मंगलवार, 20 जुलाई 2010

हाइकू

चल रहा
जिंदगी का खेल
मुड़ती-तुड़ती सांसों में


एक सपना टूटा
बच्चा हँसा
अहम गिरा टप...टप..टप


वृक्ष से पत्ता गिरा
मन में कुछ हिला
कितना क्षण-भंगुर यह जीवन


बिजली चमकी बादल खड़का
दिल धड़का
मन का शौर एक कौने में जा दुबका


ऊँचे होते मकान
बौने होते मूल्य
खोखले होते इंसान

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही गहरे भाव से लिखा है ....

    ऊँचे होते मकान
    बौने होते मूल्य
    खोखले होते इंसान...

    आज के इंसान की ताज़ा तसवीर ....

    अगर हम यूँ कहें....

    ऊँचे मकान
    बौने मूल्य
    खोखले हुए इंसान

    अगर आप को कोई आपत्ति न हो....क्या आप इसे हिन्दी हाइकू ब्लॉग में शामिल करने की इज़ाजत देंगे?

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  2. bahut khoobsoorat ye panktiya.......


    बिजली चमकी बादल खड़के
    दिल धड़का
    मन का शौर एक कौने में जा दबका

    aakhir kee teeno panktiya samay ko aaina dikha rahee hai.........
    ati sunder abhivykti.

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  3. इंद्रधनुष के जईसा भाव लिए ई हाईकू दिल के बहुत नजदीक है हमरे...हमको एही अफसोस है कि हम इस विधा में नहीं लिख पाते हैं...अंतिम वाला तो एकदम सचाई का सब्दचित्र है...

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  4. बहुत सुंदर गंभीर भाव है. काव्य भी है और दर्शन भी. व्यक्तिगत रूप से मैं इन दोनों का मुस्कराता चेहरा देखना चाहता हूँ. मुझे वह भी चाहिए. मेरी ज़िद है.

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