बुधवार, 19 अगस्त 2009

मैं कौन हूँ ?

मैं कौन हूँ ?
कैसे कहूँ ...कौन
मन से बेचैन हूँ
पर दिल में सब्र है
सहन करता हूँ
इस बेचैनी को
क्योंकि -
तू है !!!
इसका अहसास है


विरह की पीड़ा क्षण प्रतिक्षण
बढ़ती जाती है
तेरे बिना
यह संसार अधूरा लगता है
लेकिन तू है !!!
इसका अहसास गहराता जाता है


क्या यह पीड़ा
तेरा ही गीत है
जिसको गाने के लिए
तू इस नासाज़ की
तारें खींच -खींच कर
तान बिठा रहा ?

माना कि मैं खुद से बेखुदा हूँ
पर तुझ से जुदा तो नहीं हूँ
यह अहसास है
तभी तो इस जीवन में रस है !!!
रस में रम ।

1 टिप्पणी:

  1. सीधे सरल शब्द उकेर गए है कितनी ही बातें..
    सुन्दर......नहीं......अतिसुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं