शनिवार, 31 जुलाई 2010

सोलह संस्कार

भारतीय संस्कृति में जीवन के विकास क्रम में सोलह संस्कारों की बहुत महत्ता है । ये संस्कार गर्भाधान से शुरु होकर अंत्येष्टि तक हैं । ये संस्कार परिवार द्वारा प्रवृत्त होते थे, परिवार की संस्था के साथ ही इनका आविर्भाव हुआ । परिवार वस्तुत: इन्हीं संस्कारों द्वारा संचालित था । ये सोलह संस्कार इस प्रकार हैं :

1. गर्भाधान : श्रेष्ठ संतान की इच्छा से यह संस्कार किया जाता है । पच्चीस वर्ष के पुरुष और सोलह वर्ष की स्त्री विवाह बंधन के बाद इस संस्कार के लिए पात्र होते हैं । जीवन के उद्देश्य को स्मरण करके, अपने आदर्शों के अनुकूल मनोदशा रख कर व उत्तम विचारों को धारण करते हुए, स्त्री-पुरुष संतानोत्पत्ति के लिए संसर्ग करें और बच्चे के लिए माँ गर्भ धारण करे । यही इस संस्कार का उद्देश्य है ।

2.पुंसवन : गर्भ के तीसरे मास के भीतर गर्भ की रक्षा और बच्चे के उत्तम विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है । इस संस्कार में स्त्री-पुरुष प्रतिज्ञा करते हैं कि वे कोई भी ऐसा कार्य मनसा,वाचा,कर्मणा नहीं करेंगे जिससे गर्भ में विकसित हो रहे बच्चे के विकास में बाधा पहुँचे ।

3. सीमंतोन्नयन : यह संस्कार गर्भ के सातवें या आठवें मास में बच्चे की मानसिक शक्तियों की वृद्धि के लिए किया जाता है । इसमें ऐसे उपाय किए जाते हैं ,जिनसे कि स्त्री का मन संतुष्ट रहे । वह मानसिक रूप से प्रसन्नचीत्त रहे ।

4. जातकर्म : यह संस्कार बालक के जन्म लेते ही किया जाता है । बालक का पिता सोने या चाँदी की सलाई से घी व शहद से बालक की जिह्वा पर ओ3म लिखता है । यह बच्चे के संसार में आध्यात्मिक विकास हेतु किया जाता है ।

5. नामकरण : बालक के जन्म से ग्यारहवें दिन या एक सौ एकवें दिन, या दूसरे वर्ष के आरंभ में, यह संस्कार किया जाता है । इसमें बालक का नाम रखा जाता है ।

6. निष्क्रमण : यह संस्कार बालक के जन्म के चौथे महीने में , उसी तिथि को जब बालक का जन्म हुआ हो, किया जाता है । इसका उद्देश्य बालक को प्रकृति के खुले वातावरण में शुद्ध हवा का सेवन व सृष्टि का प्रथम अवलोकन करवाना होता है । इस दिन से बालक को बाहर खुले में लाना ले जाना शुरु कर दिया जाता है ।

7. अन्नप्राशन : छठे या आठवें महीने में जब बालक की शक्ति अन्न पचाने की हो जाए, तब यह संस्कार किया जाता है और बच्चे को अन्न ग्रहण करवाना शुरु कर दिया जाता है ।

8. चूड़ाकर्म : इसे मुंडन संस्कार भी कहते हैं । यह पहले अथवा तीसरे वर्ष में बालक के बाल काटने के लिए किया जाता है ।

9. कर्णवेध : इसमें बालक के कान बेधे जाते हैं । यह संस्कार तीसरे या पाँचवें वर्ष में किया जाता है ।

10. उपनयन संस्कार : जन्म के सातवें वर्ष से लेकरचौदहवें या सौलहवें वर्ष तक बालक का यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है और उसे गुरुकुल में विद्याभ्यास के लिए भेजा जाता है ।

11. वेदारम्भ : उपनयन संस्कार के दिन या उससे एक वर्ष के भीतर गुरुकुल में वेदों का ज्ञान गायत्री मंत्र से किया जाता है ।

12. समावर्तन : यह संस्कार ब्रह्मचर्य-व्रत की समाप्ति पर किया जाता है ।

13. विवाह : विद्या समाप्ति पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए गुणशील संपन्न कन्या के पाणिग्रहण द्वारा यह संस्कार संपन्न होता है ।

14. वानप्रस्थ : इसका समय पचास वर्ष की आयु उपरांत है । जब घर में पुत्र का भी पुत्र हो जाए, तब गृहस्थी के धंधों में फंसे रहना धर्म नहीं है । उस समय वानप्रस्थ की तैयारी के लिए यह संस्कार किया जाता है ।

15. संन्यास : वानप्रस्थ में रहकर जब इंद्रियों पर विजय प्राप्त हो, किसी के लिए मोह,शोक आदि न रहे, तब केवल परोपकार के हेतु संन्यास आश्रम में प्रवेश के लिए यह संस्कार किया जाता है ।

16. अंत्येष्टि : मनुष्य के शरीर का यह अंतिम संस्कार है, जो मरने के पश्चात शव को जलाकर पूरा किया जाता है ।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

सम्यक निरीक्षण

सामने शून्य जगत में जो परिवर्तन हो रहे हैं
वे अज्ञान के कारण ही यथार्थ दीख पड़ते हैं ;
सत्य के पीछे दौड़ने की कोशिश मत करो,
केवल मन की सारी आस्थाओं और विचारों को छोड़ दो ।
- ओशो 

ज्योंही सत-असत का द्वैत खड़ा होता है
भ्रांति पैदा होती है, मन खो जाता है । 

हम अपने मन को पहचाने, देखें । 
इसकी गति-विधि का निरीक्षण करें ।
जिसे तुम चाहते हो, उसे  उसके विरुद्ध खड़ा कर देना,;
जिसे तुम नहीं चाहते - मन का सबसे बड़ा रोग है । 
जब पथ के गूढ़ अर्थ का पता नहीं होता
तब मन की शांति भंग होती है, जीवन व्यर्थ होता है । 
मूक दर्शक रहें, पक्ष ग्रहण न करे, बल्कि अपनी वासनाओं, विचारों को ऐसे ही देखे जैसे कोई सागर पर खड़ा हो, सागर की लहरों को देखता हो । कृष्णमूर्ति ने इसे निर्विकल्प सजगता कहा है । यह बिल्कुल तटस्थ निरीक्षण है ।

बुधवार, 28 जुलाई 2010

स्वयं होना काफी है

1. सिर्फ अज्ञान के कारण ही दो व्यक्ति किसी एक बात पर राजी होते हैं ।
2. किसी भी तरह की प्रभावित करने की चेष्टा बहुत गहरे में दूसरे व्यक्ति को गुलाम बनाने की चेष्टा है ।
3. प्रभावित होने से बचना हो तो पक्ष-विपक्ष से बचना पड़ता है । नहीं तो प्रभाव पड़ ही जाता है ।
4. प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है । दूसरों से तुलना न करें ।
5. एक-एक मनुष्य अतुलनीय है ।
6. न मानने की फिक्र करना, न न मानने की ।
7. आदमी एक अनंत घटना है । उसमें अनंत रूप हैं ।
8. स्वयं की विचार प्रक्रिया को समझें ।
9. आदमी का मन बहुत आश्चर्यजनक है, उसके लिए निषेध ही आमंत्रण है ।
10. मित्र जब दुखी होते हैं, तो दुश्मनी से कम पर नहीं रुकते ।
11. मैं मित्र नहीं बनाता, क्योंकि मित्रता में पोटेंशियल शत्रु छिपा है ।
12. जिंदगी बहुत इनकंसिस्टेंट है, सिर्फ मौत कंसिस्टेंट है ।
13. अधिकतर संत सैडिस्ट होते हैं या मेसोचिस्ट होते हैं ।या तो वे दूसरे को सताते हैं या स्वयं को सताते हैं । और जो खुद को सताने में कुशल होता है वह दूसरे को सताने का अधिकार पा जाता है ।
14. जब तक सीधे सत्यों को देखने की हिम्मत न जुटाएँ, बड़ी मुश्किल होती है ...स्वयं को देखने की ।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

ओशो के चिर-स्मरणीय दस सूत्र

1. किसी की आज्ञा कभी मत मानों, जब तक कि वह स्वयं की ही आज्ञा न हो ।
2. जीवन के अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं है ।
3. सत्य स्वयं में है, इसलिए उसे और कहीं मत खोजना ।
4. प्रेम प्रार्थना है ।
5. शून्य होना सत्य का द्वार है; शून्यता ही साधन है, साध्य है, सिद्धि है।
6. जीवन है, अभी और यहीं ।
7. जियो, जागे हुए ।
8. तैरो मत - बहो ।
9. मरो प्रतिपल ताकि प्रतिपल नए हो सको ।
10. खोजो मत; जो है - है; रुको और देखो ।

रविवार, 25 जुलाई 2010

नए की खोज

(नए के प्रति ओशो का नजरिया )
1. हर पल और हर क्षण नया होता है ।
2. दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं, एक वे जो अपने को नया करने का राज खोज लेते हैं और एक वे जो अपने को पुरानाबनाए रखते हैं ।
3. उत्सव हमारे दुखी चित्त के लक्षण हैं ।
4. जब तक दुनिया में दुखी आदमी हैं तभी तक उत्सव हैं ।
5. जिस दिन दुनिया में प्रसन्न लोग रहेंगे उस दिन उत्सव नहींरहेंगे; क्योंकि रोज ही उत्सव का दिन होगा ।
6. जब दुनिया में दुखी लोग हैं तब तक मनोरंजन के साधन हैं । जिस दिन आदमी आनंदित होगा
उस दिन मनोरंजन के साधन एकदम विलीन हो जाएंगे ।
7. सिर्फ दुखी आदमी मनोरंजन की खोज करता है और सिर्फ दुखी आदमी ने उत्सव ईजाद किए हैं ।
8. रोज नया चित्त हो तो रोज नया दिन हो ।
9. जो एक क्षण में शांत होने की तरकीब जान लेता है वहपूरी जिंदगी शांत रह सकता है ; क्योंकि एक क्षण से ज्यादाकिसी आदमी के हाथ में दो क्षण होते ही नहीं ।
10. पुराना करने की तरकीबों में हम निष्णात हैं ; प्रत्येक चीजमें पुराने को खोजने को इतने आतुर हैं जिसका कोई हिसाबनहीं ।
11. मनुष्य कितना विरोधाभासी सोचता है ; एक तरफ वहनिरंतर पुराने की अपेक्षा किए हुए है और दूसरी तरफ नए कीआकांक्षा भी किए हुए है ।
12. प्रतिपल नए की खोज की हमारी दृष्टि होनी चाहिए कि नया क्या है ?
13. जो कल था वह कल विदा हो गया । आज हर चीज नई है ।
14. नए का सम्मान करना सीखें तो नया प्रकट होगा ।
15. नए का सम्मान करें और जिंदगी की यंत्रवत पुनरुक्ति कीआकांक्षा छोड़ दें ।
16. जिंदगी को एक पुलक में जीने दें, एक अनिश्चय में जीने दें । इस असुरक्षा को स्वीकार कर लें ।
17. जिंदगी एक अनिश्चय है और आदमी डर के कारण सबनिश्चित कर लेता है ।
18. वे ही लोग नए हो सकते हैं जो अनिश्चित में जीने कीहिम्मत रखते हैं ।
19. जिंदगी में नए का स्वागत नहीं है, पुराने का आग्रह है, तोसब पुराना हो जाएगा ।
20. पुराने की अपेक्षा छोड़ दें ।
21. हम अपने चारों तरफ क्या इकट्ठा कर रहें हैं इस पर निर्भर करेगा कि हमारे भीतर क्या घटित होगा । हमारे भीतर जोघटना घटेगी, वह हमारे हाथ से ही इकट्ठी की हुई है ।
22. जो व्यक्ति एक बार नए के लिए मन का द्वार खोल लेता है, आज नहीं कल पाता है कि नए के पीछे परमात्मा प्रवेश करगया है , क्योंकि परमात्मा अगर कुछ है तो जो निरंतर नया है, उसी का नाम है ।
23. जिंदगी रोज नई है और जिंदगी रोज वहां पहुँच जाती है जहां कभी नहीं पहुँची थी ।
24. परमात्मा वह है जो प्रतिपल होता है और प्रतिपल होता ही चला जाता है ।
25. अगर हमारे पास वह तकनीक, वह तरकीब, वह शिल्प ,वह कला है जिससे हम हर जगह नए को खोज लें, तो हम परमात्मा हैं ।
26. एक बार जिंदगी में नए का बोध होना शुरु हो जाए तो सबकुछ ठीक हो जाता है ।
27. पुराने को मत खोजे, खोजेंगे तो वह मिल जाएगा क्योंकि वह है ।
28. जिंदगी बहुत अद्भूत है । उसमें खोजने वाले को सब मिल जाता है । आदमी जो खोजने जाता है, वह उसे मिल ही जाता है ।
29. ध्यान से समझ लेना, कि आपने खोजा था इस लिए मिल गया है और कोई कारण नहीं है उसके मिल जाने का ।
30. जो कभी नहीं हुआ है वह आज हो, इसकी ओर हमारा खुलामन होना चाहिए ।
31. पुराने सुखों से नए दुख भी बेहतर होते हैं क्योंकि नए होते हैं ।
32. पुराने की अपेक्षा न करें, नया जब आवे तब उसे स्वीकार करें, पुराने की आकांक्षा न करें ।
33. इस क्षण को नया करने की फिक्र करें । अगले क्षण की फिक्र न करें ।
34. नए के द्वार अंतहीन हैं ।
35. आज के दिन को पुराना न होने दें ।

शनिवार, 24 जुलाई 2010

क्षणिकाएँ

दु:ख
सुख
से पार आनंद

इच्छा
मन
से है दु:ख


इच्छा
पूर्ति
से है सुख


मोह
शोक
से है बंधन

मोह
इच्छा
शोक  गए कटे बंधन

जिंदगी
खिलौना
फिर भी शोक 

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

हाइकू

चल रहा
जिंदगी का खेल
मुड़ती-तुड़ती सांसों में


एक सपना टूटा
बच्चा हँसा
अहम गिरा टप...टप..टप


वृक्ष से पत्ता गिरा
मन में कुछ हिला
कितना क्षण-भंगुर यह जीवन


बिजली चमकी बादल खड़का
दिल धड़का
मन का शौर एक कौने में जा दुबका


ऊँचे होते मकान
बौने होते मूल्य
खोखले होते इंसान

शनिवार, 17 जुलाई 2010

भावनाएँ

भावनाओं के एक ही कुवे में बार-बार डूबकी न लगाएँ ।

अधिक उचित होगा यदि कहें कि ...
स्वयं की भावना के एक ही कुवे में बार-बार डूबकी लगाना उचित नहीं ।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

डिगरी

लोगों को आप से अधिक आप की डिगरियों पर अधिक विश्वास है । वे आपको आपकी डिगरियों से पहचानते हैं ।@ मनोज भारती

रविवार, 11 जुलाई 2010

बिगड़े हालातों में काश्मीर का दौरा

अभी परसों ही काश्मीर घाटी से लौटा हूँ । कार्यालय के काम से श्रीनगर जाना हुआ । कुल 10 दिन श्रीनगर में रहा । इन 10 दिनों में जहाँ काश्मीर के नैसर्गिक सौंदर्य को देखने का अवसर मिला वहीं दूसरी ओर काश्मीर की वर्तमान स्थिति को देखने व समझने का एक अनुभव भी रहा । श्रीनगर शहर को अब तक आरजू, काश्मीर की कली जैसी फिल्मों और गुल गुलशन गुलफाम जैसे टी.वी. धारावाहिकों या काश्मीर पर बनी डाक्यूमेंटरी फिल्मों में ही देखा था । धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला काश्मीर वस्तुत: स्वर्ग ही है । चारों ओर फैला नैसर्गिक सौंदर्य आँखों को अद्-भूत सुकून और आनंद देता है । श्रीनगर एअर-पोर्ट से निकलते ही जिन सुंदर वादियों, मकानों और सड़कों के दर्शन होते हैं, वे खूबसूरत अहसास देते हैं । यद्यपि मैं श्रीनगर सड़क मार्ग से जाने वाला था, लेकिन घाटी के हालात बिगड़ जाने से जम्मू-श्रीनगर रास्ता बंद कर दिया गया था । इसलिए मुझे जम्मू से श्रीनगर का सफर एअर से करना पड़ा । फिर श्रीनगर पहुँचते ही कार्यालय के कामों व मिटिंग की व्यस्तताओं में डूबा रहा । इस दौरान डल झील और लाल चौक के आस-पास के इलाके में आना जाना लगा रहा । कभी मिटिंग में शामिल होने वाले मेहमानों के लिए उपहार खरीदने तो कभी हमारे अधिकारियों को श्रीनगर घुमाने के लिए डल पर चार बार जाना हुआ । डल झील बहुत बड़ी है । सैंकड़ों एकड़ में फैली इस झील पर शिकारों में विहार करना एक अलग तरह का आनंद देता है । इस झील में होटलनुमा बोटहाउस हैं । जहाँ रहकर आप प्रकृति के विशुद्ध मनोरम दृश्यों का आनंद ले सकते हैं । विशेषकर चाँदनी रातों में...जब पूर्णिमा का पूरा चाँद झील में विभिन्न दृश्य प्रस्तुत करता है । झील का पानी आजकल गंदा हो गया है । वर्षों से झील की सफाई नहीं हुई है या हुई भी है तो ऊपर-ऊपर से । यहाँ के शिकारा चलाने वालों से बात किया तो पता चला कि झील की सफाई के लिए करोड़ों रुपए सरकार देती है...लेकिन पूरा पैसा कभी झील पर खर्च नहीं होता...भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों के द्वारा अधिकाँश पैसा हड़प लिया जाता है । झील पर अतिक्रमण बहुत बढ़ गया है और झील का आकार पहले की अपेक्षा काफी कम रह गया है ।

जिस होटल में, ललित ग्राँड पैलेस में मिटिंग थी, वह श्रीनगर का पाँच सितारा खूबसूरत होटल है । यहाँ के बगीचे के दक्षिण छोर से श्रीनगर की वादियों का जो नजारा देखने को मिला , वह अद्-भूत और आत्मा को एक अलौकिक अहसास करा रहा था ।

इस दौरान घाटी के हालात बिगड़ते रहे । रोज ही सीआरपीएफ और स्थानीय लोगों के बीच मुठभेड़ जारी थी ।  सीआरपीएफ पत्थर बरसाती और प्रदर्शन करती भीड़ को तीतर-बितर करने के लिए बहुत बार गोली चलाने को विवश हुई और लोगों की जाने जाती रही । कभी 3 , कभी 4 लोग सीआरपीएफ की गोली की शिकार होते रहे । एक दिन एक 9 साल का बच्चा मारा गया । एक दिन एक 24 वर्षीय महीला मारी गई । घाटी का माहौल बहुत बिगड़ गया । लोगों को घरों में ही रखने के लिए सख्त कर्फ्यू लगा दिया गया । देखते ही गोली मारने के आदेश आ गए ।  पुलिस की चौकसी बढ़ चुकी थी । शहर के अंदरुनी हिस्से अधिक संवेदनशील बन चुके हैं ।

इन हालातों की गहराई में जाने के विचार चलते रहे । काश्मीर के बहुत से लोग आजादी चाहते हैं ? बच्चों के कोमल मनों में आजादी के शब्द घोले जा रहें हैं । लेकिन किस से आजादी ???  स्वर्ग सदृश काश्मीर घाटी को को नरक में तबदील कर देने वाले कौन लोग हैं ? शायद ये सवाल इतने आसान नहीं हैं । हमेशा की तरह राजनीति तो इसका एक बड़ा कारण है ही, साथ ही शायद आज भी काश्मीर के लोग स्वयं को भारत से जुदा समझते हैं । युवा बेरोजगार हैं । कुछ कानून ऐसे हैं जो केवल काश्मीर पर ही लागू होते हैं और पूरे भारत पर नहीं । काश्मीर की सरकार को करोड़ों रुपए केन्द्र सरकार से विकास और खुशहाली के लिए दिए जाते हैं । लेकिन इसके बावजूद लोगों को अलगाववादी ताकतें भड़काने में कामयाब रहती हैं । कुछ लोग कहते हैं इसमें बाह्य ताकतों का हाथ है ।

श्रीनगर में कर्फ्यू के बावजूद सुबह -शाम बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए यात्रा के साधन मिल ही जाते हैं । हवाई सेवाएँ भी निर्बाध रूप से जारी हैं । इधर हरियाणा पंजाब व चंडीगढ़ में भारी बारीश के कारण बाढ़ के हालातों की खबरें टीवी से मिलती हैं । तो दूसरी ओर मैं होटल में बैठा हालात सामान्य होने का इंतजार कर रहा हूँ । मुझे मिटिंग खत्म करके 7 जुलाई को ही चंडीगढ़ के लिए निकलना था, लेकिन नहीं निकल सका । 8 जुलाई को किसी तरह एक वैन में जगह मिल पाई और मैं अमरनाथ यात्रियों के साथ जम्मू पहुँचा । श्रीनगर से जम्मू की यात्रा में भी बहुत से सुंदर प्राकृतिक दृश्य देखने को मिले । अमरनाथ यात्रियों के लिए जगह-जगह लंगर चल रहा था । जिसकी वजह से रास्ते में बहुत सा ट्रैफिक जाम भी रहा ।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

स्त्री और पुरुष

कोई पुरुष कभी भी किसी स्त्री से नहीं जीत सकता । क्योंकि पुरुष का उद्-गम स्त्री से है, उसे अस्तित्व में लाने वाली स्त्री है और पुरुष स्वयं अस्तित्व से बड़ा हो नहीं सकता । - मनोज भारती