शुक्रवार, 8 जून 2012

सजगता से सरलता : साक्षी की साधना

अखंड जीवन ही सरल जीवन है। समग्र-इन्टीग्रेटेड-जीवन ही सरल जीवन है। इसे पहचानने का रास्ता है: सजगता। सजगता का अर्थ है:अवेयरनेस,होश,भान,आत्मभान। जिस व्यक्ति का आत्मभान जितना जागृत होगा वह उतना ही सरल और अखंड हो जाता है। आत्मभान का क्या अर्थ है? होश का क्या अर्थ है? आत्मभान या अमूर्च्छा या अप्रमाद का अर्थ है--जीवन के जितने भी अनुभव हैं उनके साथ एक न हो जाएं;उनसे दूर बनें रहें,उनके द्रष्टा बनें रहें। जैसे मैं इस भवन में बैठा हूं। प्रकाश जला दिया जाए तो भवन में प्रकाश भर जाएगा। प्रकाश मुझे घेर लेगा। दो भूलें मैं कर सकता हूं। यह भूल कर सकता हूं कि मैं समझ लूं कि मैं प्रकाश हूं,क्योंकि प्रकाश कमरे में भरा हुआ है। फिर प्रकाश बुझा दिया जाए तो अंधकार आ जाएगा। फिर मैं यह भूल कर सकता हूं कि मैं अंधकार हूं। यह भूल है। क्यों? क्योंकि प्रकाश आया तब भी मैं यहां था;प्रकाश चला गया तब भी मैं यहां यहां था। अंधकार आया तब भी मैं यहां हूं। अंधकार चला जाए तब भी मैं यहां रहूंगा। तो मेरा जो मैं है,वह न तो प्रकाश है,न अंधकार है। सुख आते हैं,चले जाते हैं। दु:ख आते हैं,चले जाते हैं। सम्मान मिलता है,चला जाता है। अपमान मिलता है,चला जाता है।  जो आता है और चला जाता है,वह मैं नहीं हो सकता। 

तो जीवन के प्रत्येक अनुभव में,घृणा में,अशांति में,शांति में,सुख में,दु:ख में,मान में,सम्मान में--यह स्मरण,यह स्मृति कि जो भी घटित हो रहा है वह मैं नहीं हूं,मैं केवल उसका देखने वाला हूं--मैं देख रहा हूं कि अपमान किया जा रहा है और मैं देख रहा हूं कि सम्मान किया जा रहा है,और मैं देख रहा हूं कि दु:ख आया और मैं देख रहा हूं कि सुख आया और मैं देखता हूं कि रात हुई और मैं देखता हूं कि दिन हुआ। सूरज उगा और सूरज डूबा। मैं केवल देखने वाला हूं। मैं केवल साक्षी हूं। जो हो रहा है उससे मेरा इससे ज्यादा कोई संबंध नहीं कि मैं देख रहा हूं। अगर क्रमश: यह स्मृति और यह भान विकसित होने लगे कि मैं केवल देखने वाला हूं तो धीरे-धीरे आप पाएंगे कि आपकी अखंडता आ रही है और खंडता जा रही है। खंड होना बंद हो जाएगा। खंड-खंड वे होते हैं,जो किसी दृश्य को देखते ही उस के साथ एक हो जाते हैं। इसलिए द्रष्टा यदि दृश्य के साथ एक हो जाए तो जीवन खंड हो जाता है। द्रष्टा दृश्य से अलग हो जाए तो जीवन अखंड हो जाता है। 

सारा योग,सारे धर्म,सारे मार्ग,सारी पद्धतियां जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुंचाती हैं,बुनियादी रूप से इस बात पर खड़ी हैं कि मनुष्य अपनी चेतना को साक्षी समझ ले। मनुष्य केवल दर्शक मात्र रह जाए। लेकिन हम तो अजीब पागल लोग हैं। हम तो नाटक देखें या फिल्म देखें वहां भी दृश्य ही रह जाते हैं। वहां भी हम भोक्ता हो जाते हैं। अगर नाटक में कोई दु:ख का दृश्य आता है तो हमारी आंखों से आंसू बहने लगता है। हम द्रष्टा नहीं रह गए,हम भोक्ता बन गए। हम सम्मिलित हो गए नाटक में। हम नाटक के पात्र हो गए। नाटकगृह में बैठकर ऐसे बहुत कम लोग हैं,जो नाटक के पात्र न हो जाएं। कोई रोने लगता है,कोई हंसने लगता है,कोई दुखी और प्रसन्न हो जाता है। वह जो मंच पर हो रहा है या पर्दे पर हो रहा है,जहां कि विद्युत घरों के सिवा और रोशनी के खेल के सिवा कुछ भी नहीं है,वहां भी रोना,दुखी होना और पीड़ित होना आपके भीतर शुरु हो जाता है। आपको आदत पड़ी है कि दृश्य के साथ एक हो जाएं। धर्म कहता है कि जीवन का जो दृश्य है वहां भी एक न रह जाएं और हम ऐसे पागल हैं कि नाटक के जो दृश्य होते हैं वहां भी एक हो जाते हैं। जीवन का जो बृहत्तर नाटक चल रहा है;वह नाटक से ज्यादा नहीं है। क्यों हम उसे कह कह रहें हैं कि नाटक से ज्यादा नहीं है? इसलिए नहीं कि उसके मूल्य को कम करना चाहते हैं,बल्कि इसलिए कि उसका जो ठीक-ठीक मूल्य है वही आंकना चाहते हैं।

सुबह मैं जागता हूं तो जो देखता हूं वह सच मालूम होने लगता है और रात में सोता हूं तो जो सपना होता है वह सच मालूम होने लगता है। सपने में जाते हैं तो संसार झूठा हो जाता है। सब भूल जाता हूं,कुछ याद नहीं रहता। और सपने के बाहर आते हैं, तो संसार सच हो जाता है और सपना झूठा हो जाता है। इसलिए जो जानते हैं, वह इस यात्रा में एक सपने से दूसरे सपने में आते हैं और फिर मृत्यु में सब सपना हो जाता है। अभी पीछे उलटकर देखें अपने जीवन को,तो जो जाना था और देखा था,क्या ठीक-ठीक याद पड़ते हैं कि वह सपने में देख रहा था या सच में देख रहा था? सिवा स्मृति के और क्या निशान रह गए हैं? पीछे लौटकर अगर कोई मृत्यु के कगार पर देखे तो क्या उसे याद पड़ेगा कि जो मैंने जीवन में जाना वह सच था या सपना था;क्योंकि निशान कहां हैं? केवल स्मृति में रह गए हैं। सपना भी स्मृति में निशान छोड़ जाता है और संसार भी,और अगर स्मृति/पहचान न रह जाए तो दोनों मिट जाएंगे।

एक आदमी ट्रेन से गिर पड़ा था। ट्रेन से गिरते ही उसकी स्मृति विलीन हो गई। फिर उसने पहचानना बंद कर दिया था--कोन उसकी पत्नी है,कौन उसका पिता है। मैं उससे मिलने गया तो वह मुझे नहीं पहचान सका। क्या हो गया? स्मृति विलीन हो गई। उसे सपने भी भूल गए,जो उसने पहले देखे थे,और वह जिंदगी भी भूल गई जो उसने देखी थी; जिसकी रेखाएं केवल स्मृति पर रह जाती हैं। और स्मृति के न रहने से जिसका सब मिट जाए उसे सपने से ज्यादा क्या कहेंगे? जो केवल स्मृति में है उसे सपने से ज्यादा और कहने का प्रयोजन क्या है? और मौत सब स्मृति पोंछ देती है और सब जो जाना था,जो जिया था वह सपना हो जाता है। यह जो जगत का बड़ा सपना है,इस सपने के प्रति बोध और सजगता चाहिए।

यह जानना कि जो मैं देख रहा हूं,वह दृश्य है और मैं अलग हूं,मैं पृथक और भिन्न हूं। सुबह से शाम तक,उठते-बैठते,सोते- जागते,बोलते-चुप रहते,खाते-पीते,चलते-फिरते हर वक्त धीमे-धीमे इस स्मरण को गहरा करना होगा कि मैं अलग हूं; जो हो रहा है वह अलग है। धीरे-धीरे वह घड़ी आएगी,जब आप अपने भीतर एक अलग चेतना की ज्योति का अनुभव करेंगे जो सारे अनुभवों से पृथक है और तब जीवन एकदम सरल हो जाएगा। तब आप पाएंगे,आप एकदम सरल हो गए हैं,एकदम इनोसेंट--जैसे छोटे बच्चे। और छोटा बच्चा हुए बिना कोई उपलब्धि नहीं है। बूढ़े जब बच्चे हो जाते हैं तभी वे परमात्मा को पा लेते हैं। इतनी सरलता सजगता से उत्पन्न हो सकती है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. यहां से मुझे बहुत ही आध्यात्मिक लाभ हो रहे हैं। इन विधियों को अपना भी रहा हूं।

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  2. Great philosophies of life can be well understood by the life style of small, innocent kids. Their pure and pious heart teaches us all.

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