गुरुवार, 27 अगस्त 2009

झूठ और सच

एक बहुत पुरानी कथा है, शायद तब की जब कि परमात्मा ने यह दुनिया बनाई । कहते हैं कि परमात्मा ने जब यह दुनिया बनाई तो बहुत एक रूप और साम्यबद्ध बनाई । फिर परमात्मा ने देखा कि पृथ्वी पर कोई हलचल नहीं है । सब एकरूप और शिथिल सा है । तब परमात्मा ने पृथ्वी पर विरोधी तत्वों की कामना की । और एक सच की देवी तथा एक झूठ की देवी बनाई । दोनों में विपरीत्त गुण भरे । और उन दोनों को पृथ्वी पर भेजा । आकाश से जमीन पर आते-आते उनके कपड़े मैले हो गए । रास्ते की धूल जम गई । जब वे जमीन पर उतर रही थी, तो भोर के अंतिम तारे डूब रहे थे। सूर्य निकलने के करीब था । थोड़ी देर थी सूरज निकलने में । इसके पहले कि वे परमात्मा के संदेश के अनुसार पृथ्वी की यात्रा पर जाएं और अपना काम शुरु करें, झूठ की देवी ने सच की देवी से सरोवर में स्नान का प्रस्ताव रखा । दोनों देवियाँ कपड़े उतारकर सरोवर में स्नान करने को उतरी । सच की देवी तैरती हुई आगे चली गई, उसे कुछ भी पता न था कि उसके पीछे कोई धोखा हो जाने को है । झूठ की देवी किनारे पर वापस आई और सच की देवी के कपड़े पहन कर भाग खड़ी हुई, और तो और स्वयं के कपड़े भी साथ ही लेते गई । जब लौटकर सच की देवी ने देखा, तो वह हैरान हो गई । वह नग्न थी । उसके कपड़े वहां नहीं थे । सूर्य निकल चुका था । गाँव के लोग जागने लगे थे । उसके पास कोई चारा न था । वह छुपते-छिपाते झूठ की देवी का पीछा करने लगी । कुछ डरी सी, कुछ सहमी सी, कुछ सकुचाई सी । लेकिन कथा कहती है कि वह अब तक भी झूठ की देवी को पकड़ नहीं पाई है । झूठ की देवी अब भी सच की देवी के वस्त्र पहन कर घूम रही है । और सच की देवी छुपती-छुपाती उसके पीछे-पीछे भाग रही है । लेकिन जब कभी वह झूठ के सामने प्रत्यक्ष नग्न खड़ी हो जाती है, तो किसी को बर्दाश्त नहीं होता क्योंकि सभी के मुखौटे उतर जाते हैं । तब से संसार में हलचल और विविधता तो बहुत है, पर सब थोथा और झूठा । मुखौटों से लदे चेहरे, जो सच के सामने तिलमिला जाते हैं ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह.. ..बहुत सुन्दर..
    शत-प्रतिशत सत्य हैं...
    सच्चाई जब भी नग्नअवस्था में किसी को नज़र आजाये तो झेल पाना बहुत कठिन होता है....
    झूठ वास्तव में सत्य का आवरण पहन कर ही आता है..
    मानना पड़ेगा भारती जी ....आप के पास लघु-कथाओं की पिटारी है क्या ?
    सभी एक से बढ़ कर एक ज्ञानवर्धक...अब तो आदत हो गयी है आपके ब्लॉग की ....आना ही पड़ता है...इतना कुछ होता जो है यहाँ..
    आपका ह्रदय से धन्यवाद..

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