शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

समाज और सत्य

"समाज में रहने के लिए'सत्य' जैसे खुले आकाश की नहीं; बल्कि बंद,अंधेरे कमरे जैसे 'झूठ' की ज्यादा जरूरत रहती है।" _मनोज भारती 

7 टिप्‍पणियां:

  1. fir jo ghutan hogee usaka kya......?na baba na aise samaj ko namaskar....
    kaduva saty......

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह हमारा दुर्भाग्य है मनोज भाई कि हम ऐसे समाज में रह रहे हैं.. क्या हमने ऐसे ही समाज की कल्पना की थी????

    उत्तर देंहटाएं
  3. रोगियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है ! वे रहना चाहते हैं घुटन भरे झूठे खोल में ! रहने दीजिये उन्हें वैसे ही ! सत्य की राह सब के बस की है भी नहीं ! सत्य की राह पर चलना जलते हुए अंगारों पर चलने के सामान है ! और इस राह पर चलने की ख़ुशी कुछ लोगों को हासिल है ! वे ही जानते हैं सत्य से मिलने वाले सुख को !

    उत्तर देंहटाएं
  4. न...न...न...न. सत्य के कमरे में रहिए झूठ वाले में आवश्यकतानुसार जाइए.- भारत भूषण उवाच :))

    उत्तर देंहटाएं
  5. @भूषण जी !!! समझौतावादी दृष्टिकोण सत्य नहीं जानता।

    उत्तर देंहटाएं
  6. पुनश्च: समझौतावाद में अवसरवाद समाहित है।

    उत्तर देंहटाएं