रविवार, 9 अक्तूबर 2011

हिंदू विवाह के प्रकार

हिंदू धर्मसूत्रों,शास्त्रों और स्मृतियों में विभिन्न प्रकार के विवाह बताए गए हैं। मनु ने विवाह के आठ भेद किए हैं परंतु वशिष्ठ ने छ: प्रकार के विवाह माने हैं। मनु स्मृति में कहा गया है-
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्ष प्राजापत्यस्तथासुर:।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चष्टमोधम:॥
इस प्रकार मनु ने ब्रह्म,दैव,आर्ष,प्राजापत्य,आसुर,गांधर्व,राक्षस और पैशाच आठ प्रकार के विवाह माने हैं।वशिष्ठ ने ब्राह्म,दैव,आर्ष,गांधर्व,क्षात्र(राक्षस) और मानुष(आसुर) विवाह के छ: प्रकार माने हैं।ब्राह्म विवाह, दैव विवाह,आर्ष विवाह और प्राजापत्य विवाहों को धर्म विवाह कहा गया है और ये समाज द्वारा स्वीकृत विवाह होने के कारण उत्तम विवाह कहे गए।अन्य चार विवाहों को अधर्म विवाह कहा गया है और इसीलिए ये समाज द्वारा अस्वीकृत कहे गए हैं।

1) ब्राह्म विवाह :मनुस्मृति में ब्राह्म विवाह के संबंध में लिखा है-
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुति शीलवते स्वयम्।
आहुय दानं कन्याय ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित:॥
अर्थात कन्या को वस्त्र,अलंकार आदि से सुसज्जित करके विद्वान,शीलवान वर को आमंत्रित करके कन्यादान करने का नाम ब्रह्म विवाह है। यह विवाह वस्तुत: ब्रह्म-विद्या में संलग्न विद्वान पुरुष के लिए है। इसमें विवाह के तीन पक्ष स्पष्ट हैं- विद्वान व्यक्ति द्वारा विवाह की स्वीकृति,विवाह संस्कार का होना तथा दहेज न लिया जाना।इस विवाह में श्रेष्ठ कन्या को ब्रह्म विद्या में संलग्न विद्वान पुरुष को केवल एक वस्त्र से अलंकृत कर उसका दान किया जाता है।

2) दैव विवाह ::दैव विवाह को परिभाषित करते हुए मनु ने लिखा है-
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते।
अलंकृत्य सुतादानं दैव धर्म प्रचक्षते॥
अर्थात दैव विवाह में वस्त्रों और अलंकारों से सुसज्जित कन्या का दान उस यज्ञकर्ता ऋत्विक(पुरोहित) को किया जाता है,जो किसी यज्ञशाला में यज्ञ कार्य को उचित रूप से पूरा करता है। इस प्रकार का विवाह देवताओं (प्राकृतिक शक्तियों का आह्वाहन)की स्तुति के समय संपन्न होता था,इसलिए इसे दैव विवाह कहा गया।बाद में इस विवाह में तड़क-भड़क और दहेज भी समाविष्ट हो गया।

3)आर्ष विवाह:: मनु के शब्दों में -
एकं गोमिथुने द्वेवा वारदशेय धर्मत:।
कन्या प्रदानं विधिवरार्षो धर्म स उच्चते॥
अर्थात पवित्र धर्म के निर्वाह के उद्देश्य से एक गाय और बैल अथवा दो जोड़े बैल लेकर कन्या के माता-पिता उसे ऋषि की पत्नी के रूप में सौंप देते हैं।ये वस्तुएं कन्या-मूल्य नहीं थी,बल्कि ऋषि के गृहस्थ जीवन बिताने के निश्चय की सूचक थी। आर्ष शब्द का अर्थ ही ऋषि है,इस प्रकार किसी सुपात्र कन्या का ऋषि से पाणिग्रहण ही आर्ष विवाह कहलाता है।

4)प्राजापात्य विवाह:: मनु ने मनुस्मृति में इस विवाह के संबंध में लिखा है-
सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानु भाष्य च:।
कन्या प्रदानमभ्यर्त्थ प्राजापत्यो विधि: स्मृत:॥
अर्थात तुम दोनों मिलकर गृहस्थ धर्म का आचरण करना,यह कहकर विधिवत वर की पूजा करके कन्यादान करना प्राजापात्य विवाह है। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार वर और वधू दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के लिए हो,यह कामना ही प्रजापत्य विवाह का आधार है।

वस्तुत: यह विवाह प्रजा अर्थात संतति-उत्पत्ति की दृष्टि से सर्व-साधारण का विवाह है। इस विवाह में स्त्री या पुरुष का कोई धार्मिक गुण या विशेषता नहीं देखी जाती थी। यह विवाह बहुत बाद में प्रचलित हुआ लगता है क्योंकि वशिष्ठ और आपस्तम्ब दोनों ने ही इस विवाह के संबंध में कुछ नहीं लिखा है। संभवत: इस विवाह को बाद में उस वर्ग का ध्यान रखते हुए जोड़ा गया जो ब्रह्म-ज्ञान में उत्सुक नहीं है,लेकिन प्रजा की दृष्टि से धर्म का पालन कर सकता है।इस प्रकार से संतति के उद्देश्य से कन्या को घर लाने को प्राजापात्य विवाह कहा गया।

5)आसुर विवाह:: मनु ने इस विवाह को इस प्रकार परिभाषित किया है-
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्वा कन्याये चैव शक्तित:।
कन्या प्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म स उच्यते॥
अर्थात् आसुर विवाह उसे कहते हैं जब विवाह के लिए इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छा से कन्या के परिवार वालों को धन देकर विवाह करता है। महाभारत काल में पांडु का माद्री के साथ इसी प्रकार का विवाह हुआ था। यह विवाह समाज में स्वीकृत नहीं रहा।

6)गांधर्व विवाह::मनुस्मृति में गांधर्व विवाह के संबंध में कहा गया है कि-
इच्छामान्योन्य संयोग: कन्यायाश्च वरस्य च:।
गंधर्व: सतु विज्ञेयो मैथुन्य: काम: संभव: ॥
अर्थात गंधर्व विवाह उसे कहते हैं जो कन्या और वर के परस्पर प्रेम के फलस्वरूप होता है। इसमें वैवाहिक संस्कार कार्य संभोग के बाद पूर्ण किये जाते हैं। इसका उदाहरण दुष्यंत और शकुंतला का विवाह है।

इस प्रकार के विवाह में पुरुष और स्त्री दोनों अपनी इच्छा के अनुसार पति और पत्नी चुन लेते हैं और विवाह पूर्व ही पति-पत्नी के रूप में रहने लगते हैं और बाद में अपने परिवार और समाज से उसकी स्वीकृति लेते हैं।

कामसूत्र के रचयिता वात्स्यायन ने गंधर्व विवाह को आदर्श माना है। बौधायन का कहना है कि कुछ लोग    गांधर्व विवाह की इसलिए प्रशंसा करते हैं क्योंकि यह स्त्री-पुरुष की इच्छा से होता है,इसलिए यह आदर्श है। तैत्तरीय संहिता में कहा गया है कि "स्त्री कामा वै गंधर्वा" अर्थात स्त्री की कामना गांधर्व लोगों की विशेषता है।वस्तुत: प्राचीन काल में गांधर्व नाम की एक जाति थी जो अत्यंत कामुक थी। यह उन्हीं के लिए कहा गया है।इसी कारण कामवासना पर आश्रित इस प्रकार के विवाह को स्मृतिकारों ने गांधर्व विवाह की संज्ञा दी।

सत्यार्थ प्रकाश में महर्षि दयानंद सरस्वती ने कहा है कि अनियम,असमय इत्यादि किसी कारण से दोनों की प्राचीन इच्छा से वर-कन्या का परस्पर संयोग होना गंधर्व विवाह है।

7)राक्षस विवाह:: राक्षस विवाह उस काल की प्रथा है जबकि स्त्रियां युद्ध का पारितोषिक मानी जाती थी। मनु ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है-
हत्वा,छित्वा च भित्वा च क्रोशन्ति रूदन्ती गृहातौ।
प्रसाह्य कन्या हरणं राक्षसो विधिरुच्यते॥
अर्थात् राक्षस विवाह में विजेता कन्या पक्ष के लोगों को मार-काट कर उनका घर तोड़कर विलाप करती हुई कन्या को उसके घर से उठा लाता है। श्री कृष्ण से रुक्मणी का ऐसा ही विवाह हुआ था। इस विवाह को क्षत्रीय विवाह भी कहा गया क्योंकि क्षत्रिय लोग ही युद्ध करते थे और विजयी होने पर शत्रु की कन्याओं को पारितोषिक रूप से उठा लाते थे।

8) पैशाच विवाह::मनु ने पैशाच विवाह के संबंध में लिखा है-
सुप्तां मत्तां प्रमतां वा रहो यमोपगच्छत।
स पापिष्ठो विवाहनां पैशाचाष्टमोधम:॥
अर्थात सोई हुई,शराब पीने से उन्मत्त हुई स्त्री से एकांत में विवाह(बलात्कार) करना ही पैशाच विवाह है।इस प्रकार बलात्कारी द्वारा विधिपूर्वक विवाह संस्कार कर लेने पर समाज की स्वीकृति मिल जाती थी,जिसमें शारीरिक संयोग की पवित्रता और सामाजिक व्यवस्था बनी रहे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदू समाज में विवाह के अनेक रूप रहे हैं। विवाह के प्राचीन रूपों में कुछ का आज भी अस्तित्व दिखाई देता है। पहले  विवाह का आधार व्यक्ति का वर्ण था। मनु के अनुसार  ब्राह्मणों के लिए दैव,आर्ष और प्राजापत्य, क्षत्रियों के लिए राक्षस और वैश्यों तथा शूद्रों के लिए आसुर विवाह उचित हैं।आज भी उच्च वर्ग के लोगों में प्राजापत्य विवाह और निम्न वर्ग के लोगों में आसुर विवाह प्रचलित हैं।

आज सर्वाधिक प्रचलित विवाह प्रेम-विवाह बन गया है। इसके कारणों में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव, औद्योगिकरण,शहरीकरण,आधुनिक शिक्षा और व्यक्तिवादी विचारधारा का विकास, नारी सशक्तिकरण आदि को माना जा रहा है। संयुक्त परिवार का ह्तास भी इसका एक कारण हो सकता है।

इधर विवाह का एक अलग ही चलन देखने में आया है- लिव इन रिलेशनशिप, इस विवाह में युवा लड़का-लड़की बिना विवाह के एक साथ तब तक रहते हैं जब तक कि उनके बीच में किसी बात विशेष को लेकर मतभेद पैदा न हो। इस प्रकार के रिलेशनशिप महानगरों में बहुत दिखाई पड़ते हैं। इसके बहुत से कारण हैं। जिसके बारे में हम आगे किसी पोस्ट में चर्चा करेंगे। 

5 टिप्‍पणियां:

  1. टुकड़े-टुकड़े में यह सारी जानकारी थी मुझे, किन्तु एक सुव्यवस्थित रूप में आपने प्रस्तुत किया तो ज्ञान वर्धन हुआ!!
    स्वयंवर किस श्रेणी में आता है तथा क्या इसपर कोई अलग पोस्ट लिखने का विचार है??

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  2. @ सलिल जी !!! पोस्ट में आए विवाह(गंधर्व विवाह को छोड़ कर,जिसमें स्त्री-पुरुष की स्व-इच्छा से संसर्ग होता)पुरुष की दृष्टि से परिभाषित हुए हैं। स्वयंवर विवाह का प्रचलन वशिष्ठ के समय से ही प्रचलित है। इसमें विदुषी व श्रेष्ठ कन्या को अपना वर चुनने की व्यवस्था थी। कन्या अपनी इच्छा से बलिष्ठ,विद्वान,सुंदर वर का चयन करती थी। इसके लिए वह उपस्थित हुए पुरुषों के सम्मुख अनेक शर्तें रखती थी, जो एक तरह से पुरुष के ज्ञान,बल आदि की परीक्षा होती थी। कन्या को इनमें से जो श्रेष्ठ वर दिखाई पड़ता था...उससे वह विवाह रचा लेती थी। राम और सीता का विवाह इसी श्रेणी में आता है। क्षत्रीय कन्याओं में यह विवाह प्रचलित था।

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  3. मनोज जी,
    आभार!मेरी जिज्ञासा पर आपकी त्वरित प्रतिक्रिया के लिए पुनः आभार!!

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  4. विवाह एक संस्था है और सभी प्रकार की संस्थायें एक तरह से कारागार ही हैं। ओशोने इस संस्था की मुखालफत की है, इस विषय पर ओशो की दृष्टि से भी प्रकाश डालें, मनोज भाई ।

    चैतन्य आलोक

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