मंगलवार, 31 मई 2011

ओशो की डायरी से :2:


  • यह मत कहो कि मैं प्रार्थना में था,क्योंकि उसका अर्थ है कि आप प्रार्थना के बाहर भी होते हो। जो प्रार्थना के बाहर भी होता है,वह प्रार्थना में नहीं हो सकता। प्रार्थना क्रिया नहीं है। प्रार्थना तो प्रेम की परिपूर्णता है।
  • जीवन की खोज में आत्मतुष्टि से घातक और कुछ नहीं। जो स्वयं से संतुष्ट हैं,वे एक अर्थ में जीवित ही नहीं हैं। स्वयं से जो असंतुष्ट है,वही सत्य की दिशा में गति करता है। स्मरण रखना कि आत्मतुष्टि से निरंतर ही विद्रोह में होना धार्मिक होना है।
  • मृत्यु से घबड़ाकर तो आपने ईश्वर का आविष्कार नहीं कर लिया है? भय पर आधारित ईश्वर से असत्य  और कुछ भी नहीं है।
  • जो सदा वर्तमान है,वही सत्य है। निकटतम जो है,वही अंतिम सत्य है। दूर को नहीं,निकट को जानों क्योंकि जो निकट को ही नहीं जानता है, वह दूर को कैसे जानेगा? और जो निकट को जान लेता है,उनके लिए दूर शेष नहीं रह जाता है।
  • मैं कौन हूँ?  पूछो- स्वयं से। मैं कहां हूँ? खोजो- स्वयं में।जब तुम कहीं भी स्वयं को नहीं पा सकोगे तो जान जावोगे कि तुम कौन हो। मैं की अनुपलब्धि में ही मैं का रहस्य छिपा हुआ है।
  • सत्य यदि ज्ञात नहीं है,तो शास्त्र व्यर्थ है और यदि सत्य ज्ञात है तो भी शास्त्र व्यर्थ है।
  • सत्य की जिज्ञासा कर रहे हो और मन पर धूल इकट्ठी करते जाते हो? मन तो दर्पण की भांति है। इसे साफ करो और तुम पाओगे कि सत्य समक्ष है- और सदा से ही समक्ष है।
  • एक भ्रम को मिटाने के लिए दूसरा भ्रम पैदा मत करो। एक स्वप्न तोड़ने को दूसरे स्वप्न में जाना उचित नहीं है। ईश्वर की कल्पना मत करो-सब कल्पनाएँ छोड़कर देखो। जो समक्ष पाओगे वही ईश्वर है।
  • मैं नदी में स्नान करने जाता हूँ तो वस्त्र तट पर छोड़ देने होते हैं। परमात्मा में स्नान करने की जिसकी अभीप्सा है,उसे भी अपने सारे वस्त्र तट पर ही छोड़ने होंगे-सारे वस्त्र,सारे ओढ़े हुए व्यक्तित्व। उस परम सागर में तो केवल वे ही प्रवेश पाते हैं,जो कि बिलकुल ही नग्न हैं- जिसके पास अब छोड़ने को कुछ भी शेष नहीं रहा है। किंतु धन्य हैं वे जो सब छोड़ सकते हैं क्योंकि इस भांति वे वह पा लेते हैं जो कि सब के जोड़ से भी अधिक है।
  • शायद और सिद्धांत तो सूखे पत्तों की भांति हैं। स्वानुभूति की हरियाली न उनमें है, न हो सकती है। हरे पत्ते और जीवित फूल तो स्वयं के जीव-वृक्ष पर ही लगते हैं।

रविवार, 29 मई 2011

नियति का सुख

जिंदगी में कुछ चीजें निश्चित सी होती हैं या कहें कि नियति चाहती है कि हम वो करें। स्कूल के दिनों में मेरे संस्कृत के अध्यापक ने मेरी अच्छी लिखावट को देख कर मुझे एक कार्य नियमित रूप से करने को कहा। हमारे स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बोर्ड था,जिस पर रोज एक सुविचार लिखा जाता था। इस कार्य के लिए मुझे चुना गया। यह कार्य करते हुए मुझे भी अच्छा लगता था। क्योंकि मैं अखबार,पत्रिकाओं में छपने वाले महापुरुषों के अनमोल विचारों को सदा पढ़ता और उनका संग्रह अपनी नोट बुक में करता।मुझे नहीं मालूम की मेरे इस गुण को मेरे वह अध्यापक समझते थे या नहीं।  

आज वर्षों बाद भी, मैं जिस संस्थान में कार्य कर रहा हूँ, वहाँ भी मुख्य द्वार पर 'आज का सुविचार' बोर्ड लगा है। और उस पर विचार लिखने का कार्य मेरा ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि स्कूल के बोर्ड पर मैं जो विचार लिखता था, वह 'ब्लैक बोर्ड' पर 'खड़िया मिट्टी' से लिखता था और आज 'वाइट-बोर्ड'पर 'मार्कर पैन'से लिखता हूँ।'

इस कार्य को करते समय अनेक अनुभव हुए हैं। कभी विचार लिखे जाने के समय कोई कर्मचारी आकर सुविचार की तारीफ करने लगता है तो कभी उसमें छिपे हुए गूढ़ अर्थ को पूछने लगता है। कई बार कोई विचार इतना सशक्त होता है कि लोग पूछते हैं कि आप इन्हें कहाँ से चुन कर लाते हैं। यह सब सुन कर अच्छा लगता है। 

लेकिन मुझे यह करते हुए तब सबसे ज्यादा खुशी होती है, जब कोई व्यक्ति किसी विचार को आत्मसात करते हुए उसके अनुसार अपने आचरण में परिवर्तन करने की कोशिश करता नजर आता है या उस पर चिंतन -मनन करके अपनी राय को बदलने के लिए तैयार हो जाता है। 

क्या आपकी जिंदगी में भी कुछ ऐसे कार्य हैं, जो करते हुए आपको लगता है कि नियति ने आपको यह करने के लिए चुना है और उन्हें करते हुए आप को खुशी महसूस होती है। ऐसे कार्यों को अवश्य कीजिए; जिनको करके आपको मन से खुशी मिले और फिर देखिए नियति आपके द्वारा कैसे अपना कार्य संपन्न करवाती है।

बुधवार, 4 मई 2011

पवित्र छाया

एक सूफी कहानी : ओशो मुख से

एक बार की बात है,एक इतना भला फकीर था कि स्वर्ग से देवदूत यह देखने आते थे कि किस प्रकार से एक व्यक्ति इतना देवतुल्य भी हो सकता है। यह फकीर अपने दैनिक जीवन में, बिना इस बात को जाने,सदगुणों को इस प्रकार से बिखेरता था जैसे सितारे प्रकाश और फूल सुगंध फैलाते हैं। उसके दिन को दो शब्दों में बताया जा सकता था- बांटों और क्षमा करो- फिर भी ये शब्द कभी उसके होंठों पर नहीं आए। वे उसकी सहज मुस्कान,उसकी दयालुता,सहनशीलता और सेवा से अभिव्यक्त होते थे। 

देवदूतों ने परमात्मा से कहा: प्रभु,उसे चमत्कार कर पाने की भेंट दें।
परमात्मा ने उत्तर दिया, उससे पूछो वह क्या चाहता है? 
उन्होंने फकीर से पूछा, क्या आप चाहेंगे कि आपके छूने भर से ही रोगी स्वस्थ हो जाए।
नहीं, फकीर ने उत्तर दिया, बल्कि मैं तो चाहूँगा परमात्मा ही इसे करें।
क्या आप दोषी आत्माओं को परिवर्तित करना और राह भटके दिलों को सच्चे रास्ते पर लाना पसंद करेंगे?
नहीं, यह तो देवदूतों का कार्य है, यह मेरा कार्य नहीं कि किसी को परिवर्तित करुं।
क्या आप धैर्य का प्रतिरूप बन कर लोगों को अपने सदगुणों के आलोक से आकर्षित करते हुए और इस प्रकार परमात्मा का महीमा मंडन करना चाहेंगे?
नहीं,फकीर ने कहा, यदि लोग मेरी ओर आकर्षित होंगे तो वे परमात्मा से विमुख होने लगेंगे।
तब आपकी क्या अभिलाषा है? देवदूतों ने पूछा।
मैं किस बात की अभिलाषा करूँ? मुस्कुराते हुए फकीर ने पूछा, यह कि परमात्मा मुझे अपना आशीष प्रदान करे, क्या इससे ही मुझको सब कुछ नहीं मिल जाएगा? 
देवदूतों ने कहा: आपको चमत्कार मांगना चाहिए अन्यथा किसी चमत्कार की सामर्थ्य आपको बलपूर्वक दे दी जाएगी।
बहुत अच्छा, फकीर बोला, यह कि मैं भलाई के महत् कार्य उन्हें जाने बिना कर सकूँ।
अब देवदूत परेशानी में पड़ गए। उन्होंने आपस में विचार-विमर्श किया और इस योजना को सुनिश्चित कर दिया। फकीर की छाया भले ही उससे पीछे पड़े या किसी एक ओर पड़े, जिस ओर भी पड़ेगी उस को रोग-मुक्त करने की, दर्द को मिटाने की और पीड़ा को हरने की क्षमता प्रदान कर दी गई, जिससे कि वह इसे जान ही न सके।

जब भी वह फकीर रास्ते से गुजरता,उसकी छाया या तो उसके एक तरफ पड़ती या पीछे पड़ती तो उससे सूखे रास्ते हरियाली से भर जाते,इधर उधर के वृक्ष पुष्पित हो जाते,सूखे जल स्रोतों में पानी की स्वच्छ धार बहने लगती, बच्चों के मुरझाए हुए चेहरे खिल उठते, और दुखी स्त्री-पुरुष हर्षित हो उठते।

लेकिन वह फकीर तो बस अपने दैनिक जीवन में वैसे ही सदगुणों को बिखेरता रहा- जैसे कि सितारे प्रकाश और फूल सुगंध बिखेरते हैं, उसे पता ही न लगता। लोग उसकी विनम्रता का सम्मान करते हुए शांतिपूर्वक उसके पीछे चलते, वे उससे कभी उसके चमत्कारों का उल्लेख न करते। जल्दी ही वे उसका नाम भी भूल गए, और उन्होंने उसको 'पवित्र छाया' नाम दे दिया।

( ओशो की पुस्तक पतंजलि योग सूत्र : भाग-5 से उद्धृत एक सूफी कथा)