी यौन संबंध स्थापित रख सकते हैं। इसके विपरीत्त कुछ समाजों में पति-पत्नी का अन्य के साथ यौन संबंध रखना अवैध और अधार्मिक माना जाता है।परंतु सभी समाजों में आर्थिक सहयोग और बच्चे का पालन-पोषण करना विवाह का मुख्य उद्देश्य होता है;किंतु भारत में हिंदू विवाह के उद्देश्य एक भिन्न धरातल पर स्थित हैं।

हिंदू विवाह के उद्देश्य तथा आदर्श के बारे में धर्मशास्त्रों में अनेक मतों की प्रतिस्थापना की गई है। ऋग्वेद के अनुसार विवाह का उद्देश्य गृहस्थ होकर देवों के लिए यज्ञ करना तथा संतान उत्पन्न करना है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार,व्यक्ति,पति-पत्नी द्वारा गर्भ में पुत्र रूप में जन्म लेता है।इसी कारण स्त्री को जाया कहा गया है।शतपथ ब्राह्मण के अनुसार,व्यक्ति तब तक अपूर्ण है,जब तक कि विवाह करके संतान को जन्म नहीं देता।इसी कारण पत्नी को अर्धांगनी कहा गया है। मनुस्मृति के अनुसार संतानोत्पत्ति ,धर्म,आनंद,सेवा तथा पूर्वजों की स्वर्ग-प्राप्ति पत्नी पर निर्भर है।

इस प्रकार हिंदू विवाह के उद्देश्यों में तीन प्रमुख कारण लक्षित होते हैं :- 1. धर्म 2. प्रजा 3. रति । ये तीनों महत्ता के क्रम में रखे गए हैं। धर्म को सबसे प्रमुख माना गया है और रति को सबसे कम महत्त्वपूर्ण माना गया है। इनके बारे में विस्तार से हम अगली पोस्ट में चर्चा करेंगे। 


बुधवार, 31 अगस्त 2011

My thoughts/मेरे विचार


  • SINCERITY comes from heart;hypocrites never know sincerity.
  • In the existence only man tries to be perfect. Nothing but existence itself perfect.
  • Nothing is transparent unless you have eyes to see through things.
  • Without zest zenith never comes.
  • Self image sets the boundaries of individual perspective.
  • Without a good rapport no team exists. With a good rapport team definitely wins.
  • BOSS stands for Big Offer to Sure Success.
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  • निष्कटता हृदय से आती है;ढ़ोंगी इसे कभी नहीं समझ सकते।
  • अस्तित्व में मनुष्य ही पूर्ण होने का प्रयास करता है। परंतु अस्तित्व के अतिरिक्त कुछ भी पूर्ण नहीं है।
  • जब तक चीजों को आर-पार देखने वाली आंखें न हों कुछ भी पारदर्शी नहीं है।
  • जोश के बिना शिखर कभी नहीं आता।
  • आत्म-छवि व्यक्ति की सीमाओं को निर्धारित करती है।
  • सौहार्द के बिना टीम नहीं बन सकती। जहां सौहार्द है वह टीम अवश्य ही जीतती है।
  • सुनिश्चित सफलता के लिए बड़ा प्रस्ताव, अंग्रेजी के शब्द बॉस का विस्तार है। 

रविवार, 28 अगस्त 2011

अन्ना हजारे होने के मायने

आज देश ने अन्ना हजारे को जितना प्यार और स्नेह दिया है,उतना देश की जनता ने शायद ही किसी ओर को दिया हो।अन्ना में ऐसा क्या है?जो उन्हें हमारे तथाकथित नेताओं से अलग करता है।पिछले बारह दिनों में अन्ना को मैंने जितना सुना,देखा और समझा है; उसके अनुसार अन्ना में अग्रलिखित गुण पाएं हैं:

1.कथनी और करनी में एकरूपता:: अन्ना हजारे हमारे समय के एक ऐसे युगपुरुष के रूप में उभरे हैं जिनकी कथनी और करनी एक है।वे जो बोले उस पर अडिग रहे।उनके हृदय की सरलता देखते ही बनती है।वे जो बोलते हैं,उसी के अनुरूप उनका कर्म है। दोहरापन या कूटनीति उनमें लेश मात्र भी नहीं है।वे विशुद्ध रूप से खरा सोना हैं।जिन्हें देश की जनता और युवा शक्ति पर पुरा भरोसा है।

2. निरहंकारिता: अन्ना जी में अहंकार और झूठे घमंड का तनिक भी दर्शन नहीं हुआ। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन खड़ा किया,उसमें उनके हृदय की विशालता और इस निरंहकारिता का बहुत बड़ा योग है। देश में पहली बार ऐसा हुआ,जब किसी गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति ने देश को अपने साथ जोड़ा और इस पर उन्हें किसी प्रकार का गर्व या अहंकार किंचित भी न छू सका।सचमुच अन्ना एक संत छवि के व्यक्तित्व के रूप में उभरे हैं।

3. सत्य और सादगी का अनुपम उदाहरण : अन्ना जी का जीवन सत्य को समर्पित दिखाई पड़ता है।वे सत्य के लिए और आम आदमी के हकों के लिए लड़ते हुए दिखाई देते हैं। उनके सरल और सादगी भरे जीवन में सत्य प्रतिबिंबित हो उठा है। लोगों को पहली बार अहसास हुआ है कि व्यवस्था से झूठ और भ्रष्ट आचरण को दूर किया जा सकता है। पूरा देश उनके इस आंदोलन में उनके साथ जुड़ा और जनलोकपाल बिल को सरकार की कुजिद्द के बावजूद संसद में चर्चा के लिए रखना पड़ा और सांसदों ने इसके पक्ष में ध्वनिमत दिया।यह सत्य की असत्य पर जीत है। अन्ना जी ने भारत के सद्य-स्नात इस नारे को नये अर्थ दिए हैं कि सत्य की सदैव विजय होती है- सत्यमेव जयते। अन्ना ने भ्रष्टाचार के अंधकार से निकलने के लिए प्रकाश की एक ज्योत जलाई है।अन्ना ने असत्य से सत्य की ओर चलने का इस कलयुग में एक मार्ग दिखाया है।

4. दृढ़ता: अन्ना के व्यक्तित्व की एक अन्य विशेषता जो हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है:वह है उनकी अडिगता या संकल्प की दृढ़ता। उन्होंने हमें इस बात की सीख दी है कि अपने हृदय की आवाज़ सुनों और उसके अनुसार आचरण करो तथा कभी हृदय से निकली आवाज से डिगो नहीं। उस पर दृढ़ रहो। उसके लिए संघर्ष करो।उन्होंने आज यह बात साबित कर दी है कि सत्य के पथ पर चलने वाले लोग कभी अकेले नहीं पड़ते,,,लोग उनके साथ आ खड़े होते हैं और कुछ समय पहले तक जब यह समझा जा रहा था कि व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता...व्यवस्था से भ्रष्टाचार को खतम नहीं किया जा सकता और देश से भ्रष्ट नेताओं के तंत्र को समाप्त नहीं किया जा सकता।इन सब बातों को अन्ना ने अपनी दृढ़ता से परास्त किया है। और लोगों में एक विश्वास पैदा हुआ है कि व्यवस्था से भ्रष्टाचार को हटाया जा सकता है यदि उद्देश्य नेक हो।

5. अहिंसा और देश-भक्ति की भावना: अन्ना एक सच्चे गांधीवादी हैं। आज गांधी यदि किसी रूप में जिंदा हैं तो वे अन्ना के रूप में हमारे सामने खड़े हैं। जिस पार्टी को गांधी ने खड़ा किया था...उसी पार्टी ने गांधी के विचारों और आदर्शों को स्वतंत्रता के बाद तिलांजलि दे दी और उन्हें भुला बैठी ...आज उसी पार्टी के लोग गांधी के रास्ते पर चलने वाले अन्ना के अनशन,अहिंसा और सत्य के मार्ग को धता बता रहें हैं...जबकि दूसरी ओर देश के एक छोटे से गाँव से उठे 74 वर्षीय अन्ना के जीवन में गांधी के आदर्श और विचार कूट-कूट कर भरें हैं। उन्होंने न केवल हमारे देश को बल्कि पूरे संसार को यह जता दिया है कि गांधी के आदर्श और विचार आज भी व्यवहारिक और समसामयिक हैं। उन्होंने देश के लोगों में देश-भक्ति की भावना का संचार किया है। उन्होंने हमारे युवाओं में देश-भावना का जज्बा फूंका है।

6. संयम और धैर्य:: अन्ना जी के पास संयम और धैर्य का असीम बल है।अन्ना ने अपने पूरे आंदोलन में कहीं भी संयम और धैर्य नहीं खोया।उन्हें अपने अंतस पर पूरा भरोसा है। उनका व्यक्तित्व कहीं भी बंटा हुआ नजर नहीं आया। उन्होंने अपनी वाणी पर पूरा नियंत्रण रखा है और विषम से विषम परिस्थिति में धैर्य के साथ बहुत ही विवेक से आचरण किया है। उनकी इस धीरता,गंभीरता और संयम ने उन्हें संत की श्रेणी में खड़ा कर दिया है।

7.विवेकशीलता:: अन्ना ने हर परिस्थिति में जो विवेक और समझदारी दिखाई है और उनसे जो निकला है...वह अकल्पनीय और स्वर्गीक अनुभव जैसा है। सरकार ने उन्हें अपने पथ से विचलित करने के लिए येन-केन-प्रकारेण,साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई...लेकिन उन्हें किंचित भी विचलित नहीं कर सकी और सरकार के पास अन्ना के प्रश्नों और मुद्दों का कोई तोड़ नजर नहीं आया। अन्ना जब भी बोले तो लगा कि अन्ना की बात में जितना दम है...सरकार के तर्कों में उसका एक प्रतिशत भी नहीं है। अन्ना के विवेक के सम्मुख सरकार निरुत्तर हो गई। 

सत्य  और भ्रष्टाचार के लिए लड़ने वाले इस योद्धा को हमारा शत-शत नमन है। अन्ना तुझे सलाम!!! 


गुरुवार, 25 अगस्त 2011

मेरी सेवानिवृत्ति

एक दिन मैं भी
ऐसे ही सेवानिवृत्त हो
कर
जाउंगा कार्यालय से

लोग अनमने मन से
मुझे भी कुछ हार पहनाएंगे
थोड़े मेरी प्रशंसा में
वे शब्द कहेंगे
जिनमें न रस होगा
न ताज़गी
और फिर खाने-पीने
का दौर शुरु हो जाएगा

तब मैं घर लौट आऊंगा
और लोग धीरे-धीरे
मुझे भूल जाएंगें
कार्यालय वैसे ही चलता
रहेगा
जैसे आज चलता है
बस मैं न रहूंगा
न मेरे हस्ताक्षर होंगे
0
0
0
होगा एक विराट शून्य
जिसमें धीरे-धीरे
सब समा जाएगा
और अस्तित्व अपनी
एक महायात्रा पूरी
कर चुका होगा


रविवार, 14 अगस्त 2011

दोस्ती और शेयरिंग

आज एक दृष्टांत प्रस्तुत कर रहा हूँ; दोस्ती और दोस्ती में अपेक्षाओं का। दोस्त अक्सर परस्पर एक-दूसरे के साथ अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं और इन्हें आपस में बांट कर सांझा करते हैं। लेकिन दोस्ती में क्या जरुरी है कि दोस्त की हर अपेक्षा को पूरा किया जाए??? 

एक बार मेरे किसी मित्र ने ई-मेल मेल से मुझे कुछ फोटोग्राफ़ भेजे। उन्होंने जो चित्र मुझे भेजे,वे तकनीकी कारणों से मेरी मेल पर खुले नहीं। मैंने उन्हें,प्रत्युत्तर भेजा कि आपने जो फोटोग्राफ़ भेजे थे,वे खुल नहीं पा रहे हैं? कृपया इन्हें पुन:भेज दें। मित्र ने मुझ से मेरे ई-मेल का पॉस-वर्ड पूछा। मैंने उन्हें पासवर्ड नहीं दिया।इस बात को लेकर मित्र मुझ से नाराज़ हो गए। और उन्हें लगा कि मैं उन्हें मित्र नहीं मानता। मित्र मानता तो पॉसवर्ड देता? इसके बाद हमारे बीच में दूरियाँ बढ़ गई,जिन्हें मैं चाह कर भी खतम नहीं कर सका। क्या किसी मित्र को अपनी इस तरह की निजी और गोपनीय बातें भी बतानी चाहिएं??? 

कृपया पाठक गण अपनी राय व्यक्त कर मेरी समस्या का समाधान करें।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

समाज और सत्य

"समाज में रहने के लिए'सत्य' जैसे खुले आकाश की नहीं; बल्कि बंद,अंधेरे कमरे जैसे 'झूठ' की ज्यादा जरूरत रहती है।" _मनोज भारती 

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

चिंतन


  • संप्रदायों,पंथों में बंटा हुआ व्यक्ति सत्य को नहीं पहचान सकता।
  • व्यक्ति की वैयक्तिक सोच,जब तक सृजन में साकार नहीं होती,तब तक व्यक्ति की सोच वायवीय समझी जाती है।एक पागलपन।सृजन के लिए यह पागलपन,जुनून जरुरी है।
  • किसी चीज की वयुत्पत्ति के लिए दो विरोधी तत्त्वों का मिलन आवश्यक है।
  • दूसरों को धोखा देने से पहले,व्यक्ति स्वयं को धोखा देता है।

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

ढोल,गंवार,पुरुष और घोड़ा

ओशो से किसी स्त्री ने प्रश्न किया, "ओशो! शास्त्र कहतें हैं- स्त्री नर्क का द्वार है।" इस पर आप क्या कहते हैं? 
ओशो ने कहा, "एक छोटी सी कहानी कहता हूं- 
ढब्बू जी की पत्नी धन्नो एक दिन उदास स्वर में अपनी सहेली गुलाबो से कह रही थी, "बहन, मैं तो परेशान हो गई हूं अपने पति से,वे मुझे हमेशा ही रामायण की यह चौपाई कि - 
ढोल गंवार शूद्र पशु नारी।
ये सब ताड़न के अधिकारी॥
कह कर प्रताड़ित करते रहते हैं। मैं तो तंग आ गई, यह सुन-सुन कर।" 
गुलाबो बोली,"अरे,इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है! मैंने कुछ ही दिन पहले एक नई चौपाई बनाई है,तू इसे गाया कर-
ढोल गंवार पुरुष और घोड़ा।
जितना पीटो उतना थोड़ा ॥"
इसमें क्या चिंता लेनी है! स्त्रियों को अपनी चौपाइयां बना लेनी चाहिएं। अपने शास्त्र बनाओ,शास्त्रों पर किसी की बपौती है,किसी का ठेका है? चौपाई लिखने की कला कोई बाबा तुलसीदास पर खत्म हो गई है? याद कर लो इस चौपाई को- 
ढोल गंवार पुरुष और घोड़ा।
जितना पीटो उतना थोड़ा ॥


शनिवार, 2 जुलाई 2011

तू न आना इस देस,लाडो...

-- "यैस ओशो" पत्रिका  के "जुलाई 2011" अंक का संपादकीय
--लेखक :संजय भारती 

एक लोकप्रिय टी.वी. सीरियल का यह शीर्षक बिलकुल मौजू हो जाता है अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण संस्था थॉमस रॉयटर्स के इस तथ्य-उद्-घाटन से कि स्त्रियों के लिए असुरक्षित देशों में भारत पूरे विश्व में चौथे स्थान पर आता है। विश्वास नहीं होता न! 

भारत में 30 लाख वेश्याएं हैं- अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार। असली संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार जो 30 लाख वेश्याएं हैं,उनमें से 40 प्रतिशत चौदह वर्ष से कम उम्र की बच्चियां हैं। ये सब वे बच्चियां हैं जो चुरा ली गई या जिनके चाचा,भाई,पड़ौसी या स्वयं पिता तक ने पहले उनका उपभोग किया और फिर उन्हें बेच दिया। ज्ञात आँकड़ों के हिसाब से पिछले सौ वर्षों में 5 करोड़ बच्चियां गुम हुई हैं। विदेशी बैंकों में गुम हुआ भारत का धन तो आज सभी के जेहन में है,लेकिन ये 5 करोड़ बच्चियां? इनका क्या? 

थॉमस रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों की लिस्ट में सबसे पहले स्थान पर आता है-स्त्रियों की भ्रूण ह्त्या। लेकिन परिवारों और बाजारों में हो रहे उनके यौन शोषण,बंधुआ मजदूर जैसी उनकी सामाजिक हैसियत, मूक आक्रांता के उनके रोल को देखें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि अच्छा ही हुआ वो इस देश में पैदा नहीं हुई? 

सड़क चलते चूंटी काट लिया जाने, और न जाने कितनी अभद्र घटनाओं का सामना भारत में लड़कियां रोज करती हैं। और उनका प्रशिक्षण ऐसा है कि चूंटी कटवाओ और चुपचाप आगे बढ़ जाओ। जो होता है,होने दो- -कुछ कहो मत,क्योंकि तुम तो बेचारी स्त्री हो। विद्रोह मत करो। 

भारत के मानस में कुछ ऐसा है कि स्त्रियों ने स्वयं भी अपने को दूसरे दर्जे पर रख लिया है,इसलिए उनकी ओर से कोई विद्रोह नहीं आता। घर में सब कुछ होते हुए भी स्त्रियां खुद को ठीक से पोषित नहीं करती। यही कारण है कि भारत की 80 प्रतिशत स्त्रियां कुपोषण के कारण एनीमिया की शिकार हैं। 

स्त्रियों के मानस में ऐसा क्या गहरा चला गया है कि उनकी ओर से विद्रोह की छोड़ो,बल्कि जो होता है उसे होने देना उसके चरित्र का हिस्सा बना हुआ है? वह है कि सीता का आदर्श जो उन्हें दिया गया है। हर स्त्री के भीतर सीता उतर गई है,जिसे आग में चलवा लो तो चुपचाप चल लेगी,कोई आरोप लगा लो तो सिर झुकाकर स्वीकार कर लेगी,जंगल में फिंकवा दो तो अहोभाव मानेगी। लेकिन सीता को ही आदर्श रखना हो तो याद रहे सबकुछ स्वीकारती ही सीता नहीं है। सीता तो वहां से शुरु होती है,जहां वह राम के साथ वापस जाने से इनकार करती है--भले ही धरती में क्यों न समाना पड़े।वास्तव में तो यहीं रामायण समाप्त हो जाती है। और कुछ क्षण की ही क्यों नहीं,सीतायण जन्म लेती है। 

स्त्रियों के खिलाफ अपराधों में पुरुषों का तो हाथ है ही, स्वयं स्त्रियों का भी उतना ही है,क्योंकि वे अपराध सहती हैं। 

ओशो कहते हैं, "स्त्रियों को अपने लिए वाणी जुटानी होगी। और उनको वाणी तभी मिल सकती है सब दिशाओं में,जब तुम यह हिम्मत जुटाओ कि तुम्हारी अतीत की धारणाओं में निन्यानवे प्रतिशत अमानवीय हैं। और उन अमानवीय धारणाओं को चाहे कितने ही बड़े ऋषियों-मुनियों का समर्थन रहा हो,उनका कोई मूल्य नहीं है। न उन ऋषि-मुनियों का मूल्य है,न उन धारणाओं का कोई मूल्य है। चाहे वे वेद में लिखी हों,चाहे रामायण में लिखी हों,कुछ फर्क नहीं पड़ता। कहां लिखी हैं,इससे कोई सवाल नहीं है। एक पुनर्विचार की जरूरत है।"
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रविवार, 26 जून 2011

ओशो की डायरी से:5:

  • यह सत्य है कि मनुष्य अब पशु नहीं है;लेकिन क्या यह भी सत्य है कि मनुष्य,मनुष्य हो गया है? पशु होना अतीत की घटना हो गई है पर मनुष्य होना अभी भी भविष्य की संभावना है।शायद हम मध्य में हैं और यही हमारी पीड़ा है,यही हमारा तनाव है,यही हमारा संताप है। जो प्रयास करते हैं और स्वयं के इस पीड़ा-अस्तित्व से असंतुष्ट होते हैं,वे ही मनुष्य हो पाते हैं।मनुष्यता मिली हुई नहीं है,उसे हमें स्वयं ही स्वयं में जन्म देना होता है। लेकिन मनुष्य होने के लिए यह आवश्यक है कि हम पशु न होने को ही मनुष्य होना न समझ लें और जो हैं उससे तुष्ट न हो जावें। स्वयं से गहरा और तीव्र असंतोष ही विकास बनता है।
  • मैं तथाकथित शिक्षा से कितना पीड़ित हुआ हूं,कैसे बताऊं? सिखाया हुआ ज्ञान,विचार की शक्ति को तो नष्ट ही कर देता है। विचारों की भीड़ में विचार की शक्ति तो दब ही जाती है। स्मृति प्रशिक्षित हो जाती है और ज्ञान के स्रोत अविकसित ही रह जाते हैं। फिर यह प्रशिक्षित स्मृति ही ज्ञान का भ्रम देने लगती है। इस तथाकथित शिक्षा में शिक्षित व्यक्ति को नए सिरे से ही विचार करना सीखना होता है। उसे फिर से अशिक्षित होना पड़ता है। यही मुझे भी करना पड़ा और यह कार्य अति कठिन था। वस्त्र उतार कर रखने जैसा नहीं,वरन् स्वयं की चमड़ी उतार कर रखने जैसी कठिनाई थी। पर यह जरूरी था। उसके बिना कोई राह ही नहीं थी। अपने ही ढ़ंग से जीवन को देखने के लिए आवश्यक था कि जो भी मैं सीखा हूँ और सिखाया गया हूं,उसे भूल जाऊं। अपनी ही दृष्टि पाने के लिए दूसरों की दृष्टियां विस्मृत करनी आवश्यक थी। स्वयं के विचार को पाने के लिए औरों के विचार से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसे अपने पैरों से चलना सीखना हो,उसे दूसरों के कंधे का सहारा छोड़ ही देना चाहिए। स्वयं की आंखें तभी खुलती हैं,जब हम दूसरों की आंखों से देखना बंद कर देते हैं। और स्मरण रहे कि दूसरों की आंखों से देखने वाला व्यक्ति अंधे व्यक्ति से भी ज्यादा अंधा होता है।
  • जीवन में जो भी गति है,जो विकास है,जो भी ऊंचाइयों का स्पर्श है, वह सब दु:साहस से आता है। दु:साहस का अर्थ है :असुरक्षा को आमंत्रण,अपरिचित और अज्ञात से प्रेम,जोखिम का आनंद। खतरे उठाने की और खतरों को प्रेम करने की जिसकी तैयारी नहीं है,वह जीता है लेकिन जीवन को नहीं पाता है। और सबसे बड़ा दु:साहस क्या है? परमात्मा की खोज। सबसे बड़ा दु:साहस है,क्योंकि परमात्मा की दिशा से अधिक असुरक्षित और कौन सी दिशा है? क्योंकि, परमात्मा से अधिक अपरिचित,अज्ञात और अज्ञेय और क्या है? क्योंकि,परमात्मा की खोज से बड़ा दांव,जुआ और जोखिम कौन सा है? इससे मैं कहता हुं कि दु:साहस सबसे बड़ा धार्मिक गुण है। जिसमें दु:साहस नहीं है,वह धर्म के लिए नहीं है,धर्म उसके लिए नहीं है।
  • सत्यानुभूति न तो विचार है,न भावना है। वह तो समस्त प्राणों का- तुम्हारी समस्त सत्ता का आंदोलित और स्पंदित हो उठना है। वह तुममें नहीं होती,वरन् तुम ही उसमें होते हो। वह तो तुम्हारा स्वरूप है। वह अनुभव ही नहीं,स्वयं तुम ही हो। और मात्र तुम ही नहीं हो,तुम से भी ज्यादा वह है,क्योंकि उसमें सर्व की सत्ता भी समाहित है।
  • क्या तुम इतने दरिद्र हो कि धर्म भी तुम्हारे पास नहीं है? धन की दरिद्रता बहुत बड़ी बात नहीं है। असली दरिद्रता तो धर्म की दरिद्रता है। धन रहते भी लोग दरिद्र बने रहते हैं,लेकिन जिसके पास धर्म की संपदा होती है,उसकी दरिद्रता सदा-सदा के लिए नष्ट हो जाती है। मनुष्य के जीवन में - पूरी मनुष्यता के जीवन में भी सबसे बड़ी घटना उसकी भौतिक सफलताएं या साम्राज्यों का निर्माण नहीं है,बल्कि इस संपदा की खोज और उपलब्धि है; जो कि उसके ही भीतर छिपी है। उस संपदा को ही मैं धर्म कहता हूं। जो संपदा बाहर है,वह धन है और जो संपदा भीतर है वह धर्म है। धन को चुनने वाले अंतत: दरिद्रता को,और धर्म को चुनने वाले अंतत: वास्तविक धन को चुनने वाले सिद्ध होते हैं।
  • एक घर में गया था। वहां वीणा रखी थी। मैंने कहा: मनुष्य का मन भी वीणा की भांति है। वह तो साधन है। उसमें संगीत और विसंगीत दोनों ही पैदा हो सकते हैं। और जो भी हम उसमें पैदा करेंगे,उसकी जिम्मेवारी हमारे अतिरिक्त और किसी पर नहीं होगी। अपने मन को संगीत का साधन बनाएं और सत्य का। उसे स्वतंत्र रखें और सच्चा। और अंहकार से मुक्त रखें,क्योंकि अहंकार से अधिक विसंगति पैदा करने वाला और कोई तत्व नहीं है। सत्य के निकट वही पहुंच पाता है जो स्वयं के भीतर संगीतपूर्ण होता है। मात्र बुद्धिमान नहीं,बल्कि समग्र रूपेण जिनका व्यक्तित्व संगीतपूर्ण है, वे ही सत्य के सर्वाधिक निकट पहुंचते हैं।
  • मैं तुम्हें मंत्रों को दुहराते देखता हूं,कंठस्थ शब्दों और शास्त्रों की पुनरुक्ति करते देखता हूं,तो मेरा हृदय दया और सहानुभुति से भर जाता है। यह तुम क्या कर रहे हो? क्या अपने को भुलाने और विस्मरण करने और आत्मसम्मोहन के द्वारा निद्रा में जाने को ही तुमने धर्म और साधना समझा हुआ है? निश्चय ही मंत्रों का उच्चार और शब्दों का जप चित्त को सुखद निद्रा में सुलाने में समर्थ है, लेकिन निद्रा को समाधि मत समझ लेना। मित्र, सुषुप्ति और समाधि में बहुत भेद है। आत्म सम्मोहन जनित सुषुप्ति में अनुभव भी घटित होते हैं,लेकिन वे सब स्वप्नों से ज्यादा नहीं हैं और उन्हें हमारा मन ही प्रक्षिप्त करता है। फिर ये स्वप्न चाहे कितने ही सुखद और संतुष्टिदायी हो,सुख और संतोष के कारण सत्य नहीं हो जाते हैं। पर साधारणत: हम सत्य को नहीं,संतोष को ही खोजते हैं और इसलिए किसी भी भ्रम में हमारा उलझ जाना बहुत आसान है। संतोष को खोजने वाला मन किसी भी रूप में पैदा हुई मादकता से तृप्त हो सकता है- किसी भी भांति का आत्म-विस्मरण उसे तृप्ति दे सकता है और तथाकथित मंत्र-जप और एकाग्रताओं के द्वारा आत्म-विस्मरण संभव हो जाता है। किसी भी भांति की सतत पुनरुक्ति चेतना को मूर्च्छित करती है,जबकि धर्म का संबंध मूर्च्छा से नहीं, अमूर्च्छा से है।
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रविवार, 19 जून 2011

ओशो की डायरी से :4:


  • समाधि में क्या जाना जाता है? कुछ भी नहीं। जहां तक जानने को कुछ भी शेष है,वहां समाधि नहीं है। समाधि सत्ता के साथ एकता है- जानने जितनी भी दूरी वहां नहीं है।
  • संसार में संसार के होकर न रहना संन्यास है। पर बहुत बार संन्यास का अर्थ उन तीन बंदरों की भांति लगा लिया जाता है जो कि बुरे दृश्यों से बचने के लिए आंख बंद किए हैं और बुरी ध्वनियों से बचने के लिए कान और बुरी वाणी से बचने के लिए मुख। बंदरों के लिए तो यह क्षम्य है लेकिन मनुष्यों के लिए अत्यंत हास्यास्पद। भय के कारण संसार से पलायन मुक्ति नहीं वरन् एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरा बंधन है। संसार से भागना नहीं,स्वयं के प्रति जागना है। भागने में भय है, जागने में अभय की उपलब्धि। ज्ञान से प्राप्त अभय के अतिरिक्त और कुछ भी मुक्त नहीं करता। 
  • क्या निर्वाण और मोक्ष भी चाहा जा सकता है? निर्वाण को चाहने से अधिक असंगत बात और कोई नहीं है, क्योंकि जहां कोई चाह नहीं है, वहीं निर्वाण है। चाह ही अमुक्ति है तो मोक्ष कैसे चाहा जा सकता है? किंतु मोक्ष को चाहने वाले व्यक्ति भी हैं और तब स्वाभाविक ही है कि उनका तथाकथित संन्यास भी बंधन का एक रूप हो और संसार का ही एक अंग। निर्वाण तो उस समय सहज ही,अनचाहा ही,अनपेक्षित ही उपलब्ध होता है,जबकि चाह की व्यर्थता को उसके दु:ख स्वरूप और बंधन को, उनके समस्त सूक्ष्म रूपों में जान और पहचान लिया जाता है। चाह की व्यर्थ दौड़ के दर्शन होते ही वह दौड़ चली जाती है। उसका संपूर्ण ज्ञान ही उससे मुक्ति है और तब जो शेष रह जाता है वही निर्वाण है। 
  • हम दु:खी हैं, हमारा युग दु:खी है। कारण क्या है? कारण है कि हम जानते तो बहुत हैं,लेकिन अनुभव कुछ भी नहीं करते हैं। मनुष्य में मस्तिष्क ही मस्तिष्क रह गया है और हृदय विलीन हो गया है। जबकि वास्तविक ज्ञान मात्र जानने में नहीं वरन् अनुभव करने में प्राप्त होता है और वे आंखें जो कि जीवन पथ को आलोकित करती हैं,मस्तिष्क की नहीं हृदय की होती हैं। हृदय अंधा हो तो जीवन में अंधकार बिलकुल ही स्वाभाविक है। 
  • बुद्धि में अर्थ हो सकता है,अनुभूति नहीं। अनुभूति तो प्राणों के प्राण हृदय में होती है और अनुभूति शून्य अर्थ मृत्यु होता है। ऐसे मृत अर्थ और शब्द ही हमारे मस्तिष्कों में गूंज रहे हैं और उनके बोझ से हम पीड़ित हैं। वे हमें मुक्त नहीं करते,वरन् वे ही हमारे बंधन हैं। निर्भार और मुक्त होने के लिए तो हृदय की अनुभूति चाहिए। इसलिए मैं कहता हूँ कि सत्य का अर्थ और सत्य की व्याख्या मत खोजो। खोजो सत्य की अनुभुति और जीवन। सत्य में डूबो और स्मरण रखो कि जो अशेष भाव से सत्य में डूबते हैं,वे ही असत्य से उबर पाते हैं। बुद्धि ऊपर-ऊपर तैरती है, लेकिन हृदय तो पूरा ही डुबा देता है। बुद्धि नहीं,हृदय ही मार्ग है। 
  • सत्य के अनुभव और सत्य के संबंध में दिए गए वक्तव्यों में बहुत भेद है। वक्तव्य में हम वक्तव्य से बाहर होते हैं, लेकिन अनुभव में अनुभव के भीतर और अनुभव से एक। इसीलिए जिन्हें अनुभव है,उन्हें वक्तव्य देना असंभव ही हो जाता है। वक्तव्य की संभावना अनुभव के अभाव की द्योतक है। लोग मुझसे पूछते हैं: सत्य क्या है? मौन रह जाने के सिवाय मैं और क्या कह सकता हूँ? 
  • ज्ञान रहस्य की समाप्ति नहीं है। वस्तुत: ज्ञान के साथ ही रहस्य का संपूर्ण उद्-घाटन होता है और फिर तो सिर्फ रहस्य ही रहस्य रह जाता है। ज्ञान है रहस्य का बोध। रहस्य की स्वीकृति,रहस्य से मिलन,रहस्य के साथ आनंद-मंगल जीवन; रहस्य से, रहस्य में और हृदय द्वारा। जहां स्व तो मिट जाता है और मात्र रहस्य ही रह जाता है, जानना कि परमात्मा की पवित्र भूमि में प्रवेश हो गया है। और यह भी जानना कि स्व के मिट जाने से बड़ा कोई रहस्य नहीं है, क्योंकि स्व तो मिट जाता है लेकिन साथ ही स्वयं की सत्ता अपनी परिपूर्ण गरिमा में प्रकट भी हो जाती है। 

रविवार, 12 जून 2011

ओशो की डायरी से :3:


  • मैं खोजता था तो मौन से बड़ा कोई शास्त्र नहीं पा सका। और शास्त्र खोजे तो पाया कि शास्त्र व्यर्थ हैं, और मौन ही सार्थक है।
  • कहां जा रहे हो? जिसे खोजते हो,वह दूर नहीं निकट है।और जो निकट है,उसे पाने को यदि यात्रा की तो उसके पास नहीं,उसके दूर ही निकल जाओगे। ठहरो और देखो। निकट को पाने के लिए ठहरकर देखना ही पर्याप्त है। 
  • मुक्ति न तो प्रार्थना से पाई जाती है,न पूजा से, न धर्म-सिद्धांतों में विश्वास से। मुक्ति तो पाई जाती है अमूर्च्छित जीवन से। इसलिए मैं कहता हूँ कि प्रत्येक विचार और प्रत्येक कर्म में अमूर्च्छित होना ही प्रार्थना है,पूजा है और साधना है।
  • उसे सोचो जिसे कि तुम सोच ही नहीं सकते हो और तुम सोचने के बाहर हो जाओगे।सोचने के बाहर हो जाना ही स्वयं में आ जाना है।
  • जीवन के विरोध में निर्वाण मत खोजो।वरन जीवन को ही निर्वाण बनाने में लग जाओ। जो जानते हैं वे यही करते हैं। डो-झेन के प्यारे शब्द हैं- "मोक्ष के लिए कर्म मत करो,बल्कि समस्त कर्मों को ही मौका दो कि वे मुक्तिदायी बन जाएं।" यह हो जाता है, ऐसा मैं अपने अनुभव से कहता हूँ। और जिस दिन यह संभव होता है,उस दिन जीवन एक पूरे खिले हुए फूल की भांति सुंदर हो जाता है और सुवास से भर जाता है। 
  • क्या तुम ध्यान करना चाहते हो? तो ध्यान रखना कि ध्यान में न तो तुम्हारे सामने कुछ हो,न पीछे कुछ हो। अतीत को मिट जाने दो और भविष्य को भी। स्मृति और कल्पना- दोनों को शून्य होने दो। फिर न तो समय होगा और न आकाश होगा। उस क्षण जब कुछ भी नहीं होता है,तभी जानना कि तुम ध्यान में हो। महामृत्यु का यह क्षण ही नित्य जीवन का क्षण भी है।
  • ध्यान के लिए पूछते हो कि क्या करें? कुछ भी न करो- बस शांति से श्वास-प्रश्वास के प्रति जागो। होशपूर्वक श्वास पथ को देखो। श्वास के आने-जाने के साक्षी रहो। यह कोई श्रमपूर्ण चेष्टा न हो वरन् शांत और शिथिल- विश्रामपूर्ण बोधमात्र हो। और फिर तुम्हारे अनजाने ही, सहज और स्वाभाविक रूप से, एक अत्यंत प्रसादपूर्ण स्थिति में तुम्हारा प्रवेश होगा।इसका भी पता नहीं चलेगा कि कब तुम प्रविष्ट हो गए हो। अचानक ही तुम अनुभव करोगे कि तुम वहां हो जहां कि कभी नहीं थे।
  • मैं जो सीखा था,उसे भूला,तब उसे पा सका जो कि अकेला ही सीखने योग्य है, लेकिन सीखा नहीं जा सकता है। क्या सत्य को पाने के लिए सत्य के संबंध में जो सीखा है,उसे भुलने की तुम्हारी तैयारी है? यदि हाँ तो आओ सत्य के द्वार तुम्हारे लिए खुले हुए हैं। 
  • सत्य जाना तो जा सकता है,लेकिन न तो समझा जा सकता है और न समझाया ही जा सकता है। 
  • सत्य आकाश की भांति है- अनादि और अनंत और असीम। क्या आकाश में प्रवेश का कोई द्वार है? तब सत्य में भी कैसे हो सकता है? पर यदि हमारी आँखें ही बंद हों तो आकाश नहीं है और ऐसा ही सत्य के संबंध में भी है। आँखों का खुला होना ही द्वार है और आँखों का बंद होना ही द्वार का बंद होना है।

मंगलवार, 31 मई 2011

ओशो की डायरी से :2:


  • यह मत कहो कि मैं प्रार्थना में था,क्योंकि उसका अर्थ है कि आप प्रार्थना के बाहर भी होते हो। जो प्रार्थना के बाहर भी होता है,वह प्रार्थना में नहीं हो सकता। प्रार्थना क्रिया नहीं है। प्रार्थना तो प्रेम की परिपूर्णता है।
  • जीवन की खोज में आत्मतुष्टि से घातक और कुछ नहीं। जो स्वयं से संतुष्ट हैं,वे एक अर्थ में जीवित ही नहीं हैं। स्वयं से जो असंतुष्ट है,वही सत्य की दिशा में गति करता है। स्मरण रखना कि आत्मतुष्टि से निरंतर ही विद्रोह में होना धार्मिक होना है।
  • मृत्यु से घबड़ाकर तो आपने ईश्वर का आविष्कार नहीं कर लिया है? भय पर आधारित ईश्वर से असत्य  और कुछ भी नहीं है।
  • जो सदा वर्तमान है,वही सत्य है। निकटतम जो है,वही अंतिम सत्य है। दूर को नहीं,निकट को जानों क्योंकि जो निकट को ही नहीं जानता है, वह दूर को कैसे जानेगा? और जो निकट को जान लेता है,उनके लिए दूर शेष नहीं रह जाता है।
  • मैं कौन हूँ?  पूछो- स्वयं से। मैं कहां हूँ? खोजो- स्वयं में।जब तुम कहीं भी स्वयं को नहीं पा सकोगे तो जान जावोगे कि तुम कौन हो। मैं की अनुपलब्धि में ही मैं का रहस्य छिपा हुआ है।
  • सत्य यदि ज्ञात नहीं है,तो शास्त्र व्यर्थ है और यदि सत्य ज्ञात है तो भी शास्त्र व्यर्थ है।
  • सत्य की जिज्ञासा कर रहे हो और मन पर धूल इकट्ठी करते जाते हो? मन तो दर्पण की भांति है। इसे साफ करो और तुम पाओगे कि सत्य समक्ष है- और सदा से ही समक्ष है।
  • एक भ्रम को मिटाने के लिए दूसरा भ्रम पैदा मत करो। एक स्वप्न तोड़ने को दूसरे स्वप्न में जाना उचित नहीं है। ईश्वर की कल्पना मत करो-सब कल्पनाएँ छोड़कर देखो। जो समक्ष पाओगे वही ईश्वर है।
  • मैं नदी में स्नान करने जाता हूँ तो वस्त्र तट पर छोड़ देने होते हैं। परमात्मा में स्नान करने की जिसकी अभीप्सा है,उसे भी अपने सारे वस्त्र तट पर ही छोड़ने होंगे-सारे वस्त्र,सारे ओढ़े हुए व्यक्तित्व। उस परम सागर में तो केवल वे ही प्रवेश पाते हैं,जो कि बिलकुल ही नग्न हैं- जिसके पास अब छोड़ने को कुछ भी शेष नहीं रहा है। किंतु धन्य हैं वे जो सब छोड़ सकते हैं क्योंकि इस भांति वे वह पा लेते हैं जो कि सब के जोड़ से भी अधिक है।
  • शायद और सिद्धांत तो सूखे पत्तों की भांति हैं। स्वानुभूति की हरियाली न उनमें है, न हो सकती है। हरे पत्ते और जीवित फूल तो स्वयं के जीव-वृक्ष पर ही लगते हैं।

रविवार, 29 मई 2011

नियति का सुख

जिंदगी में कुछ चीजें निश्चित सी होती हैं या कहें कि नियति चाहती है कि हम वो करें। स्कूल के दिनों में मेरे संस्कृत के अध्यापक ने मेरी अच्छी लिखावट को देख कर मुझे एक कार्य नियमित रूप से करने को कहा। हमारे स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बोर्ड था,जिस पर रोज एक सुविचार लिखा जाता था। इस कार्य के लिए मुझे चुना गया। यह कार्य करते हुए मुझे भी अच्छा लगता था। क्योंकि मैं अखबार,पत्रिकाओं में छपने वाले महापुरुषों के अनमोल विचारों को सदा पढ़ता और उनका संग्रह अपनी नोट बुक में करता।मुझे नहीं मालूम की मेरे इस गुण को मेरे वह अध्यापक समझते थे या नहीं।  

आज वर्षों बाद भी, मैं जिस संस्थान में कार्य कर रहा हूँ, वहाँ भी मुख्य द्वार पर 'आज का सुविचार' बोर्ड लगा है। और उस पर विचार लिखने का कार्य मेरा ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि स्कूल के बोर्ड पर मैं जो विचार लिखता था, वह 'ब्लैक बोर्ड' पर 'खड़िया मिट्टी' से लिखता था और आज 'वाइट-बोर्ड'पर 'मार्कर पैन'से लिखता हूँ।'

इस कार्य को करते समय अनेक अनुभव हुए हैं। कभी विचार लिखे जाने के समय कोई कर्मचारी आकर सुविचार की तारीफ करने लगता है तो कभी उसमें छिपे हुए गूढ़ अर्थ को पूछने लगता है। कई बार कोई विचार इतना सशक्त होता है कि लोग पूछते हैं कि आप इन्हें कहाँ से चुन कर लाते हैं। यह सब सुन कर अच्छा लगता है। 

लेकिन मुझे यह करते हुए तब सबसे ज्यादा खुशी होती है, जब कोई व्यक्ति किसी विचार को आत्मसात करते हुए उसके अनुसार अपने आचरण में परिवर्तन करने की कोशिश करता नजर आता है या उस पर चिंतन -मनन करके अपनी राय को बदलने के लिए तैयार हो जाता है। 

क्या आपकी जिंदगी में भी कुछ ऐसे कार्य हैं, जो करते हुए आपको लगता है कि नियति ने आपको यह करने के लिए चुना है और उन्हें करते हुए आप को खुशी महसूस होती है। ऐसे कार्यों को अवश्य कीजिए; जिनको करके आपको मन से खुशी मिले और फिर देखिए नियति आपके द्वारा कैसे अपना कार्य संपन्न करवाती है।

बुधवार, 4 मई 2011

पवित्र छाया

एक सूफी कहानी : ओशो मुख से

एक बार की बात है,एक इतना भला फकीर था कि स्वर्ग से देवदूत यह देखने आते थे कि किस प्रकार से एक व्यक्ति इतना देवतुल्य भी हो सकता है। यह फकीर अपने दैनिक जीवन में, बिना इस बात को जाने,सदगुणों को इस प्रकार से बिखेरता था जैसे सितारे प्रकाश और फूल सुगंध फैलाते हैं। उसके दिन को दो शब्दों में बताया जा सकता था- बांटों और क्षमा करो- फिर भी ये शब्द कभी उसके होंठों पर नहीं आए। वे उसकी सहज मुस्कान,उसकी दयालुता,सहनशीलता और सेवा से अभिव्यक्त होते थे। 

देवदूतों ने परमात्मा से कहा: प्रभु,उसे चमत्कार कर पाने की भेंट दें।
परमात्मा ने उत्तर दिया, उससे पूछो वह क्या चाहता है? 
उन्होंने फकीर से पूछा, क्या आप चाहेंगे कि आपके छूने भर से ही रोगी स्वस्थ हो जाए।
नहीं, फकीर ने उत्तर दिया, बल्कि मैं तो चाहूँगा परमात्मा ही इसे करें।
क्या आप दोषी आत्माओं को परिवर्तित करना और राह भटके दिलों को सच्चे रास्ते पर लाना पसंद करेंगे?
नहीं, यह तो देवदूतों का कार्य है, यह मेरा कार्य नहीं कि किसी को परिवर्तित करुं।
क्या आप धैर्य का प्रतिरूप बन कर लोगों को अपने सदगुणों के आलोक से आकर्षित करते हुए और इस प्रकार परमात्मा का महीमा मंडन करना चाहेंगे?
नहीं,फकीर ने कहा, यदि लोग मेरी ओर आकर्षित होंगे तो वे परमात्मा से विमुख होने लगेंगे।
तब आपकी क्या अभिलाषा है? देवदूतों ने पूछा।
मैं किस बात की अभिलाषा करूँ? मुस्कुराते हुए फकीर ने पूछा, यह कि परमात्मा मुझे अपना आशीष प्रदान करे, क्या इससे ही मुझको सब कुछ नहीं मिल जाएगा? 
देवदूतों ने कहा: आपको चमत्कार मांगना चाहिए अन्यथा किसी चमत्कार की सामर्थ्य आपको बलपूर्वक दे दी जाएगी।
बहुत अच्छा, फकीर बोला, यह कि मैं भलाई के महत् कार्य उन्हें जाने बिना कर सकूँ।
अब देवदूत परेशानी में पड़ गए। उन्होंने आपस में विचार-विमर्श किया और इस योजना को सुनिश्चित कर दिया। फकीर की छाया भले ही उससे पीछे पड़े या किसी एक ओर पड़े, जिस ओर भी पड़ेगी उस को रोग-मुक्त करने की, दर्द को मिटाने की और पीड़ा को हरने की क्षमता प्रदान कर दी गई, जिससे कि वह इसे जान ही न सके।

जब भी वह फकीर रास्ते से गुजरता,उसकी छाया या तो उसके एक तरफ पड़ती या पीछे पड़ती तो उससे सूखे रास्ते हरियाली से भर जाते,इधर उधर के वृक्ष पुष्पित हो जाते,सूखे जल स्रोतों में पानी की स्वच्छ धार बहने लगती, बच्चों के मुरझाए हुए चेहरे खिल उठते, और दुखी स्त्री-पुरुष हर्षित हो उठते।

लेकिन वह फकीर तो बस अपने दैनिक जीवन में वैसे ही सदगुणों को बिखेरता रहा- जैसे कि सितारे प्रकाश और फूल सुगंध बिखेरते हैं, उसे पता ही न लगता। लोग उसकी विनम्रता का सम्मान करते हुए शांतिपूर्वक उसके पीछे चलते, वे उससे कभी उसके चमत्कारों का उल्लेख न करते। जल्दी ही वे उसका नाम भी भूल गए, और उन्होंने उसको 'पवित्र छाया' नाम दे दिया।

( ओशो की पुस्तक पतंजलि योग सूत्र : भाग-5 से उद्धृत एक सूफी कथा)

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

अथर्ववेद

अंगिरा-वंशीय अथर्वा ऋषि के नाम पर इसका अथर्ववेद  नाम पड़ा।इसके नामकरण के संबंध में गोपथ ब्राह्मण में एक कथा आती है।कथा के अनुसार,ब्रह्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति के लिए घोर तपस्या की।तप के प्रभाव से उनके तप:पूत शरीर से तेजस्वरूप दो जल धाराओं का उद्-भव हुआ, जिनमें से एक धारा से अथर्वन तथा दूसरी से अंगिरा उत्पन्न हुए।इन्हीं से अथर्वागिरसों की उत्पत्ति हुई।इनके वंशजों को जो मंत्र दृष्ट हुए उन्हें अथर्ववेद,मृग्वंगिरसवेद अथवा अर्वांगिरसवेद कहा गया।

अथर्व का शाब्दिक अर्थ है :गति रहित। थर्व शब्द चंचलता व गति का द्योतक है जबकि अथर्व से गति रहित,निश्चलता,एकाग्रता आदि का तात्पर्य है।इसी लिए कहा गया है : थर्व गति कर्मा न थर्व इति अथर्वा।अथर्व वेद में मानव शरीर के अंगों,शारीरिक रोगों,राजधर्म,समाज-व्यवस्था,अध्यात्मवाद और प्रकृति वर्णन का विस्तृत व व्यवहारिक ज्ञान भरा पड़ा है।

अथर्ववेद में वर्णित मंत्र यज्ञ से संबंधित न होकर यज्ञ में उत्पन्न होने वाले विघ्नों के निवारण हेतु यज्ञ संरक्षक ब्रह्म के निमित्त मंत्रों का संग्रह है।इस संहिता में मारण,मोहन,उच्चाटन आदि तंत्र-क्रियाओं का विशेष वर्णन है।इसमें भूत-प्रेतों से बचने के मंत्र,प्रयोग और विधियाँ हैं। यहां तक कि सुख-सम्पत्ति,व्यापार,जुए आदि की सफलता के लिए प्रार्थना और मंत्र हैं।आयुर्वेद संबंधी अनेक बातें इसमें दी गई हैं, इसी कारण आयुर्वेद इसका उपवेद माना जाता है।

इसके ऋत्विक ब्रह्मा,देवता सोम तथा मुख्य आचार्य सुमन्तु हैं।अथर्ववेद की कुल नौ शाखाएँ हैं -1.पिप्पलाद2.शौनक 3.मौदमहाभाष्य 4.स्तौद 5.जाजल  6.जलद 7.ब्रह्मवेद 8.देवदर्श तथा 9. चारण वैद्य। इन नौ शाखाओं में वर्तमान में प्रथम दो शाखाएँ पिप्पलाद तथा शौनक ही उपलब्ध हैं।इनमें भी शौनक शाखा ही प्रसिद्ध है।पिप्पलाद शाखा का प्रश्नोपनिषद ग्रंथ एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ है, इसके विपरीत्त शौनक शाखा का शौनक संहिता, गोपथ ब्राह्मण एवं दो उपनिषद और दो सूत्र ग्रंथ भी उपलब्ध हैं।

संपूर्ण अथर्ववेद संहिता 20 कांडों में विभाजित है।जिनमें 34 प्रपाठक, 111 अनुवाक,739 सूक्त तथा 5849 मंत्र या ऋचाएँ हैं।इनमें से लगभग 1200 ऋचाएँ ऋग्वेद से ली गई हैं।अथर्ववेद गद्य-पद्य मिश्रित है। छठा भाग गद्य में है।

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

सामवेद

साम शब्द का अर्थ है गान, अर्थात सामवेद में संकलित मंत्र देवताओं की स्तुति के समय गाये जाने वाले मंत्र हैं।अन्य शब्दों में कहें तो गेय मंत्रों अथवा ऋचाओं का ही नाम साम है तथा इनका संकलन सामवेद संहिता कहलाता है।इस वेद का स्थान ऋग्वेद और यजुर्वेद के पश्चात निर्धारित है।सामवेद में संकलित ऋचाएँ अधिकतर ऋग्वेद की ऋचाएँ ही हैं।सामवेद में कुल 1549 ऋचाएँ हैं,इनमें 75 ऋचाएँ स्वतंत्र हैं,बाकी सारी ऋचाएँ ऋग्वेद की हैं।सामवेद का ऋत्विक उद्-गाता कहलाता है।संगीत-शास्त्र का उद्-गम यहीं से होता है।

सामवेद की शाखाओं की कुल संख्या 1000 मानी गई है, जिनमें 13 महत्त्वपूर्ण हैं।हालांकि वर्तमान में तीन शाखाएँ ही उपलब्ध हैं।ये शाखाएँ हैं - 1.कौथुमीय2.राणायनीय3.जैमिनीय।इन शाखाओं के आधार पर सामवेद की कौथुमीय संहिता,राणायनीय संहिता तथा जैमिनीय संहिता नाम से तीन संहिताएँ उपलब्ध हैं। इन संहिताओं के अलग-अलग ब्राह्मण,आरण्यक तथा उपनिषद भी मिलते हैं।

सामवेद संहिता के दो भाग हैं- 1.पूर्वार्चिक तथा 2.उत्तरार्चिक। पूर्वार्चिक भाग को छंद,छंदसी या छंदशिका भी कहते हैं।पूर्वार्चिक भाग चार उप विभागोँ में विभक्त है-(क)आग्नेय पर्व (ख)ऐन्द्र(ग)पवमान(घ)आरण्यक। उत्तरार्चिक भाग में विषयानुसार कई उपखंड हैं,जिनमें इन सात अनुष्ठानों का निर्देश किया गया है- 1.दशराज2.सम्वत्सर3.ऐकाह4.अहीन 5.सूत्र 6.प्रायश्चित 7.क्षुद्र। साम के गायनों में स्वरों का प्रयोग किया जाता है जो क्रुष्ट स्वरित और उदात्त से विकसित हुए हैं।साम विकारों की संख्या छ: तथा साम गान पाँच बताए गए हैं ।

सामवेद के 3 ब्राह्मण उपलब्ध हैं : 1.पंचविंश 2.षडविंश 3.जैमिनीय ।
सामवेद के 3 आरण्यक उपलब्ध हैं : 1.आरण्यक संहिता 2.आरण्यक गान 3.जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण
सामवेद के 2 उपनिषद् उपलब्ध हैं :1. छान्दोग्य 2.केन ।

रविवार, 30 जनवरी 2011

यजुर्वेद

यजुर्वेद का संबंध यज्ञ से है।ज्ञान को कर्म में परिणित करना इसका उद्देश्य है।कर्म के लिए प्रेरित करने वाला शास्त्र होने के कारण ही इसे कर्मवेद के रूप में भी पहचाना जाता है।यजुर्वेद के पहले मंत्र में ही कर्म करने का आदेश है: 
देवो व: सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे। 
अर्थात सबका सृजन करने वाला देव ! तुम सबको श्रेष्ठ कर्म करने के लिए प्रेरित करो। 

इसी तरह यजुर्वेद के अंतिम चालिसवें अध्याय के दूसरे मंत्र में कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखने को कहा गया है: 
कुर्वन्नवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समा:।
इस वेद में यज्ञ के समय उपयोग में लाए जाने वाले नियमों एवं मंत्रों का वर्णन है। यह प्रमुखत: गद्य में है। यजुर्वेद मुख्यत: अध्वर्यु पुरोहितों की दिग्दर्शिका है; जो कर्मकांडों के नियमों का पालन करते थे।यजुर्वेद संहिता के दो भाग हैं: 1.कृष्ण यजुर्वेद 2. शुक्ल यजुर्वेद।

1. कृष्ण यजुर्वेद : कृष्ण यजुर्वेद की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को यजुर्वेद सिखलाया। वैशम्पायन ने याज्ञवल्क्य ऋषि को इसकी शिक्षा दी।बाद में किसी बात पर रुष्ट होकर वैशम्पायन ने अपनी दी हुई शिक्षा याज्ञवल्क्य से वापस मांगी, जिसके कारण याज्ञवल्क्य ने पठित यजुषों(मंत्रों)का वमन कर दिया, तब वैशम्पायन के अन्य शिष्यों ने तित्तिर (तीतर) का रूप धारण कर उन्हें चुन लिया।इसके बाद यजुर्वेद का नाम तैत्तरीय संहिता हुआ। यही कृष्ण यजुर्वेद कहलाया।बुद्धि की मलिनता के कारण यजुषों का रंग काला पड़ गया,इसी लिए यह कृष्ण यजुर्वेद के नाम से प्रसिद्ध हुआ।कृष्ण यजुर्वेद में छंदोबद्ध मंत्रों के अलावा गद्यात्मक टिप्पणी भी हैं।इसकी चार शाखाएँ हैं : 1.तैत्तिरीय संहिता2.मैत्रायणी संहिता3.काठक संहिता4.कपिष्ठल संहिता। 
2. शुक्ल यजुर्वेद : वैशम्पायन के मांगने पर याज्ञवल्क्य ने यजुषों का वमन करने के पश्चात सूर्य की आराधना कर नवीन यजुषों को उत्पन्न किया। ये यजुष ही शुक्ल यजुर्वेद कहलायी। कहा जाता है कि सूर्य ने बाजी अर्थात घोड़े का रूप धारण कर इसका उपदेश याज्ञवल्क्य को दिया था।इसलिए इसे बाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है।इसमें चालिस अध्याय हैं।इसकी दो प्रमुख शाखाएँ हैं- 1.माध्यन्दिन 2. काण्व । 

शुक्ल यजुर्वेद ऋग्वेद की तरह पद्य में है।प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से शुक्ल-यजुर्वेद प्राधान्य है। देवपूजा, संगतिकरण और दान इन तीन अर्थों में याज्ञिक दृष्टि या वैदिक कर्म-कांड का संपूर्ण इतिहास इसमें आ जाता है। यजुर्वेद के कुल चालिस अध्याय हैं, जिसमें 1975 मंत्र हैं । 

शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण प्रसिद्ध है।यह सौ अध्यायों में है और वैदिक कालीन धार्मिक समाज का उज्ज्वल चित्रण करता है।

कृष्ण-यजुर्वेद का तैत्तिरीय ब्राह्मण ग्रंथ है। 

शतपथ ब्राह्मण का चौदहवाँ कांड बृहदआरण्यक के नाम से प्रसिद्ध है। 

कृष्ण यजुर्वेद के आरण्यकों में तैत्तिरीयाण्यक और मैत्रायणी आरण्यक आते हैं। 

शुक्ल यजुर्वेद का चालिसवाँ अध्याय ईशोपनिषद के नाम से प्रसिद्ध है। बृहदारण्यक उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद की और कठोपनिषद,तैत्तिरीयोपनिषद, श्वेताश्वेत उपनिषद, मैत्रायणी और कैवल्य उपनिषद कृष्ण-यजुर्वेद की उपनिषद हैं ।