मंगलवार, 7 सितंबर 2010

स्त्री और पुरुष

कोई पुरुष कभी भी किसी स्त्री से नहीं जीत सकता, क्योंकि पुरुष का उद्-गम स्त्री से है, उसे अस्तित्व में लाने वाली स्त्री है और पुरुष स्वयं अस्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता ।-मनोज भारती

5 टिप्‍पणियां:

  1. ई कहानी त सब लोग पढा होगा कि बिना काटे अऊर मिटाए एगो लाईन को छोटा करने के लिए, उसके आगे एगो बड़ा लाईन खींच दीजिए, पहिला वाला अपने आप छोटा हो जाएगा. लेकिन पुरुस जब अपना अस्तित्व को खतरा में पाता है, त ऊ नारी पर आक्रमन करता है ताकि उसको छोटा साबित कर सके... लाईन को काटकर अऊर मिटाकर छोटा करने का ई खेल पुरुस सदियों से स्त्री के साथ खेलता आ रहा है!!

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  2. अगर पुरुष और स्त्री को जगत की दो जातियाँ मान लें तो भी प्रमाणित हो जाता है कि इन दोनों का आपस में प्रेम और विरोध है. इसके बिना ग़ुज़ारा नहीं. इन दोनों भावों में समय बहुत अच्छा बीत जाता है.

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  3. खुश्वंत सिहं का एक चुटकुला याद आ गया..
    इसी तरह के एक विवाद में जब यह सिद्द हो गया कि स्त्री ही सृष्टि की बुनियाद है तो संता ने क्या कहा पता है ?

    He said ok! agree that woman is faundation of the nation. but then tell me, who laid the foundation?

    प्लीज़..मज़ाक ही समझना इसे..स्त्री-पुरुष के वर्चस्व की बात बेमतलब की है,मनुष्यता और उससे भी आगे जीवन की बातें होनी चाहिये अब! आखिर ईसा के बाद भी 20 शताब्दीयां बीत चुकी हैं

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  4. चैतन्य जी !!! आज भी वर्चस्व की लड़ाई जारी है...स्त्री और पुरुष के बीच समस्वरता हो इसके लिए जरुरी है कि दोनों के बीच संघर्ष न हो बल्कि एक राइट अंडरस्टैंडिंग हो कि दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं...तभी उस मनुष्यता का जन्म हो सकता है जो प्रेमपूर्ण होगी ।

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