शनिवार, 2 जुलाई 2011

तू न आना इस देस,लाडो...

-- "यैस ओशो" पत्रिका  के "जुलाई 2011" अंक का संपादकीय
--लेखक :संजय भारती 

एक लोकप्रिय टी.वी. सीरियल का यह शीर्षक बिलकुल मौजू हो जाता है अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण संस्था थॉमस रॉयटर्स के इस तथ्य-उद्-घाटन से कि स्त्रियों के लिए असुरक्षित देशों में भारत पूरे विश्व में चौथे स्थान पर आता है। विश्वास नहीं होता न! 

भारत में 30 लाख वेश्याएं हैं- अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार। असली संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। अधिकारिक आँकड़ों के अनुसार जो 30 लाख वेश्याएं हैं,उनमें से 40 प्रतिशत चौदह वर्ष से कम उम्र की बच्चियां हैं। ये सब वे बच्चियां हैं जो चुरा ली गई या जिनके चाचा,भाई,पड़ौसी या स्वयं पिता तक ने पहले उनका उपभोग किया और फिर उन्हें बेच दिया। ज्ञात आँकड़ों के हिसाब से पिछले सौ वर्षों में 5 करोड़ बच्चियां गुम हुई हैं। विदेशी बैंकों में गुम हुआ भारत का धन तो आज सभी के जेहन में है,लेकिन ये 5 करोड़ बच्चियां? इनका क्या? 

थॉमस रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों की लिस्ट में सबसे पहले स्थान पर आता है-स्त्रियों की भ्रूण ह्त्या। लेकिन परिवारों और बाजारों में हो रहे उनके यौन शोषण,बंधुआ मजदूर जैसी उनकी सामाजिक हैसियत, मूक आक्रांता के उनके रोल को देखें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि अच्छा ही हुआ वो इस देश में पैदा नहीं हुई? 

सड़क चलते चूंटी काट लिया जाने, और न जाने कितनी अभद्र घटनाओं का सामना भारत में लड़कियां रोज करती हैं। और उनका प्रशिक्षण ऐसा है कि चूंटी कटवाओ और चुपचाप आगे बढ़ जाओ। जो होता है,होने दो- -कुछ कहो मत,क्योंकि तुम तो बेचारी स्त्री हो। विद्रोह मत करो। 

भारत के मानस में कुछ ऐसा है कि स्त्रियों ने स्वयं भी अपने को दूसरे दर्जे पर रख लिया है,इसलिए उनकी ओर से कोई विद्रोह नहीं आता। घर में सब कुछ होते हुए भी स्त्रियां खुद को ठीक से पोषित नहीं करती। यही कारण है कि भारत की 80 प्रतिशत स्त्रियां कुपोषण के कारण एनीमिया की शिकार हैं। 

स्त्रियों के मानस में ऐसा क्या गहरा चला गया है कि उनकी ओर से विद्रोह की छोड़ो,बल्कि जो होता है उसे होने देना उसके चरित्र का हिस्सा बना हुआ है? वह है कि सीता का आदर्श जो उन्हें दिया गया है। हर स्त्री के भीतर सीता उतर गई है,जिसे आग में चलवा लो तो चुपचाप चल लेगी,कोई आरोप लगा लो तो सिर झुकाकर स्वीकार कर लेगी,जंगल में फिंकवा दो तो अहोभाव मानेगी। लेकिन सीता को ही आदर्श रखना हो तो याद रहे सबकुछ स्वीकारती ही सीता नहीं है। सीता तो वहां से शुरु होती है,जहां वह राम के साथ वापस जाने से इनकार करती है--भले ही धरती में क्यों न समाना पड़े।वास्तव में तो यहीं रामायण समाप्त हो जाती है। और कुछ क्षण की ही क्यों नहीं,सीतायण जन्म लेती है। 

स्त्रियों के खिलाफ अपराधों में पुरुषों का तो हाथ है ही, स्वयं स्त्रियों का भी उतना ही है,क्योंकि वे अपराध सहती हैं। 

ओशो कहते हैं, "स्त्रियों को अपने लिए वाणी जुटानी होगी। और उनको वाणी तभी मिल सकती है सब दिशाओं में,जब तुम यह हिम्मत जुटाओ कि तुम्हारी अतीत की धारणाओं में निन्यानवे प्रतिशत अमानवीय हैं। और उन अमानवीय धारणाओं को चाहे कितने ही बड़े ऋषियों-मुनियों का समर्थन रहा हो,उनका कोई मूल्य नहीं है। न उन ऋषि-मुनियों का मूल्य है,न उन धारणाओं का कोई मूल्य है। चाहे वे वेद में लिखी हों,चाहे रामायण में लिखी हों,कुछ फर्क नहीं पड़ता। कहां लिखी हैं,इससे कोई सवाल नहीं है। एक पुनर्विचार की जरूरत है।"
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11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सारगर्भित आलेख।
    एक नए नज़रिए से समस्या को देखने का प्रयास अच्छा लगा।

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  2. बहुत ही सारगर्भित आलेख।
    एक नए नज़रिए से समस्या को देखने का प्रयास अच्छा लगा।

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  4. दिल दहला देने वाले आंकड़ों के साथ ...विचारणीय लेख

    सीता की सहनशीलता के साथ सीता का विद्रोह भी देखो .........सीतायन की जरूरत है..

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  5. एक अवाक कर देने वाली बातें है ये... शर्मसार करने वाले तथ्य!! खंडित हो रही हैं बहुत सी धारणाएं.. लेकिन क्या सिर्फ शहरी महिलाओं की जागरूकता ही आंदोलन बन सकती है?? ग्रामीण भारत में कुछ नहीं बदला और आज भी उन्हीं ऋषी मुनियों की आरोपित धारणाएं फल फूल रही हैं!!
    (सलिल)

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  6. .

    स्त्रियों की जो दुर्दशा है , उसे देखते हुए स्त्री होना एक श्राप के सामान लगता है. . कुछ na badal paane की लाचारी सताती है.

    वैसे समाज में बदलाव हो रहे हैं , लेकिन ये जागरूकता , उन पर हो रहे अत्याचारों की तुलना में नगण्य है. स्त्रियों की ये दासता समाप्त होने में अभी सदियाँ लगेंगी .

    इस जुल्म को देखकर , शीर्षक की सार्थकता स्वमेव ही सिद्ध हो जाती है.

    .

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  7. KHAAP PANCHAYAT KA ASTITV JAB TAK BARKARAR HAI AUR JAB TAK GHAR-GHAR ME SHIKSHA KA DEEPAK NAHEE JAL JATA KISEE PRAKAR KA PARIVARTAN HO SAKTA HAI MAHILAO KEE STHITEE ME YE SOCHANA BHEE SAPNAA HEE HOGA.jagrukta kee
    flame swayam streeyo ko jalaanee hogee.

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  8. ऐसी धारणाओं को बदलने की खातिर... लाडो(कन्याओं) का इस देस.. आना बहुत जरूरी है .....

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