मंगलवार, 11 अगस्त 2009

आकर्षणों में वास्तविक लक्ष्य से न भटकें

एक यात्री एक निर्जन पहाड़ी स्थल से गुजर रहा था । अचानक उसने देखा कि सामने से एक पागल, मदमस्त हाथी बड़ी तेजी से उसकी ओर बढ़ा आ रहा है । उसे देख कर यात्री विपरीत्त दिशा में भागने लगा । हाथी भी उसके पीछे भागने लगा । यात्री ने अपनी गति दुगुनी कर दी । लेकिन हाथी पीछा नहीं छोड़ रहा था । भागते-भागते वह पहाड़ी की कगार पर पहुँच गया, जहाँ से आगे गहरी खाई थी । लेकिन पागल हाथी उसकी ओर अभी भी बढ़ा आ रहा है । स्वयं को हाथी से बचाने के लिए वह एक लता के सहारे खाई में कूद गया । लता कमजोर है, जो अधिक समय तक उसका भार सहन नहीं कर सकती । हाथी अब भी उसके इंतजार में पहाड़ी के किनारे खड़ा है । यात्री ने देखा कि दो चूहे लता की जड़ों को कुतर रहें हैं । एक चूहा दिन की तरह सफेद है और दूसरा रात की तरह काला । जल्दी ही वे अपना काम पूरा कर लेंगे । किनारे पर ही एक बड़े वृक्ष पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा है, जिससे बूँद-बूँद मधुर मधु टपक रहा है और वह रिसता हुआ मधु यात्री के मुख पर गिर रहा है । यात्री ने उस मधु के लिए अपना मुँह खोला और रिसते मधु का रसस्वादन करने लगा । मधु के स्वाद में पड़ा यात्री निकट खड़ी मौत भूल गया । साक्षात काल रूपी हाथी, दिन और रात की भांति उसके जीवन को नष्ट करने वाले चूहे, ये सब मधुर मधु के आकर्षण में बँधे उस यात्री के लिए विस्मृत हो गए । वह अपना सही लक्ष्य भूल गया ।

उसका क्या अंत हुआ होगा, यह हम समझ सकते हैं ? कहीं संसार के बाह्य आकर्षणों में बँधे हम जीवन के सही लक्ष्य को तो नहीं भूल रहे ?

यह कथा महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों से अक्सर कहा करते थे ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मानव जीवन के यथार्थ की ओर इंगित करती हुई अतिसुन्दर लघु-कथा..
    ह्रदय की बहुत भायी..

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  2. धन्यवाद !!!
    ऐसी ही अन्य रचनाएँ पढ़ने के लिए अपनी दृष्टि बनाए रखिए ।

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