रविवार, 24 जून 2012

शून्यता

( ध्यानमय जीवन के लिए अब तक हमने पिछली पोस्टों में सरलता,सजगता की बात की है। आज की इस पोस्ट में प्रस्तुत है ध्यानमय जीवन  का तीसरा सूत्र: शून्यता) 

तीसरा सूत्र है: शून्यता। जितना शून्य होंगे उतनी सजगता गहरी होगी। सरलता उत्पन्न होती है सजगता से     और सजगता उत्पन्न होती है शून्यता से। शून्यता चरम बिंदु है। शून्यता साधना का केंद्र बिंदु है। शून्य हो जाएं। शून्य होने का मतलब है जो हो रहा है चारों तरफ, उसके प्रति मरना सीखें।

एक छोटी सी कहानी कहूं तो शायद समझ आ जाए। जापान  में एक संन्यासी हुआ। एक ऐसा दरिद्र भिखारी,जो टोकियो राजधानी में एक नीम के झाड़ के नीचे पड़ा रहता था। वर्ष आए और गए,वह वहीं पड़ा रहा। लाखों हजारों लोग उसे मानते थे और उसे श्रद्धा देते थे। स्वयं बादशाह भी उसे श्रद्धा देता था और उसका आदर करता था। एक दिन बादशाह आया और उसके चरण छुए और कहा कि कृपा करें,मेरे महल में चलें। यहां पड़े रहने से क्या? बरसात भी है,शरीर आपका वृद्ध हो गया है,धूप आती है,तकलीफ होती है,सर्दी आती है। मुझ पर कृपा करें और तुरंत मेरे महल में चलें।

साधु ने अपनी चटाई लपेटी और खड़ा हो गया। राजा बहुत हैरान हुआ। साधु इतनी जल्दी तैयार हो गया! कैसा साधु है,कैसा संन्यासी है? एक दफ़ा भी ऐसा नहीं कहा कि यह संसार सब माया है,महल से क्या लेना-देना है। हमने तो लात मार दी। हम तो झोंपड़े में रहने वाले फकीर है,हम तो मग्न रहते हैं,हमको क्या मतलब? ऐसा कहता तो मालूम पड़ता कि संन्यासी है। और जिन-जिन को संन्यासी मालूम पड़ना हो,उन को ऐसा कहना पड़ता है।

वह संन्यासी तो खड़ा हो गया। उसने कहा,महाराज चलें। वह तो आगे हो गया और बादशाह बहुत चिंतित हुआ। बड़े उत्साह से लेने गया था,लेकिन चित्त एकदम फीका हो गया कि किस आदमी को ले जा रहा हूं। यह भी गलती हो गई। यह तो धोखा हो गया। लेकिन जब खुद ही आमंत्रण दिया था,खुद ही बुलाया था,इसलिए इंकार भी बीच रास्ते में कैसे करे। महल में ले गया,बड़ी अच्छी व्यवस्था की थी। जो व्यवस्था स्वयं राजा की थी,वैसी ही व्यवस्था उसकी थी।

लेकिन राजा का संदेह प्रतिक्षण बढ़ने लगा। जो जो दिया,उसने स्वीकार कर लिया और जो शाही बिस्तरे दिए उन पर सो गया। नौकर-चाकर दिए,उनकी सेवाएं अंगीकार कर ली। राजा तो हैरान हुआ कि यह आदमी कैसा है? यह तो बिलकुल ही गलत आदमी मालूम होता है। क्या यह उसकी प्रतीक्षा में ही बैठा हुआ था? क्या सब ढ़ोंग था,धोखा था? यह सारी फकीरी क्या बरसों से प्रतीक्षा कर रही थी कि राजा कब आमंत्रण दे और मैं चलूं। रात मुश्किल में बीती। संन्यासी तो मजे से सोया पर राजा नहीं सो सका। सुबह होते ही राजा ने कहा कि संत जी,बड़ी शंका मन में उठी है। जब तक निवारण न हो, मैं बड़ी दिक्कत में पड़ गया हूं। एक शंका उठी है,उसे प्रकट करने की आज्ञा दें।

संन्यासी हंसने लगा। उसने कहा-तुम्हें शंका अब प्रकट हुई? मुझे वहीं हो गई थी। जैसे ही मैं खड़ा हुआ, मैं समझा तुमने निमंत्रण वापस ले लिया। फिर तो मजबूरी से यहां तक ले आए हो। पूछ लो,शंका का निवारण कर लो। राजा ने कहा कि रात मैं यही सोचता रहा कि आप कैसे संन्यासी हैं? संन्यासी ने कहा कि थोड़ा एकांत होगा तो सरलता होगी बतलाने में। राजा ने कहा भेद तो जानना ही है। मुझमें और आपमें क्या भेद रहा,इस रात? कल तक तो भेद था। आप नीम के नीचे थे,भिखारी थे, भिखमंगे थे। खाने के बर्तन को सिर के नीचे रखकर सो जाते थे। मैं महल में था तो राजा था,आप भिखमंगे थे कल तक;तो बहुत भेद था। आप संन्यासी थे,मैं भोगी था। लेकिन आज रात कोई भेद मुझे दिखाई नहीं पड़ता। संन्यासी खूब हंसने लगा। और कोई भी संन्यासी हंसेगा,क्योंकि अगर भेद इतना ही है कि एक के पास बहुत बिस्तर हैं और एक के पास बहुत बिस्तर नहीं हैं; एक दरख्त के नीचे सोता है और एक महलों में। अगर भेद इतना ही हो,तो संन्यास और संसार में भेद किस मूल्य का हुआ? कोई भेद है ही नहीं।

संन्यासी बहुत हंसा। उसने कहा कि गांव के बाहर चलें। वे दोनों गांव के बाहर गए। बार-बार थोड़ी-थोड़ी दूर पर राजा पूछने लगा,उत्तर दे दें। अब तो गांव से बाहर आ गए। संन्यासी ने कहा,थोड़ा और आगे,थोड़ा और आगे। दोपहर हो गई। सूरज ऊपर आ गया तो राजा ने कहा-क्या कर रहें हैं! आपको उत्तर देना है कि नहीं? यह और आगे से क्या मतलब होगा? संन्यासी ने कहा,और आगे ही उसका उत्तर है। अब मैं आगे ही जाऊंगा,पीछे नहीं लौटूंगा। आप भी मेरे साथ चलते हैं। राजा ने कहा-मैं कैसे चल सकता हूं? पीछे मेरा महल,मेरा राज्य है। संन्यासी ने कहा-पीछे न मेरा महल है न मेरा राज्य है और इतना ही भेद है। जब रात तुम्हारे भवन में मैं सोया तो मैं बिल्कुल उतना ही शून्य था जितना जब मैं नीम के नीचे सोता था। इतना ही भेद है। इसे स्मरण रखें,इसे हृदय के किसी कोने में बैठ जाने दें। इतना ही भेद है कि जब तुम्हारे महल में सोया उतना शून्य था जितना जब मैं नीम के नीचे सोता था। मेरी शून्यता वही थी,वही भेद है,तुम्हारे भीतर शून्यता नहीं है। जो तुम्हारे पास आता है उसी से तुम भर जाते हो। महल से भरे हुए हो। तुम कहते हो पीछे मेरा महल है,तुम कहते हो पीछे मेरा राज्य है। तुम जब मरोगे तब भी कहोगे कि पीछे मेरा सब कुछ गया। तुम रोते हो कि कहां मुझे लिए जा रहे हो। और मैं जब मरूंगा तो ऐसा ही चला जाऊंगा आगे,क्योंकि मेरे पीछे कुछ भी नहीं है। पीछे वही है जो भीतर हो और जो भीतर न हो वह पीछे भी नहीं है। बाहर भी वही है जो भीतर हो। जो भीतर न हो बाहर भी कुछ नहीं है। जो शून्य हो जाते हैं,उनके लिए संसार मोक्ष हो जाता है। जो शून्य हो जाते हैं उनके लिए संसार परमात्मा हो जाता है। जो शून्य हो जाते हैं उनके लिए यहीं सब कुछ उतर आता है,जिसकी आपको तलाश और खोज है। लेकिन शून्य हो जाना जरूरी है।

क्यों? क्योंकि जब वर्षा का पानी गिरता है और आकाश में मेघ इकट्ठे होते हैं और बूंदे बरसती हैं तो वह पानी की बूंदे टीलों पर या पहाड़ों पर इकट्ठी नहीं होती,गड्ढ़ों में इकट्ठी हो जाती हैं। जो टीले की भांति हैं,जिनका अहंकार उठा हुआ है,उन पर पानी तो गिरेगा लेकिन बहकर नीचे निकल जाएगा,इकट्ठा नहीं होगा। और जो गड्ढ़ों की भांति खाली और शून्य हैं उनमें भर जाएगा। जो शून्य है,वह ग्रहण करता है परमात्मा को और जो भरा है संसार से वह इंकार कर देता है,अस्वीकार कर देता है।

द्वार खोलना है तो शून्य हो जाएं। भीतर बिल्कुल खाली हो जाएं। जैसे वहां कुछ न हो। सामान वहां इकट्ठा न करें। फर्निचर अपने घर में लाएं, पर उसे अपने भीतर न लाएं। चीजें अपने बाहर लाएं लेकिन भीतर न लाएं। बाहर सब होने दें लेकिन भीतर खाली रहने दें। रोज सांझ को जो इकट्ठा किया उसे बाहर कर दें। झाड़ लें अपने को। बिलकुल साफ कर लें अपने को।


4 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी द्वारा बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। यह शून्यता कैसे उपजे इस पार काम किया जाना चाहिए।

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  2. आभार | बहुत दिन बाद यहाँ ई हूँ | फिर से बहुत अच्छा लगा यहाँ आ कर |

    ओशो को मैं भी बहुत पढ़ती हूँ - उनका नजरिया और फिलोसोफी बहुत पसंद हैं मुझे |

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  3. प्रेरक कथा जो शून्य के दर्शन करा देती है. शेष है उसे साधना जो व्यावहारिक कार्य/साधना है. बहुत बढि़या पोस्ट.

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  4. बहुत संतोष मिला यहाँ आ कर- यह प्रेरक कथा पढ़ कर!

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