रविवार, 24 जून 2012

शून्यता

( ध्यानमय जीवन के लिए अब तक हमने पिछली पोस्टों में सरलता,सजगता की बात की है। आज की इस पोस्ट में प्रस्तुत है ध्यानमय जीवन  का तीसरा सूत्र: शून्यता) 

तीसरा सूत्र है: शून्यता। जितना शून्य होंगे उतनी सजगता गहरी होगी। सरलता उत्पन्न होती है सजगता से     और सजगता उत्पन्न होती है शून्यता से। शून्यता चरम बिंदु है। शून्यता साधना का केंद्र बिंदु है। शून्य हो जाएं। शून्य होने का मतलब है जो हो रहा है चारों तरफ, उसके प्रति मरना सीखें।

एक छोटी सी कहानी कहूं तो शायद समझ आ जाए। जापान  में एक संन्यासी हुआ। एक ऐसा दरिद्र भिखारी,जो टोकियो राजधानी में एक नीम के झाड़ के नीचे पड़ा रहता था। वर्ष आए और गए,वह वहीं पड़ा रहा। लाखों हजारों लोग उसे मानते थे और उसे श्रद्धा देते थे। स्वयं बादशाह भी उसे श्रद्धा देता था और उसका आदर करता था। एक दिन बादशाह आया और उसके चरण छुए और कहा कि कृपा करें,मेरे महल में चलें। यहां पड़े रहने से क्या? बरसात भी है,शरीर आपका वृद्ध हो गया है,धूप आती है,तकलीफ होती है,सर्दी आती है। मुझ पर कृपा करें और तुरंत मेरे महल में चलें।

साधु ने अपनी चटाई लपेटी और खड़ा हो गया। राजा बहुत हैरान हुआ। साधु इतनी जल्दी तैयार हो गया! कैसा साधु है,कैसा संन्यासी है? एक दफ़ा भी ऐसा नहीं कहा कि यह संसार सब माया है,महल से क्या लेना-देना है। हमने तो लात मार दी। हम तो झोंपड़े में रहने वाले फकीर है,हम तो मग्न रहते हैं,हमको क्या मतलब? ऐसा कहता तो मालूम पड़ता कि संन्यासी है। और जिन-जिन को संन्यासी मालूम पड़ना हो,उन को ऐसा कहना पड़ता है।

वह संन्यासी तो खड़ा हो गया। उसने कहा,महाराज चलें। वह तो आगे हो गया और बादशाह बहुत चिंतित हुआ। बड़े उत्साह से लेने गया था,लेकिन चित्त एकदम फीका हो गया कि किस आदमी को ले जा रहा हूं। यह भी गलती हो गई। यह तो धोखा हो गया। लेकिन जब खुद ही आमंत्रण दिया था,खुद ही बुलाया था,इसलिए इंकार भी बीच रास्ते में कैसे करे। महल में ले गया,बड़ी अच्छी व्यवस्था की थी। जो व्यवस्था स्वयं राजा की थी,वैसी ही व्यवस्था उसकी थी।

लेकिन राजा का संदेह प्रतिक्षण बढ़ने लगा। जो जो दिया,उसने स्वीकार कर लिया और जो शाही बिस्तरे दिए उन पर सो गया। नौकर-चाकर दिए,उनकी सेवाएं अंगीकार कर ली। राजा तो हैरान हुआ कि यह आदमी कैसा है? यह तो बिलकुल ही गलत आदमी मालूम होता है। क्या यह उसकी प्रतीक्षा में ही बैठा हुआ था? क्या सब ढ़ोंग था,धोखा था? यह सारी फकीरी क्या बरसों से प्रतीक्षा कर रही थी कि राजा कब आमंत्रण दे और मैं चलूं। रात मुश्किल में बीती। संन्यासी तो मजे से सोया पर राजा नहीं सो सका। सुबह होते ही राजा ने कहा कि संत जी,बड़ी शंका मन में उठी है। जब तक निवारण न हो, मैं बड़ी दिक्कत में पड़ गया हूं। एक शंका उठी है,उसे प्रकट करने की आज्ञा दें।

संन्यासी हंसने लगा। उसने कहा-तुम्हें शंका अब प्रकट हुई? मुझे वहीं हो गई थी। जैसे ही मैं खड़ा हुआ, मैं समझा तुमने निमंत्रण वापस ले लिया। फिर तो मजबूरी से यहां तक ले आए हो। पूछ लो,शंका का निवारण कर लो। राजा ने कहा कि रात मैं यही सोचता रहा कि आप कैसे संन्यासी हैं? संन्यासी ने कहा कि थोड़ा एकांत होगा तो सरलता होगी बतलाने में। राजा ने कहा भेद तो जानना ही है। मुझमें और आपमें क्या भेद रहा,इस रात? कल तक तो भेद था। आप नीम के नीचे थे,भिखारी थे, भिखमंगे थे। खाने के बर्तन को सिर के नीचे रखकर सो जाते थे। मैं महल में था तो राजा था,आप भिखमंगे थे कल तक;तो बहुत भेद था। आप संन्यासी थे,मैं भोगी था। लेकिन आज रात कोई भेद मुझे दिखाई नहीं पड़ता। संन्यासी खूब हंसने लगा। और कोई भी संन्यासी हंसेगा,क्योंकि अगर भेद इतना ही है कि एक के पास बहुत बिस्तर हैं और एक के पास बहुत बिस्तर नहीं हैं; एक दरख्त के नीचे सोता है और एक महलों में। अगर भेद इतना ही हो,तो संन्यास और संसार में भेद किस मूल्य का हुआ? कोई भेद है ही नहीं।

संन्यासी बहुत हंसा। उसने कहा कि गांव के बाहर चलें। वे दोनों गांव के बाहर गए। बार-बार थोड़ी-थोड़ी दूर पर राजा पूछने लगा,उत्तर दे दें। अब तो गांव से बाहर आ गए। संन्यासी ने कहा,थोड़ा और आगे,थोड़ा और आगे। दोपहर हो गई। सूरज ऊपर आ गया तो राजा ने कहा-क्या कर रहें हैं! आपको उत्तर देना है कि नहीं? यह और आगे से क्या मतलब होगा? संन्यासी ने कहा,और आगे ही उसका उत्तर है। अब मैं आगे ही जाऊंगा,पीछे नहीं लौटूंगा। आप भी मेरे साथ चलते हैं। राजा ने कहा-मैं कैसे चल सकता हूं? पीछे मेरा महल,मेरा राज्य है। संन्यासी ने कहा-पीछे न मेरा महल है न मेरा राज्य है और इतना ही भेद है। जब रात तुम्हारे भवन में मैं सोया तो मैं बिल्कुल उतना ही शून्य था जितना जब मैं नीम के नीचे सोता था। इतना ही भेद है। इसे स्मरण रखें,इसे हृदय के किसी कोने में बैठ जाने दें। इतना ही भेद है कि जब तुम्हारे महल में सोया उतना शून्य था जितना जब मैं नीम के नीचे सोता था। मेरी शून्यता वही थी,वही भेद है,तुम्हारे भीतर शून्यता नहीं है। जो तुम्हारे पास आता है उसी से तुम भर जाते हो। महल से भरे हुए हो। तुम कहते हो पीछे मेरा महल है,तुम कहते हो पीछे मेरा राज्य है। तुम जब मरोगे तब भी कहोगे कि पीछे मेरा सब कुछ गया। तुम रोते हो कि कहां मुझे लिए जा रहे हो। और मैं जब मरूंगा तो ऐसा ही चला जाऊंगा आगे,क्योंकि मेरे पीछे कुछ भी नहीं है। पीछे वही है जो भीतर हो और जो भीतर न हो वह पीछे भी नहीं है। बाहर भी वही है जो भीतर हो। जो भीतर न हो बाहर भी कुछ नहीं है। जो शून्य हो जाते हैं,उनके लिए संसार मोक्ष हो जाता है। जो शून्य हो जाते हैं उनके लिए संसार परमात्मा हो जाता है। जो शून्य हो जाते हैं उनके लिए यहीं सब कुछ उतर आता है,जिसकी आपको तलाश और खोज है। लेकिन शून्य हो जाना जरूरी है।

क्यों? क्योंकि जब वर्षा का पानी गिरता है और आकाश में मेघ इकट्ठे होते हैं और बूंदे बरसती हैं तो वह पानी की बूंदे टीलों पर या पहाड़ों पर इकट्ठी नहीं होती,गड्ढ़ों में इकट्ठी हो जाती हैं। जो टीले की भांति हैं,जिनका अहंकार उठा हुआ है,उन पर पानी तो गिरेगा लेकिन बहकर नीचे निकल जाएगा,इकट्ठा नहीं होगा। और जो गड्ढ़ों की भांति खाली और शून्य हैं उनमें भर जाएगा। जो शून्य है,वह ग्रहण करता है परमात्मा को और जो भरा है संसार से वह इंकार कर देता है,अस्वीकार कर देता है।

द्वार खोलना है तो शून्य हो जाएं। भीतर बिल्कुल खाली हो जाएं। जैसे वहां कुछ न हो। सामान वहां इकट्ठा न करें। फर्निचर अपने घर में लाएं, पर उसे अपने भीतर न लाएं। चीजें अपने बाहर लाएं लेकिन भीतर न लाएं। बाहर सब होने दें लेकिन भीतर खाली रहने दें। रोज सांझ को जो इकट्ठा किया उसे बाहर कर दें। झाड़ लें अपने को। बिलकुल साफ कर लें अपने को।


शुक्रवार, 8 जून 2012

सजगता से सरलता : साक्षी की साधना

अखंड जीवन ही सरल जीवन है। समग्र-इन्टीग्रेटेड-जीवन ही सरल जीवन है। इसे पहचानने का रास्ता है: सजगता। सजगता का अर्थ है:अवेयरनेस,होश,भान,आत्मभान। जिस व्यक्ति का आत्मभान जितना जागृत होगा वह उतना ही सरल और अखंड हो जाता है। आत्मभान का क्या अर्थ है? होश का क्या अर्थ है? आत्मभान या अमूर्च्छा या अप्रमाद का अर्थ है--जीवन के जितने भी अनुभव हैं उनके साथ एक न हो जाएं;उनसे दूर बनें रहें,उनके द्रष्टा बनें रहें। जैसे मैं इस भवन में बैठा हूं। प्रकाश जला दिया जाए तो भवन में प्रकाश भर जाएगा। प्रकाश मुझे घेर लेगा। दो भूलें मैं कर सकता हूं। यह भूल कर सकता हूं कि मैं समझ लूं कि मैं प्रकाश हूं,क्योंकि प्रकाश कमरे में भरा हुआ है। फिर प्रकाश बुझा दिया जाए तो अंधकार आ जाएगा। फिर मैं यह भूल कर सकता हूं कि मैं अंधकार हूं। यह भूल है। क्यों? क्योंकि प्रकाश आया तब भी मैं यहां था;प्रकाश चला गया तब भी मैं यहां यहां था। अंधकार आया तब भी मैं यहां हूं। अंधकार चला जाए तब भी मैं यहां रहूंगा। तो मेरा जो मैं है,वह न तो प्रकाश है,न अंधकार है। सुख आते हैं,चले जाते हैं। दु:ख आते हैं,चले जाते हैं। सम्मान मिलता है,चला जाता है। अपमान मिलता है,चला जाता है।  जो आता है और चला जाता है,वह मैं नहीं हो सकता। 

तो जीवन के प्रत्येक अनुभव में,घृणा में,अशांति में,शांति में,सुख में,दु:ख में,मान में,सम्मान में--यह स्मरण,यह स्मृति कि जो भी घटित हो रहा है वह मैं नहीं हूं,मैं केवल उसका देखने वाला हूं--मैं देख रहा हूं कि अपमान किया जा रहा है और मैं देख रहा हूं कि सम्मान किया जा रहा है,और मैं देख रहा हूं कि दु:ख आया और मैं देख रहा हूं कि सुख आया और मैं देखता हूं कि रात हुई और मैं देखता हूं कि दिन हुआ। सूरज उगा और सूरज डूबा। मैं केवल देखने वाला हूं। मैं केवल साक्षी हूं। जो हो रहा है उससे मेरा इससे ज्यादा कोई संबंध नहीं कि मैं देख रहा हूं। अगर क्रमश: यह स्मृति और यह भान विकसित होने लगे कि मैं केवल देखने वाला हूं तो धीरे-धीरे आप पाएंगे कि आपकी अखंडता आ रही है और खंडता जा रही है। खंड होना बंद हो जाएगा। खंड-खंड वे होते हैं,जो किसी दृश्य को देखते ही उस के साथ एक हो जाते हैं। इसलिए द्रष्टा यदि दृश्य के साथ एक हो जाए तो जीवन खंड हो जाता है। द्रष्टा दृश्य से अलग हो जाए तो जीवन अखंड हो जाता है। 

सारा योग,सारे धर्म,सारे मार्ग,सारी पद्धतियां जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुंचाती हैं,बुनियादी रूप से इस बात पर खड़ी हैं कि मनुष्य अपनी चेतना को साक्षी समझ ले। मनुष्य केवल दर्शक मात्र रह जाए। लेकिन हम तो अजीब पागल लोग हैं। हम तो नाटक देखें या फिल्म देखें वहां भी दृश्य ही रह जाते हैं। वहां भी हम भोक्ता हो जाते हैं। अगर नाटक में कोई दु:ख का दृश्य आता है तो हमारी आंखों से आंसू बहने लगता है। हम द्रष्टा नहीं रह गए,हम भोक्ता बन गए। हम सम्मिलित हो गए नाटक में। हम नाटक के पात्र हो गए। नाटकगृह में बैठकर ऐसे बहुत कम लोग हैं,जो नाटक के पात्र न हो जाएं। कोई रोने लगता है,कोई हंसने लगता है,कोई दुखी और प्रसन्न हो जाता है। वह जो मंच पर हो रहा है या पर्दे पर हो रहा है,जहां कि विद्युत घरों के सिवा और रोशनी के खेल के सिवा कुछ भी नहीं है,वहां भी रोना,दुखी होना और पीड़ित होना आपके भीतर शुरु हो जाता है। आपको आदत पड़ी है कि दृश्य के साथ एक हो जाएं। धर्म कहता है कि जीवन का जो दृश्य है वहां भी एक न रह जाएं और हम ऐसे पागल हैं कि नाटक के जो दृश्य होते हैं वहां भी एक हो जाते हैं। जीवन का जो बृहत्तर नाटक चल रहा है;वह नाटक से ज्यादा नहीं है। क्यों हम उसे कह कह रहें हैं कि नाटक से ज्यादा नहीं है? इसलिए नहीं कि उसके मूल्य को कम करना चाहते हैं,बल्कि इसलिए कि उसका जो ठीक-ठीक मूल्य है वही आंकना चाहते हैं।

सुबह मैं जागता हूं तो जो देखता हूं वह सच मालूम होने लगता है और रात में सोता हूं तो जो सपना होता है वह सच मालूम होने लगता है। सपने में जाते हैं तो संसार झूठा हो जाता है। सब भूल जाता हूं,कुछ याद नहीं रहता। और सपने के बाहर आते हैं, तो संसार सच हो जाता है और सपना झूठा हो जाता है। इसलिए जो जानते हैं, वह इस यात्रा में एक सपने से दूसरे सपने में आते हैं और फिर मृत्यु में सब सपना हो जाता है। अभी पीछे उलटकर देखें अपने जीवन को,तो जो जाना था और देखा था,क्या ठीक-ठीक याद पड़ते हैं कि वह सपने में देख रहा था या सच में देख रहा था? सिवा स्मृति के और क्या निशान रह गए हैं? पीछे लौटकर अगर कोई मृत्यु के कगार पर देखे तो क्या उसे याद पड़ेगा कि जो मैंने जीवन में जाना वह सच था या सपना था;क्योंकि निशान कहां हैं? केवल स्मृति में रह गए हैं। सपना भी स्मृति में निशान छोड़ जाता है और संसार भी,और अगर स्मृति/पहचान न रह जाए तो दोनों मिट जाएंगे।

एक आदमी ट्रेन से गिर पड़ा था। ट्रेन से गिरते ही उसकी स्मृति विलीन हो गई। फिर उसने पहचानना बंद कर दिया था--कोन उसकी पत्नी है,कौन उसका पिता है। मैं उससे मिलने गया तो वह मुझे नहीं पहचान सका। क्या हो गया? स्मृति विलीन हो गई। उसे सपने भी भूल गए,जो उसने पहले देखे थे,और वह जिंदगी भी भूल गई जो उसने देखी थी; जिसकी रेखाएं केवल स्मृति पर रह जाती हैं। और स्मृति के न रहने से जिसका सब मिट जाए उसे सपने से ज्यादा क्या कहेंगे? जो केवल स्मृति में है उसे सपने से ज्यादा और कहने का प्रयोजन क्या है? और मौत सब स्मृति पोंछ देती है और सब जो जाना था,जो जिया था वह सपना हो जाता है। यह जो जगत का बड़ा सपना है,इस सपने के प्रति बोध और सजगता चाहिए।

यह जानना कि जो मैं देख रहा हूं,वह दृश्य है और मैं अलग हूं,मैं पृथक और भिन्न हूं। सुबह से शाम तक,उठते-बैठते,सोते- जागते,बोलते-चुप रहते,खाते-पीते,चलते-फिरते हर वक्त धीमे-धीमे इस स्मरण को गहरा करना होगा कि मैं अलग हूं; जो हो रहा है वह अलग है। धीरे-धीरे वह घड़ी आएगी,जब आप अपने भीतर एक अलग चेतना की ज्योति का अनुभव करेंगे जो सारे अनुभवों से पृथक है और तब जीवन एकदम सरल हो जाएगा। तब आप पाएंगे,आप एकदम सरल हो गए हैं,एकदम इनोसेंट--जैसे छोटे बच्चे। और छोटा बच्चा हुए बिना कोई उपलब्धि नहीं है। बूढ़े जब बच्चे हो जाते हैं तभी वे परमात्मा को पा लेते हैं। इतनी सरलता सजगता से उत्पन्न हो सकती है।

सोमवार, 4 जून 2012

अखंड का बोध

एक भारतीय साधु सारी दुनिया की यात्रा करके वापस लौटा था। वह भारत आया और हिमालय की एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ। उस रियासत के राजा ने साधु के पास जाकर कहा,"मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं। मैंने बहुत से लोगों के प्रवचन सुने हैं,बहुत सी बातें सुनी हैं,सब मुझे बकवास मालूम होती है। मुझे नहीं मालूम होता है कि ईश्वर है और जब भी साधु-संन्यासी मेरे गांव में आते हैं,तब उनके पास जाता हूं और उनसे पूछता हूं। अब मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि ईश्वर के संबंध में मुझे कोई व्याख्यान नहीं सुनने हैं,मैंने काफी सुन लिए हैं। तो आपसे यह पूछने आया हूं कि अगर ईश्वर है,तो मुझे मिला सकते हैं?"

वह संन्यासी बैठा चुपचाप सुन रहा था। वह बोला-"अभी मिलना है या थोड़ी देर ठहर सकते हो?" राजा एकदम अवाक् रह गया। उसको आशा नहीं थी कि कोई आदमी कहेगा कि अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर सकते हैं। राजा ने समझा कि समझने में भूल हो गई होगी। संन्यासी कुछ गलत समझ गया है। राजा ने दोबारा कहा-"शायद आप ने ठीक से नहीं समझा। मैं ईश्वर की बात कर रहा हूं,परमेश्वर की।" संन्यासी ने कहा-मैं तो उसके सिवा किसी की बात ही नहीं करता। अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं?"

उस राजा ने कभी नहीं सोचा था कि वह ऐसा पूछेगा,तो क्या उत्तर दूंगा? उसने कहा-"आप कहते हैं तो मैं अभी ही मिलना चाहता हूं।" संन्यासी ने कहा,"तो एक काम करें; यह कागज है,इस पर थोड़ा लिख दें कि आप कौन हैं,ताकि परमात्मा तक खबर भेज दूं। क्योंकि यह तो आप मानेंगे ही कि जो आपसे भी कोई मिलने आता है,तो आप पूछ लेते हैं कौन है,क्या है?" राजा ने कहा,"यह तो ठीक है। यह तो नियमबद्ध है।" उसने अपने राज्य और भवन का पता उस संन्यासी को दिया।

वह संन्यासी हंसने लगा और उसने कहा,"दो तीन बातें पूछनी जरूरी हो गई हैं। इस कागज में जो भी आपने लिखा है,वह असत्य है।" तब राजा बोला-"असत्य! आप क्या पागलपन की बात कर रहें हैं! मैं राजा हूं और जो नाम मैंने लिखा है,वही मेरा नाम है।" संन्यासी ने कहा,"मुझे तो बिलकुल ही असत्य मालूम होता है। आप न राजा हैं और न आपने जो नाम लिखा है वह आपका है।" वह राजा बोला-"आप अजीब आदमी मालूम होते हैं। पहले तो आपने कहा कि ईश्वर से अभी मिला दूंगा। वह भी मुझे पागलपन की बात मालूम पड़ी। और दूसरे यह कि अब मैं कह रहा हूं कि मैं इस क्षेत्र का राजा हूं,मेरा यह नाम है,तो उससे इनकार करते हैं।"

संन्यासी ने कहा-"थोड़ा सोचें। अगर आपका नाम दूसरा हो तो क्या फर्क पड़ जाएगा? आपके मां-बाप ने 'आ' नाम दे दिया और यदि मैं 'बा' नाम दे देता,तो क्या फर्क पड़ जाता? आप जो थे,वही रहते कि बदल जाते? आपको अगर हम दूसरा नाम दे दें तो आप बदल जाएंगे?" उस राजा ने कहा-"नाम बदलने से मैं कैसे बदलूंगा?" संन्यासी ने कहा-"जिस नाम के बदलने से आप नहीं बदलते,निश्चित ही नाम कुछ और है,आप कुछ और हैं। आज आप उस नाम से अलग हैं और फिर आप राजा हैं,कल अगर इसी गांव में भिखारी हो जाएं तो बदल जाएंगे? फिर आप-आप नहीं रहेंगे?" राजा बोला-"मैं तो फिर भी रहूंगा। राज्य नहीं रहेगा,धन नहीं रहेगा,राजा नहीं रहेंगे,भिखारी हो जाऊंगा,मेरे पास कुछ नहीं रहेगा,लेकिन मैं तो जो हूं वही रहूंगा।" 

संन्यासी बोला-"फिर राजा होने का कोई मतलब नहीं रहा। फिर आपकी सत्ता से उसका कोई संबंध नहीं। वह तो ऊपरी खोल है,बदल जाए तो भी नहीं बदलेंगे। यह कपड़े मैं पहने हूं तो मैं यह थोड़े कहूंगा कि यह कपड़ा मैं हूं। क्यां नहीं कहूंगा? क्योंकि कपड़े दूसरे पहन लूं तब भी मैं मैं ही बना रहूंगा।" संन्यासी ने फिर कहा,"फिर राजा होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह आपका परिचय नहीं हुआ,क्योंकि जो परिचय आपने दिया है,उसके बदल जाने पर भी आप नहीं बदलते हैं। अत: आपका परिचय कुछ और होना चाहिए,जिसके बदलने पर आप न बदल जाएं,वही आप हो सकते हैं। और जब तक आप वह परिचय न देंगे तो मैं कैसे परमात्मा को कहूं कि कौन मिलने आया है,किसको मिलाऊं? परमात्मा तो मौजूद है,लेकिन मिलाऊँ किसको। मिलने वाला मौजूद नहीं है। क्योंकि मिलने वाला बंटा हुआ है-बहुत से टुकड़ों में खंडों में। वह इकट्ठा नहीं है,वह राजी नहीं है,वह खड़ा नहीं है। कौन है जो मिलना चाहता है? आप ईश्वर को खोजते हैं,लेकिन कौन हैं आप?"

अपने खंडों को इकट्ठा करना होगा। कैसे वे खंड इकट्ठे होंगे,क्योंकि अगर सच में खंड हो गए हैं तो कैसे इकट्ठे होंगे? कितने ही उनको पास लाएं तब भी वे खंड बने रहेंगे। अगर सच में ही आप खंडित हैं तो फिर अखंड नहीं हो सकते। क्योंकि खंडों को कितने ही करीब लाओ उनके बीच फिर भी फासला बना रहेगा। वैज्ञानिक कहते हैं कि दो अंगों को कितने ही करीब लाओ,फिर भी फासला दोनों के बीच बना ही रहेगा। यह ठीक ही कहते हैं,क्योंकि कितने ही करीब लाओ,बीच में फासला होगा ही। यदि फासला न हो तो दोनों एक ही हो जाएंगे। तो खंडों को कितने भी करीब लाओ अखंड नहीं बन सकते हैं,खंडों का जोड़ ही होगा।

इसका अर्थ है कि आप वस्तुत: अखंड हैं। खंड होना आपका भ्रम है। भ्रम टूट सकता है और आप इसी क्षण अखंडता को पा सकते हैं। आप खंडित हो नहीं गए हैं,खंडित मालूम हो रहे हैं। मैं एक पहाड़ पर गया था और वहां एक महल में लोग मुझे ले गए थे। एक बड़ा गुंबज था और उस गुंबज में कांच के छोटे-छोटे लाखों टुकड़े लगे थे। मैं वहां खड़ा हुआ। मुझे लाखों अपनी तस्वीरें दिखाई पड़ने लगी,टुकड़े-टुकड़े में। और फिर हमने वहां दिया जलाया तो लाख दीए जलने लगे-कांच के टुकड़े-टुकड़े में। अब अगर उस दिए को न देखूं जिसको हाथ में लिए हूं और उन कांच पर प्रतिबिंबित हजारों दीयों को देखूंगा तो मैं समझूंगा कि इस भवन में लाखों दीए जल रहे हैं और अगर मैं हाथ के दिए को देखूं तो मैं पाऊंगा कि एक ही दिया जल रहा है। 

जो व्यक्ति अपने अनुभव के दर्पण में,अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के दर्पण में क्षण-क्षण प्रवाही जीवन के दर्पण में अपनी तस्वीर को देखता है,उसे हजार-हजार टुकड़े खुद के मालूम होंते हैं। और अगर वह उनको न देखे,उसको देखे जो पीछे बैठा है,सबके अनुभवों में नहीं बल्कि अनुभोक्ता में;दृश्यों में नहीं बल्कि द्रष्टा में;जो चारों तरफ घटित हो रहा है उसमें नहीं जिसके ऊपर घटित हो रहा है उसमें,तो पाएंगे वह एक है और वहां अखंडता है। चित्त अनेक हैं,चेतना एक है। चित्त प्रतिफलित है,चेतना एक है। जिसका प्रतिफलन है उसे पकड़ना होगा। अगर उसे पकड़ने में हम समर्थ हो जाएं तो जीवन एकदम सरल हो जाएगा।