गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

ज्ञान

ज्ञान जब आदत बन जाता है, तो व्यर्थ हो जाता है ।
ज्ञान आदत में नहीं है, बल्कि सजगता का फल है ।
ज्ञान जब तृप्ति देता है, तो पूर्ण होता है ।
पूर्ण ज्ञान अपूर्णता के द्वार न खोले तो वह बंधन है ।
ज्ञान इंद्रिय-अनुभव है, पर हर ज्ञान अनुभव नहीं है ।
सत्य का अनुभव पहले होता है, तब वह ज्ञान बनता है ।
एक ही अनुभव बार-बार नहीं होता, हर अनुभव अद्वितीय है ।
हर अनुभव का ज्ञान अनूठा है ।
एक ही अनुभव की बार-बार कल्पना करना अज्ञानता है ।
क्योंकि कोई भी अनुभव पुनरावृत्त नहीं होता ।
जो पुनरावृत्त हो वह ज्ञान नहीं ।
ज्ञान हर पल नया होता है ।
आदत अज्ञानता है क्योंकि वह नये के लिए बंधन है ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है!

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  2. वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।

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  3. मेरी द्रष्टि में जीवन ही परमात्मा है और जीवन ही मोक्ष है ...जो व्यक्ति जीने की कला को जान लेता है और जीने की गहराइयों में उतर सकता है , जीवन की ऊँचाइयों को छु लेता है , वह आदमी फिर नहीं पूछता की जीवन का लक्ष्य क्या है ...? जीवन अपने में काफी है ...जीवन पर्याप्त है ....
    by ....osho

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  4. ओशो की यह दृष्टि समझ में आ जाए, तो जीवन के मायने ही बदल जाते हैं ।

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  5. ज्ञान जब आदत बन जाता है, तो व्यर्थ हो जाता है ।
    ज्ञान आदत में नहीं है, बल्कि सजगता का फल है ।
    ज्ञान जब तृप्ति देता है, तो पूर्ण होता है ।
    पूर्ण ज्ञान अपूर्णता के द्वार न खोले तो वह बंधन है ।
    ज्ञान इंद्रिय-अनुभव है, पर हर ज्ञान अनुभव नहीं है ।
    सत्य का अनुभव पहले होता है, तब वह ज्ञान बनता है.
    gyan ki gaharai par likhi hui ye rachana kafi achchhi hai .

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