गुरुवार, 20 अगस्त 2009

वह

वह
मेरी सांसों में बसता है
मेरे होंठों से झरता है
मेरी आंखों से देखता है
मेरे कानों से सुनता है
मेरी जिह्वा से स्वाद लेता है
मेरे हाथों से लिखता है
फिर भी ...
वह मुझ से दूर है
क्योंकि -
मैं हूँ !!!
मेरा है !!!
मेरी है !!!

3 टिप्‍पणियां:

  1. भारती जी,
    आपकी इस कविता का रहस्योदघाटन मैं नहीं कर पायी....कल भी पढ़ा...आज भी...
    लेकिन शायद यह मेरी मेधा से परे होगी.....

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  2. अदा जी !!!
    प्रणाम, सर्वप्रथम तो मैं कहना चाहूँगा कि आप बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं । आप में जहां भावों का समुन्द्र है, वहीं आपकी वाणी इन भावों को मधुर स्वर भी दे रही है ।

    इस कविता का रहस्य इतना है कि हमारे माध्यम से जो देखता है, सुनता है,स्वाद लेता है और अनुभव करता है, हम खुद उसकी उपेक्षा करते हैं ? क्या आपने महसूस नहीं किया जब आप गा रही होती हैं, तो आपके भीतर कोई आपके ही शब्दों को सुन रहा है, लेकिन उसके बारे में हमें कुछ अधिक ज्ञात नहीं । क्योंकि हमने अपने नाम, काम और शरीर को ही स्व समझ लिया है । जब हम इन बाह्य चीजों को ही अपना होना स्वीकार कर लेते हैं, तो वह साक्षी (जो सबका गवाह है)हमसे दूर हो जाता है । इन्हीं भावों को उकेरा है इन शब्दों में ।

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  3. भारती जी,
    प्रणाम,
    जी हाँ, अब मैं समझ पाई हूँ....
    यह सत्य है ...वह हर पल साथ ही होता है ..अंतःकरण ....जिसकी उपेक्षा न मालूम हम कितनी बार कर जाते हैं....फिर भी वह जीवित रहने की और हमें सत-मार्ग पर ले जाने कि चेष्टा करता ही रहता है...तब तक जब तक वह मर नहीं जाता......या फिर हम उसे मार नहीं डालते....
    बहुत ही सुन्दर कविता...विस्मित सी रह जाती हूँ जब अर्थ समझ जाती हूँ...आपके मन की उड़ान कहाँ तक जाती है ? अब तो मैं शब्दों से कंगाल होने लगी हूँ....

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