गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कुछ मुक्तक

यूं तन्हाई में रहने की
आदत तो न थी
जमाने की बेवफाई ने
तन्हाई में रहना सीखा दिया

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एक सपना मैंने देखा
जो मेरा अपना था
वो ही बेगाना निकला
सपना क्या अपना और क्या बेगाना
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जानें क्यों उससे प्रीत लगाई
रातें क्यों उसके लिए जगाई
जाने क्यों वो दिल में समाई
वो ही जाने ये तो ....
मैं इतना ही जानूँ  कि प्रीत पराई
..........................................................................................

जब जब मैं उसे देखूँ
मेरी आँखों से कुछ रिसता
हृदय की अतल गहराई में जा गिरता
मैं मिटता, गिरता आनंदित पुलकित होता
....................................................................................................................

14 टिप्‍पणियां:

  1. यूं तन्हाई में रहने की
    आदत तो न थी
    जमाने की बेवफाई ने
    तन्हाई में रहना सीखा दिया
    Zamana kya kuchh na sikha deta!

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  2. इक विरह की वेदना
    इन मुक्तकों में है ऐ दोस्त
    फिर भी भला क्यों दोष दें इस दर्द को
    अपना ही है
    अपना सा है
    और क्यों न हो अपनों से बढकर दर्द ये
    तुमने दिया है!!
    .
    बस यह पंक्तियाँ ख़ुद ब ख़ुद आपके मुक्तकों पर बिखरती चली गईं, न तारीफ में, न तंक़ीद में.. शायद दिल से महसूस करने के एहसास की वज़ह से!!

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  3. जानें क्यों उससे प्रीत लगाई
    रातें क्यों उसके लिए जगाई
    जाने क्यों वो दिल में समाई
    वो ही जाने ये तो ....
    मैं इतना ही जानूँ कि प्रीत पराई
    Yebhi bahut khoob...preet ka yahi dard bada zalim hota hai.

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  4. bahut badiya muktak hai ..........

    vedana jhalaktee hai..........chalo hum baat lete hai ise..........

    mujhe isse nipatana aata hai.........

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  5. जानें क्यों उससे प्रीत लगाई
    रातें क्यों उसके लिए जगाई
    जाने क्यों वो दिल में समाई
    वो ही जाने ये तो ....
    मैं इतना ही जानूँ कि प्रीत पराई

    ये पंक्तियाँ मन को छू गईं.

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  6. मेरी आँखों से कुछ रिसता
    हृदय की अतल गहराई में जा गिरता

    बेहतरीन अनुभूति और तदनुसार उसकी प्रस्तुति.
    हार्दिक बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  7. जमाने की बेवफाई...
    कोई बात नहीं आपने तो नहीं की ना...बेवफाई ??
    एक सपना मैंने देखा......
    खुली या बन्द आँख ??
    मैं इतना ही जानूँ कि प्रीत पराई...
    समझदार हो न ??
    मैं मिटता, गिरता आनंदित पुलकित होता...
    चलो कुछ तो हुआ !!!
    बहुत ही अच्छे भाव हैं जो आपने लिखे...मैने तो बस यूँ ही हल्की-फुल्की सी बात की है !!!

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  8. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
    बहुत सुन्दर लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! उम्दा प्रस्तुती!

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  9. मनोज,
    शायद पहली बार आया हूँ!
    बार-बार आना चाहूँगा!
    अच्छा है!
    आशीष
    --
    प्रायश्चित

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  10. जब जब मैं उसे देखूँ
    मेरी आँखों से कुछ रिसता
    हृदय की अतल गहराई में जा गिरता
    मैं मिटता, गिरता आनंदित पुलकित होता
    bahut sundar hai sabhi .

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  11. मनोज भारती जी

    नमस्कार !
    चारों मुक्तक अच्छे हैं , एक से बढ़कर एक हैं … बधाई !

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  12. चारों कवितायें छोटी हैं..लेकिन मन की बात कह रही हैं...
    बहुत ही अच्छी लगी हैं...

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