शनिवार, 27 नवंबर 2010

चाँद की चोरी

जो भी चुराया जा सकता है, वह द्रष्टा के सम्मुख दो कोड़ी का साबित होता है । जब तक व्यक्ति को यह समझ नहीं आता कि वह जिन-जिन चीजों का लालच करता है,वह दो कोड़ी से ज्यादा मूल्य नहीं रखता, उसका लालच बना रहता है । एक बहुत सुंदर झेन कहानी है । झेन गुरु रियोकॉन प्रकृति के सान्निध्य में पर्वतों की तलहटी में एक कुटिया में रहते थे । एक रात उनकी कुटिया में एक चोर घुस आया । लेकिन वहाँ चुराने लायक कुछ भी नज़र नहीं आया । वह निराश खाली हाथ लौटने ही वाला था कि रियोकॉन वहां आ पहुँचे । 

रियोकॉन ने चोर से कहा, तुम बड़ी दूर से चल कर आए लगते हो । मैं तुम्हें यूँ निराश नहीं लौटने दूँगा । मेरे पास चुराने लायक कुछ नहीं है । लेकिन मेरे पास ये कपड़े हैं, इन्हें उपहार स्वरूप प्राप्त करो । चोर चकित था, उसने ऐसा व्यक्ति नहीं देखा था, जो स्वयं चोर की सहायता करे । उसने कपड़े थामे और चुपचाप वहां से चला गया । 

वस्त्रहीन शरीर के साथ रियोकॉन बाहर एक शिला पर बैठ कर चाँद को निहारने लगा । चाँद की खूबसूरती देखते ही बनती थी । आधी रात का पूर्णिमा का चाँद और रियोकॉन की दृष्टि उसमें कुछ अमूल्य पा रही थी । रियोकॉन ने स्वयं से कहा, काश ! चोर को मैं यह सुंदर चाँद भेंट में दे पाता । 

3 टिप्‍पणियां:

  1. रियोकॉन की अपने ऐश्वर्य को प्राप्त प्रज्ञा, के लिये चोर को चादँ देने का भाव बहुत ही सहज रहा होगा।

    अपने दारिद्र्य के काम्प्लैक्स में हमें तो वो चोर दिखता है पर रियोकॉन को वो जरूर प्रिय अतिथि लगा होगा!

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  2. उन्मुक्त मन से देने का भाव मुक्ति का मार्ग खोल देता है. बहुत बढ़िया पोस्ट.

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  3. रियोकॉन की इस कथा ने गुलज़ार साहब की ये पंक्तियाँ स्मरण करा दींः
    चाँद चुरा के लाया हूँ
    चल बैठे चर्च के पीछे.
    ना कोई देखे ना पहचाने
    बैठे पेड़ के नीचे!!!

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