रविवार, 19 जून 2011

ओशो की डायरी से :4:


  • समाधि में क्या जाना जाता है? कुछ भी नहीं। जहां तक जानने को कुछ भी शेष है,वहां समाधि नहीं है। समाधि सत्ता के साथ एकता है- जानने जितनी भी दूरी वहां नहीं है।
  • संसार में संसार के होकर न रहना संन्यास है। पर बहुत बार संन्यास का अर्थ उन तीन बंदरों की भांति लगा लिया जाता है जो कि बुरे दृश्यों से बचने के लिए आंख बंद किए हैं और बुरी ध्वनियों से बचने के लिए कान और बुरी वाणी से बचने के लिए मुख। बंदरों के लिए तो यह क्षम्य है लेकिन मनुष्यों के लिए अत्यंत हास्यास्पद। भय के कारण संसार से पलायन मुक्ति नहीं वरन् एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरा बंधन है। संसार से भागना नहीं,स्वयं के प्रति जागना है। भागने में भय है, जागने में अभय की उपलब्धि। ज्ञान से प्राप्त अभय के अतिरिक्त और कुछ भी मुक्त नहीं करता। 
  • क्या निर्वाण और मोक्ष भी चाहा जा सकता है? निर्वाण को चाहने से अधिक असंगत बात और कोई नहीं है, क्योंकि जहां कोई चाह नहीं है, वहीं निर्वाण है। चाह ही अमुक्ति है तो मोक्ष कैसे चाहा जा सकता है? किंतु मोक्ष को चाहने वाले व्यक्ति भी हैं और तब स्वाभाविक ही है कि उनका तथाकथित संन्यास भी बंधन का एक रूप हो और संसार का ही एक अंग। निर्वाण तो उस समय सहज ही,अनचाहा ही,अनपेक्षित ही उपलब्ध होता है,जबकि चाह की व्यर्थता को उसके दु:ख स्वरूप और बंधन को, उनके समस्त सूक्ष्म रूपों में जान और पहचान लिया जाता है। चाह की व्यर्थ दौड़ के दर्शन होते ही वह दौड़ चली जाती है। उसका संपूर्ण ज्ञान ही उससे मुक्ति है और तब जो शेष रह जाता है वही निर्वाण है। 
  • हम दु:खी हैं, हमारा युग दु:खी है। कारण क्या है? कारण है कि हम जानते तो बहुत हैं,लेकिन अनुभव कुछ भी नहीं करते हैं। मनुष्य में मस्तिष्क ही मस्तिष्क रह गया है और हृदय विलीन हो गया है। जबकि वास्तविक ज्ञान मात्र जानने में नहीं वरन् अनुभव करने में प्राप्त होता है और वे आंखें जो कि जीवन पथ को आलोकित करती हैं,मस्तिष्क की नहीं हृदय की होती हैं। हृदय अंधा हो तो जीवन में अंधकार बिलकुल ही स्वाभाविक है। 
  • बुद्धि में अर्थ हो सकता है,अनुभूति नहीं। अनुभूति तो प्राणों के प्राण हृदय में होती है और अनुभूति शून्य अर्थ मृत्यु होता है। ऐसे मृत अर्थ और शब्द ही हमारे मस्तिष्कों में गूंज रहे हैं और उनके बोझ से हम पीड़ित हैं। वे हमें मुक्त नहीं करते,वरन् वे ही हमारे बंधन हैं। निर्भार और मुक्त होने के लिए तो हृदय की अनुभूति चाहिए। इसलिए मैं कहता हूँ कि सत्य का अर्थ और सत्य की व्याख्या मत खोजो। खोजो सत्य की अनुभुति और जीवन। सत्य में डूबो और स्मरण रखो कि जो अशेष भाव से सत्य में डूबते हैं,वे ही असत्य से उबर पाते हैं। बुद्धि ऊपर-ऊपर तैरती है, लेकिन हृदय तो पूरा ही डुबा देता है। बुद्धि नहीं,हृदय ही मार्ग है। 
  • सत्य के अनुभव और सत्य के संबंध में दिए गए वक्तव्यों में बहुत भेद है। वक्तव्य में हम वक्तव्य से बाहर होते हैं, लेकिन अनुभव में अनुभव के भीतर और अनुभव से एक। इसीलिए जिन्हें अनुभव है,उन्हें वक्तव्य देना असंभव ही हो जाता है। वक्तव्य की संभावना अनुभव के अभाव की द्योतक है। लोग मुझसे पूछते हैं: सत्य क्या है? मौन रह जाने के सिवाय मैं और क्या कह सकता हूँ? 
  • ज्ञान रहस्य की समाप्ति नहीं है। वस्तुत: ज्ञान के साथ ही रहस्य का संपूर्ण उद्-घाटन होता है और फिर तो सिर्फ रहस्य ही रहस्य रह जाता है। ज्ञान है रहस्य का बोध। रहस्य की स्वीकृति,रहस्य से मिलन,रहस्य के साथ आनंद-मंगल जीवन; रहस्य से, रहस्य में और हृदय द्वारा। जहां स्व तो मिट जाता है और मात्र रहस्य ही रह जाता है, जानना कि परमात्मा की पवित्र भूमि में प्रवेश हो गया है। और यह भी जानना कि स्व के मिट जाने से बड़ा कोई रहस्य नहीं है, क्योंकि स्व तो मिट जाता है लेकिन साथ ही स्वयं की सत्ता अपनी परिपूर्ण गरिमा में प्रकट भी हो जाती है। 

6 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते बंधुवर,
    कैसे हैं. आपकी पोस्ट साधकों के लिए बहुत उपयोगी है चाहे वे किसी भी विचारधारा के क्यों न हों. ओशो ने जिस निर्वाण का उल्लेख किया है उसका अर्थ ही है विचारों और मन को माया मान कर उसे छोड़ते जाना अर्थात उसे फूँक मार कर उड़ा देना. निर्वाण का शाब्दिक अर्थ 'फूँक मार कर उड़ाना' ही है.
    बढ़िया सामग्री दी है आपने.
    आभार.
    आपका
    भारत भूषण

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  2. मनोज जी ,
    चुन-चुन कर हीरे मोती लाते हैं आप पाठकों के लिए। आपकी पोस्ट्स के माध्यम से जो ज्ञानवर्धन होता है उसके लिए ह्रदय से आभार प्रेषित करती हूँ। आपके अनुभव और ज्ञान ही दर्शन के रूप में आपकी टिप्पणियों में देखने को मिलता है। मन में आपके लिए अति-सम्मान है । अभिवादन स्वीकार करें।

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  3. पिछले दिनों ब्लॉग जगत से दूर रहा, तो ओशो को भी मनन किया.. यह सारे ज्ञान इत्ने व्यावहारिक हैं कि बस इनमें गोता लगाने को जी चाह्ता है.. आभार आपका!!

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  4. ओशो जिस रहस्य में डूबने को कह रहे हैं, उसमें खोने का अभय पैदा हो सभी साधकों में, यही ""कामना"" है।

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  5. बहुत ही अच्छा पोस्ट है जी !आपना कीमती टाइम निकल कर मेरे ब्लॉग पर आए !
    डाउनलोड म्यूजिक
    डाउनलोड मूवी

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  6. जीवन दर्शन का यथार्थ !
    पढ़ना सार्थक रहा !
    आभार !

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