गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

हँसता हुआ बुद्ध

जब से भारत में चॉईनीज़ बाजार का जोर पकड़ा है, भारत में चॉईनीज़ वास्तु, फेंग्सुई, विंड चॉईम के साथ-साथ हँसते हुए बुद्ध यानी लॉफिंग बुद्धा भी बहुत प्रचारित हो गए हैं । हँसते हुए मुख, थुलथुल शरीर और पीठ पर बड़ी सी पोटली को लटकाए इस लॉफ़िंग बुद्धा की मूर्ति आजकल भारत के हर तीसरे घर और बाजार में गिफ्ट शॉपस पर दिखाई पड़ जाती है । जो समृद्धि व खुशहाली का प्रतीक है । 

बहुत कम लोग जानते हैं कि लॉफिंग बुद्धा वास्तव में कौन हैं । वस्तुत: वह एक झेन साधक था । जिसका जन्म चीन के ताँग साम्राज्य में हुआ  और जिसका वास्तविक नाम होतेई था । लेकिन उसमें गुरु होने की जरा भी इच्छा न थी । वह नहीं चाहता था कि वह किसी आश्रम में रहे और चेले बनाए । वह तो एक बड़ी सी पोटली पीठ पर लादे, गलियों में यायावर की तरह घूमता रहता । उसकी इस पोटली में सूखे-मेवे, टॉफियाँ, फल आदि भरे रहते थे । वह इन्हें उपहार स्वरूप उन बच्चों में बाँटता रहता था, जो खेल-खेल में उसके चारों ओर इकट्ठा हो जाते थे । यह कृत्य कुछ-कुछ सैंटा से मिलता-जुलता है ।

होतेई जब भी किसी झेन साधक से मिलता, तो अपना हाथ पसार कर एक पेनी देने का अनुरोध करता । एक बार होतेई बच्चों से घिरा अपने खेल में मग्न था कि तभी एक झेन-गुरु उधर आ धमके । उन्होंने होतेई से पूछा, "बताओ झेन का क्या महत्त्व है ? "

होतेई ने अपनी पोटली उतार कर जमीन पर रख दी ।
"और उसका अमल ?"  झेन गुरु ने दूसरा सवाल दागा । 
समृद्ध होतेई ने अपनी पोटली उठा कर पीठ पर रखी और हँसते-हँसते अपने रास्ते चल पड़ा । 

इस कथा में झेन का संपूर्ण सार-तत्व आ गया है ।

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

अनाड़ी हाथ

झेन आश्रमों में चाय बनाना और उसे पीना भी ध्यान की एक विशेष विधि है । वस्तुत: यह" कार्य करते हुए ध्यान" का एक अनूठा प्रयोग है । साधक एक-एक चीज़ होशपूर्ण ढंग से करता है । चुल्हे का जलाना, उस पर चाय की केतली रखना, उसमें पानी डालना, उसे उबलते हुए देखना, उसमें विशेष मात्रा में चाय की पत्तियाँ उँडेलना, दूध डालना और फिर चाय की महक को महसूस करना और फिर विशेष ढंग से बने नाजुक प्यालों में चाय को डालना और फिर उसकी धीरे-धीरे करके चुस्कियाँ लेना । इस पूरे उपक्रम में साधक घंटों व्यतीत करते हैं । यह उनका चाय ध्यान होता है । 

एक बार ऐसे ही चाय-ध्यान के अवसर पर  एक वरिष्ठ साधक एक नवीन साधक के साथ था । चाय  के नाजुक प्याले को पकड़ते हुए, उसने वरिष्ठ साधक से पूछा, "ये चाय के प्याले इतने नाजुक क्यों बनाए जाते हैं कि जरा-सी चूक होते ही टूट जाएँ ।" 

वरिष्ठ साधक ने कहा," प्याले नाजुक नहीं होते, जिन हाथों में प्याले टूटते हैं, वे अनाड़ी होते हैं ।"

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

ज्ञान की बत्ती

"तेन्दई" बौद्ध-दर्शन की एक दार्शनिक विचारधारा है । इसी विचारधारा का एक दार्शनिक झेन का ज्ञान हासिल करना चाहता था । वह इस उद्देश्य से झेन-गुरु "गासन" के आश्रम में आ कर ठहरा । कुछ वर्ष आश्रम में रहकर उसने झेन का अध्ययन किया । झेन पद्धति के संबंध में तथ्यों को एकत्रित किया । जब वह आश्रम से लौटने लगा तो गासन ने उसे सचेत किया, "सत्य की दार्शनिक विवेचना संबंधी सामग्री इकट्ठा करना एक उपयोगी कार्य हो सकता है, लेकिन याद रखना, अगर तुमने नियमित रूप से ध्यान नहीं किया तो तुम्हारे दार्शनिक-ज्ञान की बत्ती कभी भी गुल हो सकती है ।" 

शनिवार, 27 नवंबर 2010

चाँद की चोरी

जो भी चुराया जा सकता है, वह द्रष्टा के सम्मुख दो कोड़ी का साबित होता है । जब तक व्यक्ति को यह समझ नहीं आता कि वह जिन-जिन चीजों का लालच करता है,वह दो कोड़ी से ज्यादा मूल्य नहीं रखता, उसका लालच बना रहता है । एक बहुत सुंदर झेन कहानी है । झेन गुरु रियोकॉन प्रकृति के सान्निध्य में पर्वतों की तलहटी में एक कुटिया में रहते थे । एक रात उनकी कुटिया में एक चोर घुस आया । लेकिन वहाँ चुराने लायक कुछ भी नज़र नहीं आया । वह निराश खाली हाथ लौटने ही वाला था कि रियोकॉन वहां आ पहुँचे । 

रियोकॉन ने चोर से कहा, तुम बड़ी दूर से चल कर आए लगते हो । मैं तुम्हें यूँ निराश नहीं लौटने दूँगा । मेरे पास चुराने लायक कुछ नहीं है । लेकिन मेरे पास ये कपड़े हैं, इन्हें उपहार स्वरूप प्राप्त करो । चोर चकित था, उसने ऐसा व्यक्ति नहीं देखा था, जो स्वयं चोर की सहायता करे । उसने कपड़े थामे और चुपचाप वहां से चला गया । 

वस्त्रहीन शरीर के साथ रियोकॉन बाहर एक शिला पर बैठ कर चाँद को निहारने लगा । चाँद की खूबसूरती देखते ही बनती थी । आधी रात का पूर्णिमा का चाँद और रियोकॉन की दृष्टि उसमें कुछ अमूल्य पा रही थी । रियोकॉन ने स्वयं से कहा, काश ! चोर को मैं यह सुंदर चाँद भेंट में दे पाता । 

रविवार, 21 नवंबर 2010

अवधान

हम दैनिक जीवन में कितने चेतनशील जीते हैं, दैनिक जीवन के कामों को करते हुए कितने चेतनशील होते हैं ? इस चेतनशीलता को विकसित करना ही झेन का आधार है । झेन साधक इस चेतनशील जीवन को साधने के लिए झेन गुरु के सान्निध्य में शिक्षा लेते हैं । कम से कम दो वर्ष । झेन गुरु नान-इन के पास इस हेतु एक टेन्नो नाम का साधक शिक्षा ग्रहण करता था । शिक्षा पूरी होने पर टेन्नो अपने गुरु से मिलने गया । वर्षा का मौसम था । टेन्नो खड़ाऊ पहने था और छाता साथ में लिए हुए था । गुरु के निवास स्थान में प्रवेश करने से पूर्व उसने अपने खड़ाऊ और छाता बाहर अहाते में रखे और कुटिया में प्रवेश किया । नान-इन ने टेन्नो का स्वागत किया और उसकी ओर गौर से देखते हुए पूछा, मेरा ख्याल है, तुम अपने खड़ाऊ अहाते में छोड़ कर आए हो । मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम्हारा छाता तुम्हारे खड़ाऊ के दायीं तरफ रखा है या बायीं तरफ ? 

टेन्नो उलझन में था । वह यह कार्य करते हुए सजग न था । उसे तत्काल कोई जवाब न सूझा । उसे एहसास हुआ कि जिस ध्यान की शिक्षा वह ग्रहण कर चुका है, वह पूरी नहीं हुई है और वह सजग जीवन जीने में सफल नहीं हुआ है । इसे पूरा करने के लिए उसे कुछ समय और गुरु के सान्निध्य में रहना होगा । 

बुधवार, 17 नवंबर 2010

वीणा के तार तोड़ना - एक चीनी मुहावरा

झेन कथाएं हमें चेतनशील जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं । झेन कथाओं में व्यक्ति की चेतना का अनेक-अनेक ढ़ँग से अवबोध कराने का प्रयास रहता है । इनके द्वारा दैनिक जीवन में सजगता के प्रयोग को गहराया जाता है और व्यक्ति को ध्यान में अवस्थित होने का अवसर मिलता है । इसी प्रकार की एक झेन कथा प्रस्तुत है :-

चीन में दो मित्र हुए । एक मित्र वीणा वादन में कुशल था । उसके वीणा वादन में विभिन्न स्वर लहरियाँ थी । जब वह वीणा के तार झंकृत करता था, तो दूसरा उसके स्वरों को डूब कर सुनता था । जब पहला वीणा से कोई पहाड़ी धुन छेड़ता, तो दूसरा कहता, मेरी आँखों के सम्मुख पर्वतों की चोटियाँ सजीव हो उठी हैं और घाटियों की प्रतिध्वनि गूँज उठी है । 

वादक पानी के सुर लगाता, तो दूसरा मित्र कहता, ऐसा लगता है जैसे कल-कल करती नदी मेरे सम्मुख प्रवाहित हो रही है । एक मित्र के पास वीणा वादन की कुशलता थी तो दूसरे के पास सुनने की अद्-भूत कर्ण शक्ति । 

एक दिन सुनने वाला मित्र बीमार पड़ा और जल्दी ही देह से मुक्त हो गया । वीणा वादक ने अपनी वीणा के तार तोड़ डाले और कहते हैं कि फिर उसने कभी वीणा नहीं बजाई । 

क्यो ? 

लेकिन तब से चीन में एक मुहावरा प्रचलित हो गया - "वीणा के तार तोड़ना" , जिसका अर्थ है : अटूट मित्रता । 

रविवार, 14 नवंबर 2010

ईर्ष्या

सामने की दीवाल पर पड़ने वाली तेज धूप के कारण आंखें मिचमिचाती थी और लोगों के चेहरे भी कुछ अस्पष्ट दीखते थे । एक छोटी लड़की स्वयं ही मेरे पास आकर बैठ गई । यह सब क्या चल रहा है, इस कौतूहल से उसकी आंखें विस्फारित हो रही थी । शायद उसने अभी-अभी स्नान किया था और वह स्वच्छ वस्त्र पहने थी । उसके बालों में फूल भी लगे थे । बाल-स्वभाव के अनुरूप बहुत कुछ ध्यान में न रखने की चिंता न करते हुए, वह आसपास की सारी बातों का निरीक्षण कर रही थी । उसकी आंखों में अनोखी चमक थी । अब क्या किया जाए- रोए,हँसे कि उछल-कूद करे - उसे सूझ नहीं रहा था । संभवत: इसी कारण उसने सहज रूप से मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और उसका अत्यंत ध्यानपूर्वक निरीक्षण करने लगी ।जल्दी ही वह आसपास के लोगों को भूल गई और मेरी जांघ पर सिर रखकर सो गई । उसका माथा सुंदर,सुडौल था और वह अत्यंत स्वच्छ और निर्मल थी । लेकिन उसका भविष्य कमरे में बैठे अन्य लोगों की तरह भ्रम और दुखमय था । भविष्य में उसके मन में पैदा होनेवाला संघर्ष और दुख सामने की दीवाल पर पड़ने वाले सूर्य-प्रकाश की तरह स्पष्ट है । क्योंकि दुख और वेदना से मुक्त होने के लिए श्रेष्ठ प्रज्ञा आवश्यक है । लड़की को भविष्य में जो शिक्षण मिलनेवाला है और जिन-जिन बातों का प्रभाव उस पर पड़ने वाला है,उसके कारण श्रेष्ठ प्रज्ञा का उदय उसमें कभी नहीं होने दिया जाएगा । यह साफ था । प्रीति - वह धूम्ररहित ज्योति- इस विश्व में कितनी विरल है । यह धुआँ ही सबको व्याप लेता है , दम घोटता है और ह्रदय में तीव्र वेदना तथा आंखों में दुख-अश्रु लाता है । इस धुएँ में वह ज्योति शायद ही दिखाई पड़ती है । और जब धुएँ को ही सर्वकष माहात्म्य प्राप्त होता है, (जब धूएँ को ही सब कुछ समझ लिया जाता है), तब तो ज्योति बुझ ही जाती है । यह प्रीति- ज्योति न हो तो जीवन का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । वह निर्बुद्ध और उबाने वाला बन जाता है । लेकिन घने काले धुएँ में यह ज्योति रह ही नहीं सकती । धुएँ और ज्योति का एक जगह रहना संभव नहीं । धुएँ के बिलकुल नष्ट होने पर ही ज्योति का दर्शन होता है ।यह ज्योति उस धुएँ की प्रतिस्पर्धी नहीं होती , क्योंकि उसका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं होता । धुएँ का अर्थ ज्योति नहीं है । धुआँ ज्योति को अपने में कभी भी समाविष्ट नहीं कर सकता । इसी तरह धुआँ ज्योति के अस्तित्व का निदर्शक भी नहीं हो सकता । क्योंकि ज्योति पूरी तरह धुम्ररहित होती है ।


वह स्त्री कहने लगी : प्रेम और द्वेष का एक जगह रहना क्या सम्भव ही नहीं है ? क्या ईर्ष्या भी वस्तुत: प्रीति की ही निदर्शक (पीठ) नहीं है ? एक क्षण में हम प्रीतिपूर्वक एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, और दूसरे ही क्षण एक-दूसरे से चिढ़ने लगते हैं । कभी हम रोष में आकर एक-दूसरे को चुभने वाले कठोर शब्द बोलते हैं और थोड़ी ही देर बाद एक-दूसरे का आलिंगन करने लगते हैं । कभी हम एक-दूसरे से जोरदार लड़ाई करते हैं और फिर एक-दूसरे का चुम्बन लेकर झगड़ा मिटा डालते हैं । ये सारे रूप क्या प्रेम के ही निदर्शक ( छीपे रूप) नहीं हैं ? ईर्ष्या होने लगना ही तो हमारी दृष्टि में प्रीति का निदर्शक है । प्रकाश और अंधकार की तरह प्रीति और ईर्ष्या भी एक ही जगह विचरती हुई दीखती हैं । एक क्षण में नाराज होना और दूसरे क्षण में सहलाना, यह अभिव्यक्ति क्या प्रीति की ही पूर्णता नहीं प्रकट करती ? नदी का स्वरूप कभी शांत रहता है तो कभी अशांत । वह प्रकाश में भी बहती है और अंधकार में भी । क्या इसी में नदी का सौंदर्य निहित नहीं है ? 

जिसे हम प्रीति कहते हैं, वह क्या चीज है, इसे देखें । ईर्ष्या होना, कामवासना जाग्रत होना, कठोर शब्द बोलना,सहलाना और हाथ में हाथ लेना, झगड़ा करना और उसे तत्काल मिटा डालना, --ये सारी घटनाएँ प्रीति के क्षेत्र की मानी जाती हैं । पहले नाराज होना और फिर सहलाना तो इस क्षेत्र की रोज की घटनाएँ हैं, हैं कि नहीं ? इन विभिन्न घटनाओं के संबंध जोड़ने का हम सदैव प्रयत्न करते रहते हैं । या हम एक घटना की दूसरी घटना से तुलना करते रहते हैं । इसी क्षेत्र की एक घटना की सहायता से हम दूसरी घटना को दोष देने लगते हैं अथवा समर्थन करने लगते हैं । अथवा इस क्षेत्र की एक घटना का संबंध बाहर की किसी घटना से जोड़ना चाहते हैं । हम प्रत्येक घटना का स्वतंत्र रूप से विचार करते ही नहीं । बल्कि अनेक घटनाओं में परस्पर संबंध ढूँढते हैं । हम ऐसा क्यों करते हैं ? वस्तुत: किसी घटना का आकलन करने के लिए, उसी क्षेत्र की दूसरी घटना की सहायता से, उस घटना को समझने का प्रयत्न करना कभी उपयोगी नहीं होता । क्योंकि ऐसा करने से भ्रम और संघर्ष ही उत्पन्न होते हैं । एक ही क्षेत्र की विभिन्न घटनाओं की परस्पर तुलना हम क्यों करते हैं ? एक घटना अगर अर्थपूर्ण है, तो उसकी अर्थपूर्णता की सहायता से दूसरी घटना का अर्थ लगाने का अथवा दूसरी घटना के विरोध में ही उसे खड़ी करने का प्रयास हम क्यों करते हैं ? 

आप क्या कर रहे हैं, इसका अर्थ कुछ-कुछ मेरी समझ में आने लगा है । लेकिन हम ऐसा क्यों करते हैं ? 

देखिए, किसी भी घटना का आकलन क्या कल्पना अथवा स्मृति के चश्में से हो सकता है ? एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, तो क्या आप ईर्ष्या की भावना को समझ सकेंगे ? वस्तुस्थिति यह है कि जैसे हाथ में हाथ लेना एक घटना है, वैसे ही ईर्ष्या भी एक घटना है । लेकिन एक दूसरे का हाथ पकड़ने की स्मृति आपके मन में है, इसलिए इसकी सहायता से ईर्ष्या की प्रक्रिया भी आपके ध्यान में आ जाएगी ,ऐसा थोड़े ही है । स्मृति की सहायता से क्या किसी भी बात का आकलन संभव है ? दो घटनाओं की तुलना करना,उनमें परिवर्तन करना, उनको दोष लगाना, उनका समर्थन करना अथवा उनसे एकरूप होना - ये सारी बातें स्मृति ही करती है । लेकिन किसी का भी यथार्थ  आकलन करा देना स्मृति के लिए बिलकुल संभव नहीं है ।  तथाकथित प्रीति के क्षेत्र की घटनाओं की ओर हम कल्पना के अथवा पूर्वनिश्चित निर्णयों के चश्में से देखते हैं । ईर्ष्या की घटना वास्तव में जैसी होती है,उसी रूप में उसका हम शांतिपूर्वक निरीक्षण नहीं करते । इसके बदले घटना की तरफ देखने का स्मृति द्वारा निर्मित जो ढ़ग है तथा उसमें से निष्पन्न होने वाले जो निर्णय हैं, उसके अधीन होकर हम उस घटना की ओर देखते हैं । क्योंकि उसके वास्तविक स्वरूप की के आकलन की सचमुच हमारी इच्छा ही नहीं होती । वस्तुत: ईर्ष्या की संवेदना भी प्रेम से सहलाने से उत्पन्न संवेदना जैसी ही उद्दीपक होती है  । लेकिन हम तो संवेदना के साथ-साथ अपने -आप आने वाले दुख और व्यग्रता से रहित संवेदना का उद्दीपन चाहते हैं । इसी लिए हम उसे प्रीति कहते हैं, उसके क्षेत्र में संघर्ष, भ्रम और विरोध प्रकट होते हैं । लेकिन क्या यही यथार्थ प्रीति है ? प्रीति कल्पना,संवेदना अथवा उद्दीपन कैसे है ? प्रीति का मतलब ईर्ष्या कैसे है ? 

लेकिन क्या सत्य भी माया से आवरित नहीं होता ? क्या अंधकार प्रकाश को आवरित नहीं करता, ढँक नहीं देता ? क्या ईश्वर भी बंधन में अटका हुआ नहीं है ? 

ये सब केवल कल्पनाएँ हैं, केवल मत हैं । इसलिए उनमें कोई यथार्थता नहीं है । ये कल्पनाएँ केवल वैर-भाव ही पैदा करती हैं । ये सत्य को आवरित भी नहीं कर सकती और उसे बाँधकर भी नहीं रख सकती । जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ अंधकार नहीं रहता । अंधकार प्रकाश को ढँक नहीं सकता । अगर वह ढँक दे तो मानना होगा कि वहाँ प्रकाश था ही नहीं । जहाँ ईर्ष्या होती है, वहाँ प्रीति नहीं होती । कल्पना प्रीति को कभी आवरित नहीं कर सकती । किन्हीं भी दो बातों के पारस्परिक सुसंवाद के लिए आपसी रिश्ता आवश्यक है । प्रीति का कल्पना से कोई नाता नहीं । इसलिए कल्पना का प्रीति से सुसंवाद हो ही नहीं सकता । प्रीति धूम्ररहित ज्योति है । 


(जे.कृष्णमूर्ति की पुस्तक जीवन भाष्य ( Commentaries on living )से लिया गया एक अध्याय )

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीपावली की शुभकामनाएँ

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ 
असतो मा सदगमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय 
ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!

Let the festival of lights lead us from
falsehood to Truth!
From darkness to Light!
From death to Eternal
Life!
Let there be Peace Everywhere
to Everyone
at Every
moment!
Wishing you & your family
A Happy &
Enlightening 
Deepavali!

रविवार, 31 अक्तूबर 2010

संग्राम और युद्ध

एक पुराना शब्द है संग्राम । शब्दकोश में इसका अर्थ मिलेगा - युद्ध । लेकिन इसका उत्पत्ति अर्थ है : दो गाँवों की सीमा, दो गाँवों को अलग करने वाली रेखा । यह शब्द युद्ध का पर्यायवाची शायद इसलिए बन गया, क्योंकि जहाँ  सीमा है वहाँ युद्ध भी है । ओशो कहते हैं : "जहाँ सीमा है वहाँ युद्ध भी हैं । जहाँ दो आदमियों के बीच सीमाएँ हैं, वहाँ युद्ध भी है । प्रेम की दुनिया तो उस दिन बन सकेगी, जिस दिन राष्ट्र की कोई सीमाएँ न हों । ...सीमाएँ हैं तो प्रेम की दुनिया नहीँ बन सकती ।"

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

गंदगी

गंदगी में पत्थर फैंकने से गंदगी के छींटे लौट कर स्वयं पर ही पड़ेगें ।

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

आत्मा और परमात्मा : एक या अनेक

सारे मनुष्य का अनुभव शरीर का अनुभव है, सारे योगी का अनुभव सूक्ष्म शरीर का अनुभव है, परम योगी का अनुभव परमात्मा का अनुभव है । परमात्मा एक है, सूक्ष्म शरीर अनंत हैं, स्थूल शरीर अनंत हैं । वह जो सूक्ष्म है, वह नए स्थूल शरीर ग्रहण करता है । हम यहाँ देख रहें हैं कि बहुत से बल्ब जले हुए हैं । विद्युत तो एक है, विद्युत बहुत नहीं है । वह ऊर्जा, वह शक्ति, वह एनर्जी एक है ; लेकिन दो अलग बल्बों में प्रकट हो रही है । बल्ब का शरीर अलग अलग है, उसकी आत्मा एक है । हमारे भीतर से जो चेतना झाँक रही है, वह चेतना एक है, लेकिन उपकरण है सूक्ष्म देह, दूसरा उपकरण है स्थूल देह । हमारा अनुभव स्थूल देह तक ही रुक जाता है । यह जो स्थूल देह तक रुक गया अनुभव है, यही मनुष्य के जीवन का सारा अंधकार और दुख है । लेकिन कुछ लोग सूक्ष्म शरीर पर भी रुक सकते हैं । जो लोग सूक्ष्म शरीर पर रुक जाते हैं, वे ऐसा कहेंगे कि आत्माएँ अनंत हैं ।॥(योगी)॥ लेकिन जो सूक्ष्म शरीर से भी आगे चले जाते हैं, वे कहेंगे परमात्मा एक है, आत्मा एक है , ब्रह्म एक है ।।(परम योगी)॥

मेरी इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है । मैंने जो आत्मा के प्रवेश के लिए कहा उसका अर्थ है वह आत्मा जिसका सूक्ष्म शरीर गिर नहीं गया है । इसलिए हम कहते हैं कि जो आत्मा परम मुक्ति को उपलब्ध हो जाती है, उसका जन्म-मरण बंद हो जाता है । आत्मा का तो कोई जन्म-मरण है ही नहीं, वह न तो कभी जन्मी है और न कभी मरेगी । वह जो सूक्ष्म शरीर है वह भी समाप्त हो जाने पर कोई जन्म-मरण नहीं रह जाता है क्योंकि सूक्ष्म शरीर ही कारण बनता है नए जन्मों का । सूक्ष्म शरीर का अर्थ है हमारे विचार, हमारी कामनाएँ, हमारी वासनाएँ, हमारी इच्छाएँ, हमारे अनुभव, हमारे ज्ञान इन सबका जो संग्रहीभूत बीज है वह हमारा सूक्ष्म शरीर है , वही हमें आगे की यात्रा पर ले जाता है । लेकिन जिस मनुष्य के सारे विचार नष्ट हो गए, जिस मनुष्य की सारी वासनाएँ क्षीण हो गई, जिस मनुष्य की सारी इच्छाएँ विलीन हो गई, जिसके भीतर अब कोई भी इच्छा शेष न रही, उस मनुष्य को जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती है, जाने का कोई कारण नहीं बचता । जन्म की कोई वजह नहीं रह जाती । 

राम कृष्ण के जीवन में एक अद्-भुत घटना है । रामकृष्ण को जो लोग बहुत निकट से परमहंस जानते थे उनको यह बात जानकर अत्यंत कठिनाई होती थी कि रामकृष्ण जैसा परमहंस, रामकृष्ण जैसा समाधिस्थ व्यक्ति भोजन के संबंध में बहुत लोलुप था । रामकृष्ण भोजन के लिए बहुत आतुर होते थे और भोजन के लिए इतनी प्रतीक्षा करते थे कि कई बार उठकर चौका में पहुँच जाते और पूछते शारदा को, बहुत देर हो गई, क्या बन रहा है आज ? ब्रह्म की चर्चा चलती और बीच में ब्रह्म चर्चा छोड़कर पहुँच जाते चौके में और पूछने लगते, क्या बना है आज और खोजने लगते । शारदा ने उन्हें कहा, आप क्या करते हैं ? लोग क्या सोचते होंगे कि ब्रह्म चर्चा छोड़कर एकदम अन्न की चर्चा पर आप उतर आते हैं  । रामकृष्ण हँसते और चुप रह जाते । उनके शिष्यों ने भी बहुत बार कहा कि इससे बहुत बदनामी होती है । लोग कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति क्या  ज्ञान को उपलब्ध हुआ होगा, जिसकी अभी रसना, जिसकी अभी जीभ इतनी लालायित होती है  भोजन के लिए । एक दिन बहुत कुछ भला-बुरा कहा रामकृष्ण की पत्नी शारदा ने, तो रामकृष्ण ने कहा कि तुझे पता नहीं, जिस दिन मैं भोजन के प्रति अरुचि प्रकट करुँ, तू समझ लेना कि अब मेरे जीवन की यात्रा केवल तीन दिन और शेष बच गई । बस तीन दिन से ज्यादा फिर मैं बचूँगा नहीं । जिस दिन भोजन के प्रति मेरी उपेक्षा हो, तू समझ लेना कि तीन दिन बाद मेरी मौत आ जाएगी ।  शारदा कहने लगी इसका अर्थ ? रामकृष्ण कहने लगे, मेरी सारी वासनाएँ क्षीण हो गई , मेरी सारी इच्छाएँ विलीन हो गई, मेरे सारे विचार नष्ट हो गए, लेकिन जगत के हित के लिए मैं रुका रहना चाहता हूँ । मैं एक वासना को जबरदस्ती पकड़े हुए हूँ ; जैसे किसी नाव की सारी जंजीरे खुल गई हों और एक जंजीर से नाव अटकी रह गई हो और वह जंजीर भी टूट जाए तो नाव अपनी अनंत यात्रा पर निकल जाएगी । मैं चेष्टा करके रुका हुआ हूँ । किसी की समझ में शायद यह बात नहीं आई । लेकिन रामकृष्ण की मृत्यु के तीन दिन पहले शारदा थाली लगाकर उनके कमरे में गयी । वे बैठे हुए देख रहे थे । उन्होंने थाली देखकर आँखें बंद कर ली, और पीठ कर ली शारदा की तरफ । उसे एकदम से ख्याल आया कि उन्होंने कहा था कि तीन दिन बाद मौत हो जाएगी, जिस दिन भोजन के प्रति अरुचि करुँ । उसके हाथ से थाली गिर गई और पीट-पीट कर रोने लगी । रामकृष्ण ने कहा, रोओ मत । तुम जो कहती थी वह बात अब पूरी हो गई । ठीक तीन दिन बाद रामकृष्ण की मृत्यु हो गई । एक छोटी सी वासना को प्रयास करके वे रोके हुए थे। उतनी छोटी सी वासना जीवन यात्रा का आधार बनी थी । वह वासना भी चली गई तो जीवन यात्रा का सारा आधार समाप्त हो गया । जिसे तिर्थंकर कहते हैं, जिसे हम  ईश्वर पुत्र कहते हैं, जिसे हम अवतार कहते हैं, उनकी भी एक वासना शेष रह गई होती है और उस वासना को वे शेष रखना चाहते हैं करुणा के हित, मंगल के हित, सर्वमंगल के हित, सर्वलोक के हित । जिस दिन वह वासना भी क्षीण हो जाती है उसी दिन जीवन की यह यात्रा समाप्त और अनंत की अंतहीन यात्रा शुरु होती है । उसके बाद जन्म नहीं, उसके बाद मरण नहीं है , उसके बाद न एक है, न अनेक है । उसके बाद तो जो शेष रह जाता है उसे संख्या में गिनने का कोई उपाय नहीं । इसलिए जो जानते हैं वे यह भी नहीं कहते  कि ब्रह्म एक है, परमात्मा एक है । क्योंकि एक कहना व्यर्थ है जबकि दो की गिनती न बनती हो । एक कहने का कोई अर्थ नहीं जब कि दो और तीन नहीं कहे जा सकते हों । एक कहना तभी सार्थक है जब तक कि दो, तीन,चार भी सार्थक होते हैं । संख्याओं के बीच में ही एक की सार्थकता है । इसलिए जो जानते हैं वे यह भी नहीं कहते कि ब्रह्म एक है, वे कहते हैं ब्रह्म अद्वैत है, दो नहीं है, बहुत अद्-भुत बात कहते हैं । वे कहते हैं परमात्मा दो नहीं है । एक कहकर भी हम संख्या में गिनने की कोशिश करते हैं, वह गलत है । लेकिन उस तक पहुँचना दूर है, अभी तो हम स्थूल में खड़ें हैं, उस शरीर पर जो अनंत है, अनेक है । उस शरीर के भीतर हम प्रवेश करेंगे तो एक और शरीर उपलब्ध होगा, सूक्ष्म शरीर । उस शरीर को भी पार करेंगे तो वह उपलब्ध होगा जो शरीर नहीं है, अशरीर है, जो आत्मा है । 

 (शो की पुस्तक "घाट भुलाना बाट बिनु"  के जीवन और मृत्यु प्रवचन से उद्धृत एक प्रवचनांश )

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

क्षणिकाएँ

सपने टूटे
प्रेम टूटा
भ्रम छूटा


आदमी की परेशानी
मकड़ी का जाल
दम तोड़ा फंस कर


आदत
मजबूर
लोग


आदमी
झगड़े
वासना

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

सलिल वर्मा उर्फ चला बिहारी ब्लॉगर बनने














जगमग अंदर में हिया , दिया न बाती तेल
 परम प्रकासक पुरुष का, कहा बताऊं खेल 
तुलसी की ये पंक्तियाँ संवेदनशील हृदय के स्वामी सलिल वर्मा जी के लिए हैं । सलिल वर्मा जी से परिचय चैतन्य आलोक के माध्यम से हुआ । पिछले वर्ष नवम्बर में मैं नागपुर से स्थानांतरित होकर चंडीगढ़ आया तो एक कवि सम्मेलन के लिए चैतन्य जी से कविता की कुछ पंक्तियाँ सुनी तो चैतन्य जी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका । फिर उनकी (चैतन्य जी) प्रतिभा को देख ब्लॉग लिखने की सलाह दी । चैतन्य जी और सलिल जी दो अलग शहरों में रहते हुए भी प्रतिदिन विचारों का आदान-प्रदान करते रहते । कुछ महीनों में ही हमारे सामने सलिल जी और चैतन्य जी का "सम्वेदना के स्वर" ब्लॉग देखने को मिला और धीरे-धीरे मैं भी उनकी बातचीत में यदा-कदा शामिल होने लगा । थोड़े से समय बाद मुझे "उड़न -तश्तरी" बलॉग पर "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" की टिप्पणी पढ़ने को मिली,...मैं इस बेनामी व्यक्ति से प्रभावित हुआ । कुछ महीनों तक मैं अक्सर चैतन्य जी से "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" की टिप्पणियों की चर्चा करता रहा । तब मुझे यह कतई ज्ञात न था कि "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" वाले  और कोई नहीं बल्कि स्वयं सलिल जी हैं । यह राज तो तब खुला जब समीर लाल और सलिल जी के बीच टिप्पणियों को लेकर तक्ररार होने लगी और एक दिन चैतन्य जी ने इस बात का रहस्योद्-घाटन किया कि "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" वाले बिहारी बाबू हमारे सलिल जी ही हैं ;। बाद में सलिल जी बेनामी की गुहा से बाहर निकल आए और अपने नाम के साथ लिखने लगे । आज तो वे ब्लॉग जगत में निरंतर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ रहें हैं । उनकी टिप्पणियाँ किसी भी रचना के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं । 

     अपने ब्लॉग के अपने परिचय में वे लिखते है:  सलिलवर्मा,वल्दः शम्भु नाथ वर्मा,साकिनः कदम कुँआ, पटना,हाल साकिनः नोएडा. हम तीन माँ के बेटा हैं,बृज कुमारी हमको जनम देने वाली,पुष्पा अर्याणी मेरे अंदर के कलाकार को जन्म देने वाली,अऊर गंगा माँ जिसके गोदी में बचपन बीता अऊर कॉलेज (साइंस कॉलेज/पटना विश्वविद्यालय) की पढाई की.बस ई तीन को निकाल लिया तो हम ही नहीं रहेंगे...
इस परिचय को पढ़ने के बाद कोई भी पाठक यह सहज ही अनुमान लगा सकता है कि सलिल जी में सहृदयता और सामाजिकता एक हो गई हैं । जो स्वयं को तीन माँ का बेटा कहता है ; उसकी संवेदनाएँ कितनी गहरी होंगी । हृदय कितने ममत्व से भरा होगा । और इनके प्रकृति प्रेम का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्होंने गंगा को माँ के समान दर्जा दिया और जहाँ से पढ़ाई की उस संस्थान को भी दिल मे बिठलाए हुए हैं ।
इनकी रुचियों में संगीत ,साहित्य और अभिनय की त्रिवेणी है । इनके ब्लॉग को पढ़ने पर संगीत की मधुर स्वर लहरियाँ सुनाई पड़ती हैं । अपने अनुभवों को इस ढ़ग से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक एक बार पढ़ना शुरु कर दे तो अंत तक उनके सम्मोहन पाश में बँधा रहता है । इनकी दृष्टि में संगीत वही अच्छा होता है जिसको सुनकर व्यक्ति अपना अस्तित्व भूल जाए । सलिल जी का साहित्य में गहरा दखल है । उर्दू, अरबी,हिंदी, बंगला, मलयाली और अंग्रेजी भाषाओं पर इनका अच्छा अधिकार है । ग़ज़ल के व्याकरण की समझ ने इन्हें उर्दू शायरी का नगीना बना दिया है । साखी ब्लॉग पर इनकी सटीक टिप्पणियाँ इस बात की परिचायक हैं ।

राही मासूम रजा, सआदत हसन मंटो, गुलजार ,हरिवंश राय बच्चन, शंकर, राजेश रेड्डी , जेम्स हेडली, रस्किन बाँड, मोपासाँ, ओ.हेनरी सरीखे साहित्यकारों को न केवल इन्होंने पढ़ा है, बल्कि उन पर चिंतन, मनन और गुनन भी किया है ।

थोड़ा बहुत हमने इनका अभिनय भी देखा है...मार्फत चैतन्य जी । वहाँ भी ये किसी से कम नहीं ठहरते ।

पिछले दिनों गूँज अनुगूँज के संदर्भ में बात निकली । कुछ हँसी-मजाक की बातों ही बातों में अनुगूँज शब्द को लेकर और अनु उपसर्ग को लेकर बात हो रही थी...तो इनके मुख से एक कविता अवतरित हुई । यह कविता यहाँ प्रस्तुत है :-




अनुगूंज उठी अंतर्मन से 
अनुसरण लगा उसका करने
अनुराग जगा ऐसा मन में
अनुनाद लगा उसका सुनने.
अनुरोध प्रिये से इतना है
अनुदान प्रेम का मुझको दे
अनुलम्बन दूर करे अपना
अनुकम्पा मुझ पर बरसा दे.
अनुदार नहीं वह हो सकता
अनुताप वियोग का क्यों देगा
अनुपम है प्राण प्रिये मेरा
अनुबंध भला क्यों तोड़ेगा.
अनुपस्थित हो तुम आज प्रिये
अनुगामी बन कर आओगे
अनुदेश सुनोगे जब दिल का
अनुशासन ना रख पाओगे!

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

सोच और सृजन

व्यक्ति की वैयक्तिक सोच, जब तक सृजन में साकार नहीं हो जाती, तब तक उस व्यक्ति की वह सोच वायवीय समझी जाती है । एक पागलपन । - मनोज भारती 

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

लेखक और संवेदना

अनुभव प्रत्येक व्यक्ति के आस-पास घटित होते हैं, लेकिन लेखक की संवेदना ही उन अनुभवों को अभिव्यक्त करना जानती है । - मनोज भारती 

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

जीवन-संगीत

संगीत तुम्हारा गीत हमारा 
आओ हम मिल कर खेलें 
एक खेल ऐसा जिस में सुर हो
हमारा तुम्हारा.

जब सुर से सुर मिले 
तो एक संगीत बने
जीवन एक गीत है 
जिसे सांसों के संगीत पर गाना है 


सांस आती जाती है एक लय में 
रास आती जाती है जिंदगी एक वय में
खास बात होती है जिंदगी एक साथ में
साथ सांसों सा हो, तो जिंदगी एक संगीत है .

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कुछ मुक्तक

यूं तन्हाई में रहने की
आदत तो न थी
जमाने की बेवफाई ने
तन्हाई में रहना सीखा दिया

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एक सपना मैंने देखा
जो मेरा अपना था
वो ही बेगाना निकला
सपना क्या अपना और क्या बेगाना
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जानें क्यों उससे प्रीत लगाई
रातें क्यों उसके लिए जगाई
जाने क्यों वो दिल में समाई
वो ही जाने ये तो ....
मैं इतना ही जानूँ  कि प्रीत पराई
..........................................................................................

जब जब मैं उसे देखूँ
मेरी आँखों से कुछ रिसता
हृदय की अतल गहराई में जा गिरता
मैं मिटता, गिरता आनंदित पुलकित होता
....................................................................................................................

शनिवार, 18 सितंबर 2010

साहित्य क्या है


साहित्य का आनंद हर पढ़े-लिखे व्यक्ति ने जिंदगी में अपने-अपने ढंग से लिया ही है और जब कभी वह कुछ अच्छा पढ़ता है तो उसे दूसरों में बाँटने का भाव भी उसमें उमगता ही है । आपस में बांटने के लिए उस आनंद का कुछ ब्यौरा भी देना पड़ता है । उसे यह बताना पड़ता है कि जो अच्छा लगा वह क्या है और वह उसे क्यों अच्छा लगा । इस अच्छे लगने के पीछे शब्द और उसके अर्थ-ग्रहण का भाव निहित है । 


संस्कृत में एक शब्द है : वाङ्मय अर्थात भाषा में जो कहा गया या लिखा गया हो वह वाङ्मय है । वाङ्मय के अंतर्गत समस्त ज्ञान आ जाता है ।  वाङ्मय के दो भेद माने गए हैं : शास्त्र और काव्य । शास्त्र के अंतर्गत सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान- चाहे वे भौतिक विज्ञान हों या फिर समाज विज्ञान या मानविकी । लेकिन जिसे साहित्य कहा जाता है वह विशुद्ध रूप से काव्य है । यह काव्य साहित्य क्यों कहा जाने लगा, इसे समझ लेना चाहिए । संस्कृत में काव्य की प्राचीनतम परिभाषा है : शब्दार्थो सहितौ काव्यम । शब्द और अर्थ का सहित भाव काव्य है । इस परिभाषा में सहित शब्द इतना महत्वपूर्ण है कि कालांतर में यह सहित भाव ही साहित्य के रूप में काव्य के लिए स्वीकृत कर लिया गया । आचार्य विश्वनाथ महापात्र ने साहित्य दर्पण ग्रंथ लिख कर साहित्य शब्द को प्रचलन में ला दिया ।

इस सहित शब्द में ऐसी कौन सी विशेषता रही जिसके कारण शब्द और अर्थ साहित्य के गुणधर्म को प्राप्त होते हैं ? साधारणत: देखें तो शब्द और अर्थ तो हर जगह साथ-साथ ही रहते हैं । क्या शास्त्र में शब्द और अर्थ साथ-साथ नहीं रहते ? फिर साहित्य के शब्द और अर्थ में क्या विशेष जुड़ जाता है कि वह एक अलग कोटि में रखा जाता है ? 

आचार्य कुंतक ने इन प्रश्नों का बहुत सुंदर समाधान प्रस्तुत किया । वे कहते हैं कि जब शब्द और अर्थ के बीच सुंदरता के लिए स्पर्धा या होड़ लगी हो तो साहित्य की सृष्टि होती है । सुंदरता की इस दौड़ में शब्द अर्थ से आगे निकलने की कोशिश करता है और अर्थ शब्द से आगे निकल जाने के लिए कसम खाता है और निर्णय करना कठिन हो जाता है कि कौन अधिक सुंदर है । शब्द और अर्थ की यह स्पर्धा ही सहित भाव है और साहित्य का मूल गुणधर्म भी यही है ।

तुलसी की एक पंक्ति है : वरदंत की पंगति कुंद कली अधराधर पल्लव खोलन की । यह राम के शिशु रूप का वर्णन है । शब्द भी सुंदर हैं और अर्थ भी । लेकिन कौन अधिक सुंदर है, यह कहना कठिन है । शब्द और अर्थ के बीच जैसे स्पर्धा लगी है । यह स्पर्धा ही सहित भाव है । इसलिए यह साहित्य है ।

सहित का जो भाव साहित्य का अपना धर्म है, वही मनुष्य के समाज की भी बुनियाद है । इसे परस्परता या आपसी संबंधों के रूप में देखा जा सकता है । मनुष्य सामाजिक प्राणी है । इसलिए वह अपने अलावा दूसरों के कृत्यों में भी रस लेता है औरों के सुख-दुख में शामिल होता है तथा औरों को भी अपने सुख दुख में साझीदार बनाना चाहता है । इतना ही नहीं बल्कि वह अपने इर्द-गिर्द की दुनिया को समझना चाहता है और इस दुनिया में कोई कमी दिखाई पड़ती है तो उसे बदल कर बेहतर बनाने की भी कोशिश करता है । परस्परता के इस वातावरण में ही प्रसंगवश वह चीज पैदा होती है जिसे साहित्य की संज्ञा दी गई है । दूसरी ओर जब मनुष्य की कोई वाणी समाज में परस्परता के इस भाव को मजबूत बनाती है तो वह भी साहित्य कहा जाता है । इस प्रकार साहित्य में निहित सहित शब्द का एक व्यापक सामाजिक अर्थ भी है जो उसके उद्देश्य और प्रयोजन की ओर संकेत करता है । 

जब कोई अपने और पराये की संकुचित सीमा से ऊपर उठ कर सामान्य मनुष्यता की भूमि पर पहुँच जाए तो समझना चाहिए कि वह साहित्य धर्म का निर्वाह कर रहा है । आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने इसी को ह्रदय की मुक्तावस्था कहा है । 

इस प्रकार साहित्य के संसार में शब्द और अर्थ सौंदर्य के लिए आपस में स्पर्धा करते हुए लोकमंगल के ऊँचे आदर्श की ओर अग्रसर होते हैं ।   

बुधवार, 15 सितंबर 2010

जुंग के अनमोल विचार

  • खुशियों से सावधान रह । 
  • शांति ठीक वहां से शुरु होती है, जहां महत्त्वाकांक्षा का अंत हो ।
  • यदि यह जान लिया जाए कि परिग्रही अपनी प्रचुरता का कितना कम भोग-उपभोग कर पाते हैं, तो संसार से बहुत सी ईर्ष्या मिट जाए ।
  • ओ  इंसान ! अपने आप को जान; समस्त ज्ञान वहीं केन्द्रीभूत होता है ।
  • बादल चाहें पदवियां और जागीरें बरसा दें, दौलत चाहे हमें ढ़ूँढ़े, लेकिन ज्ञान को तो हमें ही खोजना पड़ेगा ।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

व्यक्ति जितना अधिक मूल्यों के प्रति आस्थावान होता है, उसके जीवन में उतने ही अधिक कष्ट और कठिनाइयाँ आती हैं । कष्ट और कठिनाइयाँ अग्निपरीक्षा का काम करते हैं । - मनोज भारती 

सोमवार, 13 सितंबर 2010

अनुभव और आनंद

व्यक्ति संसार के अनुभवों की भट्ठी में जल कर ही आनंद रूपी कुंदन को प्राप्त होता है ।- मनोज भारती

रविवार, 12 सितंबर 2010

संबंध

मानवीय संबंध कभी नहीं टूटते, हमेशा व्यक्ति की अपेक्षाएँ टूटती हैं । इसलिए संबंध टूटते दिखाई पड़ते हैं । -मनोज भारती

शनिवार, 11 सितंबर 2010

अहंकार

अहंकार मनुष्य की नकारात्मक शक्ति है । जिसका बीज हर मनुष्य में होता है । आयु बढ़ने के साथ-साथ यह बीज अंकुरित,पल्लवित होता हुआ विकसित होता है । पर जब अहंकार अपने शिखर पर होता है, तो मनुष्य अपने जीवन के निम्नतम स्तर पर होता है । 

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

स्त्री और पुरुष

कोई पुरुष कभी भी किसी स्त्री से नहीं जीत सकता, क्योंकि पुरुष का उद्-गम स्त्री से है, उसे अस्तित्व में लाने वाली स्त्री है और पुरुष स्वयं अस्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता ।-मनोज भारती

सोमवार, 6 सितंबर 2010

चमार राष्ट्रपति

लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति हुआ । उसका बाप एक गरीब चमार था । कौन सोचता था कि चमार के घर एक लड़का पैदा होगा, जो मुल्क में आगे खड़ा हो जाएगा ? अनेक-अनेक लोगों के मन को चोट पहुँची । एक चमार का लड़का राष्ट्रपति बन जाए । दूसरे जो धनी थे और सौभाग्यशाली घरों में पैदा हुए थे, वे पिछड़ रहे थे । जिस दिन सीनेट में पहला दिन लिंकन बोलने खड़ा हुआ, तो किसी एक प्रतिस्पर्धी ने, किसी महत्वाकांक्षी ने, जिसका क्रोध प्रबल रहा होगा, जो सह नहीं सका होगा, वह खड़ा हो गया । उसने कहा, "सुनों लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम राष्ट्रपति हो गए तो तुम एक चमार के लड़के नहीं हो । नशे में मत आ जाना । तुम्हारा बाप एक चमार था, यह खयाल रखना ।" सारे लोग हँसे, लोगों ने खिल्ली उड़ाई, लोगों को आनंद आया कि चमार का लड़का राष्ट्रपति हो गया था । चमार का लड़का कह कर उन्होंने उसकी प्रतिभा छीन ली ।फिर नीचे खड़ा कर दिया । लेकिन लिंकन की आँखें  खुशी के आँशुओं से भर गई । उसने हाथ जोड़ कर कहा कि मेरे स्वर्गीय पिता की तुमने स्मृति दिला दी, यह बहुत अच्छा किया । इस क्षण में मुझे खुद उनकी याद आनी चाहिए थी । लेकिन मैं तुमसे कहूँ, मैं उतना अच्छा राष्ट्रपति कभी न हो सकूँगा, जितने अच्छे चमार मेरे बाप थे । वे जितने आनंद से जूते बनाते थे, शायद मैं उतने आनंद से इस पद पर नहीं बैठ सकूँगा । वे अद्-भुत व्यक्ति थे । मैंने उन्हें जूते बनाते और गीत गाते देखा था । मैंने उन्हें दरिद्रता में और झोंपड़े में आनंद से मग्न देखा था । मेरी वह क्षमता नहीं, मेरी वह प्रतिभा नहीं । वे बड़े अद्-भुत थे, बहुत अलौकिक थे । मैं उनके समक्ष कुछ भी नहीं हूँ ।

यह जो लिंकन कह सका, एक दरिद्र वृद्ध चमार के बाबत, जिसने गीत गा कर जूते बनाए थे और जो आनंदित था और जो अपने से तृप्त था । उसे उसने स्वीकार किया था । जीवन में जो उसे था, उसके अनुग्रह से वह भरा था । उसके प्राण निस्पंद थे । वह किसी प्रतिस्पर्धा में न था । वह किसी दौड़ में न था । वह अपनी जिंदगी के आनंद में मग्न था ।

क्या तुम भी अपने जीवन में आनंद मग्न होने के खयाल को जन्म दे सकोगे ? क्या प्रतिस्पर्धा को छोड़कर अपने में , निज में, निजता में, कोई खुशी का कारण खोज सकोगे ? दूसरे के सुख में नहीं, अपने आनंद में क्या तुम कोई द्वार खोज सकोगे ? अगर खोज सको तो एक दुनिया बन सकती है, जो प्रेम की नगरी है । अन्यथा नहीं ।
( ओशो की पुस्तक "घाट भुलाना बाट बिनु" के " प्रेम नगर के पथ पर" प्रवचन का एक अंश )

शनिवार, 4 सितंबर 2010

संसार और दुनिया

संसार शब्द कब दुनिया शब्द के अर्थ में व्यवहार में आने लगा, मालूम नहीं । संसार शब्द का अर्थ दुनिया शब्द से नितांत भिन्न है । संसार शब्द का मूल अर्थ है : सम्यक् सार । अर्थात सार तत्त्व की बात । लेकिन दुनिया शब्द का अर्थ है : जहां दु का राज है अर्थात जहां द्वैत और द्वंद्व है । शायद नकली गुरुओं द्वारा सात्विक सार तत्त्व की बात को बहुत बार बिना अनुभव के दोहराया गया, तो द्वैत में जीने वालों ने संसार और दुनिया में अंतर करना छोड़ दिया और संसार शब्द भी दुनिया का पर्याय बन कर रह गया ।- मनोज भारती

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

प्रेम और प्रार्थना

हेनरी थोरो अमेरिका का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ । वह मरने के करीब था । वह कभी चर्च में नहीं गया था । उसे कभी किसी ने प्रार्थना करते हुए नहीं देखा था । मरने का वक्त था, तो उसके गाँव का पादरी उससे मिलने गया । उसने सोचा यह मौका अच्छा है, मौत के वक्त आदमी घबड़ा जाता है । मौत के वक्त डर पैदा हो जाता है , क्योंकि अनजाना रास्ता है मृत्यु का । न मालूम क्या होगा ? उस समय भयभीत आदमी कुछ भी स्वीकार कर सकता है । मौत का शोषण धर्मगुरु बहुत दिनों से करते रहे हैं । इसलिए तो मंदिरों, मस्जिदों में बूढ़े लोग दिखाई पड़ते हैं । पादरी ने हेनरी थोरो से जाकर कहा, क्या तुमने अपने और परमात्मा के बीच शांति स्थापित कर ली है ? क्या तुम दोनों एक दूसरे के प्रति प्रेम से भर गए हो ? हेनरी थोरो मरने के करीब था । उसने आंखें खोली और कहा, "महाशय, मुझे याद नहीं पड़ता है कि मैं उससे कभी लड़ा भी हूँ । मेरा उससे कभी झगड़ा नहीं हुआ तो उसके साथ शांति स्थापित करने का सवाल कहाँ है ? जाओ, तुम शांति स्थापित करो, क्योंकि जिंदगी में तुम उससे लड़ते रहे हो । मुझे तो उसकी प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है । मेरी जिंदगी ही प्रार्थना थी ।" कोई मरता हुआ आदमी ऐसा कहेगा, इसकी तो हम कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन बड़ी सच्ची बात उसने यह कही कि अगर मैं उससे लड़ा होता, अगर एक पल को भी मेरे और उसके बीच कोई शत्रुता खड़ी हुई होती तो फिर मैं शांति स्थापित करने की कोशिश करता । 

( ओशो की किताब 'घाट भुलाना बाट बिनु '  के  प्रवचन 'प्रेम नगर के पथ पर ' से उद्धृत एक अंश )

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

स्थिरता और परिवर्तन

स्थिरता का अनुभव किए बगैर परिवर्तन को समझना कठिन है ।-मनोज भारती

शनिवार, 28 अगस्त 2010

पुस्तकें और ज्ञान

एक जिज्ञासु साधक था । वह ध्यान (झेन) साधना की तीव्र उत्कंठा से भरा हुआ था । वह जगह-जगह घूमा और ध्यान के संबंध में जितनी भी जानकारियाँ हो सकती थी, वे सब इकट्ठी कर ली । वर्षों तक उसने झेन का अध्ययन किया । हजारों किताबे उसके घर में इकट्ठी हो गई । उन किताबों को अनेकों बार वह पढ़ चुका था ।झेन के एक बड़े विद्वान के रूप में उसकी ख्याति भी हो गई । लोग दूर-दूर से उससे ध्यान के संबंध में जानने के लिए आने लगे । वह अनेक साधकों और जिज्ञासुओं के संपर्क में था । निरंतर ध्यान के संबंध में नई-नई विधियाँ ढ़ूँढ़ता और उन्हें आजमाता । अपने अनुभव को लिखता । अंतत: एक दिन उसे परम ज्ञान उपलब्ध हो गया । 

उस दिन उसने सब किताबों को आग लगा दी और घर से दूर कहीं चला गया । 

क्यों ???

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

सत्य और भ्रम

जानने से जो व्यर्थ हो जाए, वह भ्रम है । जानने से जो और भी सार्थक होने लगे, वह सत्य है । -ओशो

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

कूटनीति और सत्य

कूटनीति में सूक्ष्म अपराध छिपा रहता है । कूटनीति और सत्य का परस्पर गठबंधन नहीं हो सकता । जहां कूटनीति है वहां सत्य नहीं हो सकता । - मनोज भारती

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

सुधारना व स्वतंत्रता

दूसरे को सुधारने की कोशिश, उसकी स्वतंत्रता का हनन है । - मनोज भारती

सोमवार, 23 अगस्त 2010

एकाकी जीवन

कुछ व्यक्तियों के भाग्य में एकाकी जीवन लिखा रहता है ; ताकि वे समूह के लिए कुछ चिंतन, मनन कर सकें । -मनोज भारती 

रविवार, 22 अगस्त 2010

गुटबंदी और ख्याति

निकम्मे लोग गुटबंदियों और हेराफेरी से सामयिक ख्याति शीघ्र प्राप्त कर लेते हैं । इसके विपरीत्त बुद्धिजीवी को ख्याति प्राप्त करने के लिए घोर संग्राम करना पड़ता है । - इलाचंद्र जोशी

शनिवार, 21 अगस्त 2010

मौन की साधना








मौन की साधना

कभी आप स्वयं को एक एकांत कमरे में बंद करके चुपचाप बैठ जाइए और अपने अंदर झांकने की कोशिश कीजिए । आप वहां क्या पाते हैं ? एक असंगत विचारों की धारा । कभी आपको अपनी प्रेयसी का ख्याल आता है, तो कभी आप अचानक स्वयं को सफलता के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई पड़ते हैं । आपका मन निरंतर पेंडूलम की तरह एक अति से दूसरी अति पर डोलता दिखाई पड़ेगा । कभी अतीत के झरोखों में तो कभी भविष्य के गर्भ में मन खो जाएगा । क्या इन विचारों की भीड़ में आपको स्वयं का चेहरा कभी दिखाई पड़ता है, जो स्वयं आपका अपना हो ? शायद नहीं । क्या कभी आपने स्वयं को पहचानने की कोशिश की है ? क्या आपके मन में जीवन के प्रश्न उठते हैं ? यदि हाँ, तो संभवत: आपको मौन होने की कला सीखनी चाहिए ।

मौन होने से अभिप्राय:

मौन होने का अर्थ क्या है ? क्या जब आप अपने मुँह से कुछ नहीं बोल रहे होते हैं, तो क्या आप मौन में हैं ? या जब आप एकांत में बैठे हैं, तो क्या आप मौन हैं ? या जब आप दुसरों से मौखिक प्रतिक्रुया नहीं कर रहे, तब क्या आप मौन हैं ? मौन से आशय क्या है ?
मौन से अभिप्राय: मन की उस दशा से है, जब मन में विचारों का कोई प्रवाह नहीं होता । वहाँ एक शांति होती है । उस दशा में मन न तो सुख का अनुभव करता है और न ही दुख का । वह एक निर्वचनीय दशा होती है । वस्तुत: वह दशा आनंद की होती है । उस दशा में आप साक्षीत्व में होते हैं । यह दशा मन की शून्य अवस्था कहलाती है । इस दशा में आपका आपसे साक्षात्कार होता है । आप विशुद्ध रूप से जानते हैं कि आप कौन हैं । वहां आप घटनाओं के साक्षी तो बनते हैं, लेकिन उनसे स्वयं अस्पर्शित रहते हैं । आपकी स्थिति कमलवत हो जाती है । आप घटनाओं से उद्वेलित नहीं होते, क्योंकि आप जानते हैं कि घटनाएँ अलग हैं और आप अलग हैं ।

क्या यह इतना आसान है ?

आप संभवत: कभी खाली नहीं रहे । आप अपने घर (मन) के मालिक कभी नहीं बने । आपने दूसरों के विचारों से अपने घर (मन) को सजाया है । इसलिए आप अपने घर को ही नहीं जानते । इसलिए पहली नजर में संभवत: आपको लगे कि मौन होना केवल साधु, संन्नयासियों व तपस्वियों का काम है । संसार में रहते हुए ऐसा संभव नहीं । लेकिन यह विचार भी आपके मन की एक तरंग से ज्यादा नहीं है । कल्पना कीजिए एक ऐसे घर की जिसके मालिक ने अपने घर को सजाने के लिए इतना अधिक सामान एकत्रित कर लिया है कि उसके स्वयं के रहने के लिए घर में कोई जगह ही न बची हो । संभवत: हमने भी अपने मन को इसी प्रकार विचारों से भर लिया है और उसमें स्वयं हमारे लिए कोई जगह नहीं बची है और उनसे परे हम स्वयं को विचारों से रहित देखने की कल्पना भी नहीं कर सकते । क्या आप अपने घर में ऐसी वस्तु को रखना पसंद करेंगे, जिसे आप अपनी इच्छा से घर में प्रवेश तो दे सकें लेकिन अपनी इच्छा से उसे घर से बाहर न निकाल सकें । संभवत: नहीं ।

नहीं, यह कठिन नहीं है । लेकिन बाहर के प्रवाह के विपरीत्त अवश्य है । यदि आप वास्तव में ही अपने घर के स्वामी बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको अपने घर के अंदर आना होगा और वहां अपने रहने के लिए जगह खाली करनी होगी । नि:संदेह उधार के किरायेदार को घर से निकालना थोड़ा कठिन अवश्य होगा पर असंभव नहीं ।

तब आप क्या करें ?

आप चीजों को जाने अनजाने पसंद करते हैं । आपकी पसंद आपके मन में एक विशेष तरह का राग रखती है, यह राग ही संसार का बंधन बनता है । आपकी पसंद के कारण ही आपके विश्वास बनते हैं । कुछ विश्वास आप समाज, शिक्षा, संस्कृति से सीखते हैं । लेकिन यह सब आप नहीं हैं । आप इनके परे कुछ हैं जो इन सबको घटित होते हुए देखता है । यह देखने वाला तत्व ही महत्वपूर्ण है । वस्तुत: आपको इसे पाने के लिए कुछ करना नहीं है । बल्कि तटस्थ होकर यह देखना है कि आप क्या हैं और क्या नहीं हैं ? जो आप नहीं हैं उन चीजों को अपने से अलग हटा कर रख देना है । लेकिन पूरी ईमानदारी के साथ । इस प्रक्रिया में अगर आप बाहर मौन रहते हैं व अंदर तटस्थ रहते हैं तो धीरे-धीरे आप अपने अंदर अवकाश बनाने में सफल हो जाएंगे । आरंभ में आपको कुछ खालीपन लगेगा, लेकिन इस खालीपन से घबरा कर साधना मत छोड़े । आपका अपने तथाकथित विचारों से तादात्म्य टूटेगा । कई बार आप अपने को नितांत अकेला अनुभव करेंगे । बहुत बार आपको लगेगा कि आप लोगों की नजरों में पागल हो गए हैं, लेकिन वस्तुत: आप पागलपन से दूर की यात्रा पर होंगे । यदि आप निरंतर चीजों को बिना किसी हस्तक्षेप के देखते रहे, बिना किसी पक्षपात के, कि वे अच्छी हैं या बुरी तो एक दिन अवश्य ही मौन में चले जाएंगे । 

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

निष्फल प्रेम

निष्फल प्रेम जिंदगी में जितना कुछ दे जाता है, उतना सफल प्रेम नहीं । - मनोज भारती

सोमवार, 16 अगस्त 2010

विद्वान,पंडित और पुरोहित

विद्वान : विद्वान वह है जो द्वैत के भेद का ज्ञान रखता है । जो चीजों को टूकड़ों में तोड़-तोड़ कर समझता है और समझाता है । वह द्वैत का विज्ञानी होता है। बिरले ही विद्वान होते हैं जो अद्वैत का अनुभव रखते हैं । 

पंडित : पंडित शास्त्र का जानकार होता है लेकिन स्वयं का अनुभव रखे यह जरूरी नहीं । उसका ज्ञान उधार का ज्ञान होता है । 

पुरोहित : पुरोहित शास्त्र सम्मत विधि द्वारा  और  पूर्वजों के दिखाए मार्ग पर चलते हुए नागरिकों के हित के लिए यज्ञ आदि अनुष्ठान संपन्न करता है । पुरोहित को परम्परा निर्वाह में ही ज्ञान दिखाई पड़ता है । 

रविवार, 15 अगस्त 2010

परिवार व एकता

जब एक ही परिवार में चारों वर्णों  के व्यक्ति पैदा हो जाएं, तो उस परिवार की एकता खतरे में पड़ जाती है । - मनोज भारती

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

स्त्री

पुरुष जितना स्त्री से सीख सकता है,उतना किसी और से नहीं । - मनोज भारती

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

दोस्ती

जब दो व्यक्तियों के बीच दो का भाव अस्त होता है, तो दोस्ती का उदय होता है । - मनोज भारती

रविवार, 8 अगस्त 2010

भारत दुर्दशा

भारत गाँवों में बसता है । यह तथ्य आज भी उतना ही सही है जितना कि आजादी से पहले । अभी राजस्थान के कुछ गाँवों और एक दो छोटे शहरों में जाना हुआ । तो पाया कि शहरी और ग्रामीण जीवन में बहुत असमानताएँ हैं । भारत के बड़े शहरों में जन जीवन की सामान्य सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं । लेकिन गाँवों व छोटे कस्बों में जन जीवन को सामान्य सुविधाओं के लिए बड़ा श्रम करना पड़ता है । मैंने देखा कि गाँवों में पीने के पानी की समस्या आम है । खेतड़ी (ताँबे की खानों के लिए प्रसिद्ध) सिंघाना, नारनौल जैसे छोटे शहर में पानी की किल्लत है । घर के सदस्यों विशेषत: गृहणियों व बच्चों को सुबह-सुबह घर के बाहर पानी के लिए घंटों श्रम करना पड़ता है । सुबह-सुबह का यह नजारा हर घर को पनघट में बदल देता है । पानी बहुत कम समय के लिए आता है और वह भी अनियमित । छोटे बच्चे स्कूल जाने के बजाय पानी भरते नजर आते हैं । गाँवों में भी स्थिति ऐसी ही है । पानी की सप्लाई या तो बंद है या बहुत कम समय के लिए । पानी टैंकरों से मोल खरीदा जा रहा है ।

स्कूलों के लिए बने भवनों की हालत जर्जर है ,वहीं कुछ स्कूल खुले में भी चल रहें हैं । अध्यापकों की कमी तो स्कूलों की आम समस्या है । स्कूलों में बच्चों व अध्यापकों का ध्यान पढ़ाई की ओर कम और दोपहर के भोजन की तैयारी की ओर अधिक रहता है ।

हमारे कल के भविष्य, गाँवों में बसने वाले बच्चों का भविष्य अंधकारमय लगता है । बहुत कम बच्चे हैं जो इन ग्रामीण परिस्थितियों का सामना करते हुए मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते हैं । उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले ग्रामीण लोगों का प्रतिशत तो बहुत ही कम है । फिर इनकी शिक्षा हिंदी माध्यम से होने के कारण, ये शहरी कान्वेन्ट स्कूलों में पढ़े बच्चों के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ जाते हैं और रोजगार की तलाश में भटकते-भटकते ओवर-एज़ हो जाते हैं ।

हमारा वास्तविक भारत जो गाँवों में बसता है, उसकी परवाह किसे हैं ? क्या गाँव व छोटे शहरों की इन समस्याओं की ओर प्रशासन व सरकार का ध्यान नहीं है ? या फिर हमारा ग्रामीण नागरिक इन समस्याओं से झूझने के लिए यूं ही मजबूर बना रहेगा । सचमुच भारत के गाँवों में लोग जिन हालातों में रह रहें हैं वह बहुत ही सोचनीय है और भारत की दुर्दशा को ब्यां कर रहा है ।


शनिवार, 31 जुलाई 2010

सोलह संस्कार

भारतीय संस्कृति में जीवन के विकास क्रम में सोलह संस्कारों की बहुत महत्ता है । ये संस्कार गर्भाधान से शुरु होकर अंत्येष्टि तक हैं । ये संस्कार परिवार द्वारा प्रवृत्त होते थे, परिवार की संस्था के साथ ही इनका आविर्भाव हुआ । परिवार वस्तुत: इन्हीं संस्कारों द्वारा संचालित था । ये सोलह संस्कार इस प्रकार हैं :

1. गर्भाधान : श्रेष्ठ संतान की इच्छा से यह संस्कार किया जाता है । पच्चीस वर्ष के पुरुष और सोलह वर्ष की स्त्री विवाह बंधन के बाद इस संस्कार के लिए पात्र होते हैं । जीवन के उद्देश्य को स्मरण करके, अपने आदर्शों के अनुकूल मनोदशा रख कर व उत्तम विचारों को धारण करते हुए, स्त्री-पुरुष संतानोत्पत्ति के लिए संसर्ग करें और बच्चे के लिए माँ गर्भ धारण करे । यही इस संस्कार का उद्देश्य है ।

2.पुंसवन : गर्भ के तीसरे मास के भीतर गर्भ की रक्षा और बच्चे के उत्तम विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है । इस संस्कार में स्त्री-पुरुष प्रतिज्ञा करते हैं कि वे कोई भी ऐसा कार्य मनसा,वाचा,कर्मणा नहीं करेंगे जिससे गर्भ में विकसित हो रहे बच्चे के विकास में बाधा पहुँचे ।

3. सीमंतोन्नयन : यह संस्कार गर्भ के सातवें या आठवें मास में बच्चे की मानसिक शक्तियों की वृद्धि के लिए किया जाता है । इसमें ऐसे उपाय किए जाते हैं ,जिनसे कि स्त्री का मन संतुष्ट रहे । वह मानसिक रूप से प्रसन्नचीत्त रहे ।

4. जातकर्म : यह संस्कार बालक के जन्म लेते ही किया जाता है । बालक का पिता सोने या चाँदी की सलाई से घी व शहद से बालक की जिह्वा पर ओ3म लिखता है । यह बच्चे के संसार में आध्यात्मिक विकास हेतु किया जाता है ।

5. नामकरण : बालक के जन्म से ग्यारहवें दिन या एक सौ एकवें दिन, या दूसरे वर्ष के आरंभ में, यह संस्कार किया जाता है । इसमें बालक का नाम रखा जाता है ।

6. निष्क्रमण : यह संस्कार बालक के जन्म के चौथे महीने में , उसी तिथि को जब बालक का जन्म हुआ हो, किया जाता है । इसका उद्देश्य बालक को प्रकृति के खुले वातावरण में शुद्ध हवा का सेवन व सृष्टि का प्रथम अवलोकन करवाना होता है । इस दिन से बालक को बाहर खुले में लाना ले जाना शुरु कर दिया जाता है ।

7. अन्नप्राशन : छठे या आठवें महीने में जब बालक की शक्ति अन्न पचाने की हो जाए, तब यह संस्कार किया जाता है और बच्चे को अन्न ग्रहण करवाना शुरु कर दिया जाता है ।

8. चूड़ाकर्म : इसे मुंडन संस्कार भी कहते हैं । यह पहले अथवा तीसरे वर्ष में बालक के बाल काटने के लिए किया जाता है ।

9. कर्णवेध : इसमें बालक के कान बेधे जाते हैं । यह संस्कार तीसरे या पाँचवें वर्ष में किया जाता है ।

10. उपनयन संस्कार : जन्म के सातवें वर्ष से लेकरचौदहवें या सौलहवें वर्ष तक बालक का यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है और उसे गुरुकुल में विद्याभ्यास के लिए भेजा जाता है ।

11. वेदारम्भ : उपनयन संस्कार के दिन या उससे एक वर्ष के भीतर गुरुकुल में वेदों का ज्ञान गायत्री मंत्र से किया जाता है ।

12. समावर्तन : यह संस्कार ब्रह्मचर्य-व्रत की समाप्ति पर किया जाता है ।

13. विवाह : विद्या समाप्ति पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए गुणशील संपन्न कन्या के पाणिग्रहण द्वारा यह संस्कार संपन्न होता है ।

14. वानप्रस्थ : इसका समय पचास वर्ष की आयु उपरांत है । जब घर में पुत्र का भी पुत्र हो जाए, तब गृहस्थी के धंधों में फंसे रहना धर्म नहीं है । उस समय वानप्रस्थ की तैयारी के लिए यह संस्कार किया जाता है ।

15. संन्यास : वानप्रस्थ में रहकर जब इंद्रियों पर विजय प्राप्त हो, किसी के लिए मोह,शोक आदि न रहे, तब केवल परोपकार के हेतु संन्यास आश्रम में प्रवेश के लिए यह संस्कार किया जाता है ।

16. अंत्येष्टि : मनुष्य के शरीर का यह अंतिम संस्कार है, जो मरने के पश्चात शव को जलाकर पूरा किया जाता है ।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

सम्यक निरीक्षण

सामने शून्य जगत में जो परिवर्तन हो रहे हैं
वे अज्ञान के कारण ही यथार्थ दीख पड़ते हैं ;
सत्य के पीछे दौड़ने की कोशिश मत करो,
केवल मन की सारी आस्थाओं और विचारों को छोड़ दो ।
- ओशो 

ज्योंही सत-असत का द्वैत खड़ा होता है
भ्रांति पैदा होती है, मन खो जाता है । 

हम अपने मन को पहचाने, देखें । 
इसकी गति-विधि का निरीक्षण करें ।
जिसे तुम चाहते हो, उसे  उसके विरुद्ध खड़ा कर देना,;
जिसे तुम नहीं चाहते - मन का सबसे बड़ा रोग है । 
जब पथ के गूढ़ अर्थ का पता नहीं होता
तब मन की शांति भंग होती है, जीवन व्यर्थ होता है । 
मूक दर्शक रहें, पक्ष ग्रहण न करे, बल्कि अपनी वासनाओं, विचारों को ऐसे ही देखे जैसे कोई सागर पर खड़ा हो, सागर की लहरों को देखता हो । कृष्णमूर्ति ने इसे निर्विकल्प सजगता कहा है । यह बिल्कुल तटस्थ निरीक्षण है ।