प्रेम
तुम्हारी सांसों में
वही बसता है जो मेरी सांसों में
अनंत विस्तार में टूटा यह जीवन
प्रेम की आंखों से बंधा यह जीवन
द्वैत में नहीं वह जीवन आधार
अद्वैत में है वह आकार निराकार
तुम मुझ से पृथक नहीं
इस अनुभूति में है प्रेम
वही बसता है जो मेरी सांसों में
अनंत विस्तार में टूटा यह जीवन
प्रेम की आंखों से बंधा यह जीवन
द्वैत में नहीं वह जीवन आधार
अद्वैत में है वह आकार निराकार
तुम मुझ से पृथक नहीं
इस अनुभूति में है प्रेम
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है शुभकामनायें
जवाब देंहटाएं"PREM" ki sundar abhivyakti
जवाब देंहटाएंइस रचना ने मन नोह लिया।
जवाब देंहटाएंbahut sundar abhivyakti prem ki ,umda.
जवाब देंहटाएंतुम मुझ से पृथक नहीं
जवाब देंहटाएंइस अनुभूति में है प्रेम
और अलग होना भी नहीं चाहता............
सुन्दर रचना.
चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com
ek bahut hee acchee rachana padane ka soubhagy mila .aabhaar
जवाब देंहटाएं"तुम मुझ से पृथक नहीं
जवाब देंहटाएंइस अनुभूति में है प्रेम"
सहजता के साथ इन पंक्तियों के माध्यम से आपने प्रेम को दो पंक्तियों में समेत कर रख दिया है। आपके प्रेमाभावों को सादर नमन ।