बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

क्षणिकाएँ

सपने टूटे
प्रेम टूटा
भ्रम छूटा


आदमी की परेशानी
मकड़ी का जाल
दम तोड़ा फंस कर


आदत
मजबूर
लोग


आदमी
झगड़े
वासना

8 टिप्‍पणियां:

  1. सभी हाइकु अच्छे बन पड़े हैं

    सपने टूटे
    प्रेम टूटा
    भ्रम छूटा

    यह बहुत अच्छा लगा.

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  2. आदमी की परेशानी
    मकड़ी का जाल
    दम तोड़ा फंस कर
    जीवन का बहुत बड़ा सत्य..समेट गईं ये पंक्तियाँ...
    आभार..

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  3. वाह! बहुत बढ़िया! उम्दा प्रस्तुती!

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  4. स्वप्न, प्रेम, भ्रम
    जब तुम न थे
    एकाकार हुए तुमसे.

    आदमी मकड़ी जाल
    जीवन आत्मा शरीर
    मृत्यु मुक्ति मोक्ष.

    मनोज भाई! बस आपकी प्रेरणा है! प्रभावित हुआ प्रथम दो रचनाओं से... सफल या असफल आप गुणी जनों का निर्णय!!

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  5. कम शब्दों के भी अर्थ होते है विजय दशमी की मंगल कामनाएं ।

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