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बाहर-भीतर का द्वंद्व और चित्त का रुपांतरण


आज मनुष्य के विकास में एक अद्भूत विरोधाभास दिखाई देता है । जहां एक ओर भौतिक तल पर समृद्धि और प्रगति अनुभव होती है, वहीं इस भौतिक समृद्धि और प्रगति के साथ-साथ ही आत्मिक तल पर ह्तास और पतन भी दिखाई पड़ता है । अत: वे लोग भी ठीक हैं जो कहते हैं कि मनुष्य निरंतर उन्नत हो रहा है और वे लोग भी ठीक हैं जिनकी मान्यता है कि मनुष्य का प्रतिदिन पतन होता जा रहा है । हम दोनों को ठीक इसलिए कहते हैं कि भौतिकवादी अपनी दृष्टि से आधुनिक मनुष्य को देखते हैं और आध्यात्मवादी अपनी दृष्टि से । कठिनाई यह है कि दोनों यह अनुभव नहीँ करते कि उनकी दृष्टि एकांगी है । भौतिक विचारधारा वाले तो, आत्मिकतल जैसी कोई चीज है, इसे जानते तक नहीं हैं । और आध्यात्मिक विचारधारा वाले इस सारी समृद्धि और प्रगति को निरर्थक मानते हैं । विचारणीय यह हो गया है कि विरोधी दिशाओं में खिंच रही मानव की यह स्थिति कहीं उसका अंत ही न कर दे । यह घटना असंभव घटना नहीं है । यह इसलिए है कि यदि हम भौतिकतल की उन्नति में ही लगे रहे और हमारा अंतस जैसा अभी है, वैसा ही रहा, तो यह सारी भौतिक समृद्धि नष्ट हो सकती है । भीतर रुग्णता हो और बाहर स्वस्थता दिखाई पड़े, तो किसी भी क्षण दुर्घटना घटित हो सकती है । जिस ह्रदयरोग का आजकल बाहुल्य हो गया है, उसमें बाहरी स्वस्थता ही दिखाई पड़ती है । परंतु बाहर का स्वास्थ्य अच्छा दिखते हुए भी, यह ऐसा रोग है जो क्षण भर में सारी स्वस्थता समाप्त कर व्यक्ति का नाश कर देती है । बाहर संपदा दिखाई पड़े और भीतर पास में कुछ भी न हो, तो दिवालियापन कभी भी प्रकट हो सकता है । बाहर विकास हो और भीतर ह्तास तो भविष्य के संबंध में आशावान नहीं हुआ जा सकता । बाह्य और अंतस के तनाव से बड़ा और कोई तनाव संभव नहीं है। इससे बड़ी न तो कोई अशांति हो सकती है और न ही कोई आत्मवंचना । हम कब तक अपने आप को धोखा देते जाएंगे । हर धोखे के टूट जाने का समय आता है और भौतिक समृद्धि के रहते हुए अंतस् की इस शून्यता के कारण जिस धोखे की स्थिति में हम रह रहें हैं, उस धोखे के टूटने का समय निकट है । अंतस की यह स्थिति ही भौतिक समृद्धि के बढ़ते रहने पर चारों ओर अनैतीकता और अमानवीयता बढ़ा रही है । जिसे सच्ची धार्मिकता कहते हैं, वह नष्ट हो गई है । इस स्थिति में प्रतिक्षण पैदा हो रहे छोटे-बड़े दुष्परिणाम क्या हमें सजग कर देने को यथेष्ट नहीं हैं ? क्या संपत्ति और समृद्धि के बीच भी तीव्र संताप की मन: स्थिति और चिंता की ज्वाला का ताप हमें जगा देने को पर्याप्त नहीं है ?
व्यक्ति के तल पर ही नहीं, समाज और राष्ट्रों के तल पर भी फैला हुआ विद्वेष, घृणा और हिंसा और आए दिन होते हुए विस्फोट, घातक युद्ध भी क्या हमारी निद्रा को नहीं तोड़ सकेंगे ?विगत शताब्दी में दो महायुद्धों में कोई दस करोड़ लोगों की हत्या हुई । जहां-जहां युद्ध की विभीषिका फैली थी, वहां-वहां युद्ध के पश्चात जीवित जन-समुदाय ने अगणित कष्ट पाए । इतनी बड़ी हिंसा और दुर्दशा का जन्म निश्चित ही हमसे हुआ है । हम ही इसके लिए उत्तरदायी हैं । हम जैसे हैं, उसमें ही उसके बीज मौजूद हैं । ये युद्ध केवल राजनीतिक या आर्थिक स्थिति के ही परिणाम नहीं थे । मूलत: और अंतत: तो सब कुछ मानव के मन से संबंधित होता है । ऊपर से इस प्रकार की घटनाएं चाहे राजनीतिक दिखें या आर्थिक , किंतु गहरे में तो सभी कुछ मानसिक रहता है । समाज में ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके मूल कारण व्यक्ति के मन में न खोजे जा सकें । वस्तुत: समाज व्यक्तियों के जोड़ के अतिरिक्त और क्या है ? जो चिंगारियां व्यक्ति के मन में अत्यंत छोटे रूप में दिखाई पड़ती हैं, वे ही तो समूह की सामूहिकता में विकराल अग्निकांड बन जाती हैं ।


व्यक्ति की आत्मा में ही यथार्थ में समूह का सारा स्वास्थ्य या रुग्णता छिपी रहती है । आत्म विपन्न व्यक्ति स्वस्थ समाज के निर्माता नहीं हो सकते । दुखी, संतापग्रस्त ईकाइयां किसी भी भांति आनंदपूर्ण और शांतचित्त समाज की घटक कैसे हो सकती हैं ? ऐसा कोई भी चमत्कार संभव नहीं है कि जो तत्व के किसी भी अंश-रूप में, इकाई में उपस्थित न हो और वह पूर्ण जोड़ में आ जाए । जो समूह में और जोड़ में दिखाई पड़ता हो, मानना होगा कि वह अपने अंश-रूप में अति सूक्ष्म रूप से अवश्य ही मौजूद रहता है । इसलिए केवल ऊपर-ऊपर या उथला देख कर ही मानवीय जीवन की किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता । उथले में समूह ही पकड़ में आता है, गहरे जाने पर व्यक्ति उपलब्ध होता है । जहां समस्या का जन्म है, वहीं समाधान भी खोजना होगा । केवल तभी समाधान और कहना चाहिए वास्तविक समाधान होगा । अन्यथा जिसे हम समाधान मानते हैं, वह और कई दूसरी नई समस्याएँ खड़ी कर देता है । जैसे युद्ध को मिटाने के लिए या शांति पाने के लिए, उथली दृष्टि युद्ध का ही समाधान प्रस्तुत करती है । आज तक जितने युद्ध लड़े गए वे अन्याय का निराकरण करने और न्याय की स्थापना करने के उद्देश्य से ही लड़े गए । यह सदा कहा गया है । परंतु जिसे अन्याय कहा जाता था, न युद्ध से उस अन्याय का निराकरण हुआ और जिसे न्याय कहा जाता था, न उस न्याय की स्थापना हुई । इस प्रकार भ्रांत तर्क के आधार पर हजारों वर्षों से मनुष्य लड़ता रहा है । लेकिन कोई भी युद्ध न अन्याय का निराकरण कर सका और न न्याय की स्थापना । फिर शांति तो वह स्थापित कर ही कैसे सकता था ? जो युद्ध शांति का विरोधी है, उससे शांति की स्थापना !!! अनेक युद्धों को तो धर्मयुद्ध तक कहा गया है । कोई युद्ध भी धर्म युद्ध हो सकता है ? युद्ध शांति का जनक न होकर नए युद्धों का ही जन्मदाता होता है और नया युद्ध पुराने युद्ध से भीषणतर होता है । पश्चिम में जहां सर्वप्रथम सभ्यता का विकास हुआ उस यूनान के ऐथेन्स और स्पार्टा के युद्धों में वीरगति प्राप्त करने वालों की संख्या कितनी और उस यद्ध के आयुध कैसे थे ? पूर्व में भारतीय महाद्विप में महाभारत युद्ध में कितना नरसंहार हुआ था और उसमें भी किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग किया गया था ? पिछली शताब्दी के दो विश्वयुद्धों के नरसंहार और आयुधों का इन प्राचीन युद्धों से मिलान किया जाए । और अब तो अणुबम और हाइड्रोजन बम तक हम पहुंच गए हैं । यदि तीसरा महायुद्ध हुआ और युद्ध में इन आयुधों का उपयोग किया गया तो विश्व की मानवता की क्या स्थिति रहेगी ? इस संबंध में बड़े से बड़ा भविष्य वक्ता भी कोई ठीक भविष्यवाणी करने में असमर्थ है । ऐसे ही जीवन की अन्य समस्याओं के भी हमारे समाधान हैं । अपराध को मिटाना है, तो दंड और फांसी है। किंतु हजारों वर्षों तक दंड देने पर भी, अपराध मिटा नहीं, वह बढ़ता गया और विकराल रूप लिए खड़ा है । इतने पर भी हमारी आंखें नहीं खुलती और हम सतह पर ही इलाज किए चले जाते हैं, जबकि बीमारी गहरी है और भीतर है । शोषण मिटाने के लिए हिंसात्मक क्रांतियां हुई, जबकि शोषण भी हिंसा ही है । तो वह हिंसा से कैसे मिटाया जा सकेगा ? हिंसा से जो क्रांतियां हुई, उनसे क्या कहीं कोई शोषण मिट पाया है ? इस प्रकार की क्रांतियों का परिणाम यह होता है कि शोषक तो बदल जाते हैं, किंतु शोषण बना रहता है ।


व्यक्ति के अंतस्तल के परिवर्तन के बिना कोई परिवर्तन वास्तविक परिवर्तन नहीं हो सकता । व्यक्ति के ह्रदय में समृद्धि आनी चाहिए । वहां की दरिद्रता, दीनता और रिक्तता मिटनी चाहिए । वहां दुख, चिंता और संताप का अंत होना चाहिए । जब तक उस गहराई में आलोक, प्रेम और आनंद का आविर्भाव न होगा, तब तक जीवन को शांत और सुखी बनाने के सब उपाय व्यर्थ होंगे । क्या केवल भौतिक तल की समृद्धि यह कर सकती है ? केवल बाह्य समृद्धि और बाह्य विकास उस अवस्था को देने में असमर्थ है । मनुष्य की आंतरिकता भी विकसित होनी चाहिए । चीज़ों का बढ़ता जाना ही पर्याप्त नहीं है, ह्रदय भी बढ़ना चाहिए । वस्तुओं की पारिमाणिकता ही नहीं, मनुष्य की गुणात्मिकता भी बढ़नी चाहिए । मनुष्यता की वृद्धि जितनी अधिक होगी, उतनी ही अधिक समस्याएं कम हो जाएंगी । क्योंकि हमारी अधिकांश समस्याएं हमारे भीतर जो पाशविकता है, उससे ही उत्पन्न होती हैं । आज हम इस पाशविकता की अभिव्यक्ति के लिए ही अधिकतर नए-नए उपाय खोजते हैं । फिर चाहे वे राष्ट्रों के नाम पर हों, चाहे सिद्धांतों के नाम पर, चाहे वादों के नाम पर । अच्छे-अच्छे शब्दों की आड़ में हम अपने बुरे से बुरे रूप को प्रकट करते रहते हैं । शब्द तो बहाने हैं, उन्हें कोई समस्याएं न समझे । जो उन्हें समस्याएं समझ लेता है, वह समाधान तक कभी न पहुंच सकेगा । समस्या शब्दों की नहीं, चित्त की है । प्रश्न युद्ध का नहीं, युद्ध करने वाले मन का है । वह मन जो संघर्ष, विप्लव युद्ध करना चाहता है, वह एक बहाना न मिलने पर दूसरा बहाना खोज लेगा । इसलिए हम बहाने को बदलते जाते हैं । परंतु अशांति बनी रहती है । जो चित्त इसाईयत और इस्लाम के नाम पर या हिंदु या बोद्ध के नाम पर लड़ता था, वही चित्त साम्यवाद और जनतंत्र के नाम पर लड़ सकता है । लेकिन लड़ाई वही की वही है । इस स्थिति को बदलना हो तो चित्त को बदलना आवश्यक है ।

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