शनिवार, 17 जुलाई 2010

भावनाएँ

भावनाओं के एक ही कुवे में बार-बार डूबकी न लगाएँ ।

अधिक उचित होगा यदि कहें कि ...
स्वयं की भावना के एक ही कुवे में बार-बार डूबकी लगाना उचित नहीं ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. Kia baat kahee hai....
    भावनाओं के एक ही कुवे में बार-बार डूबकी न लगाएँ ......
    Ajee kon aaj kal भावनाओं kee parvah karta hai...aap ko kuchal kar par chla jata hai...
    Han yeh aap ne sahee kha aap khud apnee hee भावनाओं के एक ही कुवे में बार-बार डूबकी न लगाएँ ......

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  2. मुझे सही करने के लिए धन्यवाद ! मेरा आशय वही था जो आपने समझा । स्वयं अपनी ही भावनाओं के एक ही कुवे में बार-बार डूबकी न लगाएँ ।

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  3. भावनाएँ भी काठ की हांडी हैं, दोबारा नहीं...जो भी है गागर में सागर है...

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  4. @सम्वेदना के स्वर : बहुत से लोग एक ही भावना में डूबे हुए स्वयं को बर्बाद कर लेते हैं ; यह आशय है मेरा । न कि काठ की हांडी सदृश ..जो एक ही बार चढ़ती है ।

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