बुधवार, 19 अगस्त 2009

क्षणिका

जब-जब कुछ
माँगा
चाहा
इच्छा की
तब-तब कुछ
टूटा
छूटा
बिखरा
अब जब छूटा
माँगना
चाहना
पकड़ना
तब सब घटा
अनघटा !!!

4 टिप्‍पणियां:

  1. ख्याल आते रहे
    सोहबत में
    ज़रुरत के
    ज़िन्दगी गुज़रती रही

    इशारों को कैसे
    जुबां दे दें हम
    मोहब्बत बच जाए
    दुआ निकलती रही

    रेत के बुत से
    खड़े रहे सामने
    पत्थर की इक नदी
    गुज़रती रही

    रूह थी वो मेरी
    लहू-लुहान सी
    बदन से मैं अपने
    निकलती रही

    बेवजह तुम
    क्यों ठिठकने लगे हो
    मैं अपने ही हाथों
    फिसलती रही

    आईना तो वो
    सीधा-सादा था 'अदा
    मैं उसमें बनती
    संवरती रही

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  2. मैं आपकी यह
    रचना पढ़ गया था
    लेकिन -
    रूह थी वो मेरी
    लहू-लुहान सी
    बदन से मैं अपने
    निकलती रही
    इन भावों को
    अभी समझ पा
    रहा हूँ ।

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  3. आपकी पढने में छोटी , छोटी , लेकिन बड़ी ही गहरी , रचनाएँ पढ़ रही हूँ ..पहली बार आयी हूँ आपके ब्लॉग पे ...और विस्मित हूँ !

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