सोमवार, 6 सितंबर 2010

चमार राष्ट्रपति

लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति हुआ । उसका बाप एक गरीब चमार था । कौन सोचता था कि चमार के घर एक लड़का पैदा होगा, जो मुल्क में आगे खड़ा हो जाएगा ? अनेक-अनेक लोगों के मन को चोट पहुँची । एक चमार का लड़का राष्ट्रपति बन जाए । दूसरे जो धनी थे और सौभाग्यशाली घरों में पैदा हुए थे, वे पिछड़ रहे थे । जिस दिन सीनेट में पहला दिन लिंकन बोलने खड़ा हुआ, तो किसी एक प्रतिस्पर्धी ने, किसी महत्वाकांक्षी ने, जिसका क्रोध प्रबल रहा होगा, जो सह नहीं सका होगा, वह खड़ा हो गया । उसने कहा, "सुनों लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम राष्ट्रपति हो गए तो तुम एक चमार के लड़के नहीं हो । नशे में मत आ जाना । तुम्हारा बाप एक चमार था, यह खयाल रखना ।" सारे लोग हँसे, लोगों ने खिल्ली उड़ाई, लोगों को आनंद आया कि चमार का लड़का राष्ट्रपति हो गया था । चमार का लड़का कह कर उन्होंने उसकी प्रतिभा छीन ली ।फिर नीचे खड़ा कर दिया । लेकिन लिंकन की आँखें  खुशी के आँशुओं से भर गई । उसने हाथ जोड़ कर कहा कि मेरे स्वर्गीय पिता की तुमने स्मृति दिला दी, यह बहुत अच्छा किया । इस क्षण में मुझे खुद उनकी याद आनी चाहिए थी । लेकिन मैं तुमसे कहूँ, मैं उतना अच्छा राष्ट्रपति कभी न हो सकूँगा, जितने अच्छे चमार मेरे बाप थे । वे जितने आनंद से जूते बनाते थे, शायद मैं उतने आनंद से इस पद पर नहीं बैठ सकूँगा । वे अद्-भुत व्यक्ति थे । मैंने उन्हें जूते बनाते और गीत गाते देखा था । मैंने उन्हें दरिद्रता में और झोंपड़े में आनंद से मग्न देखा था । मेरी वह क्षमता नहीं, मेरी वह प्रतिभा नहीं । वे बड़े अद्-भुत थे, बहुत अलौकिक थे । मैं उनके समक्ष कुछ भी नहीं हूँ ।

यह जो लिंकन कह सका, एक दरिद्र वृद्ध चमार के बाबत, जिसने गीत गा कर जूते बनाए थे और जो आनंदित था और जो अपने से तृप्त था । उसे उसने स्वीकार किया था । जीवन में जो उसे था, उसके अनुग्रह से वह भरा था । उसके प्राण निस्पंद थे । वह किसी प्रतिस्पर्धा में न था । वह किसी दौड़ में न था । वह अपनी जिंदगी के आनंद में मग्न था ।

क्या तुम भी अपने जीवन में आनंद मग्न होने के खयाल को जन्म दे सकोगे ? क्या प्रतिस्पर्धा को छोड़कर अपने में , निज में, निजता में, कोई खुशी का कारण खोज सकोगे ? दूसरे के सुख में नहीं, अपने आनंद में क्या तुम कोई द्वार खोज सकोगे ? अगर खोज सको तो एक दुनिया बन सकती है, जो प्रेम की नगरी है । अन्यथा नहीं ।
( ओशो की पुस्तक "घाट भुलाना बाट बिनु" के " प्रेम नगर के पथ पर" प्रवचन का एक अंश )

9 टिप्‍पणियां:

  1. ओशो मन के मर्मज्ञ हैं. प्रेरणा के साथ उत्साह का मेल द्रष्टव्य है. बहुत बढ़िया प्रस्तुति.

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  2. वहां के सरोकार में किसी भी काम को हेय दृष्टी से नहीं देखा जाता..सौभाग्यवश

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  3. बहुत सुन्दर और शानदार प्रस्तुती!
    शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

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  4. ओशो एक सर्जन हैं, सामाजिक ताने-बाने के बीमार हिस्से पर, बहुत सहजता से अपना सर्जीकल चाकू रख देते हैं!

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  5. वह किसी प्रतिस्पर्धा में न था । वह किसी दौड़ में न था । वह अपनी जिंदगी के आनंद में मग्न था ।

    और आज हम जो भी कर रहे हैं सब इसका उलटा है तो हासिल भी तो कुछ वैसा ही होगा.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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