रविवार, 8 अगस्त 2010

भारत दुर्दशा

भारत गाँवों में बसता है । यह तथ्य आज भी उतना ही सही है जितना कि आजादी से पहले । अभी राजस्थान के कुछ गाँवों और एक दो छोटे शहरों में जाना हुआ । तो पाया कि शहरी और ग्रामीण जीवन में बहुत असमानताएँ हैं । भारत के बड़े शहरों में जन जीवन की सामान्य सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं । लेकिन गाँवों व छोटे कस्बों में जन जीवन को सामान्य सुविधाओं के लिए बड़ा श्रम करना पड़ता है । मैंने देखा कि गाँवों में पीने के पानी की समस्या आम है । खेतड़ी (ताँबे की खानों के लिए प्रसिद्ध) सिंघाना, नारनौल जैसे छोटे शहर में पानी की किल्लत है । घर के सदस्यों विशेषत: गृहणियों व बच्चों को सुबह-सुबह घर के बाहर पानी के लिए घंटों श्रम करना पड़ता है । सुबह-सुबह का यह नजारा हर घर को पनघट में बदल देता है । पानी बहुत कम समय के लिए आता है और वह भी अनियमित । छोटे बच्चे स्कूल जाने के बजाय पानी भरते नजर आते हैं । गाँवों में भी स्थिति ऐसी ही है । पानी की सप्लाई या तो बंद है या बहुत कम समय के लिए । पानी टैंकरों से मोल खरीदा जा रहा है ।

स्कूलों के लिए बने भवनों की हालत जर्जर है ,वहीं कुछ स्कूल खुले में भी चल रहें हैं । अध्यापकों की कमी तो स्कूलों की आम समस्या है । स्कूलों में बच्चों व अध्यापकों का ध्यान पढ़ाई की ओर कम और दोपहर के भोजन की तैयारी की ओर अधिक रहता है ।

हमारे कल के भविष्य, गाँवों में बसने वाले बच्चों का भविष्य अंधकारमय लगता है । बहुत कम बच्चे हैं जो इन ग्रामीण परिस्थितियों का सामना करते हुए मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते हैं । उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले ग्रामीण लोगों का प्रतिशत तो बहुत ही कम है । फिर इनकी शिक्षा हिंदी माध्यम से होने के कारण, ये शहरी कान्वेन्ट स्कूलों में पढ़े बच्चों के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ जाते हैं और रोजगार की तलाश में भटकते-भटकते ओवर-एज़ हो जाते हैं ।

हमारा वास्तविक भारत जो गाँवों में बसता है, उसकी परवाह किसे हैं ? क्या गाँव व छोटे शहरों की इन समस्याओं की ओर प्रशासन व सरकार का ध्यान नहीं है ? या फिर हमारा ग्रामीण नागरिक इन समस्याओं से झूझने के लिए यूं ही मजबूर बना रहेगा । सचमुच भारत के गाँवों में लोग जिन हालातों में रह रहें हैं वह बहुत ही सोचनीय है और भारत की दुर्दशा को ब्यां कर रहा है ।


2 टिप्‍पणियां:

  1. वस्तुत: ग्राम-दुर्दशा ही भारत दुर्दशा है। जो लोग गाँव छोड़कर शहरों में आ गये हैं किन्तु ठीक-ठाक कमाई नहीं है उनकी दशा तो गाँव में रहने वालों से भी बुरी है।

    देश के कर्णधारों को ऐसी नीति खोजनी पड़ेगी जिससे सबको समुचित काम मिल सके ; सभी कुछ न कुछ ' निर्माण ' कर सकें । इसके साथ-साथ उनकी आजीविका सुनिश्चित हो ; वे चिन्तामुक्त होकर काम कर सकें और देश के विकास में हाथ बटा सकें।

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  2. मनोज जी पहले से तो काफी बदलाव आया है गाँवों में .....
    स्कूली बच्चों को साईकिल ,युनिफोर्म , पुस्तकें ,भोजन , किसानों को बीज ,कपडा बुनकरों को सूत आदि उपलब्ध है ....
    मुझे तो पूरी जानकारी नहीं पर कई ग्रामीण महिलाओं को कहते सुना है .....
    हाँ कुछेक दूर दराज के गाँव इन सुविधाओं से महरूम हो सकते हैं .....

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