रविवार, 2 अगस्त 2009

ज्ञान-गंगा : 8 राग, लालसा और प्रेम


प्रेम क्या है ? इसे समझने के पहले यह जानना जरूरी है कि प्रेम क्या नहीं है । क्योंकि जिसे हम प्राय: प्रेम के नाम से जानते हैं, वह और कुछ भले ही हो, प्रेम कतई नहीं है । मानव के संबंधों में भी हमें अधिकतर राग,लालसा, आसक्ति दिखाई देती है, वह प्रेम नहीं कहा जा सकता । प्रेम की विकृति ही राग, लालसा और आसक्ति है । पहले काम को लें । यह राग से उत्पन्न होता है । काम प्रेम नहीं है । काम या यौन आकर्षण तो प्रकृति का संतति उत्पादन के लिए प्रयोग किया गया सम्मोहन है । यथार्थ में यह वैसी ही मूर्छा है, जैसी शल्य-चिकित्सक शल्य क्रिया के पूर्व उपयोग में लाता है । इस मूर्छा के अभाव में प्रकृति का संतति-क्रम चलना संभव नहीं है । इसे ही जो प्रेम समझ लेते हैं, वे भ्रांति में पड़ जाते हैं । यह मूर्छा मनुष्य में ही नहीं वरन् समस्त पशु-पक्षी, कीट-पतंग में भी ऐसी ही पाई जाती है । कई जीवधारियों की तो संभोग के बाद मृत्यु हो जाती है । शहद की मक्खी का दृष्टांत लीजिए । इस मक्खी के छत्ते में इन मक्खियों की एक रानी रहती है । इस रानी मक्खी से अनेक नर मक्खियां संभोग की इच्छा रखते हैं । अंत में जिस नर को वह रानी पसंद करती है, उसके साथ उड़ती है और संभोग होने के पश्चात् नर का प्राणांत हो जाता है । फिर भी प्रकृति का सम्मोहन इतना गहरा है कि सामने खड़ी मृत्यु भी यौन आकर्षण से प्राणियों को नहीं रोक पाती ।जहां तक इस प्रकार के प्रेम का संबंध है, मनुष्य के संबंध में भी, वह अन्य पशु-पक्षियों कीटादि से अलग नहीं है । प्रेम के संबंध में विचार करते समय यह ध्यान में रखना जरूरी है कि यौन-आकर्षण को ही प्रेम न समझ लिया जाए । यथार्थ में यह राग का सबसे बड़ा रूप है । सत्य तो यह है कि राग की यह शक्ति, जिस मात्रा में वासना से मुक्त हो जाती है, उतनी ही मात्रा में उसका रूपांतरण प्रेम में होता है । प्रेम राग नहीं है, बल्कि राग-शक्ति का दिव्य रूपांतरण है । राग के बाद लालसा आती है । हम लालसा और प्रेम को भी एक ही समझ बैठे हैं । लालसा में युद्ध- अधिकार की भावना रहती है । मनुष्य शक्ति का पिपासु है । फिर चाहे यह प्रेम के नाम से भी क्यों न हो । इसलिए अधिकार और स्वामित्व खोजा जाता है । पिता-पुत्र, मित्र-मित्र, पति-पत्नी आदि के अधिकांश संबंधों में यह अधिकार की भावना ही दृष्टिगोचर होती है । इसलिए अनेक बार हमें पिता-पुत्र, मित्र-मित्र और पति-पत्नी तक के संबंध टूटते दिखाई पड़ते हैं । पति को अपने स्वामित्व का बड़ा ध्यान रहता है और पत्नी दासी बन जाती है । पत्नी भी ऊपर से चाहे स्वयं को दासी कहे, परन्तु बहुधा भीतर से उसमें भी मालिक बनने का भाव सक्रिय रहता है । मालकियत की यह प्रतिस्पर्धा चाहे वह पिता-पुत्र में हो, चाहे मित्र-मित्र में और पति-पत्नी में, बहुता संघर्ष और कलह बन जाती है । प्रेम की पहली शर्त है निरहंकारिता । मनुष्य की सबसे बड़ी और गहरी भावना है अहंकार । जहां अहंकार नहीं वहीं प्रेम का जन्म होता है । लालसा में अहंकार सबसे प्रधान वस्तु रहती है । अहंकार केंद्रित जीवन में जिसे हम प्रेम समझते हैं, वह प्रेम न होकर लालसा होती है । जिसके प्रति यह लालसा रहती है, वह भी अनेक बार इसे प्रेम समझ कर भ्रांति में पड़ जाता है । वस्तुओं और साधनों से प्रेम नहीं किया जा सकता । उसका तो बस उपयोग और शोषण ही होता है । हां, उनसे प्रेम जतलाया जा सकता है । वैसे ही जैसे दासता के युगों में मालिक गुलामों को जीवन सुविधाएं देता था ताकि वे मर जाएं । शायद वे मालिक अपने दासों के प्रति प्रेम भी जतलाते रहे हों । जैसा उनका प्रेम रहा होगा वैसी ही यह लालसा है । इस प्रकार राग, लालसा और आसक्ति चाहे प्रेम दिखें, पर वह यथार्थ में प्रेम नहीं है । जो व्यक्ति स्वयं को निपट शून्य बना लेता है, उससे और केवल उससे ही प्रेम की ऊर्जा अभिव्यक्त होती है । प्रेम व्यष्टि और समष्टि दोनों के प्रति हो सकता है । जिनके ह्रदय में प्रेम है , वह चाहे व्यष्टि के प्रति हो या समष्टि के, वह प्रेम पात्र के लिए ही सब कुछ करता है । उसकी समस्त इच्छाएं प्रेम-पात्र को सुख देने में रहती हैं । उस प्रेम के बदले में वह कुछ नहीं चाहता । प्रेम बेशर्त दान है । और जब ऐसा प्रेम समष्टि से हो जाता है, तब उसे विश्व प्रेम की सत्ता मिल जाती है । इस प्रेम के लिए स्वयं को मिटाना आवश्यक है । जो कठीनतम कार्य है । हम तो स्वयं को भरने और बनाने में लगे रहते हैं । इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं है, कि हमारे जीवन राग,लालसा और आसक्ति से भरे हों तथा प्रेम से रहित । और जहां प्रेम नहीं वहां दुख है । प्रेम से उदात्त आनंद से बढ़कर निर्दोष और दिव्य कोई दूसरी अनुभूति नहीं है । इस सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ प्राणी के अनुभव में प्रेम ही सर्वश्रेष्ठ अनुभव है । प्रेम की गहराइयों में ही उसकी चेतना पदार्थ का अतिक्रमण करती है और प्रभु के द्वार पर उपस्थित होती है । प्रेम ही प्रभु का द्वार है । प्रेम है रहस्य और अबूझ । उसे मनुष्य जानता भी है और नहीं भी जानता, परंतु अनजाने ही उसका अनुभव होता है । प्रेम के समक्ष परमात्मा भी प्रत्यक्ष हो जाता है । इसी से प्रेम परम कला है और प्रेम ही परम प्रार्थना है और वही परमात्मा है ।

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