रविवार, 29 मई 2011

नियति का सुख

जिंदगी में कुछ चीजें निश्चित सी होती हैं या कहें कि नियति चाहती है कि हम वो करें। स्कूल के दिनों में मेरे संस्कृत के अध्यापक ने मेरी अच्छी लिखावट को देख कर मुझे एक कार्य नियमित रूप से करने को कहा। हमारे स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बोर्ड था,जिस पर रोज एक सुविचार लिखा जाता था। इस कार्य के लिए मुझे चुना गया। यह कार्य करते हुए मुझे भी अच्छा लगता था। क्योंकि मैं अखबार,पत्रिकाओं में छपने वाले महापुरुषों के अनमोल विचारों को सदा पढ़ता और उनका संग्रह अपनी नोट बुक में करता।मुझे नहीं मालूम की मेरे इस गुण को मेरे वह अध्यापक समझते थे या नहीं।  

आज वर्षों बाद भी, मैं जिस संस्थान में कार्य कर रहा हूँ, वहाँ भी मुख्य द्वार पर 'आज का सुविचार' बोर्ड लगा है। और उस पर विचार लिखने का कार्य मेरा ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि स्कूल के बोर्ड पर मैं जो विचार लिखता था, वह 'ब्लैक बोर्ड' पर 'खड़िया मिट्टी' से लिखता था और आज 'वाइट-बोर्ड'पर 'मार्कर पैन'से लिखता हूँ।'

इस कार्य को करते समय अनेक अनुभव हुए हैं। कभी विचार लिखे जाने के समय कोई कर्मचारी आकर सुविचार की तारीफ करने लगता है तो कभी उसमें छिपे हुए गूढ़ अर्थ को पूछने लगता है। कई बार कोई विचार इतना सशक्त होता है कि लोग पूछते हैं कि आप इन्हें कहाँ से चुन कर लाते हैं। यह सब सुन कर अच्छा लगता है। 

लेकिन मुझे यह करते हुए तब सबसे ज्यादा खुशी होती है, जब कोई व्यक्ति किसी विचार को आत्मसात करते हुए उसके अनुसार अपने आचरण में परिवर्तन करने की कोशिश करता नजर आता है या उस पर चिंतन -मनन करके अपनी राय को बदलने के लिए तैयार हो जाता है। 

क्या आपकी जिंदगी में भी कुछ ऐसे कार्य हैं, जो करते हुए आपको लगता है कि नियति ने आपको यह करने के लिए चुना है और उन्हें करते हुए आप को खुशी महसूस होती है। ऐसे कार्यों को अवश्य कीजिए; जिनको करके आपको मन से खुशी मिले और फिर देखिए नियति आपके द्वारा कैसे अपना कार्य संपन्न करवाती है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. aap shayad vystata kee vazah se blog ko adhik samay nahee de pate aapkee post ka intzar rahta hai..

    aapke paas to SUVICHARO ka khazana hoga kash aap adhik samay de pate aur hum sabse bhee ye baant pate.
    PRERANAto miltee hee hai .
    Aabhar .

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  2. बहुत सुन्दर और शानदार पोस्ट ! प्रशंग्सनीय प्रस्तुती!

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  3. मुझे तो ब्लौग लिखने में आनंद आता है , बेहद ख़ुशी भी मिलती है। शायद नियति ने मुझे इस कार्य के लिए चुना है।

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  4. मनोज जी!पिछले दिनों जब अचानक आपके ऑफिस पहुंचा तो सबसे पहले आपका ही ध्यान आया जब स्वागत किया आपके सुविचार ने!!
    अंतर तो सचमुच बहुत आया है..पहले काले बोर्ड पर सफ़ेद खडिया से सुविचार लिखे जाते थे ताकि अज्ञान का कालापन इन विचारों की सफेदी से नष्ट हो.. आज तो विचार ही काले होते जा रहे हैं,सादा मन भी दिखावा लगता है..
    आप अपनी साधना में लगे रहें..

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