बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

प्रेम

तुम्हारी सांसों में
वही बसता है जो मेरी सांसों में
अनंत विस्तार में टूटा यह जीवन
प्रेम की आंखों से बंधा यह जीवन
द्वैत में नहीं वह जीवन आधार
अद्वैत में है वह आकार निराकार

तुम मुझ से पृथक नहीं
इस अनुभूति में है प्रेम

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

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  2. तुम मुझ से पृथक नहीं
    इस अनुभूति में है प्रेम

    और अलग होना भी नहीं चाहता............

    सुन्दर रचना.

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  3. "तुम मुझ से पृथक नहीं
    इस अनुभूति में है प्रेम"
    सहजता के साथ इन पंक्तियों के माध्यम से आपने प्रेम को दो पंक्तियों में समेत कर रख दिया है। आपके प्रेमाभावों को सादर नमन ।

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